Jai Maa Gayatri

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Spiritual.

29/04/2026

मेरे हृदयेश्वर—गुरुदेव भगवान
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श्री रामचंद्र सिंह (धर्मचक्र, जिला छपरा, बिहार निवासी) की अनुभूतियों की दूसरी कड़ी इसमें दी जा रही है। इसमें शाँतिकुँज के शुभारंभ के समय के वे प्रसंग हैं, जो अति महत्त्वपूर्ण हैं। इससे एक सेवक की भक्ति एवं गुरुसत्ता की अलौकिक विभूति का परिचय मिलता है। यह आत्मकथा उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत है।

मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि सन् 1968 से 1972 तक सतत सारे भारतवर्ष के कार्यक्रम में भ्रमण करते हुए भी किस तरह परमपूज्य गुरुदेव शाँतिकुँज आने का समय निकाल लेते थे। मेरे कार्य संबंधी मार्गदर्शन हेतु वे क्षेत्र में जहाँ भी होते, वहाँ से मुझे पत्र भेजते रहते थे। हर पत्र में स्पष्ट निर्देश होता था कि अमुक तारीख को वे किस स्थान पर होंगे, अमुक पते पर निर्माण− कार्य की प्रगति की सूचना भेजने के निर्देश मिल जाते थे। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह होती थी कि हर पत्र के नीचे लिखा होता था, अपने पड़ोसियों से अच्छे संबंध बनाकर रखना।

एक बार गुरुदेव आए तो मैंने बताया कि इन दिनों महात्मा आनंद स्वामी आए हुए हैं। गुरुदेव भगवान मुझे साथ लेकर उनसे मिलने गए। खूब चर्चा व सत्संग, परस्पर विनोद आदि का क्रम चलता रहा। दो महापुरुषों के मिलन व पारस्परिक चर्चा के गहन प्रसंग आज भी मस्तिष्कपटल पर हैं। इस तरह और भी कोई महात्मा आते तो उनसे मिलने जाना होता था। मैं भी साथ रहता था।

परमपूज्य गुरुदेव जिससे भी मिलते, अपनी सज्जनता, सद्व्यवहार व विनम्रता की छाप उस पर छोड़ते थे। प्रारंभिक दिनों में जब नीचे के कमरे बिहारीलाल जी की देख−रेख में बन गए तो उनमें बिजली लेने की बात आई। गुरुदेव मुझे साथ लेकर कैलाशनगर के ठेकेदार के पास गए। उसे अभिवादन किया। वह 22 वर्ष का एक युवा था। बातचीत से इतना प्रभावित हुआ कि स्वयं मुझे साथ लेकर रुड़की अगले दिन गया, लाइन मंजूर हो गई व शाँतिकुँज में पहली बार बिजली आ गई। सन् 1970 की बात है। कैसा भी कठिन कार्य क्यों न हो, बिना किसी व्यवधान के वह आसानी से संपन्न हो जाता था। भगवान श्री के अगस्त 1968 में इस भूमि पर पदार्पण होते ही ज्वालापुर से सप्तसरोवर तक एक सिटी बस आरंभ हो गई थी। यह उनकी कृपा ही थी कि इससे इस क्षेत्र को अत्यधिक राहत मिली थी। इससे पूर्व आवागमन के साधन साइकिल या रिक्शा−ताँगा इत्यादि ही थे। सितंबर, 1969 से पूर्व हमें गंगाजल के लिए काफी दूर दो−ढाई किमी0 की दूरी पार कर जाना होता था। इसी माह गंगा में बाढ़ आई। सप्तसरोवर क्षेत्र में बड़े समीप से एक धारा बहने लगी। बाद में सरकार ने बाँध बना दिया व बड़े व्यवस्थित घाट बन गए। यह मानों उनकी अहैतुकी कृपा ही थी कि साक्षात् गंगा समीप से बहने लगी व बाद में सप्तसरोवर की मुख्य धारा यह बन गई। वैसे वे शाँतिकुँज को भी गंगा में बसा कहते थे। जब भी खुदाई होती, शालिग्राम समान पत्थर निकलते। यहाँ पानी मात्र डेढ़ फीट गहराई पर ही उपलब्ध था एवं गंगा जितना ही मीठा व बढ़िया जल था।

1972 में परमपूज्य गुरुदेव का बिहार का अंतिम यज्ञ कार्यक्रम (विदाई से पूर्व) ‘अखण्ड ज्योति) में प्रकाशित हुआ। मैंने अपने गाँव के लिए भी निवेदन किया था, पर उसका कहीं उल्लेख नहीं था। अपने छोटे−से गाँव में प्रयत्न−परिश्रम करके मेरी अनुपस्थिति में भी गाँव वालों ने मंदिर का निर्माण कर ही लिया था। पूर्णिमा से बक्सर के बीच मेरा गाँव यदुरामपुर (धर्मचक) पड़ता था। घंटाभर रुककर मेरे भगवान मेरे मंदिर में भी अपने करकमलों से प्राण−प्रतिष्ठा करे देते, यही मेरा मन बार−बार कह रहा था। मैं हरिद्वार से चलकर तुलसीपुर, गोंडा, जहाँ कार्यक्रम संपन्न हो रहा था, पहुँचा। पूज्यश्री ने हरिद्वार के समाचार पूछे, निर्माण−कार्य की गति पूछी एवं अकस्मात् आने की वजह जानी। मेरा निवेदन सुनते ही भगवान बोले, “रामचंद्र, अखण्ड ज्योति में क्या छपा है, उसे अलग रख दो। तुम्हारे गाँव की प्राण−प्रतिष्ठा हेतु हमने पहले ही तीन दिन का कार्यक्रम दे दिया है। तुम तीन वर्षों से हमारे सपने को पूरा करने में लगे हो। शाँतिकुँज की आधारशिला रख रहे हो।

क्या हम तुम्हारे लिए तीन दिन भी नहीं देंगे! तुम्हारे गाँव ही रहेंगे। तुम यज्ञ की चिंता मत करना। यज्ञ की तैयारी के लिए हमने रमेशचंद्र शुक्ला को पहले ही भेज दिया है। मूर्ति भी जयपुर से मँगवा ली है। अब तुम वापस जाओ।” मैं भावविभोर हो सब कुछ सुनता रहा। उनके श्रीचरणों को अपने अश्रुओं से धोकर मैं तत्काल वापस शाँतिकुँज आया। कार्य का फेर बनाया एवं यज्ञ की तिथि से दस दिन पूर्व अपने गाँव पहुँच गया।

