Jai Maa Gayatri

Jai Maa Gayatri Spiritual.

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ***********************************🔴 सुना है कि आत्मज्ञानी सुखी रहते हैं और चैन क...
22/08/2026

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ
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🔴 सुना है कि आत्मज्ञानी सुखी रहते हैं और चैन की नींद सोते हैं। अपने लिए ऐसा आत्म- ज्ञान अभी तक दुर्लभ ही बना हुआ है। ऐसा आत्मज्ञान कभी मिल भी सकेगा या नहीं इसमें पूरा- पूरा सन्देह है। जब तक व्यथा वेदना का अस्तित्व इस जगती में बना रहे, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े, तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा नहीं। जब भी प्रार्थना का समय आया, तब भगवान से निवेदन यही किया- हमें चैन नहीं, वह करूणा चाहिए, जो पीड़ितों की व्यथा वेदना अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके। हमें समृद्धि नहीं, वह शक्ति चाहिए, जो आँखों से आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके।

🔵 बस इतना ही अनुदान वरदान भगवान से माँगा और लगा कि द्रौपदी को वस्त्र देकर उसकी लज्जा बचाने वाले भगवान हमें करूणा की अनन्त सम्वेदनाओं से ओत- प्रोत करते चले जाते हैं। अपने को क्या सुख साधन चाहिए इसका ध्यान ही कब आया ?? केवल पीड़ित मानवता की व्यथा -वेदना ही रोम- रोम में समाई रही यही सोचते रहे कि अपने विश्वव्यापी कलेवर परिवार को सुखी बनाने के लिए क्या किया जा सकता है। जो पाया उसका एक- एक कण हमने उसी प्रयोजन के लिए खर्च किया, जिससे शोक- सन्ताप की व्यापकता हटाने और सन्तोष की साँस ले सकने की स्थिति उत्पन्न करने में थोड़ा योगदान मिल सके।

🔴 हमारी कितनी रातें सिसकते बीती हैं, कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख- बिलख कर, फूट- फूटकर रोये हैं। इसे कोई कहाँ जानता हैं ?? लोग हमें सन्त, सिद्ध, ज्ञाने मानते हैं कोई लेखक, विद्वान्, वक्ता, नेता समझते हैं, पर किसने हमारा अन्त:करण खोलकर पढ़ा समझा है। कोई उसे देख सका होता, तो मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से करूण, कराह से हा- हाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हडिडयों के ढाँचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती। कहाँ तथाकथित आत्मज्ञान की निश्चिन्तता, एकाग्रता और समाधि सुख दिला सके। हमसे बहुत दूर है शायद वह कभी मिले भी नहीं, क्योंकि इस दर्द में जो भगवान की झाँकी होती है। पीड़ितों के आँसू पोंछने में ही जब चैन अनुभव होता हो, तो उस निष्क्रिय मोक्ष और समाधि को प्राप्त करने के लिए कभी मन चलेगा ऐसा लगता नही। जिसकी इच्छा ही नहीं, वह मिला भी किसे है ??

कींमती चीज पाने के लिए कींमत चुकानी पडती है***************************************महाराज जी! आप तप कीजिए और आशीर्वाद देक...
22/08/2026

कींमती चीज पाने के लिए कींमत चुकानी पडती है
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महाराज जी! आप तप कीजिए और आशीर्वाद देकर हमारा फायदा करा दीजिए। बेटे, आशीर्वाद माने लूट नहीं है, जो तू समझता है-''राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट।'' ऐसे किसी चीज की लूट नहीं पड़ रही है। आशीर्वाद की तो पड़ रही है? नहीं बेटे, आशीर्वाद की तो बिलकुल नहीं पड़ रही है। आशीर्वाद की बहुत कीमत है। कीमत चुकाए बिना न आशीर्वाद मिलता है, न वरदान मिलता है, न सिद्धि मिलती है, न चमत्कार मिलता है और न मनोकामना पूरी होती है। हर आदमी को हर चीज की कीमत चुकानी पड़ी है। नहीं गुरुजी, हम तो बिना कीमत चुकाए ही पाएँगे। क्या करेंगे? लूट करेंगे। कैसे? ''राम नाम लड्डू गोपाल नाम खीर। हरि का नाम मिसरी तो घोल-घोल पी।'' हाँ बेटे ये तो हो जाएगा। ये लूट अलग है। इसमें कोई एतराज नहीं है, लेकिन जो व्यक्ति कीमती चीज पाना चाहता है, उसे कीमत चुकानी पड़ेगी ।

मित्रो! अभी मैं एकाग्रता की बात कह रहा था। एकाग्रता लाने का फैसला आप करते हैं तो मैं यह कहूँगा कि आप योग के मार्ग पर चल रहे हैं और योगी बनने की कोशिश कर रहे हैं। यह हुई नंबर एक की बात-एकाग्रता की बात। अब मैं नंबर दो-योग के दूसरे वाले लक्ष्य की बात बताता हूँ। योग के दूसरे वाले भाग में शामिल होता है-ध्यान। वह क्या है? बेटे, इसका मंतव्य यह है कि भगवान के चिंतन का कोई लक्ष्य होना चाहिए। इसका नाम हैं-इष्ट। इष्टदेव का ध्यान करना चाहिए। कौन सा इष्टदेव? जो भी आपने तय किया हो। महाराज जी! कौन सा इष्टदेव बनाऊँ? जो भी आपका मन हो, बना लीजिए लेकिन ध्यान पूरा कीजिए। इष्टदेव का आप ध्यान करेंगे तो क्या हो जाएगा? इष्ट माने लक्ष्य, इष्ट माने देवता। देवता पहला प्रतीक माना गया है। देवता किसी शक्ति के प्रतीक हैं, जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम। मर्यादा वाला व्यक्ति बनना है तो आपको अपना इष्टदेव राम को मानना चाहिए। आपको पूर्णपुरुष बनना है तो आपको अपना इष्टदेव कृष्ण को मानना चाहिए। अगर आपको रामभक्त बनना है तो आपको अपना इष्ट भक्त हनुमान को बनाना चाहिए!

लोक कल्याण के लिए गलने का नाम अध्यात्म है**************************************देवियो, भाइयो! आपको जहाँ कहीं भी वृक्ष- ल...
22/08/2026

लोक कल्याण के लिए गलने का नाम अध्यात्म है
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देवियो, भाइयो! आपको जहाँ कहीं भी वृक्ष- लता और पुष्प खिले हुए दिखाई पड़ें, समझ लेना कि यह जादू और चमत्कार उसका है, जो बीज गल गया। गले हुए बीजों का परिणाम आपको बगीचों के रूप में, फूलों के रूप में, उद्यानों के रूप में दिखाई पड़ता है। लेकिन जहाँ कहीं ऐसा दिखाई पड़ता हो कि सूखी हुई जमीन पड़ी है, सुनसान पड़ा हुआ है, जान लेना वहाँ कोई बीज गलने को तैयार नहीं हुआ। वहाँ बीजों ने गलने से इंकार कर दिया है। बीज जब कभी भी गले हैं, दुनिया में शांति आई है, दुनिया में खुशी आई है। दुनिया में व्यवस्था आई है, उन्नति आई है। हमारे भारतवर्ष में यह परंपरा रही है कि प्रत्येक व्यक्ति ने अपने जीवन की सार्थकता को इस बात से जोड़कर रखा कि मेरे गलने की प्रक्रिया कहाँ तक सफल रही। हर आदमी ने अपने आपसे हजार बार यह सवाल किया कि क्या मैं गलने में समर्थ हुआ? क्या मैं समाज के लिए गला? क्या मैं भगवान् के लिए गला? अगर गलने का जवाब यह आया कि हाँ, मैं गला, तो व्यक्तिगत जीवन में हरियाली आयेगी। सामाजिक जीवन में हरियाली आयेगी।

