Jai Maa Gayatri

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Jai Maa Gayatri Spiritual.

ऋषि चिंतन*********अध्यात्मवादी भावनाशील होता है!***************************सबसे बड़ा और सबसे प्रथम "विभूतिवान" व्यक्ति व...
07/09/2026

ऋषि चिंतन
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अध्यात्मवादी भावनाशील होता है!
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सबसे बड़ा और सबसे प्रथम "विभूतिवान" व्यक्ति वह है, जिसके "अंतःकरण" में "उत्कृष्ट" जीवन जीने और "आदर्शवादी" गतिविधियाँ अपनाने के लिए निरंतर उत्साह उमड़ता है। ऐसा साहस उत्पन्न होता रहता है जो लोभ, मोह के भवबंधनों के रोके रुक ही न सके। व्यक्तिगत वासना, तृष्णा के जाल-जंजाल में ही आमतौर से नर-पशुओं की क्षमताएँ गलती- जलती रहती हैं। आमतौर से लोग परिवार वालों की "मनोकामनाएँ" पूरी करते रहने में जुटे खपे रहते हैं। इस चक्रव्यूह को वेध सकना उन्हीं के लिए संभव है, जिनके भीतर आत्मबोध का आलोक प्रस्फुटित होने लगे। "भावनाशील" व्यक्ति ही ऐसा साहसपूर्ण निर्णय करते हैं कि निर्वाहमात्र के साधनों में संतोष करें और परिवार को उतना ही संपन्न बनाने तक अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मानेंगे, जितने में कि अपने समाज के औसत नागरिक को जीवनयापन करना पड़ता है। "भावनाशीलता" को दिव्यविभूति की सार्थकता के लिए इस प्रकार का साहसिक निर्णय नितांत आवश्यक है; अन्यथा परमार्थ के लंबे-चौड़े सपने मात्र कल्पना ही बनकर रह जाएँगे। अध्यात्मवादी, धर्मपरायण, त्यागी, तपस्वी, परमार्थी, संत-सुधारक, ब्रह्मपरायण महामानव स्तर के देवपुरुष वही हो सकते हैं, जिन्हें भावना की विभूति भगवान ने दी हो। कृपण और संकीर्ण लोगों को इस प्रकार का सौभाग्य मिल ही नहीं सकता। स्वार्थपरता का पिशाच उन्हें कुछ करने ही नहीं देता। यदि उसकी पकड़ से एक कदम आगे बढ़ा भी जाए तो वह दूसरे बाड़े में और भी अधिक मजबूत रस्सों से पकड़कर जकड़ देता है। सांसारिक लोभ-मोह से ऊँचा उठकर त्याग- परमार्थ की बात सोचने वाले लोग भी प्रायः एक कदम ही चलने के बाद फिर औंधे मुँह गिर पड़ते हैं। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, चमत्कार, पूजा-प्रतिष्ठा जैसे व्यक्तिगत लोभ-लाभ ही फिर नए रूप में मार्ग को घेरकर खड़े हो जाते हैं। "स्वार्थी" मनुष्य इस लोक की संपदा के बदले "परलोक" की संपदा चाहने लगता है। यह विशुद्ध रूप से सट्टेबाजी है। छिटपुट दान-पुण्य करने वाले स्वर्ग में आलीशान भवन और अजस्रवैभव पाने के लिए दांव लगाते हैं। "स्वार्थ" पूर्ति के बिना चैन नहीं, संसार के पैसे का लोभ घटा तो "स्वर्ग" के "ऐश्वर्य" का लालच सिर पर सवार हो गया।" ।कोल्हू के बैल की दिशा भर बदली, घेरा ज्यों का त्यों ही रहा । चक्कर जैसे का तैसा ही लगता रहा ।

व्यक्तित्व निर्माण और नवनिर्माण पृष्ठ-०६
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

ऋषि चिंतन**********कष्टों से न घबरावें**************कष्टों का स्वरूप अप्रिय है, उनका तात्कालिक अनुभव कड़ुआ होता है, अंततः...
07/09/2026

ऋषि चिंतन
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कष्टों से न घबरावें
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कष्टों का स्वरूप अप्रिय है, उनका तात्कालिक अनुभव कड़ुआ होता है, अंततः वे जीव के लिए "कल्याणकारी" और "आनंददायक" सिद्ध होते हैं । उनसे दुर्गुणों के शोधन और सदगुणों की वृद्धि में असाधारण सहायता मिलती है । आनंदस्वरूप, आत्म प्रकाशमय जीवन और सुखमय संसार में कष्टों का थोड़ा स्वाद परिवर्तन इसलिए लगाया गया है कि प्रगति में बाधा न पड़ने पाए । घड़ी में चाबी भर देने से उसकी चाल फिर ठीक हो जाती है, हारमोनियम में हवा धौंकते रहने से उसके स्वर ठीक तरह बजते हैं, पैडल चलाने से साइकिल ठीक तरह घूमती है, अग्नि की गर्मी से सूखकर भोजन पक जाते हैं । थोड़ा सा कष्ट भी जीवन की सुख वृद्धि के लिए आवश्यक है ।संसार में जो कष्ट है वह इतना ही है और ऐसा ही है, किंतु स्मरण रखिए जितना भी थोड़ा-बहुत दुःख है, वह हमारे अन्याय का, अधर्म का, अनर्थ का फल है । आत्मा दुःख रूप नहीं है, जीवन दुःखमय नहीं है और न संसार में ही दुःख है ।