गाँव में मेरा घर कच्चा खपरैल का बना है। उसमें शौचालय भी नहीं था। दूर खेत में जाना पड़ता था। गाँव के एक व्यक्ति ने पक्का मकान बनवाया था, जिसमें 7-9 कमरे, शौचालय व स्नानघर भगवान के ठहरने की व्यवस्था की। भगवान पधारे। भोजन हेतु मैं उन्हें अपने घर ले गया, उनने भोजन किया, कुछ देर विश्राम किया, फिर मंदिर आकर विधिवत् मूर्ति की प्राण−प्रतिष्ठा की। हजारों की भीड़ जमा हो गई। आस−पास के गाँवों के भी हजारों व्यक्ति मौजूद थे। सबने शाँतिपूर्वक प्रवचन सुना।
प्रवचन समापन के बाद रात्रि में गुरुदेव बोले, यदि तुम्हारे परिवार को कोई असुविधा न हो, तो रात्रि में हम तुम्हारे यहाँ ही सोना चाहते हैं। मैंने विनय−निवेदन किया कि प्रभु, कच्चा मकान है। शौचालय, स्नानघर की भी व्यवस्था नहीं है, इसलिए आपके विश्राम हेतु हम सबने मिलकर पक्के मकान में व्यवस्था की है, ताकि आपको कोई असुविधा न हो। गुरुदेव फिर भी न माने। रमेशचंद्र शुक्ला जी से कहा, उठाओ बिस्तर व चलो रामचंद्र के यहाँ। तुम यहाँ सोना, हम वहाँ रहेंगे। गुरुदेव श्री मेरे घर, मेरी कुटिया में पधारे। चारपाई पर बिस्तर लगा था। उनके श्रीचरण खटिया से बाहर निकल रहे थे। सुबह लगभग साढ़े तीन बजे लालटेन लेकर शौच हेतु खेत में गए। आकर आँगन में गरम पानी से स्नान किया। फिर दरवाजा बंद करके अपनी पूजा−उपासना में लग गए। सवेरे छह बजे परिवार के सभी सदस्यों को बुलाकर उनके दुःख−दर्द का हाल पूछा। सभी को आशीर्वाद प्रदान किया।

यह कार्यक्रम 24, 25, 26 जनवरी, 1972 को संपन्न हुआ। बिहार प्राँतभर के प्रायः पंद्रह हजार गायत्री परिजनों ने इस आयोजन में भागीदारी की। हजारों व्यक्तियों की पीड़ा−दुःख निवारण किया, जो मैंने अपनी आँखों से देखा। तीसरे दिन पूर्णाहुति के बाद गुरुदेवश्री ने अपने कर−कमलों से कुछ जगह छोड़कर एक कन्या विद्यालय का शिलान्यास किया और मेरी लड़की उर्मिला से कहा कि जैसे राजस्थान में श्री हीरालाल शास्त्री ने पेड़ की छाया में पाँच लड़कियों से पढ़ाना आरंभ किया था, वैसे ही यह विद्यालय तुम्हें ही चलाना है। हम जो भी कार्य आरंभ करते हैं, वह विशाल बन जाता है। ऋषियों की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती। मेरी लड़की उर्मिला सात वर्ष तक शाँतिकुँज में वंदनीया माताजी के प्रशिक्षण में रही। पाँच लड़कियों से उसने उस ग्रामीण संकुल में पढ़ाना आरंभ किया। आज इस स्कूल में, जिसका नाम ‘श्रीराम कन्या विद्यालय’ रखा गया है, लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा लड़कियाँ पढ़ती हैं। तीन शिक्षिकाएँ स्थायी रूप से कार्यरत हैं। बाद में 18 अप्रैल, 1982 को गाँव में एक दीपयज्ञ हुआ और एक कन्या महाविद्यालय बनाने का संकल्प लिया गया। परमवंदनीय माताजी ने संस्कारित शिलाएँ महाविद्यालय भवन के निर्माण हेतु आशीर्वादस्वरूप भेजीं।

परमपूज्य गुरुदेव के मेरे गाँव आगमन, वह भी तब, जबकि विदाई की पूर्व वेला में उनका एक−एक दिन बड़ा महत्वपूर्ण था एवं तीन दिन वहाँ निवास ने मुझे कृतकृत्य कर दिया। मेरे प्रति कितना प्रेम है, इसका एहसास करा दिया। एक प्रकार से ऋण से भी लाद दिया।

जैसे ही मैंने विदाई समारोह (16 से 20 जून, 1972) के समाचार सुने, मेरा भी मन करने लगा कि मैं भी इसमें सम्मिलित होऊँ। मैंने भी आने संबंधी पत्र लिखा। तत्काल उत्तर आया कि हनुमान ने भगवान राम के पहुँचने से पूर्व लंका में सारी व्यवस्था बना दी थी। तुम्हें वहाँ की सारी व्यवस्था हमारे आगमन के पूर्व करनी है, ताकि हमारे हिमालय प्रस्थान के बाद माताजी को कोई असुविधा न हो। पत्र पाकर कर्त्तव्य−बोध हुआ। मैं जी−जान से सारी तैयारियाँ करने में जुट गया। भगवान श्री का पत्र आया कि प्रयास करना कि हमारे आने से पूर्व टेलीफोन लग जाए। टेलीफोन इंस्पेक्टर का ऑफिस ऋषिकेश था। संयोग से वह ‘अखण्ड ज्योति’ पढ़ता था। तत्काल शाँतिकुँज आया। सर्वे किया व एक नियम शुल्क जमा कराने को कहा। काम शुरू हो गया व ऋषियुग्म के आने के पूर्व ही फोन लग गया। इसे मैं उनकी अनुकंपा ही मानता हूँ कि सारी व्यवस्था हो गई, नहीं तो मैं अल्पशिक्षित यह सब कैसे कर पाता।

गुरुदेवश्री 20 जून को शाम आठ बजे माताजी व अखण्ड दीपक के साथ आए एवं दस दिन बाद सबको सोता छोड़ अज्ञातवास के लिए विदा हो गए। एक साल बाद वे हिमालय से लौटे। आते ही युगतीर्थ का विस्तार, कन्या प्रशिक्षण, प्राण− प्रत्यावर्तन, विदेशयात्रा एवं विभिन्न शिविरों के क्रम में लग गए। हिमालय से लौटकर उनने मत्स्यावतार का रूप धारण कर लिया। शाँतिकुँज, गायत्रीनगर, ब्रह्मवर्चस् बने एवं फिर हजारों शक्तिपीठ बनते चले गए। सभी इस लीला को जानते है, पर इस अवधि में मेरे साथ कुछ अलौकिक घटा। मैं ऐसी घटनाओं का साक्षी बना, जो बड़ी विलक्षण थीं।