लेकिन मित्रो! जहाँ कहीं भी मनुष्य यह कह रहे होंगे कि हम नहीं गलेंगे, हम तो लेंगे और पायेंगे, वहाँ बड़ी मुश्किल आ जायेगी, कठिनाई आ जायेगी। वह अभागा देश ढलता हुआ चला जायेगा, पतित होता हुआ चला जायेगा, नष्ट होता हुआ चला जाएगा। वह व्यक्ति पतित होता हुआ चला जायेगा, नष्ट होता हुआ चला जायेगा, जिसके मन में गलने की तमन्ना नहीं है, गलने की उम्मीद नहीं है। जिसको केवल पाने की उम्मीद है, वह बड़ा स्वार्थी आदमी है। जिसको भगवान से सिर्फ पाना है, गुरु से सिर्फ पाना है, ऑफीसर से सिर्फ पाना है, स्त्री से सिर्फ पाना है, बाप से सिर्फ पाना है। जिसे सिर्फ पाना है, देना किसी को नहीं है, तो ऐसा मनुष्य बड़ा भाग्यहीन है और वह जीवन में दुःख पायेगा और दुःख देगा। दुःख देना इसके भाग्य में बदा है और दुःख पाना इसके भाग्य में बदा है। इसके मन में यह उमंग उत्पन्न नहीं होती कि हमको गलना है। गलने का नाम ही अध्यात्म है।

मित्रो! कभी भारतवर्ष में घर- घर में अध्यात्म था। इस समय के अध्यात्म को मैं अध्यात्म नहीं कहता। मैं तो सुबह भी आपको कह रहा था कि आज के अध्यात्म में विशुद्ध बहुरूपियापन है। कौन सा वाला? जिसमें हमने यह खयाल रखा कि कम पैसों में और कम कीमत में बड़ी चीज मिल जानी चाहिए। ठगे जाने वाले लोग और ठगने वाले लोग- दोनों की नीयत, दोनों की प्रक्रिया एक है कि कम पैसे में ज्यादा चीज मिलनी चाहिए। लॉटरी क्या है? यही कि हमको अपनी जेब में से एक रुपया खर्च करना चाहिए और तीन लाख प्राप्त करना चाहिए। कितने ही लोग हैं जिन्होंने लॉटरी के टिकट खरीदे हैं। आप उनके पास जाइये और इन्क्वायरी कीजिए कि आप लोगों में से कितने आदमी हैं जिन्होंने एक रुपये खर्च करके तीन लाख रुपये पाये हैं? आपको एक हजार में से नौ सौ निन्यानवे, एक लाख में से निन्यानवे हजार नौ सौ निन्यानवे व्यक्ति यह कहते हुए मिल जायेंगे कि हमारा एक रुपया बट्टेखाते में चला गया। जो मुनासिब कीमत चुकाये बिना लंबे- चौड़े ख्वाब देखता रहता है, उसका वह एक रुपया जाना ही चाहिए और बरबाद होना ही चाहिए।

हिमालय की ऋषि परम्परा का अभिनव संस्करण शान्तिकुञ्ज********************************************--पं. श्रीराम शर्मा आचार्य...
22/08/2026

हिमालय की ऋषि परम्परा का अभिनव संस्करण शान्तिकुञ्ज
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--पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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संसार की सुव्यवस्था बनाये रहने और प्रगति प्रेरणा देते रहने का काम ऋषिकल्प आत्माओं का है। वे समय-समय पर सामयिक समस्याओं का समाधान करते और कराते हैं। मनुष्यों की दुर्बल चेतना प्रायः भटकाव की ओर चल पड़ती है। अपने स्वरूप, उद्देश्य और कर्तव्य को भुलाकर वह करने लगती है, जो उसके लिए हर दृष्टि से अयोग्य है। इस अवांछनीयता का संशोधन और परिष्कार कर सकने की सामर्थ्य अर्जित करने के लिए ऋषि वर्ग के लोग अपनी पवित्रता और प्रखरता बनाये रखने, लोक प्रवाह को मोड़ने तथा व्यक्तित्वों को निखारने, उभारने में सफल होते थे। बढ़ती हुई आवश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए अभिनव अनुष्ठान करते रहते थे।

इन प्रयासों में संलग्न रहने के लिए उन्हें हिमालय का वातावरण सर्वोत्तम लगा। अधोगामी प्रवृत्तियाँ प्रायः पृथ्वी की नीची सतह पर रहती हैं। इसलिए उस क्षेत्र की गणना अधोलोक में की जाती है। ऊँचे स्थान न केवल ऊँचाई की दृष्टि से श्रेष्ठ वातावरण वाले होते हैं, वरन् उसमें आदर्शवादी उत्कृष्टता भी रहती है। हिमालय का हृदय कहे जाने वाले उत्तराखण्ड के साथ वातावरण की सात्विकता का विशेष महत्त्व है। नागपुरी संतरे, भुसावली केले, मलीहाबादी आमों एवं लखनऊ के अमरूदों की अपनी विशेषता उस स्थान विशेष के कारण है। मलयागिरि चन्दन और किसी स्थान पर इतनी सुगन्धि वाला एवं विशिष्ट उत्पन्न नहीं किया जा सकता। उत्तराखण्ड की अपनी विशेषता उस दिव्य वातावरण के कारण है, जो हमेशा से दैवी प्रेरणा का उद्गम केन्द्र रहा है। ब्रह्म कमल, देवकन्द, संजीवनी बूटी और अन्य दिव्य औषधियाँ और कहीं पायी नहीं जाती। इसका कारण इस क्षेत्र का विशेष वातावरण है। अवतारों, ऋषियों की कार्यस्थली होने तथा सूक्ष्म जगत के सतत आत्मिक विभूतियों से स्पन्दित होते रहने के कारण इस क्षेत्र का अपना महत्त्व है।

हिमालय के साथ भूतकालीन इतिहास भी जुड़ा हुआ है। चिर अतीत में देवताओं का निवास यहीं था और ऐतिहासिक स्वर्ग इसी क्षेत्र में है। ऋषि परम्परा में तप साधना से लेकर लोक कल्याण की अनेकानेक योजना बनाने तक का कार्य यहीं होता था। ऋषियों के आश्रम और प्रयोगशालाएँ इसी क्षेत्र में थी। अलग होते हुए भी वे इतनी दूरी पर थी कि एक दूसरे से परामर्श करने में आवागमन सम्बन्धी अत्यधिक कठिनाई अनुभव न करें।

उत्तराखण्ड को हिमालय का हृदय माना जाता है। इस क्षेत्र को देवात्मा भी कहते हैं। सर्व साधारण को इस क्षेत्र के सम्पर्क में आकर अद्भुत प्रेरणाओं का लाभ उठाने के लिए कई तीर्थ देवालय भी यहाँ बने हैं, पर मुख्यतया इन्हीं के इर्द-गिर्द गुफाओं, सघन वनों की झोपड़ियों में ऋषियों के स्थान भी थे, जहाँ वे वैज्ञानिक आविष्कारों की तरह अपने क्रियाकलाप निर्विघ्न रूप से चलाते रहते थे। इस प्रकार ऋषि परम्परा न केवल भारत भूमि का वरन् समस्त संसार का श्रेय साधन करती थी। निराकार भगवान के साकार प्रतिनिधि की, सन्देश वाहक की भूमिका प्रायः इन्हीं द्वारा सम्पन्न होती थी। जन कल्याण के सामयिक निर्धारण यहीं होते थे। और उन्हें परिव्राजक पुरोहितों द्वारा विश्वव्यापी बनाने की योजना भी इसी क्षेत्र में बनती थी।