आप दुःखों से डरिए मत । घबराइए मत, कांपीए मत, उन्हें देखकर चिंतित या व्याकुल मत हूजिए वरन सहन करने को तैयार रहिए । कटुभाषी किंतु सच्चे सहृदय मित्र की तरह उससे भुजा पसारकर मिलिए । वह कटु शब्द बोलता है, अप्रिय समालोचना करता है, तो भी जब जाता है तो बहुत सा माल खजाना उपहार स्वरूप दे जाता है ।बहादुर सिपाही की तरह सीना खोलकर खड़े हो जाइए और कहिए कि "ऐ आने वाले दुःखों! आओ !! ऐ मेरे बालकों, चले आओ !! मैंने ही तुम्हें उत्पन्न किया है, मैं ही तुम्हें अपनी छाती से लगाउँगा ।दुराचारिणी वेश्या की तरह तुम्हें जार पुत्र समझकर छिपाना या भगाना नहीं चाहता वरन सती साध्वी के धर्मपुत्र की तरह मेरे आँचल में सहर्ष क्रीड़ा करो । मैं कायर नहीं हूँ, जो तुम्हें देखकर रोऊँ, मैं नपुंसक नहीं हूँ, जो तुम्हारा भार उठाने से गिड़गिड़ाऊं, मैं मिथ्याचारी नहीं हूँ, जो अपने किए कर्म का फल भोगने से मुँह छिपाता फिरूँ । मैं सत्य हूँ, शिव हूँ, सुंदर हूँ, आओ मेरे अज्ञान के कुरूप मानस पुत्रों ! मेरी कुटी में तुम्हारे लिए भी स्थान है । मैं शूरवीर हूँ, इसलिए हे कष्टों ! तुम्हें स्वीकार करने से मुँह नहीं छिपाता और न तुमसे बचने के लिए किसी की सहायता चाहता हूँ । तुम मेरे साहस की परीक्षा लेने आए हो, मैं तैयार हूँ, देखो गिड़गिड़ाता नहीं हूँ, साहसपूर्वक तुम्हें स्वीकार करने के लिए छाती खोले खड़ा हूँ ।

पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

महाप्रज्ञा का युगशक्ति के रूप में अरुणोदय*********************************--पं. श्रीराम शर्मा आचार्य********************...
07/09/2026

महाप्रज्ञा का युगशक्ति के रूप में अरुणोदय
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--पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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आद्य शक्ति गायत्री अब युगशक्ति बनने जा रही है। प्रायः इस महामन्त्र का उपयोग अन्तराल के सुधार परिष्कार हेतु किया जाता है। व्यक्तित्व को पवित्र और प्रखर बनाने में उसकी शिक्षा का असाधारण उपयोग है। इतने कम अक्षरों का इतना छोटा, इतना सारगर्भित धर्म शास्त्र, तत्त्व दर्शन संसार में कहीं कोई दूसरा है नहीं। उसके एक-एक अक्षर में जीवन के हर क्षेत्र में प्रयुक्त हो सकने योग्य ऐसा सद्ज्ञान भरा पड़ा है, जिससे अध्यात्म चिन्तन और धर्म व्यवहार के दोनों ही पक्ष सधते हैं। गायत्री को त्रिवेणी कहा गया है। आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता रूपी तीन धाराओं का उसके तीन चरणों में समावेश हुआ है।

ज्ञान योग, कर्मयोग, भक्ति योग का-सत्यं शिवं सुन्दरम् का, सत् चित् आनन्द का जैसा संगम त्रिपदा में हुआ वैसा उदात्त चिन्तन से सम्बन्धित प्रतिपादन अन्यत्र नहीं देखा जा सकता। आत्म विज्ञान के क्षेत्र में उतरने पर उसकी त्रिविधि शक्तियाँ स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीरों को प्रभावित कर सकने की क्षमता से सम्पन्न हैं। उपासना, साधना और आराधना के रूप में उसका उपयोग प्रतिभा, प्रखरता और अभिवर्धन के लिए किया जाता है। साधक को ओजस्वी, मनस्वी और तेजस्वी बनने का अवसर मिलता हैं। अलंकारिक भाषा में त्रिपदा के तीन चरण ब्रह्मा-विष्णु के रूप में, सरस्वती, लक्ष्मी, काली के रूप मे प्रस्तुत किये गये हैं। तुलसीदास जी ने जिस त्रिवेणी संगम में स्नान करने का माहात्म्य काक होंहि पिक बकहुँ मराला के रूप में वर्णन किया है, उसे उसी आध्यात्मिक संगम के रूप में समझना चाहिए, जिसे त्रिपदा गायत्री कहते हैं। सिद्धि और स्वर्ग मुक्ति को इस महाशक्ति के अवगाहन से मिलने का माहात्म्य जिनने बताया है, उनने साथ-साथ यह भी कहा है कि शालीनतावादी क्रिया-प्रक्रिया दूरदर्शी विचारणा और आदर्शवादी आस्था की परिपक्वता इसी लोक में रहने वाले मनुष्यों में देवत्व का उदय कर सकती है। गायत्री को अमृत, पारस और कल्पवृक्ष इसी दृष्टि से कहा गया है कि उसके अवगाहन से मानवी सत्ता की तीनों परतें, चेतन, अचेतन और सुपर चेतन की, मन बुद्धि, चित्त की तीनों ही स्थितियाँ प्रभावित होती तथा निखरती हैं। फलतः इन तीनों विभूतियों से लाभान्वित होने में कोई संदेह नहीं रह जाता।

नित्य कर्म में गायत्री को अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया गया है। शास्त्रोक्त विधि से त्रिकाल संध्या करने पर उसका समावेश करना अनिवार्य है। शिखा को ज्ञान केन्द्र मस्तिष्क की ध्वजा कहा गया है और सूत्र यज्ञोपवीत के नौ धागों को सम्मिलित नौ अनुशासनों को कन्धे पर कर्म कौशल क्षेत्र का अंकुश माना गया है। गायत्री गुरुमन्त्र है जिसे देव संस्कृति में प्रवेश पाते समय सर्वप्रथम दिया और पढ़ाया जाता है।

यह गायत्री का व्यक्तिगत जीवन में व्यवहार हुआ। विश्व व्यवस्था में, समाज संरचना में भी महत्त्वपूर्ण प्रेरणा और दिशा दे सकने की क्षमता उसमें विद्यमान है। गायत्री सार्वजनीन है। उस पर किसी देश, धर्म, समाज, संस्कृति का एकाधिकार नहीं है। उसमें ‘वसुधैव कुटम्बकम्’ का सिद्धान्त कूट-कूट कर भरा है। साथ ही दूरदर्शी विवेकशीलता की कसौटी पर प्रत्येक प्रचलन से परामर्श को कसते रहने का निर्देश है

गायत्री का वाहन हंस इसी तथ्य का प्रकटीकरण करता है कि नीर क्षीर विवेक की क्षमता प्रखर रखी जाय और इस कसौटी पर बिना नवीन पुरातन का पक्षपात किये प्रत्येक प्रतिपादन को जागरूकता पूर्वक कसा जाय। महाप्रज्ञा का तात्पर्य ही यह है कि सत्य और तथ्य की कसौटी पर कसने के उपरान्त ही किसी कथन, प्रचलन को मान्यता दें। तात्कालिक लाभ में लुभाने वाली दुर्बुद्धि का परित्याग करते हुए दूरदर्शी विवेक के सहारे मात्र मोती ही चुना जाय, औचित्य ही अपनाया जाय। यही है हंस निर्धारण जिसे मनुष्यों में से राजहंस, परमहंस स्तर के व्यक्ति अपनाते और कृतकृत्य होते हैं।