मेरे एक मित्र दमा से पीड़ित थे। उनके बारे में बताया तो गुरुदेवश्री ने कहा, तुम उन्हें पत्र लिखों कि वे तुलसी का काढ़ा पिएँ। वैसे संभावना यही है कि तुम्हारा पत्र उनको मिले, इसके पूर्व ही वे ठीक हो जाएँ। ऐसा ही हुआ। बाद में हमारे मित्र रामउदार सिंह शाँतिकुँज आए, बोले, स्वप्न में गुरुदेव के दर्शन हुए। उनने छाती पर हाथ फेरकर कहा, तुम्हारी दवा ‘अखण्ड ज्योति’ है। उसे नित्य पढ़ते रहो। उसी दिन से सुधार आरंभ हो गया। अब हम पूर्णतः स्वस्थ हैं। 1976-77 की बात है। पटना से एक इंजीनियर बाबू श्री सत्यतन सिंह जी आए। उनने मुझसे कहा, सीढ़ियों के पास जो शौचालय-कमरा बना है, उसमें निर्माण संबंधी दोष है, जिसमें सुधार जरूरी है। मैंने गुरुदेव भगवान को यह बात बताई। इंजीनियर साहब को बुलाकर उनने चर्चा की। शिविर के बाद उनसे रुकने व नुक्स ठीक करने को कहा। मजदूर लगाकर दुरुस्ती करवा दी गई। इंजीनियर साहब बोले, मेरा पाँच वर्ष का पोता था। बिच्छू के डंक से उसकी तत्काल मृत्यु हो गई। मेरी पत्नी तथा सभी परिवारीजन इससे दुखी है। तीन लड़कियाँ है, पर लड़का एक ही था। गुरुदेव ने कहा कि यदि बच्चे की आत्मा ने कहीं और जन्म न लिया होगा तो उसी को आपके घर में लौटा देंगे।

इंजीनियर साहब का परिवार लौट गया। वे यहीं रह गए, निर्माण -कार्य देखते रहे। ठीक दस माह बाद पटना से इंजीनियर साहब का पत्र आया कि उसी शक्ल-सूरत का लड़का हुआ है। इंजीनियर साहब ने गुरुदेव के चरण पकड़ लिए। कुछ दिनों बाद परिवार के सभी सदस्य नन्हें शिशु को लेकर आए व आशीर्वाद दिलाकर ले गए। मैं कितना लिखूँ, कितना कहूँ। गुरुदेव भगवान एवं शक्ति का अवतार माताजी के मैंने इतने चमत्कार देखे हैं कि एक पूरा ग्रंथ बन सकता है। सब घटनाओं का मैं स्वयं साक्षी हूँ। यह जानता हूँ कि पात्रता के आधार पर अनुदान बँटता था, फिर वे उस व्यक्ति से काम भी गायत्री के प्रचार-प्रसार का करा लेते थे। ऐसी गुरुसत्ता से मैं जुड़ा, इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ।

29/04/2026
29/04/2026

शांतिकुंज ऋषि चिंतन
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समयदान ही युग धर्म है!
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जहाँ सच्ची सहानुभूति होगी वहाँ ‘फुरसत न मिलने’ का बहाना न किया जायगा। सूरज की तरह स्पष्ट है कि जिन कार्यों को मन से निरर्थक महत्व हीन माना होगा उन्हीं के लिए फुरसत न मिलेगी। जो कार्य ‘आवश्यक’ समझे जाते हैं उन्हें तो रोटी खाना छोड़कर भी पूरा किया जाता है और कार्यक्रमों में उन्हीं को प्राथमिकता दी जाती है। जिसने युग धर्म के निर्वाह में कुछ योगदान करने की आवश्यकता सच्चे मन से अनुभव की होगी वह फुरसत न मिलने जैसे उपहासास्पद शब्द होठों पर ला ही नहीं सकेगा। इस बहाने से कोई अपना मन बहला सकता है पर ईश्वर की- आत्मा को यहाँ तक कि हमें भी उस कथन से तनिक भी समाधान नहीं मिलेगा।

इस बार हम अपने प्रत्येक परिजन को यह समझाना चाहते हैं कि भगवत् भजन के समतुल्य ही युग साधना के लिए लगाया गया समय पवित्र एवं पुण्य फलदायक है। उसमें आत्म कल्याण, लोक-मंगल और भगवत् प्रसन्नता के तीनों ही तथ्य मिले हैं। इसलिए यह त्रिवेणी सर्वोत्कृष्ट परमार्थ प्रयोजनों में प्राथमिकता पाने योग्य है। इसके लिए एक घण्टा समय लगाना किसी को भारी नहीं पड़ना चाहिए। इसे समय का अपव्यय नहीं माना जाना चाहिए। वरन् जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए आज की स्थिति में किए जा सकने वाले विवेकपूर्ण कार्यों में सर्वोपरि समझा जाना चाहिए।

हमें देव शक्तियों की संघटना खड़ी करनी है। भावभरी जागृत आत्माओं को एक सूत्र में पिरोकर युग देवता के चरणों पर चढ़ाने योग्य पुष्पहार बनाना है। संगठन के बिना युग परिवर्तन जैसे महान लक्ष्य की दिशा में एक इंच भी बढ़ सकना सम्भव न होगा, कार्य तो अनेकों करने पड़े है। बौद्धिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति का विशाल कार्य क्षेत्र सुनसान पड़ा है। उसे उर्वर बनाने के लिए जिन प्रचारात्मक रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यों का अभियान खड़ा किया जाना है उनका सुविस्तृत उल्लेख शत सूत्री युग निर्माण योजना के रूप में अनेकों बार किया जा चुका है।

युगान्तरकारी कार्यक्रमों की रूपरेखा अनेकों बार प्रकाशित कर चुके है; उन क्रिया-कलापों का छकड़ा ज्यों-त्यों करके चलता, रेंगता भी देखा जा सकता है। पाक्षिक युग-निर्माण योजना में छपते रहने वाले समाचारों को पढ़कर यह आभास प्राप्त किया जा सकता है कि अभियान के अंतर्गत क्या हो चुका- क्या हो रहा है और क्या होने वाला है।