समय की विडम्बना ने ऋषि परम्परा को एक प्रकार से अस्त-व्यस्त कर दिया। साधु बाबा जहाँ-तहाँ गाँजा फूँकने और भ्रम जंजालों में सर्व साधारण को फँसाकर इनका शोषण करते देखे जाते हैं। ऋषि परम्परा की अस्त-व्यस्तता का ही दुष्परिणाम है कि भारत भूमि स्वर्गादपि गरीयसी नहीं रही और उसकी गरिमा मणिविहीन सर्प की तरह निस्तेज हो रही है। मध्यकाल का दुष्प्रवृत्तियों से भरा हुआ अन्धकार युग इसीलिए आया कि सूर्य, चन्द्र जैसी चमकने वाली ऋषि परम्परा पर ग्रहण लग गया और हमारी गतिविधियाँ उस स्तर की न रहीं, जिन्हें देखकर विश्व वसुधा को, भारत को जगद्गुरु मानना पड़ता और यहाँ के निवासी तैंतीस कोटि देवता माने जाते।

महर्षि व्यास ने धर्म शास्त्रों की, पुराणों की रचना बद्रीनाथ से आगे वसोर्धारा स्थान पर की थी। शरीर और मन की दिव्य शक्तियों को उभारने की योग साधना पातञ्जलि ने रुद्रप्रयाग स्थान पर की थी। याज्ञवल्क्य ने यज्ञ विधान का आविष्कार त्रियुगी नारायण क्षेत्र में किया था। विश्वामित्र ने आद्य शक्ति गायत्री का साक्षात्कार सप्तसरोवर स्थान में किया था। भागीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर उतारने की साधना गंगोत्री में भागीरथ शिला पर बैठकर की थी। चरक ने वनौषधियों का अन्वेषण करके आयुर्वेद का आविष्कार केदारनाथ में किया था। जमदग्नि उत्तरकाशी में ब्रह्म विद्या का आरण्यक चलाते थे। नारद ने शब्द ब्रह्म नाद का प्रत्यक्षीकरण गुप्तकाशी में किया था और दिव्य संगीत के माध्यम से विश्व के कोने-कोने में भक्ति भाव जगाया था। वे निरन्तर प्रव्रज्यारत रहे थे। जब अज्ञान और अनीति से वातावरण विषाक्त हो गया, तो सशक्त मूर्धन्यों का ब्रेन वाशिंग सिर उतार लेने जैसा पराक्रम परशुराम ने यमुनोत्री में तप साधना करके और शिवजी से अमोघ कुठार प्राप्त करके सम्पन्न किया था। वशिष्ठ जी ने प्रजाधर्म और राजधर्म का स्वरूप निर्धारित करके दोनों का संतुलन बिठाया था। उनका कार्यक्षेत्र देवप्रयाग के समीपवर्ती आश्रम में रहा। उन्हीं के पास ढलती आयु में चारों भाइयों समेत राम वानप्रस्थ शिक्षा प्राप्त करने गये थे। आद्य शंकराचार्य ने अपनी तपश्चर्या और साहित्य साधना ज्योतिर्मठ में की थी। पिप्पलाद ने अन्न से मन का निर्माण करने का रहस्य लक्ष्मण झूला के निकट रहकर प्राप्त किये थे। सूत−शौनक की पुराण गाथा का उद्गम ऋषिकेश माना जाता है। भरत की तपोभूमि भी वहीं है। हर की पौड़ी हरिद्वार में राजा हर्षवर्धन ने अपना सर्वस्व दान करके तक्षशिला विश्वविद्यालय का निर्माण एवं संचालन का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाया था। महर्षि कणाद ने आत्मिक कायाकल्प की विद्या सप्त सरोवर पर वहाँ आविष्कृत की थी, जहाँ आजकल ब्रह्मवर्चस है।

बुद्ध ने धर्मचक्र प्रवर्तन की, आर्य भट्ट के ज्योतिर्विज्ञान के आविष्कार की, नागार्जुन की रासायनिक प्रयोगशाला हिमालय क्षेत्र में ही थी। च्यवन की अद्भुत तपश्चर्या का क्षेत्र यही है। इसके अतिरिक्त अति पुरातन काल के तथा उसके पश्चात् वर्तमान काल के सभी उच्चस्तरीय ऋषि मुनि हिमालय क्षेत्र में रहकर दिव्य प्रेरणाएँ प्राप्त करते और प्रचण्ड आत्मबल अर्जित करते रहे हैं।

पाँच सखियों समेत गंगा इसी क्षेत्र में प्रवाहित होती है। अनेकानेक दिव्य औषधियाँ इसी क्षेत्र में उत्पन्न होती हैं और अपने प्रभाव से वातावरण में दिव्यता भरती है। देवताओं का निवास पुराणों में सुमेरु पर्वत कहा गया है। वह शिखर इसी क्षेत्र में है। नन्दन वन, शिवलिंग पर्वत के समीप ही मानसरोवर का अवस्थित होना कैलाश पर्वत की स्थिति इसी क्षेत्र में होने का संकेत करता है। सती और पार्वती दोनों की तपश्चर्या यहीं हुई थी। त्रियुगी नारायण में दोनों का ही समय-समय पर विवाह हुआ था। दक्ष अपने समय के मूर्धन्य वैज्ञानिक थे। वे कनखल में रहते थे। चाणक्य ने कुछ समय तक हिमालय में रहकर तपश्चर्या की थी। शिवजी का इसी क्षेत्र में स्थाई निवास है। कृष्ण रुक्मिणी समेत बद्रीनारायण में श्रेष्ठ सन्तान के लिए साधना करते रहे। सीता को आश्रय देने वाले और लव कुश को महान योद्धा बनाने वाले वाल्मीकि इसी क्षेत्र में रहे हैं। शकुन्तला और चक्रवर्ती भरत का पालन प्रशिक्षण इसी उत्तराखण्ड में हुआ था।

अभी भी हिमालय के उत्तराखण्ड में गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ ये चार धाम हैं ।। पाँच प्रयाग, पाँच काशियाँ, पाँच सरोवर, पाँच गंगाएँ इसी क्षेत्र में अवस्थित हैं। देवता और ऋषि स्थूल या सूक्ष्म शरीर से अभी भी यहाँ विद्यमान हैं। इन कारणों को देखते हुए उत्तराखण्ड क्षेत्र हिमालय का हृदय और आध्यात्मिक शक्ति प्रवाह का ध्रुव केन्द्र माना जाता है। थियोसोफिकल सोसायटी ने इन दिनों विश्व संचालक शक्तियों की पार्लियामेण्ट इसी को कहा है। पाण्डव सशरीर स्वर्गारोहण की योजना बनाकर इसी क्षेत्र में चले आये थे। इसके अतिरिक्त समय-समय पर अन्य तपस्वी इसी क्षेत्र का आश्रय लेते रहे हैं और इस क्षेत्र में बिखरे पड़े मणि मुक्तकों के दिव्य अनुदानों से झोली भरकर कृत-कृत्य होते रहे हैं।