अगला समय प्रज्ञा युग होगा। उसमें विवेक के सहारे ही सब कुछ सोचा, परखा और अपनाया जायेगा। प्रचलित कूड़े-कबाड़े में से मानव गरिमा के उपयुक्त आदर्शवादी शालीनता की कसौटी पर कसने के उपरान्त ही वे तथ्य अपनाये जायेंगे जो आने वाले समय में नियम अनुशासन के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकें। इन चौबीस अक्षरों में व्यक्ति और समाज से सम्बन्धित सभी तथ्यों का स्पर्श करने वाले सिद्धान्त विद्यमान हैं। इन्हें क्रमबद्ध सँजोकर भावी संसार की आचार संहिता बन सकती है। विश्व व्यवस्था का संविधान बनाना हो तो उसके लिए भी आवश्यक सूत्र गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों में हैं। उनकी विवेचना इस प्रकार की जा सकती है कि उसे सार्वभौम धर्म जैसी मान्यता मिल सके।

अगले दिनों बिखराव निरस्त करना होगा और मानवी गतिविधियों को एक दिशाधारा में बहने के लिए दबाया जायेगा। बौद्धिक, वैज्ञानिक और आर्थिक प्रगति ने सुविधा संवर्धन के साथ-साथ अगणित समस्याओं का घटाटोप संकट खड़ा किया है। इसका समाधान एकता, समता, शुचिता के त्रिविधि सिद्धान्तों को सर्वमान्य बनाने में ही संभव है। एक राष्ट्र भाषा, एक धर्मधारणा के आधार पर ही नवीन विश्व का अभिनव निर्धारण होगा। उसकी रीति-नीति क्या हो? दिशाधारा क्या रहे, इसका सूत्र संकेत अन्यत्र कहीं ढूँढ़ना न पड़ेगा। दूरदर्शी तत्त्वदर्शियों ने उसे गायत्री बीज मन्त्र में ‘गागर में सागर’ की तरह भर दिया है। उपासना क्षेत्र में भी किसी न किसी अवलम्बन की आवश्यकता पड़ेगी। तब सर्वश्रेष्ठ का चुनाव करने पर महाप्रज्ञा को स्थान बड़ी सरलता पूर्वक मिल सकता है।

धर्म सम्प्रदायों के वर्तमान जंजाल में से उबारने के लिए इसी राजमार्ग को अपनाया जा सकता है। भूमि सीमा और जाति वर्ग के नाम पर बटने वाली मनुष्य जाति को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के एक सूत्र में बाँधकर उस केन्द्र पर लाया जाना है, जिसमें सभी हिल-मिलकर रह सकें, मिल-बाँटकर खा सकें और हल्की-फुल्की हँसती हँसाती जिन्दगी जी सकें। ऐसा प्रज्ञायुग लाने में महाप्रज्ञा गायत्री की असाधारण भूमिका होगी। वह एक नये सद्ज्ञान को जन्म देगी, जिसके सहारे जन-जन का चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार उत्कृष्ट आदर्शवादिता का पक्षधर बन सके। इसी प्रकार वह एक विज्ञान को भी जन्म देगी जिसमें मानवी सत्ता के अंग अवयवों में सन्निहित अजस्र ऊर्जा भण्डार का नवयुग के अनुरूप साधन, सुविधा तथा गौरव गरिमा का समुचित उत्पादन कर सके। आत्म विज्ञान में सभी सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। उसमें वाक्, प्राण तथा संकल्प की तीन धारायें प्रस्तुत भौतिकी के ताप, शब्द और प्रकाश माध्यमों की तरह अनन्त वैभव के स्रोत उद्गम विद्यमान जो हैं।

इन दिनों सबसे विषम सामयिक समस्या है अदृश्य वातावरण में भरती जा रही विषाक्तता की। विकिरण प्रदूषण की भयावहता सर्वविदित है। इसके अतिरिक्त मानवी चिन्तन की भ्रष्टता और व्यवहार की दुष्टता ने प्रकृति को बुरी तरह रुष्ट कर दिया है। वह अभी भी अनेकानेक प्रकोप बरसाती है। भविष्य में उस क्षेत्र में और भी भयावह संकट उतरने की आशंका है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, तूफान, भूकम्प महामारी जैसे संकट प्रकृति प्रकोप स्तर के गिने जाते हैं। अन्तःविग्रहों, अपराधों की वृद्धि, दुर्बुद्धि जन्य दुरभिसंधि ही गिनी जाती है। लिप्सा और अहंता का समन्वय ही गृह युद्ध, सीमायुद्ध एवं महायुद्ध खड़े करता है। यह आशंका सम्भावनाएँ सामने ही मुँह बाए खड़ी हैं। इनके निराकरण में प्रत्यक्ष प्रयत्नों का उपयोग तो होना ही चाहिए। राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली विपन्नताओं का सूझ-बूझ और पराक्रम पूर्वक समाधान खोजा ही जाना चाहिए। उपचार प्रक्रिया के लिए प्रयत्नरत रहना ही चाहिए, किन्तु साथ ही एक बात और भी ध्यान में रखने योग्य है कि इतना करने पर भी अदृश्य दबावों का कुचक्र ऐसा है, जिसका निराकरण किये बिना भौतिक प्रयास उपचारों से ही गुत्थी पूरी सुलझने वाली नहीं है। इसके लिए कुछ ऐसा भी करना होगा, जिससे संव्याप्त विषाक्तता का परिमार्जन हो सके। यह प्रयोजन अध्यात्म उपचारों की सहायता से पूरे हो सकते हैं।