प्रश्न मूल पूँजी का है। संघ शक्ति के अभाव में जो बन पड़ रहा है उसे दूसरों की दृष्टि में कितना ही महत्व क्यों ने मिल रहा हो अपनी दृष्टि में नगण्य है। क्योंकि अखण्ड ज्योति परिवार के एक लाख परिजनों में से मात्र कुछ हजार की ही वै हलचलें है। यदि पूरा परिवार अपना एक एक बूँद सहयोग लेकर खड़ा हो जाय तो जो कुछ हो रहा है उसकी प्रगति सौ गुनी तीव्रगति पकड़ सकती है और जिसे आज आश्चर्य मात्र समझा जा रहा है वह कल चमत्कार बनकर सामने खड़ा हो सकता है।

परम पूज्य गुरुदेव पं.श्रीराम शर्मा आचार्यजी
अखण्ड ज्योति जुलाई 1975

28/04/2026

कामयाबी के छह नायाब सूत्र
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कामयाबी की राहों की तलाश हर किसी को हर कहीं रहती है। जो जहाँ है, वह वहीं प्रगति, उन्नति और उच्च विकास के मार्ग की खोज करता रहता है। इस खोज-तलाश में कई सफल होते हैं और कई असफल। अनेकों के लिए तो कामयाबी सदा स्वप्न कुसुम बनी रहती है। जिसका अहसास कल्पनाओं और स्वप्नों में तो होता है, पर यथार्थ के धरातल पर न उसकी सुगन्ध मिलती है और न स्पर्श। पल्ले पड़ती है तो सिर्फ हताशा की भटकन, निराशा की थकान एवं असफलता की कुण्ठा। सफल और कामयाब लोगों को देखकर मन इसी चिन्ता में डूबा रहता है कि आखिर इन्होंने किस जादुई शक्ति से अपनी मनचाही कामयाबी हासिल कर ली।

जिन्हें इन्सानी वजूद में गहरी पैठ है, जो मानवीय व्यक्तित्व की बारीकियाँ अच्छी तरह से जानते हैं, उन सबका कहना है कि कामयाबी हासिल करने की जादुई शक्ति सभी में होती है। पर कुछ लोग इसका इस्तेमाल करना जानते हैं और कुछ नहीं। कुछ को अपनी इस जादुई शक्ति का पता होता है तो कुछ को नहीं। इसका नजारा हम अपने आस-पास बड़े आराम से देख सकते हैं। हम और आप कहीं भी किसी आफिस, कारखाने, शिक्षण संस्थान अथवा किसी दूसरी जगहों पर काम करते हों, अपने चारों ओर कुछ सफल और परेशान लोग अक्सर दिख ही जाते हैं। इनमें से एक वे हैं जिन्होंने कामयाबी की राहें तलाश ली हैं और उन पर चल पड़े हैं, और दूसरे वे हैं जो राहों की तलाश में अभी भटक रहे हैं।

मानवीय व्यक्तित्व के गहरे जानकार कॉरनी गोल्डमैन ने इन्सानी जिन्दगी की बारीक छान-बीन करते हुए एक किताब लिखी है ‘हाउ टु फाइन्ड ओन सक्सेज़’ यानि कि अपनी सफलता कैसे पाएँ। इस पुस्तक में उनका कहना है कि सफलता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। भगवान् ने हमको मनुष्य जीवन इसीलिए दिया है कि हम अपनी सफलता हासिल कर सकें। यदि अभी तक हम सफलता से दूर हैं तो इसका कारण केवल इतना भर है कि हमने अपनी आन्तरिक शक्ति और उसकी अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों को जाना नहीं है। गोल्डमैन का कहना है कि इन सफलताओं की राहों को यदि सही ढंग से जान लें और इनका सही इस्तेमाल करने लगें तो सफलता जल्दी ही हमारे कदम चूमने लगेगी।

गोल्डमैन और उनके साथी मनोवैज्ञानिक डेनियल रिचर्ड ने इन तरीकों को कुछ मुख्य बिन्दुओं में स्पष्ट किया है। इनमें से पहला महत्त्वपूर्ण बिन्दु है- नजरिया। डेनियल रिचर्ड का कहना है कि सफलताओं के पीछे श्रम एवं ज्ञान से ज्यादा प्रभाव अपने प्रति और परिस्थितियों के प्रति आपके नजरिये का होता है। यदि आपका नजरिया सकारात्मक है तो आप न केवल अपने लिए बल्कि औरों के लिए एक मधुर वातावरण का निर्माण कर सकेंगे। सकारात्मक नजरिया या विधेयात्मक दृष्टिकोण का मतलब है स्वयं की सामर्थ्य के प्रति विश्वास, हम कर सकेंगे, इस विचार पर गहरी आश्वस्ति। परिस्थितियां कितनी ही संघर्षपूर्ण और विकट क्यों न हों, पर वे इसीलिए हैं ताकि हमारी शक्तियाँ और अधिक निखर सकें। ऐसी सकारात्मक दृष्टि हमारे अन्दर साहस और सृजनशीलता का चुम्बकत्व पैदा करती हैं, जिससे कामयाबी अपने आप ही आकर्षित होने लगती हैं।

इस संदर्भ में दूसरा बिन्दु है- समय का सही उपयोग। गोल्डमैन का कहना है कि यदि आप कामयाबी चाहते हैं तो अपने कार्यों को प्राथमिकताओं के आधार पर वर्गीकृत करके समय के अनुसार करने की कोशिश करें। इस तरह सभी जरूरी कार्य बिना किसी तनाव के बड़े आराम से पूरे हो जाएँगे। इसके लिए बस केवल सही प्लानिंग की जरूरत है। इस बारे में एक कोशिश यह जरूर करते रहना चाहिए कि आज का काम कल पर टालने की जरूरत न पड़े। रोज का काम सही ढंग से पूरा हो जाने पर गहरी आत्मसंतुष्टि मिलेगी और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।

तीसरे बिन्दु के रूप में गोल्डमैन और रिचर्ड ‘परिस्थितियों के’ सही उपयोग की बात कहते हैं। उनका कहना है कि यहीं हमारी मौलिक सूझ-बूझ की परख होती है। उनके अनुसार महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि परिस्थितियाँ कैसी हैं, बल्कि महत्त्वपूर्ण यह है कि हम उनका उपयोग किस तरह से करते हैं। परिस्थितियों का उपयोग करने की सही सूझ-बूझ हो तो परिस्थितियाँ न केवल हमारा उचित सहयोग करती हैं, बल्कि समुचित मार्गदर्शन भी करती हैं। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि सहयोग और मार्गदर्शन के लिए ठीक व्यक्तियों का चुनाव किया जाय और उनके सामने अपनी बात सही तरीके से रखी जाय। ठीक इसी तरीके से स्वयं भी औरों के सहयोग और समुचित मार्गदर्शन के लिए तत्पर रहा जाय।