पुरातन काल जैसी ऋषि विभूतियाँ इन दिनों देवात्मा हिमालय की गोदी में आश्रय पा नहीं रही हैं, तो भी पुरातन पूँजी इस क्षेत्र को अभी भी सामर्थ्यवान बनाये हुए हैं। देवात्मा हिमालय अभी भी एक अतीव शक्ति सम्पन्न एवं प्रत्यक्ष देवता है।

भारत में विभिन्न स्थानों पर अनेकानेक देवताओं के देवालय हैं। आवश्यकता समझी गई कि देवात्मा हिमालय की आत्मा का आह्वान करके प्राण प्रतिष्ठा सहित हिमालय का एक दिव्य देवालय बनाया जाय। इस आवश्यकता की पूर्ति शान्तिकुञ्ज में अवस्थित हिमालय में की गई है। यह सप्त ऋषियों की वह पुरातन तपोभूमि है, जिसके लिए गंगा ने उनका तप निर्विघ्न चलते देने के लिए अपने आगमन के समय पर सात धारायें बाँट दी थी। अभी कुछ समय पूर्व सरकार ने भूमि प्राप्त करने के लिए बाँध बना दिया है। इसके कुछ दशक पूर्व ब्रह्मवर्चस और शान्तिकुञ्ज के दोनों ही स्थानों पर गंगा की धारायें प्रवाहित होती थी। देवात्मा हिमालय के उत्तराखण्ड क्षेत्र का देवालय बनाना इसी क्षेत्र में उपयुक्त समझा गया। यह शान्तिकुञ्ज के एक विशाल कक्ष में अवस्थित है। उसमें विद्यमान तीर्थों की झाँकी भी उसी में होती है। भाव श्रद्धा वाले दर्शक इस छोटी प्रतिमा में ही समूचे उत्तराखण्ड क्षेत्र का दर्शन भली प्रकार कर सकते हैं।

शरीर के साथ प्राण भी होने चाहिए। दर्शन के साथ गतिविधियाँ भी जुड़ी रहनी चाहिए। शान्तिकुञ्ज के प्रयास और कार्यक्रम यही हैं। इस आश्रम में क्या होता है और क्या होने जा रहा है, इस पर गम्भीरतापूर्वक दृष्टिपात किया जाय तो प्रतीत होगा कि न केवल हिमालय का दृश्यमान शरीर ही यहाँ है, वरन् वे सारी गतिविधियाँ भी चलती हैं, जो पुरातन काल में हिमालयवासी ऋषियों ने अपनायी थी और जिनका लाभ प्राप्त करके समस्त संसार, समस्त जन समुदाय कृत-कृत्य हुआ था।

महाप्रज्ञा गायत्री के दृष्टा विश्वामित्र का यहाँ मन्दिर है। हर आश्रमवासी को अनिवार्यतः गायत्री उपासना करनी पड़ती है। बाहर से सैकड़ों साधक निरन्तर आते और गायत्री अनुष्ठान समेत समग्र स्वास्थ्य संवर्धन की साधना करते हैं।

याज्ञवल्क्य के यज्ञ विज्ञान का यहाँ नौ कुण्डीय यज्ञशाला में निरन्तर यज्ञ होता है और उसमें सभी साधक भाग लेते हैं। आगन्तुकों को यज्ञ के माध्यम से शारीरिक, मानसिक और आत्मिक व्याधियों के निवारण की विधि बताई और कराई जाती है।

चरक की वनौषधि शोध को यहाँ आगे बढ़ाया गया है। शान्तिकुञ्ज और ब्रह्मवर्चस में दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ लगायी गई हैं और एक साधन सम्पन्न प्रयोगशाला द्वारा उनमें से प्रत्येक का परीक्षण होता रहता है, ताकि उनकी प्रामाणिकता पर कोई अँगुली न उठा सके।

पातञ्जलि और कणाद की योगाभ्यास साधना का यहाँ अभिनव संस्करण देखा जा सकता है। हर साधक का शारीरिक, मानसिक और अन्तःकरण परीक्षण कीमती मशीनों और एम. डी., एम. एस. स्तर के सुयोग्य डाक्टरों द्वारा होता है। साधना तथा उपचार इसी आधार पर चलते हैं। दस-दस दिन के समग्र स्वास्थ्य संवर्धन सत्र इसी प्रयोजन के लिए चलते हैं और उनके द्वारा निरन्तर बड़ी संख्या में आगन्तुक लाभान्वित होते हैं।

व्यास परम्परा के अनुरूप शान्तिकुञ्ज में युग साहित्य का सृजन, मुद्रण एवं प्रकाशन क्रम निरन्तर चलता है। आर्ष ग्रन्थों का, वेद, उपनिषद्, दर्शन आदि का अनुवाद प्रकाशन पहले हो चुका है। अब जीवन और समाज के हर पक्ष पर प्रकाश डालने वाला साहित्य विनिर्मित किया जा रहा है और उनका अनुवाद हर भाषा में हो रहा है। जमदग्नि परम्परा में जन साधारण को संस्कारवान बनाने का प्रचलन था। शान्तिकुञ्ज में षोडश संस्कार कराने की व्यवस्था है। यहाँ उपनयन होते हैं, पितरों का श्राद्ध-तर्पण भी होता है, बिना खर्च के विवाह भी बड़ी संख्या में हर साल होते हैं। जन्म-दिन और विवाह-दिन मनाने भी प्रज्ञा परिजन बड़ी संख्या में यहाँ आते रहते हैं।

परशुराम के अनुरूप विचार क्रान्ति अभियान को व्यापक बनाया जा रहा है। कुरीतियों, दुष्प्रवृत्तियों, अवांछनीयताओं, मूढ़मान्यताओं, अनीतियों को जड़-मूल से उखाड़ने के लिए लोक मानस को झकझोरा जा रहा है और जो उचित है, उसी को अपनाने के लिए सहमत किया जा रहा है। यह ब्रेन वाशिंग बड़ा ही प्रभावशाली और सफल सिद्ध हो रहा है।

नारद परम्परा में संगीत और प्रवचन परामर्श का युग शिल्पी विद्यालय चलता है और प्रशिक्षित परिव्राजक जीप टोलियों द्वारा देश भर में हर वर्ष हजारों प्रज्ञा आयोजन सम्पन्न करते हैं।

उद्दालक परम्परा में बालकों का गुरुकुल और अनुसूया परम्परा में महिलाओं का प्रशिक्षण क्रमबद्ध रूप से चलता है और छात्राओं की पुरातन परम्परा को जीवन्त रखा जाता है। छात्रा, महिलाएँ और बालिकाएँ ही मिल-जुलकर यहाँ के अन्न क्षेत्र का संचालन करती हैं।

बुद्ध परम्परा के अनुरूप यहाँ के कार्यकर्ता विदेशों में भी धर्म परम्परा को प्रतिष्ठित एवं अग्रगामी बनाने का प्रयत्न करते हैं। उनने भारत से बाहर चौहत्तर देशों में मिशन की विचारधारा में लाखों लोगों को दीक्षित एवं समर्थक बनाया है।

पुरातन काल की समुद्र मंथन योजना के अनुरूप अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का भारी शोध प्रयास चला है। यह समस्त संसार में पहला और अनोखा प्रयास है। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान इसी निमित्त बना है, जिसमें लाखों रुपये के शोध उपकरण एवं बहुमूल्य यन्त्र हैं। इनके द्वारा जो निष्कर्ष निकलते जा रहे हैं, उन्हें समुद्र मंथन द्वारा निकली रत्न राशि के समतुल्य होने का अनुमान लगाया जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। यज्ञ विज्ञान की विभिन्न साधनाओं की परिणति की शोध इस प्रयास के अन्तर्गत अतीव गम्भीरता पूर्वक हो रही है।