रावण राज्य समाप्त होने पर भी अदृश्य में संव्याप्त असुरक्षा समाप्त नहीं हुई। तब भगवान राम को दस अश्वमेधों की शृंखला चलानी पड़ी थी। महाभारत के उपरान्त भी अदृश्य क्षेत्र की विषाक्तता समाप्त न हुई तो भगवान कृष्ण ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। यह धर्मानुष्ठान उसी प्रकार अनेकानेकों के सहयोग से सम्पन्न हुए जैसे कि लंका युद्ध और महाभारत अगणित योद्धाओं के पराक्रम से अनेकानेक आयुधों के आधार पर लड़े गये। इससे पूर्व भी प्रत्येक अवतार के समय ऐसे ही सामूहिक धर्मानुष्ठान हुए हैं। सीता जन्म के लिए ऋषि रक्त संचय से घड़ा भरने की और देवताओं की संयुक्त शक्ति से दुर्गा अवतरण की कथा सर्वविदित है। गिरि गोवर्धन को उठाने और समुद्र सेतु बाँधने में भी उच्चस्तरीय आत्माओं के संयुक्त प्रयास को कार्यान्वित किया गया था। अन्यान्य अवतारों के समय भी आगे या पीछे ऐसे ही धर्मानुष्ठानों की आवश्यकता पड़ी है और वह तत्कालीन ऋषियों द्वारा पूरी की गयी है। विश्वामित्र का नरमेध यज्ञ, वाजिश्रवा का सर्वमेध यज्ञ उसी शृंखला की कड़ियाँ हैं।

शब्द शक्ति की महत्ता से सभी भली-भाँति परिचित हैं। गायत्री मन्त्र के अजपा या उच्चारित जप स्वरूप के माध्यम से जो ऊर्जा उद्भूत होती है, वह सामूहिक प्रयासों के रूप में सम्पन्न होने पर तो चमत्कृत कर देने वाली परिणति को जन्म देती है। गायत्री मन्त्र का सृष्टि का आदि से अन्त तक जितना उच्चारण हुआ है, उतना किसी और मन्त्र का नहीं हुआ। इसकी शब्द तरंगें अभी भी सूक्ष्म जगत में संव्याप्त हैं। समधर्मी गुणवाली शक्तियाँ एक दूसरे को सहज ही खींच बुलाती हैं। सामूहिक धर्मानुष्ठान के रूप में एक ही समय, एक साथ, एक चिन्तन से कई व्यक्ति एक साथ जब भावना करते हैं तो उसका प्रभाव शब्द स्फोट के रूप में, लेसर की मार के रूप में होता है। इस वैज्ञानिक पक्ष को ध्यान में रखते हुए ही प्रस्तुत समाधान हेतु ऐसे ही संयुक्त अनुष्ठान की आवश्यकता आ पड़ी है

इसके लिए नैष्ठिक उपासकों का बीस वर्षीय गायत्री अनुष्ठान पहले से ही चल रहा है। समस्या की गम्भीरता को देखते हुए दबाव और भी बढ़ाये जाने की आवश्यकता है। महाप्रज्ञा को अदृश्य वातावरण के परिशोधन में प्रयुक्त करने में तत्त्वदर्शियों का ध्यान अधिकाधिक मात्रा में केन्द्रित हो रहा है। इस दिशा में अभी और भी बड़े कदम उठाने की आवश्यकता पड़ रही है। तद्नुसार एक नया निर्धारण यह किया गया है कि परिवार के बीस लाख परिजन प्रातः सूर्योदय के समय जिस भी स्थिति में हों, काम छोड़कर पाँच मिनट गायत्री मन्त्र का मौन मानसिक जप करें। साथ ही सविता का ध्यान भी। संकल्प करें कि इस प्रयास से उद्भूत शक्ति अनन्त अन्तरिक्ष में बिखरेगी और संव्याप्त विषाक्तता का परिशोधन निराकरण सम्पन्न करेगी।

जो जहाँ जिस भी स्थिति में है, जूते उतारकर आँख बन्द करके यह ध्यान जप सम्पन्न करे। सूर्योदय का समय हर देश, प्रान्त का समय अलग-अलग होता है जो स्थानीय पंचांगों से जाना जा सकता है। जिनके पास घड़ियाँ हो वे उनके सहारे समय जान लें। जहाँ वैसा प्रबन्ध नहीं है वहाँ मुर्गे की बाँग जैसी मसजिद के अजान मन्दिर के शंख जैसी ध्वनि किसी केन्द्र स्थान पर शंख बिगुल आदि बजाकर इस शुभारम्भ की घोषणा की जा सकती है। प्रज्ञा परिजन इस साधना में स्वयं तो सम्मिलित हो ही, साथ ही यह भी प्रयत्न करें कि उनके परिवार तथा सम्पर्क के लोग भी इस न्यूनतम साधना को अपनायें। इसमें स्नान पूजा उपचार स्थान आदि का भी प्रतिबन्ध न होने से वह सर्व साधारण के लिए अति सरल भी है। थोड़ा प्रयत्न करने पर इसमें सम्मिलित होने वालों की संख्या करोड़ों तक पहुँच सकती है।

प्रज्ञा परिजनों की संख्या इन दिनों प्रायः बीस लाख है। पाँच मिनट में न्यूनतम जप साठ मन्त्रों का हो जाता है। बीस लाख को साठ से गुणा कर देने पर वह संख्या बारह करोड़ हो जाती है। लक्ष्य चौबीस करोड़ प्रतिदिन का है। इसके लिए ठीक दूने युग साधकों की आवश्यकता पड़ेगी। वर्तमान समय में से प्रत्येक अपने हिस्से का एक और जो नागा करेंगे उनके बदले का एक इस प्रकार दो और नये ऐसे युग साधक उत्पन्न करें जो प्रातःकाल पाँच मिनट की उपरोक्त साधना में संकल्प पूर्वक सम्मिलित हो। जो व्रत लें उसे निभायें। इसका विवरण रखने का उत्तरदायित्व स्वाध्याय मण्डल के संचालक को सौंपा जाय, जो किसी के द्वारा न करने की स्थिति से अवगत रहे और उस कमी की पूर्ति अन्य लोगों से कराता रहे। इस प्रयोजन के लिए वही इतने लोगों से उपरोक्त युग साधना कराने का उत्तरदायित्व उठायें। उनका एक कर्तव्य यह भी है कि अपने सम्पर्क क्षेत्र की जप संख्या की मासिक जानकारी शान्तिकुञ्ज हरिद्वार पहुँचाते रहें, जिससे यह पता चलता रहे कि प्रतिदिन चौबीस करोड़ जप के निर्धारण में कितनी कमी पड़ रही है या उसकी किस क्षेत्र में कितनी पूर्ति हो रही हैं।