चतुर्थ बिन्दु जो कामयाबी की सबसे महत्त्वपूर्ण राह है वह है- हमारा व्यक्तित्व। व्यक्तित्व के गुण जैसे पहनावा, रहन-सहन, वार्तालाप का तरीका आदि सफलता पर बहुत ज्यादा प्रभाव डालते हैं। इसी तरह ईमानदारी, विनम्रता, कर्त्तव्यनिष्ठ हमें अपनी कामयाबी की ओर तेजी से ले जाते हैं। ध्यान रहे कि हमारा व्यवहार ही हमारे व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाता है। इसलिए हमें अपने व्यवहार में सद्गुणों की साधना बहुत ही दृढ़ता से करनी चाहिए।

कामयाबी के लिए पाँचवा आवश्यक बिन्दु है- सतत सकारात्मक क्रियाशीलता। कामयाबी पाने की चाहत रखने वालों को गोल्डमैन की सलाह है कि वे अपने आप को सतत क्रियाशील रखें। परन्तु ध्यान रहे कि यह क्रियाशीलता पूरी तरह से सकारात्मक हो। यानि कि इसमें किसी के प्रति भी विरोधी भाव न हो। यानि कि अपने विकास व प्रगति के उद्देश्य तो इसमें निहित हों, परन्तु दूसरों से द्वेष व उनकी हानि की कामना कतई न हो। अहंकार, आलस्य, ईर्ष्या, बहस व बहानेबाजी से अपने को दूर रखकर सतत अपने उद्देश्य के प्रति एकनिष्ठ भाव से क्रियाशील रहा जाय। साथ ही अनुशासनहीनता व गलत व्यवहार जैसे तत्त्व जीवन में प्रवेश न करने पाएँ।

इस सम्बन्ध में छठवाँ और अन्तिम बिन्दु है- सन्तुलन बनाए रखना। इसका अर्थ है जीवन को समग्रता से जीना। यानि की जीवन में व्यक्तिगत कामयाबी महत्त्वपूर्ण है, परन्तु उतना ही महत्त्वपूर्ण अपना घर-परिवार भी है। सफलता के साथ स्वास्थ्य भी महत्त्वपूर्ण है। भौतिक जीवन में उपलब्धियों के साथ आध्यात्मिक एवं आन्तरिक प्रगति भी आवश्यक है। यह सब एक साथ तभी सम्भव है जब हम अपने जीवन में सन्तुलन बनाए रखना सीख जाएँ। जहाँ तक सम्भव हो एक जगह की परेशानियों को दूसरी जगह से दूर रखें। यह भी अनुभव करें कि जीवन के सभी पहलू मूल्यवान एवं महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें से किसी को भी उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए।

जीवन की समग्रता में ही सार्थक कामयाबी है। इस तरह इन बिन्दुओं को जीवन में उचित ढंग से आत्मसात कर लेने से कामयाबी की राहें न केवल प्रकाशित हो जाती है, बल्कि उन पर चलना भी आसान हो जाता है। जरा सोचिए तो सही है न यही वे तौर तरीके जिन्हें पिछले काफी समय से तलाश रहे थे। अब जब मिल गए हैं तो फिर देर किस बात की, तेजी से चल पड़िए कामयाबी की डगर पर। कुछ ही कदमों दूर कामयाबी आपका इन्तजार कर रही है।

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्यजी

27/04/2026

शांतिकुंज ऋषि चिंतन
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अपने को अधिकाधिक सुविस्तृत बनाते चलें!
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अपने आप में केन्द्रीभूत होकर हम उन समस्त सम्पदाओं से वंचित हो जाते हैं जो इस संसार के प्रत्येक कण में भरी पड़ी है। आहार-विहार के समस्त साधन बाहर ही उत्पन्न होते हैं और उन्हें उपार्जित करके उपभोग के द्वारा शरीर की गतिविधियाँ चलाते हैं। अपने हाथ पैर खाकर तो पेट नहीं भरते। शिक्षा, व्यवसाय, चिकित्सा, विवाह, विनोद आदि उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए भी दूसरों का द्वार खटखटाते हैं और जो जितने मात्रा में मिल जाता है उससे उतनी ही मात्रा में प्रसन्न होते हैं। वे एकान्त में बैठकर मनमोदक खाते रहने से हर्षोल्लास के अवसर प्राप्त नहीं ही होते। विविध विधि पदार्थों का सहारा लेना पड़ता है, जो अपने भीतर नहीं बाहर ही मिलते हैं।

दूर दर्शिता इस बात में है कि अपने को संकीर्ण संकुचित न बनाये वरन् संसार के साथ घुल मिलकर समुद्र के विशद क्षेत्र में विचरण करने वाली और जीवनोपयोगी समस्त साधन उपलब्ध करने वाली मछली की नीति अपनाये। बुद्धिमत्ता इस बात में है कि सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को अपनाकर आकर्षण के ऐसे केन्द्र बने जिस पर हर दिशा में अनवरत स्नेह सहयोग की वर्षा होने लगे कुशलता इस बात में है कि अपने उन दोष-दुर्गुणों को सुधारे जो प्रगति के प्रत्येक पग पर अवरोध बन कर खड़े होते हैं। प्रवीणता इस बात में है कि उदात्त चिन्तन का अभ्यास करे सद्व्यवहार की रीति-नीति अपनाये, अपने को दूसरों के साथ और दूसरों को अपने साथ घुला मिला कर देखे। आत्म विस्तार का यही रास्ता है।

अमृतवाणी:- बीज की तरह गलें : भाग 01
परम पूज्य गुरुदेव पं.श्रीराम शर्मा आचार्यजी
अखण्ड ज्योति जुलाई 1975