शंकराचार्य परम्परा के अन्तर्गत देश के कोने-कोने पर चार धाम स्थापित किए गये थे। समर्थ गुरु रामदास के प्रयास से महाराष्ट्र के तत्वावधान में देश के कोने-कोने में चौबीस सौ शक्तिपीठ तथा बारह हजार स्वाध्याय मंडल प्रज्ञा संस्थानों का निर्माण हुआ है, यह स्थापना भी अभूतपूर्व है।

सूत शौनिक परम्परा के अनुसार प्रज्ञा पुराण का नया निर्माण हुआ है। इसके अभी तीन खण्ड छपे हैं, हर वर्ष एक नया खण्ड प्रकाशित करने की योजना है। इसकी कथाएँ इतनी लोकप्रिय हुई हैं, जिनने अन्य सभी कथाओं को पीछे छोड़ दिया है।

भूतकाल में कितने ही आरण्यक और विश्वविद्यालय धर्म प्रचारकों को प्रशिक्षित करने के लिए बने थे, अब वह कार्य अपनी सीमित सामर्थ्य के कारण अकेला हरिद्वार का शान्तिकुञ्ज कर रहा है। उसमें चौबीस हजार से अधिक प्रज्ञा पुत्र धर्म प्रचार का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में युगान्तरीय चेतना का अलख जगाते, आलोक वितरण करते हुए छोटे-बड़े आयोजन निरन्तर करते रहते हैं।

ऋषि कणाद अपनी आश्रम व्यवस्था खेतों में छूटे हुए अन्न से करते थे। शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ की यह व्यवस्था महिलाओं द्वारा एक मुट्ठी अन्न एवं पुरुषों द्वारा दस पैसा नित्य देने के आधार पर एकत्रित हुए राशि से ही चलती है।

देवात्मा हिमालय के उत्तराखण्ड क्षेत्र की प्रतीक प्रतिमा रूप में विनिर्मित यह आश्रम अद्भुत एवं अनुपम है। हिमालय के अंचल में पले ऋषियों ने जिन-जिन सत्प्रवृत्तियों को सुविस्तृत किया था और जो आत्मबल एकत्रित किया था, उसका छोटा नमूना इस आश्रम में पहुँचकर प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। वशिष्ठ-अरुन्धती की तरह यहाँ एक ऋषि युग्म का प्रयास इस योजना का सूत्र संचालन करता है। अब तक की प्रगति को देखने-सुनने वाले आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

गुरुवर की अमृतवाणी*****************गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो...
22/08/2026

गुरुवर की अमृतवाणी
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गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

मित्रो! देवताओं की कृपा हम आपको दिलाएँगे, पर आप उसे रखेंगे कहाँ? आप रखने वाली चीज का इंतजाम कर लीजिए, बाकी सब चीजें बहुत सरल हैं। जिन चीजों के लिए आप हैरान हो रहे हैं, वो कुछ कठिन नहीं हैं। वह सरल हैं। माँगने वाले भी बहुत हैं और देने वाले उससे भी ज्यादा हैं, खासकर आध्यात्मिक क्षेत्र में। आध्यात्मिक क्षेत्र में विद्यार्थियों की कमी है, मास्टरों की कमी नहीं है। नहीं साहब ! मास्टर कम हैं। मास्टर कम हैं तो आप वहाँ चले जाइए गुरुकुल काँगड़ी में और वहाँ देख करके आइए। ये कौन से क्लास में पढ़ रहे हैं? साइकोलॉजी में एम० ए० कर रहे हैं। साइकोलॉजी में कितने विद्यार्थी हैं? साहब ! दो विद्यार्थी हैं और मास्टर कितने हैं? तीन मास्टर हैं। धत् तेरे की ये क्या हुआ? अरे बेटे! विद्यार्थी कहाँ हैं दुनिया में। आध्यात्मिक क्षेत्र में तो खासकर विद्यार्थी नहीं हैं। नहीं साहब! हम गुरु की तलाश कर रहे हैं। गुरु की तलाश कर रहा है कि शिष्यों की तलाश कर रहा है। शिष्य नहीं हैं बेटे! शिष्य दुनिया से गायब हो गए हैं। अगर दुनिया में से शिष्य गायब न हुए होते तो गुरु धन्य हो गए होते।

साथियो! दुनिया में शिष्यों का अभाव है। रामकृष्ण परमहंस के पास ढेरों के ढेरों लोग जाते थे। कौन जाते थे? शिष्य जाते थे, लेकिन कोई सच्चा शिष्य नहीं मिला। कोई एक मिल गया तो गुरु धन्य हो गए और नाचने लगे, कूदने लगे, निहाल हो गए। गुरु मिलना बड़ी बात है, लेकिन चेला मिलना बहुत मुश्किल की बात है, जब कभी कोई ऐसा चेला मिल जाता है तो गुरु धन्य हो जाते हैं। आप समझते नहीं हैं इस बात को। ईसामसीह धन्य हो गए। कब धन्य हो गए? जब उनको सेंटपॉल मिल गए। सेंटपॉल कौन थे? सेंटपॉल ईसा से तीन सौ वर्ष बाद पैदा हुए थे। उन्होंने सारी की सारी क्रिश्चिनिटी को नए ढंग से विस्तारित किया है। उन्होंने मर्कस से लेकर बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट और न्यू टेस्टामेंट का नए सिरे से डिवीजन किया। ईसाई धर्म का, जो वर्तमान स्वरूप है, वह सेंटपॉल का दिया हुआ है। सेंटपॉल को पा करके ईसा धन्य हो गए। यह तो मैं नहीं कहता कि ईसा को पा करके सेंटपॉल धन्य नहीं हुए, लेकिन मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि सेंटपॉल जितने प्रसन्न हुए होंगे ईसा की कृपा पा करके, ईसा उससे कम प्रसन्न नहीं हुए होंगे सेंटपॉल को पा करके।

मित्रो! हम अपने गुरु को पा करके बड़े प्रसन्न हैं। क्यों? क्योंकि हमको एक सामर्थ्यवान सत्ता मिल गई है, जो कि समय-समय पर पिछले पचपन साल से दिन-रात हमारी सहायता कर रही है। हम धन्य हैं। कौन करता है किसी की सहायता? जरूरत पड़ती है तो इतनी अकल हम कहाँ से लाते? इतनी बुद्धि कहाँ से लाते, जिससे वेदों का भाष्य करते। वेदों का भाष्य चार आदमियों ने किया है, पाँचवाँ आदमी अभी तक दुनिया में नहीं हुआ है। कौन नहीं हुआ है? एक आदमी का नाम था—सायण। एक का नाम था—उब्बट। एक का नाम था—महीधर और एक का नाम था—रावण। प्राचीनकाल के केवल चार भाष्यकार हुए हैं। अब और कोई भाष्यकार हो सकते हैं? नहीं बेटे! वेदों का भाष्य करना बहुत कठिन कार्य है। यह अकल हम कहाँ से लाए? यह हमारे गुरु की कृपा थी। अठारह पुराणों के भाष्य हमने किए? नहीं बेटे! हमने नहीं किए। हमारी अकल नहीं है, वह तो कराने वाला कोई और है, जो यह सब कराता रहता है और कठपुतली की तरह हम उसके इशारे पर नाचते रहते हैं।