सामूहिकता की शक्ति भौतिक क्षेत्र में बहुत कारगर सिद्ध होती है और उसका प्रतिफल हाथों-हाथ देखने को मिलता है। बुहारी, रस्सा, सेना, संयुक्त परिवार, झुण्ड, गिरोह, संगठन आदि उदाहरण यह बताते हैं कि बिखराव का केन्द्रीकरण कितना सशक्त होता है। आतिशी शीशे पर सूर्य किरणों का चमत्कार तत्काल आग लगने के रूप में सभी ने देखा है। प्रज्ञा परिजनों की उपरोक्त संयुक्त साधना परिस्थितियों के सुधार, परिष्कार में असाधारण भूमिका सम्पन्न करेगी। सिपाहियों की टुकड़ी यदि कदम मिलाकर एक ध्वनि उत्पन्न करे तो जिस लोहे के पुल पर से वह चल रही है, वह धँसक या गिर सकता है। पायल की क्रमबद्ध आवाज हाल की छत को गिरा सकती है। यह संयुक्त शब्द शक्ति का चमत्कार है। प्रज्ञा परिजन एक मन से एक उद्देश्य से एक प्रक्रिया अपनाकर एक समय में एक निर्धारण के अनुरूप साधना करें तो वह थोड़ी छोटी होते हुए भी इतना बड़ा प्रयोजन पूरा कर सकती है, जिससे विकृतियों, विषाक्तताओं का निराकरण हो सके और उसके स्थान पर उज्ज्वल भविष्य का, प्रज्ञा युग के अवतरण का सुनिश्चित आधार खड़ा हो सके।

इस विशिष्ट साधना का महत्त्व सभी प्रज्ञा परिजन गम्भीरता पूर्वक समझें और उसे कार्यान्वित करने में अपनी जागरूकता एवं तत्परता का परिचय दें। इस साधना को प्रज्ञा पुरश्चरण नाम दिया गया है तथा सभी परिजनों से उसे जन-जन तक व्यापक बनाने का अनुरोध किया गया है। युग परिवर्तन की इस बेला में आद्यशक्ति को युगशक्ति के रूप से प्रतिष्ठित होना है। परिजनों की नैष्ठिक परीक्षा का ठीक यही समय है।

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य, गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार

युगऋषि की अभिलाषा*******************बड़े आदमी नहीं, महान बने—***********************बड़े आदमी बनने की हविस और ललक स्वभाव...
07/09/2026

युगऋषि की अभिलाषा
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बड़े आदमी नहीं, महान बने—
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बड़े आदमी बनने की हविस और ललक स्वभावत: हर मनुष्य में भरी पड़ी है। उसके लिए किसी को सिखाना नहीं पड़ता। धन, पद, इंद्रिय सुख, प्रशंसा, स्वास्थ्य आदि कौन नहीं चाहता? वासना और तृष्णा की पूर्ति में कौन व्याकुल नहीं हैं? पेट और प्रजनन के लिए किसका चिंतन नियोजित नहीं है। अपने परिवार को हमने बड़े आदमियों का समूह बनाने की बात कभी नहीं सोची। उसे महापुरुषों का देव समाज देखने की ही अभिलाषा सदा से रही है। वस्तुत: महामानव बनना ही व्यक्तिगत जीवन का साफल्य और समाज का सौभाग्य माना जा सकता है।

मनुष्य जीवन की सार्थकता महामानव बनने में है। इसके अतिरिक्त आज की परिस्थितियाँ महामानवों की इतनी आवश्यकता अनुभव करती हैं कि उन्हीं के लिए सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई है। हर क्षेत्र उन्हीं के अभाव में वीरान और विकृत हो रहा है। वे बढ़ें तो ही विश्व के हर क्षेत्र में संव्याप्त उलझनों और शोक-संतापों का समाधान होगा। अपने परिवार का गठन हमने इसी प्रयोजन के लिए किया था कि इस खान से नर-रत्न निकलें और विश्व इतिहास का एक नया अध्याय आरंभ करें। युग परिवर्तन जैसे महान अभियान को उथले स्तर के व्यक्तियों द्वारा नहीं केवल उन्हीं लोगों से सम्पन्न किया जा सकता है जिनको महापुरुषों की श्रेणी में खड़ा किया जा सके।

अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ५५

अगले चरण की तैयारी—
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युग निर्माण के लिए अगले ही दिनों हमें अनेक रचनात्मक और संघर्षात्मक प्रक्रियाएँ, हलचलें आरंभ करनी पड़ेंगी। उसके लिए ऐसे कर्मठ, भावनाशील, प्रतिभाशाली और प्रबुद्ध व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी, जो अपना सारा जीवन ही इस पुण्य प्रयोजन के लिए समर्पित करें और सारी विचारणा एवं आकांक्षा उसी केन्द्र पर केन्द्रीभूत कर दें। अपने आपको और अपने संकीर्ण स्वार्थों को भूलकर विश्व मंगल के लिए अपने को उत्सर्ग करने में गर्व-गौरव का अनुभव करें। ऐसी प्रबुद्ध आत्माओं से रहित भारत भूमि नहीं है। वे हैं, उन्हें जगाया, उठाया और लगाया जाएगा।

अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६९, पृष्ठ ४

तपोनिष्ठों की जरूरत है—
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एक नया युद्ध हम लड़ेंगे। परशुराम की तरह लोक मानस में जमी हुई अवांछनीयता को विचार अस्त्रों से हम काटेंगे। सिर काटने का मतलब विचार बदलना भी है। परशुराम की पुनरावृत्ति हम करेंगे। जन-जन के मन-मन पर गहराई तक गड़े हुए अज्ञान और अनाचार के आसुरी झंडे हम उखाड़ फेकेंगे। इस युग का सबसे बड़ा और सबसे अंतिम युद्ध हमारा ही होगा, जिसमें भारत एक देश न होगा महाभारत बनेगा और उसका दार्शनिक साम्राज्य विश्व के कोने-कोने में पहुँचेगा। निष्कलंक अवतार यही है। सद्भावनाओं का चक्रवर्ती सार्वभौम साम्राज्य जिस युग अवतारी निष्कलंक भगवान् द्वारा होने वाला है वह और कोई नहीं विशुद्ध रूप में अपना युग निर्माण आंदोलन ही है।

महान संभावनाएँ हम उत्पन्न करेंगे। उसके लिए सच्चाई और सद्भावना भरे उत्कृष्ट तपोनिष्ठों की जरूरत है। इसी को इन दिनों विरजा और बीना जा रहा है।

अखण्ड ज्योति, मई १९७०, पृष्ठ ६०, ६१

जिसने जो माँगा वो पाया********************पूज्य गुरुदेव-माताजी दोनों एक ही थे। परम पूज्य गुरुदेव के स्थूल शरीर छोड़ने के ...
07/09/2026