27/04/2026

मित्रता अच्छी हैःपर करें समझ-बूझकर
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निकम्मे आदमियों के पास समय ही समय होता है। घर बैठकर काटने में जी ऊबता है। किसी रेस्टोरेन्ट में जाने पर कुछ खाना पीना होगा। सिनेमा के लिये टिकट खरीदना होगा। सैर सपाटे के लिये भी साथी तथा पैसा चाहिये। पढ़ने लिखने से उनका सम्बंध नहीं होता, पुस्तकालय तथा वाचनालय उन्हें काटते, विद्वान तथा साधु जनों के सत्संग में न तो उन्हें रस आता है और न उन मनीषियों के संपर्क में आने का साहस होता है समाज सेवा, देश सेवा, अथवा जन सेवा उनके लिए बेकार की चीज होती हैं— तो आखिर फालतू समय कैसे और किसके पास काटा जायें? इसके लिए सबसे उपयुक्त तथा सरल वे ही सहनशील व्यक्ति हो सकते हैं जो नैतिक उदारता में इतने बढ़ गये होते हैं कि उनका वह गुण दोष बन जाता है और जिन्हें निरन्तर पुनरावृत्ति के साथ समय तथा पैसे की हानि कि लिये सहनशीलता का अभ्यस्त बना लिया गया होता है।

निदान निठल्ले लोग ऐसे अनिषेधशील व्यक्तियों को खोज लेते, उनके मित्र बन जाते, और बिना इस विचार के कि इन बेचारों के पास कोई काम भी होगा अपना फालतू समय यापन-करने के लिए दूसरों के समय की बरबादी किया करते हैं। किसी भी सावधान आदमी को ऐसे निठल्ले व्यक्तियों की मित्रता से अपनी, अपने पैसे तथा अपने समय की -रक्षा करनी ही चाहिये।

इस प्रकार के तथा-कथित निठल्ले मित्र मनुष्य की नैतिक, चारित्रिक, आर्थिक हानि किया करते हैं सो तो किया ही करते हैं, सबसे बड़ी शत्रुता यह करते हैं कि किसी से नाम मात्र के मनोमालिन्य को बढ़ाकर शत्रुता की सीमा तक बढ़ा देते हैं। वे जानते हैं कि विरोधी की बुराई करने से कोई भी व्यक्ति ‘शत्रु का शत्रु मित्र’- के सिद्धान्तानुसार मित्र ही नहीं बन जाता बल्कि घनिष्ठ एवं विश्वासी मित्र बन जाता है। और ऐसी स्थिति में आसानी से उसका शोषण किया जा सकता है।

वंचक मित्र पिशुनता के माध्यम से किसी भी व्यक्ति को निन्दारसिक बना देता है। इसके साथ मित्र एक बड़ी हानि और भी करते हैं— वह है छलपूर्वक मिथ्या प्रशंसा करके किसी को अहंकारी बना देना। वे विविध प्रकार से चाटुकारी करके किसी भी व्यक्ति को उसके सत्य स्वरूप से भटका देते हैं और उसको एक ऐसी वातुलता पर पहुँचा देते हैं जहाँ से वह यथार्थ की भूमि पर उतर ही नहीं पाता और झूठे स्वप्नों के संसार में भटकता हुआ अपने को वह सब कुछ समझने लगता है, जो वह यथार्थ में होता नहीं। वंचक मित्रों की इस प्रकार की चाटुकारी जहाँ किसी में दम्भ एवं अहंकार की निर्बलता पैदा कर देती है वह चाटुकार को अन्तरंग प्रिय जन बना देती है, जिससे उसे अनेक प्रकार के लाभ उठा सकने का अवसर रहता है। इस प्रकार निन्दा प्रशंसा के आधार पर घनिष्ठता पाने के लिये प्रयत्नशील मित्रों से हर समझदार व्यक्ति को सावधान रहना चाहिये।

सच्ची मित्रता क्या हैं?
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आज की दुनिया में जहाँ हर चीज नकली होती जा रही है मित्र भी नकली होने लगे हैं। इसलिए मित्रता स्थापित करने में मनुष्य को आवेगपूर्ण भावुकता से काम नहीं लेना चाहिए। जहाँ तक हो कम से कम मित्र बनाए और जिन्हें बनाए उन्हें अच्छी प्रकार से समझ परख ले। मित्र बनाने में अनियंत्रित उदारता बरतना अपने चारों ओर प्रच्छन्न शोषकों तथा शत्रुओं को इक करना है।

किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि आज सच्चे मित्रों का सर्वथा अभाव हो गया है अथवा हर किसी का हर मित्र प्रवंचक ही होता है। संसार में सच्चे और अच्छे मित्र भी होते हैं किन्तु उनकी संख्या विरल हो चली है। फिर भी लोगों को वास्तविक मित्र मिलते हैं जिसके लिये वे बधाई के पात्र हैं। फिर भी राह चलते हर व्यक्ति अथवा आकस्मिक संपर्क में आ गये किसी भी व्यक्ति से भावुकता वश मित्रता स्थापित कर लेने के अभ्यस्त ‘यार-बाश’ लोग घाटे में रहते और जीवन में बहुत बार धोखा खाकर अपना सुधार कर पाते हैं।

पं.श्रीराम शर्मा आचार्यजी
अखण्ड ज्योति अगस्त 1966

26/04/2026

परम पूज्य गुरुदेव की पावन स्मृतियाँ
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अखिल विश्व गायत्री परिवार के इतिहास में ऐसी कई स्मृतियाँ हैं जो सार्वजनिक मंचों से कम सुनी गई हैं। यहाँ कुछ ऐसी अनसुनी या कम चर्चित घटनाएं हैं, जो गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के जीवन के उस पक्ष को दिखाती हैं जहाँ वे एक मार्गदर्शक के साथ-साथ एक अत्यंत संवेदनशील मानव भी थे:

१. जब गुरुदेव ने स्वयं परोसा भोजन
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१९५८ के 'सहस्रकुंडी गायत्री महायज्ञ' के दौरान, जहाँ लाखों लोग आए थे, वहाँ एक रात ऐसी स्थिति बनी कि कुछ मजदूर और सफाई कर्मचारी थक कर एक कोने में बैठे थे और भोजन का समय समाप्त हो चुका था।

जब गुरुदेव को पता चला, तो उन्होंने आयोजकों को नहीं डांटा। इसके बजाय, वे स्वयं रसोई में गए, जो कुछ भी शेष था उसे व्यवस्थित किया और उन श्रमिकों के पास जाकर उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराया। उन्होंने कहा था, "इनका पसीना सूखने से पहले इनकी आत्मा तृप्त होनी चाहिए, क्योंकि यज्ञ की असली नींव यही लोग हैं।"