आज के शिष्य शिष्य नहीं हैं। ये कौन हैं? ठग हैं, जालसाज हैं। आपको हम गुरु बना लेंगे। आपने हमको गुरु बना दिया। हमें गुरु बना लेंगे तो आपका पेशाब निकल जाएगा। राजा हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र को गुरु बनाया था। उन्होंने उनका सारा कचूमर निकाल दिया था। आप गुरु किसे कहते हैं? नहीं साहब! गुरु उसे कहते हैं, जो शिष्य पर कृपा करके बेटा-बेटी पैदा करा देता है। लोगों की तरक्की करा देता है, अच्छी औलाद पैदा करा देता है। चुप बेईमान कहीं के। गुरु ऐसा करते हैं? नहीं साहब ! आइए गुरु-शिष्य का खेल खेलेंगे और राजा-रानी का खेल खेलेंगे। बेटे! ये बच्चों के खेल-तमाशे हैं। यही खेल तू गुरु-शिष्य के रूप में खेलना चाहता है। मित्रो! हम और आप क्या करते हैं? गुरु−शिष्य का खेल खेलते हैं। कैसे खेलते हैं? तू मेरा गुरु बन जा और मैं तेरा चेला बन जाऊँगा। नहीं साहब! आप गुरु बन जाइए और हम चेले बन जाएँगे। ये खेल है। अध्यात्म इससे कहीं बड़ी चीज है। इसके अन्दर जो प्राप्त होती है, बड़ी चीज प्राप्त होती है। इसमें छोटी चीजें नहीं प्राप्त होतीं। आप यह बात ध्यान रखना कि बड़ी चीजों की कीमत भी बड़ी होती है। बड़ी चीजें बड़ी कीमत में आती हैं, आप हमेशा ध्यान रखिए और छोटी चीजें कम दाम की आती हैं। छोटी चीजें धूपबत्ती की कीमत पर, सुपारी की कीमत पर, फूलों की कीमत पर, चावलों की कीमत पर लगभग उसी प्रकार की कम कीमत पर आ जाएँगी, जिस कम कीमत की चीज का आपने सामान जुटाया है।

गायत्री ही कामधेनु है*****************गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ध...
22/08/2026

गायत्री ही कामधेनु है
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गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

देवियो, भाइयो! चौबीस साल के चौबीस पुरश्चरण पूरा कर लेने के पश्चात् मैंने सबसे पहले गायत्री की एक पुस्तक लिखी थी। गायत्री महाविज्ञान तो बाद में लिखा। पहले छोटी सी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी। उसका नाम था— ‘‘ब्राह्मण की कामधेनु गायत्री।’’ जब सबसे पहले यह किताब छपी, तो ब्राह्मणों ने यह कहा कि यह तो केवल पण्डितों की है, ब्राह्मणों की है। आचार्य जी ने भी पुरश्चरण करने के पश्चात् यही लिखा है। इसको ब्राह्मण जप कर सकता है और कोई बिरादरी वाला नहीं जप सकता। देख लीजिए हम जो कहते थे, वही आचार्य जी कहते हैं। आचार्य जी के और हमारे कहने में कोई फर्क नहीं है।

मिलो! इस पुस्तक को पढ़ करके, पुरातन पंथियों ने यही बात कही, जो बहुत दिनों से कहते हुए चले आ रहे थे। जबकि वास्तव में मेरा मतलब ब्राह्मणत्व से था, ब्राह्मण वंश से नहीं था। पर मैं क्या कर सकता था, गलती हो गयी। इसलिए पहला संस्करण छपने के बाद मैंने इस किताब का छापना बन्द कर दिया और किताब का नाम बदल दिया। फिर मैंने किताब का नाम लिखा— ‘‘गायत्री ही कामधेनु है।’’ कामधेनु का मतलब है- सबकी कामधेनु। क्या ब्राह्मण, क्या बनिया, क्या हिन्दू, क्या मुसलमान- सबकी कामधेनु हैं। फिर तीस साल बाद मैं दूसरा पाठ पढ़ाता हूँ। दूसरा पाठ क्या पढ़ाता हूँ? जब तक मैं यह कहता था कि गायत्री का अधिकार सबको है। सब जप कर सकते हैं। यह बात भी सही है।

मित्रो! हिन्दुस्तान से बाहर विदेशों में मैं जहाँ भी गया, वहाँ मेरा वास्ता ईसाइयों से पड़ा। मुसलमानों से वास्ता पड़ा। हिन्दुओं की बात तो आप जाने दीजिए। हिन्दुओं के बनिया, ब्राह्मण, ठाकुर आदि की बात आप छोड़ दें। विदेशियों में मुसलमान और ईसाइयों से मुझे वास्ता पड़ा। अफ्रीका में जो नीग्रो हैं, उनमें से ज्यादातर, मुसलमान है, या ईसाई हैं। हिन्दू तो कोई है ही नहीं। बहुत दिनों तक मैं वहाँ प्रचार करता रहा। मैंने उनको गायत्री मंत्र सिखाया। गायत्री मंत्र की दीक्षा दी। मुसलमानों को भी दी, ईसाइयों को भी दी, दूसरे लोगों को दी। पूना में एक सज्जन थे। जाति से मुसलमान थे। हमारे गायत्री तपोभूमि पर रहते थे। कुछ दिन बाद उन्होंने कहा— ‘‘गुरुजी! मैं हिन्दू होना चाहता हूँ।’’ नहीं बेटे, तू हिन्दू मत बन, मुसलमान ही बना रह। तुझे मुसलमानों में काम करना है। एक बार जब मैं पूना गया तो उनको मालूम पड़ा कि आचार्य जी आये हैं, तो अपने सारे- के शिष्यों को लेकर कोई एक हजार मुसलमान आ गये। पूछने पर पता चला कि वे सबके सब दादा गुरु के दर्शन करने आये हैं। दादा गुरु कौन हैं? दादा गुरु ये आचार्य जी हैं। हमारा गुरु वह मुसलमान जो पहले हमारे यहाँ मुसलतापुर में रहते थे और दादा गुरु हम।

मित्रो! दादा गुरु के हजार मुसलमान आये और बोले कि आपको हमारे यहाँ चलना ही पड़ेगा। हमारे यहाँ भी गायत्री यज्ञ होगा, आपको चलना ही पड़ेगा। वे डॉक्टर साहब। जिनके यहाँ मैं ठहरा हुआ था, उन्होंने कहा गुरुजी। इनके यहाँ तो चलना ही चाहिए, और कहीं मत चलना। चलने की तैयारी हो गयी और हम वहाँ गये। वहाँ उन्होंने- मुसलमानों ने जप कराया था और हवन कराया था। बम्बई में हम जाते हैं, तो ढेरों- के पारसी आते हैं। पारसियों के यहाँ अग्निपूजा होती है। पारसी हिन्दुस्तान के रहने वाले नहीं हैं। वे ईरान के रहने वाले हैं। पारसियों में नानक जी श्राफ रहते थे। उन्होंने हमारे गायत्री का प्रचार सारे पारसी समाज में किया था। अभी भी यहाँ हर साल वे आते हैं। अभी हर साल एक पारसी लड़की यहाँ आती है। पिछले शिविरों में भी वह थी। पारसियों में बहुत लोग हैं, जो यहाँ हर साल आते हैं।