जिसने जो माँगा वो पाया
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पूज्य गुरुदेव-माताजी दोनों एक ही थे। परम पूज्य गुरुदेव के स्थूल शरीर छोड़ने के बाद उनकी प्रत्यक्ष जिम्मेदारियाँ माताजी के कंधों पर आ गईं। उस समय उनके पास रहने वाले परिजन बताते हैं कि माताजी ने पूज्य गुरुदेव की कमी का अहसास नहीं होने दिया। उनमें पूज्य गुरुदेव की समस्त शक्तियाँ प्रारंभ से ही विद्यमान थीं, परंतु गुरुदेव के रहते तक उन्होंने इसका खास अहसास नहीं होने दिया। स्वयं को उनकी आड़ में छिपाये रखा। कभी-कभी आवश्यकता पड़ने पर परिजनों को उन्होंने उनका आभास भी कराया है। परंतु गुरुदेव के सूक्ष्म में विलीन होने के पश्चात् तो वे स्पष्ट रूप से सामने आईं। परिजनों को उन्होंने एहसास कराया कि वे गुरुदेव से भिन्न नहीं हैं। अर्धनारी नटेश्वर की तरह वे और गुरुदेव दोनों एक ही हैं।
जो भी उनके पास आया, वह निहाल हो गया। किसी को उन्होंने खाली हाथ नहीं लौटाया। अधिकतर लोग उनसे लौकिक चीजें ही माँगते रहे। जिस पर वे कभी-कभी खेद भी प्रकट करते थे। कहते कि मैं तो कठिन तप से कमाई आध्यात्मिक विभूतियाँ देना चाहता हूँ, पर हमारे बच्चे अभी तक बच्चे ही बने हुए हैं। लौकिक चीजें ही माँगते हैं। यह सब तो मेरे लिये टॉफी चॉकलेट बाँटने के समान है।
इसके अतिरिक्त किसी ने उनसे विद्या माँगी, किसी ने भक्ति। किसी ने पवित्रता तो किसी ने शक्ति भी। कोई-कोई भक्त तो शबरी, नरसिंह मेहता की नाईं उन्हें साक्षात् भगवान् मानते ही नहीं रहे अपितु दृढ़ विश्वास भी करते रहे। उन्होंने जब उनके दर्शनों की इच्छा की तो पूज्यवर ने उन्हें अपना स्वरूप भी दिखाया। जिसने जो माँगा वो पाया। उनके विषय में बस यही कहा जा सकता है-

‘तेरे दरबार की गुरुवर निराली शान यह देखी,
तुझे देते नहीं देखा, मगर झोली भरी देखी।’’
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बायना (हुंडी) तो भरना ही पड़ेगा
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श्री शिव प्रसाद मिश्र, शान्तिकुञ्ज
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श्री रघुवीर सिंह चौहान जी की बड़ी लड़की की शादी तय हो चुकी थी। चूँकि श्री चौहान जी मेरे साथ ही गुरुदेव व वंदनीया माताजी से परिजनों को मिलाने के कार्य में व्यस्त रहते थे, अतः हम लोग प्रायः ही उनसे पूछते रहते-
‘‘चौहान जी, लड़की की शादी की तैयारी हो गई?’’
वे कहते, ‘‘सब गुरुजी ठीक करेंगे।’’ शादी में मात्र दो माह का समय था। जब भी पूछते, उनका एक ही जवाब होता। ‘‘सब गुरुजी ठीक करेंगे।’’

अब शादी में मात्र चार-पाँच दिन ही बचे थे। चौहान जी पूर्ववत् ही अपने कार्य में लगे रहते। शादी की तैयारियों की बाबत पूछने पर अब भी उनका यही जवाब था। ‘‘सब गुरुजी ठीक करेंगे।’’ मैं किसी कार्यवश ज्वालापुर गया। अकस्मात् ही उनके घर पर नजर पड़ी। देखा, अरे! घर तो ज्यों का त्यों पड़ा है। न लिपाई-पुताई, न रंग-रोगन। चार दिन बाद शादी है लेकिन उसके एक भी लक्षण दिखाई नहीं पड़ रहे। मुझे चिंता हुई। आकर अन्य भाई-बहनों से चर्चा की। सोचा, अब गुरुजी-माताजी से कहे बिना काम नहीं चलेगा।

उस दिन भी चौहान जी से जब पूछा तो जवाब वही का वही। अब शादी में केवल तीन दिन शेष थे। मैंने पूज्य गुरुदेव से सब बात बताई। गुरुजी ने सारी बात सुनी। थोड़े गंभीर हुए, फिर बोले, ‘‘बेटा, बायना तो भरना पड़ेगा’’ उनकी बात सुनकर मुझे लगा कि ‘कहीं ये पूर्व जन्म के नरसिंह मेहता तो नहीं हैं, जो अपने कृष्ण को हुंडी चुकाने को विवश कर रहे हैं। प्रभु की लीला प्रभु ही जाने।’ मैं अभी सोच ही रहा था कि पूज्यवर का आदेश हो गया ‘‘बेटा, तू देख। सारी व्यवस्था कर।’’
मैंने नीचे आकर परम वंदनीया माताजी से परामर्श किया, उन्होंने भी सारी व्यवस्था हेतु स्वीकृति दे दी और अन्य परिजनों को भी सहयोग करने के लिये कहा।
हमने चौके से बर्तन आदि सभी आवश्यक सामग्री मेटाडोर में भरी और कुछ भाई-बहनों को साथ ले कर चौहान जी के घर पहुँचे। सावित्री जीजी चौके वाली कुछ बहनों को साथ लेकर गईं। उन सबने लिपाई पुताई से लेकर चौके की पूरी व्यवस्था सँभाली।

क्योंकि, बारात बहादराबाद से ही आनी थी, सो कितनी व्यवस्था करनी पड़ेगी, इसका पहले से ही अन्दाजा ले लिया जाय; यह सोचकर मैं समधी जी के यहाँ बहादराबाद चला गया। देखा तो मेरे नेत्र खुले के खुले रह गये। वे गाँव के मान्य ठाकुर थे। गाँव भर में उत्सव का माहौल था। वे उस समय पूरे गाँव को खाना खिला रहे थे। मैं कुछ देर रुका। फिर बात ही बात में पूछा, ‘‘कितनी बारात जायगी?’’ उत्तर मिला-‘‘पूरा गाँव तैयार है। एक हजार तो हो ही जायेंगे।’’ सुनकर मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम थी। निवेदन किया। यह तो बहुत ज़्यादा है। आपके समधी शायद सँभाल न सकें। कृपया, उन पर इतना बोझ न डालें। कुछ आदर्श की भी बात की। वे पहले पाँच सौ, फिर तीन सौ; अंततः बड़ी मुश्किल से डेढ़ सौ के लिये तैयार हुए। पर फिर भी तीन सौ बाराती हो ही गये थे। शायद इससे अधिक उनको भी नकारते न बन पड़ा हो।
ज्वालापुर आकर मैं किराना सामान लेने गया। यह सन् 77-78 की बात है। उस समय मैं 1345 रु. का किराने का सामान लाया। मिठाई गिनकर दो सौ पीस से कुछ ऊपर ही लिया था। तीन सौ बराती आए और लगभग तीन सौ ही घराती हो गये।