२. 'पिन' बचाने का अनुशासन
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एक बार शांतिकुंज के शुरुआती दिनों में एक कार्यकर्ता ने एक पुराने लिफाफे को फेंक दिया जिसमें एक छोटी सी लोहे की पिन लगी थी। गुरुदेव ने उसे रुकवाया और स्वयं झुककर वह पिन उठाई।

उन्होंने उस समय एक बड़ी गहरी बात कही:
"यह केवल एक पिन नहीं है, यह समाज का अंशदान है। जो व्यक्ति एक छोटी सी पिन की बर्बादी नहीं रोक सकता, वह भविष्य में बड़े संसाधनों का प्रबंधन कैसे करेगा? सादगी और मितव्ययिता केवल शब्दों में नहीं, आचरण में होनी चाहिए।"

३. हिमालय प्रवास के दौरान 'गुप्त' संदेश
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हिमालय की गुफाओं में तपस्या के दौरान जब गुरुदेव अपने मार्गदर्शक (दादागुरु) के साथ थे, तब उन्होंने वहां से अपनी पत्नी, माता भगवती देवी शर्मा को एक गुप्त संदेश भेजा था। उस संदेश में उन्होंने किसी आध्यात्मिक सिद्धि की बात नहीं की थी, बल्कि यह पूछा था कि "क्या आश्रम में आने वाले पशुओं (गायों) को समय पर चारा मिल रहा है?" यह स्मृति दर्शाती है कि सर्वोच्च आध्यात्मिक शिखर पर होने के बावजूद, उनकी करुणा छोटे से छोटे जीव के प्रति कितनी सघन थी।

४. कलम की शक्ति का सम्मान
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गुरुदेव के लेखन का एक विशेष नियम था। वे जब भी लिखने बैठते, तो पहले अपनी लेखनी (Pen) को नमन करते थे। एक बार एक परिजन ने पूछा कि आप निर्जीव वस्तु को प्रणाम क्यों करते हैं?

गुरुदेव ने मुस्कुराकर कहा, "यह निर्जीव नहीं है। यह लाखों लोगों के विचारों को बदलने का माध्यम है। जब मैं इसे नमन करता हूँ, तो मैं दरअसल उस सत्य को नमन करता हूँ जो इसके माध्यम से कागज़ पर उतरने वाला है।"

५. अंतिम विदाई का वह मौन संकेत
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गायत्री जयंती (१९९०) के कुछ दिन पहले, गुरुदेव ने अपनी दिनचर्या पूरी तरह बदल दी थी। वे अक्सर शांत होकर आकाश की ओर देखते रहते थे। एक पुराने सेवक ने पूछा, "गुरुदेव, आप क्या देख रहे हैं?"

उन्होंने बस इतना कहा, "तैयारी हो रही है, घर लौटने का समय करीब है। पर याद रखना, मैं शरीर से जा रहा हूँ, विचारों से सदा तुम्हारे पास रहूँगा।" उस समय कोई समझ नहीं पाया कि वे महाप्रयाण का संकेत दे रहे थे।

ये स्मृतियाँ हमें याद दिलाती हैं कि अखिल विश्व गायत्री परिवार का आधार केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि सादगी, संवेदनशीलता और अटूट अनुशासन है।

22/04/2026

लाखों व्यक्तियों के जीवन बदले।
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स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे कि छटाँक भर के दिमाग से कहीं रामकृष्ण की अवधारणा हो सकती है? स्वामीजी का कथन गुरुदेव पर भी सौ फीसदी खरा उतरता है। बात 7 दिसम्बर 1989 की है। गुरुदेव अपने ऊपर के आँगन में टहलने हुए पास बैठे एक शिष्य को मनोविज्ञान के कुछ सिद्धान्त स्पष्ट कर रहे थे। यही कोई साढ़े-तीन चार का समय होगा। सिद्धान्तों को भली प्रकार स्पष्ट करते हुए बोले “जानता हे! आजकल शांतिकुंज क्या बन गया हैं?”

सुनकर शिष्य कुछ अचकचा गया उसे हाल में हुए नए निर्माण के बारे में मालूम था। विश्वामित्र की तपस्थली के बारे में भी जानता था। अपनी जानकारियों को उसने कह सुनाया। सुनकर उसके बचकाने पन पर हँसते हुए बोल “अरे यह सब नहीं लड़के! आजकल शांतिकुंज बन गया है- महाकाल का घोंसला।” सुनने वाले की समझ को परखते हुए वह थोड़ा खुलासा करते हुए बोल “धरती पर चल रही महाकाल की विभिन्न गतिविधियों का हेड ऑफिस अब यहीं है।”
सुनने वाले को चकित देख वह हँसने लगे। उसने भी घोंसले के निवासी को प्रणाम किया और चलता बना। उसके दिमाग में गोस्वामी जी की एक चौपाई गूँज रही थी “सो जानइ जेहि देहु जनाई”।

विवेक चूड़ामणि में आचार्य शंकर ने परम सिद्ध को आनन्द का पिटारा कहा है। आनन्द का पिटारा होने का मतलब है बच्चों जैसा निश्छल हंसता-हंसता विनोदी जीवन। जिन्हें भी उनके निकट आने का सौभाग्य मिला उनके हंसी के फव्वारों से नहाए बिना न रहे होंगे। ऐसे ही एक दिन गुरुदेव तपोभूमि में दो कार्यकर्ताओं के साथ बैठे हुए। इनमें से एक कार्यकर्ता को लम्बी दाढ़ी बढ़े हुए बाल रखने का शौक था। तिलक लगाने, पीत वस्त्र धारण करने पर उनकी शोभा किसी महन्त से कम न होती थी। वार्तालाप का क्रम चल ही रहा था कि एक व्यक्ति ने अन्दर प्रवेश किया। इन तीनों के पास पहुँचकर बोला मुझे गुरुजी से मिलना है।

गुरुजी हंसते हुए बोले-पहचान लो गुरुजी को इन्हीं तीन में कोई गुरुजी है। आगन्तुक थोड़ी देर तक इधर-उधर देखता रहा। फिर लम्बी दाढ़ी वाले कार्यकर्ता के चरणों में माथा रख दिया। बेचारे कार्यकर्ता भौंचक्के हो समझाने लगे कि गुरु जी मैं नहीं वह रहे इधर वह सारे तमाशे को देख हंसते हुए कह रहे थे “बहकावे में आकर गुरु के चरणोँ को मत छोड़ देना यही गुरु जी हैं।” आसपास कुछ और लोग आ गए। बड़ी देर तक वातावरण में ठहाके गूँजते रहे। काफी देर बार आने वाले को असली गुरु जी का पता चला वह भी उनकी बालवत् हंसी देख मुग्ध हो गया।