बेटे, अब मैं क्या कहता हूँ। अब मैं अपनी गलती सुधारता हूँ? नहीं बेटे, मैं नहीं सुधारता। जहाँ तक गायत्री का मनुष्य के जन्म से सम्बन्ध है, वहाँ तक मनुष्यमात्र को—प्रत्येक मनुष्य को गायत्री का का अधिकार है। सूरज का अधिकार सबको है। पानी का अधिकार सबको है। इस तरह जितनी भी चीजें भगवान की बनाई हुई हैं, उन पर सभी का अधिकार है। किसी को भी वंचित नहीं किया गया है। क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, क्या बनिया, क्या ब्राह्मण, सबको गायत्री का अधिकार है। लेकिन एक बात और मैं आपसे कहता हूँ, जो तीस साल पहले मैने कही थी। वही बात अब मैं फिर से कहता हूँ कि वह बात सही थी। गायत्री कामधेनु तो है, पर वह सबकी कामधेनु नहीं है। गायत्री केवल ब्राह्मण की कामधेनु है।

ब्राह्मण से आपका क्या मतलब है? मित्रो! ध्यान रखिये, मैं जन्म से जाति पर विश्वास नहीं करता। मैं गीता का अनुयायी हूँ और भगवान श्रीकृष्ण ने वर्णाश्रम धर्म के बारे में जो स्पष्ट वक्तव्य कहा था, उसका अनुयायी हूँ। उन्होंने कहा था- ‘‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः।’’ (४- १३) अर्थात् गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर हमने चारों वर्णों को बनाया। गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर बने हुए वर्ण को तो मैं मानता हूँ, पर जातीयता के आधार पर नहीं। जाति के आधार पर आप ब्राह्मण है? नहीं बेटे, जाति से हम ब्राह्मण नहीं हैं, जाति से हम धोबी हैं। धोबी कैसे हैं? नहीं साहब! आप तो कहते थे कि हम पण्डित हैं? पण्डित तो हैं, परन्तु जाति से हम धोबी हैं। धोबी कैसे हैं? धुलाई करना हमारा काम है। कपड़े धोना भी हमारा काम है। मन का धोना भी हमारा काम है, जीवन को धोना भी हमारा काम है। हमारे यहाँ ड्राई क्लीनिंग फैक्ट्री है। हम हर चीज को धोते हैं। दाग, धब्बे लगे हुए आदमी को धो करके पाक- साफ कर देते हैं। हम धोबी हैं। नहीं साहब! आप तो ब्राह्मण हैं! हाँ बेटे, हम ब्राह्मण भी हो सकते हैं, लेकिन असल में हम धोबी हैं।

मित्रो! मैं यह कहना चाहता था कि गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है। इससे आपका क्या मतलब है? ब्राह्मण की कामधेनु का मतलब ‘ब्राह्मणत्व’ से है। अगर व्यक्तित्व में ब्राह्मणत्व का जन्म हुआ तो यह निश्चित रूप से कामधेनु के बराबर फल देगी। अगर ब्राह्मणत्व न हुआ, तो फल नहीं देगी। ब्राह्मणत्व की क्या मान्यतायें हैं? ब्राह्मणत्व की दो मान्यतायें हैं—एक तो आदमी को चरित्र की दृष्टि से पवित्र और शुद्ध होना चाहिए। मनुष्य अपने जीवन में जितना ज्यादा शुद्ध और पवित्र होता हुआ चला जायेगा, उतना ही उसके भीतर से ब्रह्मतेज उभरता हुआ चला जायेगा। ब्रह्मतेज कहीं बाहर से थोड़े ही माँगना पड़ता हैं। आपका जो यह ख्याल है कि यह बाहर से आता हैं। भगवान की कृपा बाहर से आती है। देवी- देवताओं का अनुग्रह बाहर से आता है और सिद्धियाँ बाहर से आती हैं, तो बेटे, आपका यह ख्याल गलत है। इसकी जड़ें भीतर से आती हैं।

मित्रो! पेड़ की जड़ें जमीन के भीतर होती है। आपको दिखाई पड़ता है कि पत्ते बाहर से आते हैं, फूल बाहर से आते हैं। लीजिए साहस! वसन्त ऋतु आ गयी और वसन्त ऋतु आते ही फूल आ गये। नहीं बेटे, वसन्त ऋतु से फूल नहीं आते। पौधों की जड़ों में से फूल आये हैं। वृक्ष जितना बड़ा होता है, उसकी जड़ें उतनी ही गहरी होती हैं। उतनी ही फैली हुई होती हैं। जड़ें खुराक खींचती हैं और पेड़ को खुराक देती हैं। यही खुराक पत्तों को चली जाती है, फूलों को चली जाती है, फलों को चली जाती है। वास्तव में ये फल आसमान से नहीं टपकते हैं, जैसा कि आपका ख्याल है। नयी कोपलें आसमान से नहीं टपकती हैं। ये जड़ में से निकलती हैं। इसी तरह आदमी की जड़ें उसके भीतर रहती हैं। भगवान का उदय भीतर से होता है। भगवान बाहर से नहीं आता, यह बात ध्यान रखना। नहीं साहब! भगवान बाहर से आता है, ब्रह्मलोक से आता है, बैकुंठलोक से आता है, बद्रीनाथ में से आता है, केदारनाथ से आता है। बेटे, कहीं से नहीं आता, भीतर से निकलता है भगवान!

गायत्री मंत्र क्यों जपें?****************मित्रो! अध्यात्म में जो शिक्षण हम प्राप्त करते हैं, उसको जीवन में उतारना पड़ता ...
22/08/2026

गायत्री मंत्र क्यों जपें?
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मित्रो! अध्यात्म में जो शिक्षण हम प्राप्त करते हैं, उसको जीवन में उतारना पड़ता है। इससे कम में कोई बात बनती नहीं, गाड़ी आगे बढ़ती नहीं। उच्चारण हमारे लिए आवश्यक तो है, पर काफी नहीं है। राम नाम या गायत्री मंत्र तो सभी याद कर लेते हैं।.....अक्षर याद कर लेने भर से अध्यात्म का कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता, जैसा कि आम लोगों का ख्याल है। आम लोगों को मुद्दतों से इसी तरह बहकाया जाता रहा है कि अक्षर याद कीजिए, अक्षरों का उच्चारण कीजिए और स्वर्गलोक को चले जाइए। पर ऐसा होता नहीं है। शुरुआत हम राम नाम से करें, ठीक है। नाम तो लेना ही पड़ता है। नाम नहीं लेंगे तो बात कैसे बनेगी? जिस तक पहुँचना है उसका नाम तो लेना ही पड़ेगा। स्टेशन का नाम बताए बिना तो उसका टिकट भी नहीं मिलता।.....लेकिन अगर नाम के उच्चारण तक ही सीमित रहा गया तो समझना चाहिए कि जिस तरीके से सुग्गा (तोता) राम नाम और गायत्री मंत्र को बोलता रहता है, पर लाभ कुछ नहीं पाता, उसी तरह उससे कम या अधिक लाभ आपको भी नहीं मिलेगा।

नाम उच्चारण आवश्यक है, पर इससे आगे उसे हमारी अन्तरात्मा में इस गहराई तक समा जाना चाहिए कि वह हमारे व्यवहार में उतरने लगे।.....हम भी बार-बार गायत्री मंत्र याद करने की बात कहते हैं और अभी २४ हजार का जप करा रहे हैं। आप यह पूछ सकते हैं कि उसे चाहे हम एक बार जप कर लें या २४ हजार बार। फिर आप बार-बार क्यों कराते हैं? उससे क्या फायदा? गायत्री मंत्र याद भी हो गया और उसका अर्थ भी हम समझ गए कि हे भगवान हमारी बुद्धि को शुद्ध-पवित्र बना दीजिए। आप यही रेपिटिशन बार-बार क्यों कराते हैं? किस काम के लिए कराते हैं? आपको यह सवाल करना चाहिए और इसका जवाब मालूम करना चाहिए।