सावित्री जीजी, भारती अम्मा के जिम्मे चौके की सब व्यवस्था थी। फिर भी इतनी बड़ी व्यवस्था में जिससे जो बना पूरा सहयोग किया। श्री महेन्द्र शर्मा जी ने पूड़ी तली। श्री राम सहाय शुक्ला जी व मैं भी जो हाथ आया वही काम किया।

तीन दिन के अन्दर सब तैयारियाँ और व्यवस्था देखकर मुहल्ले वासी भी हैरान रह गये। सब के मुँह पर एक ही बात थी कि लक्ष्मी माँ का काम फटाफट होते सुना था पर देखा आज ही है।

मैं खुद आश्चर्य में था कि मैं जो किराना सामान लाया था, उसी में सब व्यवस्था कैसे पूरी हो गई? बारात की विदाई के बाद भी पूड़ी-सब्जी, लड्डू आदि बहुत बचा था। मानो माताजी स्वयं इसे पूर्ण करने आई थीं।

मिठाई तो मैं गिनकर लाया था। दो सौ, पर छः सौ लोगों में कैसे पूरी हो गई, मैं हैरान था। चौहान जी की भक्ति और गुरुवर की शक्ति के आगे हम सब नत मस्तक थे।
लड़की जब ससुराल गई और यहाँ की बातें वहाँ तक पहुँचीं, तो उसे चमत्कारी लड़की मानकर छः माह तक दूर-दूर से लोग उसे देखने आते रहे। इस प्रकार निष्ठा ने विजय पाई। भगवान को भक्त का बायना भरना पड़ा।

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्बेटे ! तू हमें इतना छोटा मत समझ कि तू शाखा का ...
07/09/2026

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्

बेटे ! तू हमें इतना छोटा मत समझ कि तू शाखा का काम करेगा तो ही हम तेरा काम करेंगे| इस प्रकार तो हम बनिया हो गये| बेटे ! ऐसा द्रष्टिकोण मत रख| तू कहता है कि गुरूजी आप हमारे बीबी को अच्छा कर दीजिए और हम आपको शाखा का काम करेंगे? बेटे ! यह तो डॉक्टर एवं मरीज़ की बात हो गई| डॉक्टर के पास मरीज जाता है, वह दवा देता है तथा मरीज उसके ऐवज में सौ रूपये दे देता है|

बेटे ! तू हमें ऐसा मत समझ| हम दुकानदार नहीं हैं| बेटे, हम ब्राह्मण हैं तथा हमारे भीतर दया एवं करुणा भरी है| हम तो समाज की सेवा करने को बाध्य हैं| हमारी जिम्मेदारी है कि यदि तू पीड़ित है तो हमें तुम्हारी सेवा करनी चाहिए| बेटे ! हम तुम्हारी सेवा अवश्य करेंगे| तुम भले ही यहाँ मत आना, हमारी शाखा का मत करना हम तो तुम्हारी सेवा अवश्य करेंगे|

हम चाहते हैं कि हमारे बेटे बड़े हो जाएँ| छोटे बच्चे हमेशा माँगते रहते हैं| बेटे ! माँगना बुरी बात नहीं हैं| हम आपको धमकाते भी रहते हैं, परन्तु हम देते रहते है| हम चाहते हैं कि आप जवान आदमी बन जाएँ ताकी हम आपको दे सकें तथा आप भी हमें सहयोग कर सकें|

बच्चा हमेशा माँगता है परन्तु वह घाटे में रहता है| उसको छोटी चीजें मिलती हैं| उसको गुब्बारा मिलता है, १० पैसे मिलते हैं| उससे उसका कोई ख़ास मकसद पूरा नहीं होता हैं| थोड़ी देर में गुब्बारे फूट जाते हैं| परन्तु बच्चा जब बड़ा हो जाता है तो वह अपनी तिजोरी की अलमारी की चाभी देता है और चेकबुक दे देता है तथा यह कहता है कि आपकी जब इच्छा हो तो खर्च कर लिया करना| जब वह बच्चा होता है तो उसे १५ पैसा दिया जाता है| जब बच्चा जिद करता है तो उसकी १० पैसे की तरक्की होती है तथा २५ पैसे मिलते है| परन्तु जब वही बच्चा बड़ा हो जाता है, तो बाप पूरी संपत्ति सौंप देता है|

पूज्यवर की अमृतवाणी-युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य

सच्चा श्राद्ध*********शांतिकुंज ऋषि चिंतन*****************श्राद्ध पक्ष चल रहा था। सन्त एक नाथ ने भी प्रचलित लोकरीति के अ...
07/09/2026

सच्चा श्राद्ध
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शांतिकुंज ऋषि चिंतन
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श्राद्ध पक्ष चल रहा था। सन्त एक नाथ ने भी प्रचलित लोकरीति के अनुसार अपने पितरों का श्राद्ध करने का निश्चय किया और कुछ ब्राह्मणों को नियत समय पर अपने यहाँ भोजन के लिये आमंत्रित किया।

सुबह से ही घर में श्राद्ध की रसोई बनने लगी। संत एकनाथ तथा उनकी धर्मपत्नी गिरिजा दोनों पवित्रता, स्वच्छता और सात्विकता का ध्यान रखते हुए षट्रस व्यंजन बना रहे थे। घी, दूध और मिष्ठानों की सुगन्ध घर से बाहर सड़क तक व्याप रही थी। उसी समय सड़क से कुछ महार परिवार गुजरे। शायद उन्हें कई दिनों से ठीक तरह खाना नहीं मिला था। पकवानों की सौंधी सुगन्ध उनकी नाक में से घुस कर क्षुधा को और भी भड़काने वाली सिद्ध हुई। लेकिन अपने नसीब में न जानकर वयस्क महारों ने तो भूख को दबाया, परन्तु बच्चों से रहा न जा सका। एक बच्चा बोल ही उठा-माँ कैसी मीठी महक आ रही है। अहा! कितने बढ़िया-बढ़िया पकवान बन रहे होंगे। काश ये हमें मिल सकें।”