शब्द सक्रिय होते है और निष्क्रिय भी इनकी सक्रियता के लिए वाक्य व्यंजना व्याकरण कौशल नहीं, चाहिए बोलने वाले के व्यक्तित्व की प्राण ऊर्जा। जिसके बिना सभी कुछ निष्क्रिय है! प्रारम्भ से ही गुरुदेव की वाणी ऐसी प्राण ऊर्जा से सनी होती थी। उन दिनों काँग्रेस का आन्दोलन मन्दा पड़ते देख अधिकाँश कार्यकर्ता यहां तक कि वरिष्ठ कहे जाने वाले काँग्रेसी अपना काम धंधा जमाने लगे थे। भू.पू. प्रान्तीय मन्त्री जगन प्रसाद जी रावत ने भी पुस्तकों, मुहर्रिर, एवं स्थान की व्यवस्था करके अपनी वकालत प्रायः शुरू कर दी थी।

एक दिन जब वह ताँगे पर कचहरी जा रहे थे। रास्ते में नवयुवक श्रीराम ने एक क्षण के लिये ताँगा रुकवाया और बोले रावत जी! ऐसे में आप भी वकालत करने लगेंगे तो हम स्वयं सेवकों का क्या होगा? कांग्रेस कहाँ जायेगी? देश के प्रति उनके प्राणों की आकुलता ने सुनने वाले के अन्तःकरण को झकझोर दिया। ठेठ ब्रजभाषा में कहे गये शब्दों ने निर्णय परिवर्तित करा दिया। वकालत का निर्णय परे रख वे पुनः राष्ट्र सेवा में कूद पड़े आगे चलकर सरकार में मंत्री बने। ऐसे थे उनके सक्रिय शब्द। जिनके प्रभाव ने एक दो नहीं लाखों व्यक्तियों के जीवन बदले।

22/04/2026

दिशा जो बदली, तो गजब हो गया।
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मित्रो! क्या वजह है इसकी? हम में और तुलसीदास जी में क्या अंतर है? एक अंतर है। नाक, आँख्, कान, दाँत और हाथ- पाँव सब बराबर हैं, पर एक चीज जो उनके अंदर थी, वह हमारे अंदर नहीं है। वह चीज है, जिसे मैं जिंदगी कहता हूँ जिसको मैं प्रतिभा कहता हूँ जिसको मैं विभूति कहता हूँ जिसको मैं लगन कहता हूँ तन्मयता कहता हूँ जीवट कहता हूँ। वह जीवट मित्रो! जहाँ कहीं भी होगा, तो वह बड़ा शानदार काम कर रहा होगा और गलत दिशा पकड़ने पर गलत काम भी कर रहा होगा।

अंगुलिमाल पहले नंबर का डाकू था। उसने यह कसम खाई थी कि फोकट में किसी का पैसा नहीं लूँगा। उँगलियाँ काट- काटकर उसकी माला बनाकर वह देवी को रोज चढ़ाया करता था। अगर कोई कहता कि अरे भाई! पैसे ले ले, पर उँगली क्यों काटता है हमारी? वह कहता, वाह! फोकट में, दान में नहीं लेता हूँ। पहले तेरी उँगली काटूँगा, तो मेरी मेहनत हो जाएगी। फिर उस मेहनत का पैसा ले लूँगा। ऐसे मुफ्त में कैसे ले लूँगा किसी का पैसा? इस तरह वह रोज एक साथ उँगलियाँ काट- काटकर उसकी माला देवी को पहनाया करता था। कौन? खूँखार अंगुलिमाल डाकू, लेकिन जब उसने पलटा खाया, तो कैसा जबरदस्त पलटा खाया आपको मालूम है न? अंगुलिमाल जब तक डाकू था, तो पहले नंबर का और जब संत हो गया, तो उसने हिंदुस्तान से आगे जाकर के सारे के सारे विदेशों में, मिडिल ईस्ट में वो काम किए कि बस, तहलका मचा दिया। वह जहाँ कहीं भी गया, अपने प्रभाव से दुनिया को बदलता हुआ चला गया।

मित्रो! क्षमताएँ जिनके अंदर हैं प्रतिभाएँ जिनके अंदर हैं, वह कहीं से कहीं जा पहुँचता है। आम्रपाली जब तक वेश्या रही, तो पहले नंबर की रही। राजकुमार, राजाओं से लेकर सेठ- साहूकार तक उसकी एक निगाह के लिए उसकी एक चितवन और एक इशारे के लिए ढेरों रुपया खरच कर डालते थे और उसके गुलाम हो जाया करते थे, लेकिन जब आम्रपाली अपनी करोड़ों की संपत्ति को लेकर भगवान बुद्ध की ओर चली गई, तो न जाने क्या से क्या हो गई और सम्राट अशोक जो था, ऐसा खूनी था कि उसने खानदान के खानदान समाप्त कर दिए थे। सभी शाही खानदानों को एक ओर से उसने मरवा डाला था। मुसलमानों ने एक- आध को मारा था, लेकिन उसने तो किसी को जिंदा ही नहीं छोड़ा। ऐसा खूनी था अशोक। उसने चंगेज खाँ, नादिरशाह और औरंगजेब, सबको एक किनारे रख दिया था। जहाँ कहीं भी हमले किए वहाँ खून की नदियाँ ही बहाता चला गया।

लेकिन मित्रो! जब उसने पलटा खाया और जब अपने आप में परिवर्तन कर डाला, तो फिर वह कौन हो गया? सम्राट अशोक हो गया, जिसने बौद्ध संघ और बौद्ध धर्म का सारे का सारा संचालन किया। आज जो हमारे झंडे के ऊपर और हमारे सिक्कों- नोटों के ऊपर तीन शेर वाला निशान बना हुआ है, वह सम्राट अशोक की निशानी है और जो हमारे राष्ट्रीय ध्वज पर चौबीस धुरी वाला और चौबीस पंखुड़ी वाला चक्र लगा हुआ है, यह क्या है? यह सम्राट अशोक के द्वारा पारित किया और प्रतिपादित किया हुआ धर्मचक्र प्रवर्तन है, जिसको हमने राष्ट्रीय झंडे के ऊपर स्थान दिया हुआ है। ये किसकी हिम्मत, किसकी दिलेरी थी, किसकी बहादुरी थी? उसकी थी, जो डाकू था और खूँखार था।

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