“चुप रह मूर्ख! कोई सुन लेगा तो गालियाँ खानी पड़ेंगी कि निगूढ़ों ने हमारे पकवानों को नजर लगा दी।” बाप ने कहा। माँ एक गहरा निःश्वास छोड़ते हुए बोली-बेटा! हम लोगों की किस्मत में तो इन चीजों की गंध भी नहीं है। व्यर्थ में मन के लड्डू बाँधने से क्या लाभ।”

माता, पिता और बच्चों में चल रही ये चर्चायें संत एकनाथ जी के कानों में पहुँची। उनका हृदय द्रवित हो उठा। संत की साध्वी पत्नी गिरिजा भी इन बातों को सुनकर महार परिवार को घर में न्यौत लायी और उचित आदर सत्कार सहित उन्हें आसन पर बिठा कर तैयार हो रही रसोई परोसने लगी। महार स्त्री, पुरुष और बच्चे कई दिनों के भूखे थे, इधर पकवानों ने उनकी भूख और भी बढ़ा दी, सो सब तैयार रसोई उनके ही उदर में चली गयी। लेकिन खा-पीकर तृप्त हुए महार-परिजनों ने जिस हृदय से संत एकनाथ तथा गिरिजा को दुआयें दी उससे दम्पत्ति का अन्तस् प्रफुल्लित हो उठा। गिरिजा ने भोजन के बाद यथोचित दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया।

नियत समय पर न्यौते गये ब्राह्मण आये। बनायी गयी रसोई तो महारों के काम आ चुकी थी सो अब दुबारा भोजन तैयार करना पड़ रहा था। खाने में विलम्ब होते देखकर ब्राह्मणों से न रहा गया, वे कुड़कुड़ाने लगे।

संत ने कहा-”नाराज न होइये ब्राह्मण देव। रसोई तो समय से काफी पहले तैयार हो चुकी थी। परन्तु देखा भगवान सड़क पर भूखे ही जा रहे हैं। इसलिये उन्हें भोजन कराने में सारी रसोई चुक गयी।” विस्मित ब्राह्मण संत एकनाथ से पूरी घटना सुनकर आगबबूला हो उठे-”तो जिनके छूने से भी कुम्भीपाक लगता है उन्हें तुम भगवान कर रहे हो।” “वे भगवान ही तो हैं पूज्यवर! कण-कण में उनका वास है, प्राणिमात्र में वे रहते हैं। यदि वे ही भूखे जा रहे हों तो उन्हें तृप्त कर भगवान की सेवा का अवसर हाथ से जाने देने में क्या बुद्धिमानी है?”

इन वचनों ने पंडितों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया और वे बोले-”अरे! एकनाथ तुम्हारी बुद्धि तो भ्रष्ट नहीं हो गयी है। एक तो हमारे लिये बनाया भोजन अन्त्यज जनों को खिला दिया और दूसरे उन्हें भगवान सिद्ध का उनसे अपवित्र हुए घर में चौके-चूल्हे पर बना भोजन खिलाकर हमें भी भ्रष्ट करने पर तुले हो।”

संत एकनाथ उसी विनम्रता से अपनी बात कहते रहे परन्तु रूढ़िग्रस्त और दुराग्रही मन मस्तिष्क वाले ब्राह्मणों पर क्या प्रभाव होना था, उठ कर चल दिये। संत एकनाथ ने उन्हें रोका नहीं। माथे पर तिलक लगाये रेशमी वस्त्रधारी उन बहुरूपियों को उन्होंने विनयपूर्वक रवाना किया व सच्चे ब्राह्मण, हृदय से आशीर्वाद देकर गए। उस महार परिवार द्वारा छोड़ा भोजन दोनों पति-पत्नी ने भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया। यही सच्चा श्राद्ध था।

अखण्ड ज्योति जून 1987

👉 आत्मचिंतन के क्षण *******************🔷 आज भड़कीला शृंगार फैशन कहा जाता है और उसे कला, सुरुचि एवं सभ्यता का चिह्न कहकर प...
28/08/2026

👉 आत्मचिंतन के क्षण
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🔷 आज भड़कीला शृंगार फैशन कहा जाता है और उसे कला, सुरुचि एवं सभ्यता का चिह्न कहकर पुकारा जाता है। कहा और माना जो कुछ भी जाय वास्तविकता ज्यों की त्यों रहेगी। हमारे उठती उम्र के बच्चे और बच्ची इस पतन पथ पर कदम न बढ़ाएँ इसका ख्याल रखा जाना चाहिए। उत्तेजक शृंगार की जड़ में वासना का विकार स्पष्ट है इससे देखने वालों के मन में विक्षोभ उत्पन्न होता है। इसलिए हम सफाई से रहें, स्वच्छता पसंद करें, सादगी से रहें और सभ्य वेशभूषा धारण करें।

🔶 वर्तमान परिस्थितियों में प्रजनन कर्म में प्रवृत्त होने से पूर्व हर विवेकशील नर-नारी को हजार बार विचार करना चाहिए कि क्या वह सचमुच समुन्नत स्तर की संतान का निर्माण करने की मनःस्थिति और परिस्थिति में है? यदि नहीं, तो बुद्धिमत्ता इसी में है कि अपनी आर्थिक जननी की शारीरिक स्थिति को, बच्चों के भविष्य और देश की प्रगति को बर्बादी से बचाने के लिए संतानोत्पादन पर विराम लगाकर ही रखा जाय।

🔷 आज उस समय की उन मान्यताओं का समर्थन नहीं किया जा सकता जिनमें संतान वालों को सौभाग्यवान और संतानरहित को अभागी कहा जाता था। आज तो ठीक उलटी परिभाषा करनी पड़ेगी। जो जितने अधिक बच्चे उत्पन्न् करता है, वह संसार में उतनी ही अधिक कठिनाई उत्पन्न करता है और समाज का उसी अनुपात से भार बढ़ाता है, जबकि करोड़ों लोगों को आधे पेट सोना पड़ता है, तब नई आबादी बढ़ाना उन विभूतियों के ग्रास छीनने वाली नई भीड़ खड़ी कर देना है। आज के स्थित में संतानोत्पादन को दूसरे शब्दों में समाज द्रोह का पाप कहा जाय तो तनिक भी अत्युक्ति नहीं होगी।

✍🏻 पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

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