साथियो! रेपिटिशन इसलिए कराते हैं कि हमारा मस्तिष्क बड़ा भुलक्कड़ है। ऐसा भुलक्कड़ है कि इससे ज्यादा भुलक्कड़ इस दुनिया में कोई होगा क्या? जहाँ तक भौतिक जीवन का सवाल है, वहाँ तक हम और आप बिल्कुल सही हैं, कभी भुलक्कड़ नहीं हो सकते। इस मामले में हमारा दिमाग बहुत चालाक है, लेकिन इस मामले में वह इतना वाहियात है कि हम अपने जीवन-लक्ष्य को अनायास ही भूल जाते हैं। हम कौन हैं? हमारा क्या लक्ष्य है? हमारा क्या कर्तव्य है? हमारे जीवन का स्वरूप क्या है? हमको मालूम नहीं है। मूल चीज को हम एकदम भूल जाते हैं। बाहर की सब चीजें हमको याद रहती हैं कि दुकान में कितना नफा होगा, किसका लेना है, किसका देना है, आदि बातें हमको ऐसे याद रहती हैं कि कभी भी उसमें भूल नहीं पड़ती। लेकिन जहाँ तक अपनी जीवात्मा का सवाल है, परमात्मा का सवाल है, इसमें भूल पर भूल होती चली जाती है। इसलिए इस भुलक्कड़पन को दूर करने के लिए हम बार-बार आपसे गायत्री मंत्र का जप कराते हैं, ताकि आपकी जीवात्मा में वह घुल जाए और आपके स्मरण में, अन्तःचेतना में उसको प्रवेश करने का मौका मिल जाए। ग्रामोफोन के रिकार्ड के तरीके से हमारी जीभ की नोंक कई तरह से अक्षरों का, मंत्रों का उच्चारण कर लेती है, पर हमारे जीवन में वे समाविष्ट नहीं हो पाते, प्रवेश नहीं कर पाते। फलतः हमको बार-बार याद करना पड़ता है। उच्चस्तरीय सिद्धान्तों को जीवन में प्रवेश कराने के लिए, अन्तःचेतना में नए संस्कार जमाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। जिस तरह इम्तहान की तैयारी के लिए उसे बार-बार याद करना पड़ता है, उसी प्रकार हम आपको गायत्री मंत्र के जप के रूप में बार-बार रेपिटिशन कराते हैं ताकि आपकी याददाश्त में से जो बेशकीमती चीज भूल गई, उस गँवाई हुई चीज को आप तलाश पाएँ।.....

हम आपको जो बार-बार जप कराते हैं, उसके कई प्वाइंट हैं। पहला प्वाइंट मैंने आपको शिक्षक-छात्र का पढ़ने-पढ़ाने का बताया है। दूसरा व्यायामशाला का। व्यायामशाला में आप जाइए और पहलवान जी से पूछिए क्यों साहब, क्या हो रहा है? आप कितने दण्ड-बैठक करते हैं? उत्तर मिलेगा 200-300 बैठक करते हैं। यह क्या है? रेपिटिशन जिसे बार-बार करना पड़ता है। मिलिट्री वाले लेफ्ट-राइट और कवायद के रूप में रोज रियाज करते रहते हैं। संगीत को जानने वाले रोज अपना रियाज करते रहते हैं। रियाज हाथ से गया कि संगीत हाथ गया। स्नान करने और दाँत माँजने में हम रोज रेपिटिशन करते हैं। बर्तन साफ करते हैं तब, कपड़े साफ करते हैं तब, यह सब रेपिटिशन है। मन के ऊपर जो मलीनताएँ छाई हुई हैं, उसे धोने के लिए राम-नाम के माध्यम से, बार-बार जप करने के माध्यम से रेपिटिशन करना पड़ता है।.....हम बार-बार भगवान को पुकारते हैं कि हे भगवान! आप कहाँ हैं? आइए | हमारी जीवात्मा! आप कहाँ हैं? आइए। हमारे जीवन-लक्ष्य, हमारे उद्देश्य, हमारे जीवन की महानता आप कहाँ हैं? हे हमारे आदर्श! आप कहाँ हैं? आप आइए और हमको ले करके चलिए। बेटे, इसी के लिए हम जप कराते हैं आपसे।.....

जप का मोटा उद्देश्य तो मैं कितनी बार आपको समझाता रहा हूँ। गायत्री मंत्र का टाइपराइटर से उदाहरण देता रहा हूँ। मंत्र का हमारी जीभ से उच्चारण होता है। इससे शक्तिकेन्द्र खुल जाते हैं। बार-बार एक लयबद्ध और क्रमबद्ध शब्दों के उच्चारण करने से एक गति पैदा होती है—शब्द की गति। लोहे के पुल के ऊपर से फौजी कदम से कदम मिलाकर चलते हैं तो क्रमबद्ध एक लय उत्पन्न होती है, जिससे पुल के गिरने का जोखिम पैदा हो जाता है। इसलिए उन्हें कदम से कदम मिलाकर पुल पर चलने से मना कर दिया जाता है। इसी तरह एक लयबद्ध, दिशाबद्ध, क्रमबद्ध ढंग से उच्चारण किया हुआ शब्द इतना शक्तिशाली हो जाता है, जिसे समझाना मेरे लिए मुश्किल है। लेकिन साइंस के साथ मैं आपको समझा सकता हूँ, कि बार-बार एक ही शब्द को, एक ही गति से, एक चक्र से घुमा देने से ‘सेंट्रीफ्यूगल फोर्स’ पैदा हो जाती है। श्रेष्ठ शब्दों के गुंथन और बार-बार उनके उच्चारण के माध्यम से हमारे भीतर सेंट्रीफ्यूगल फोर्स पैदा हो जाती है। इसके अतिरिक्त बार-बार एक ही शब्दोच्चारण का एक साइकोलाजिकल प्वाइंट भी है। पैरासाइकोलॉजी एवं मेटाफिजिक्स के हिसाब से हमारी चेतना चार हिस्सों में बँटी हुई है, जिसे प्रशिक्षित करने के लिए चार आधार और स्तर हैं। पहला वाला स्तर जिसको हम ‘लर्निंग’ कहते हैं। यह दिमाग का वह स्तर है, जो केवल एक बात को समझा देने से जानकारी मिल जाती है, जैसे आपको बता दिया कि ऋषिकेश यहाँ से 22 मील दूर है। इसकी जानकारी आपको हो गई। दूसरी परत वह है जिसे हम ‘रिटेंशन’ कहते हैं अर्थात् प्रस्तुत जानकारी को स्वभाव का अंग बना लेना। जिस बात को हम निरन्तर करते रहते हैं, बहुत दिनों बाद वह हमारे स्वभाव में शामिल हो जाती है, आदत में शामिल हो जाती है। यह रिटेंशन कहलाता है। एक और परत है, जिसमें बहुत सी चीजें दबी हुई पड़ी रहती हैं और बड़ी मुश्किल से ही कभी-कभी याद आ जाती हैं। चेतना की इस परत में बहुत सारी चीजें दबी हुई पड़ी होती हैं, जिन्हें हम भूल गए हैं। भूली हुई उन चीजों के ऊपर जब हम जोर देते हैं, उन पर प्रकाश फेंकते हैं तो वे स्मृतियाँ उठकर खड़ी हो जाती हैं, जाग जाती हैं, जिसे ‘रीकाल’ कहते हैं। आखिरी परत है—‘रीकॉग्नीशन।’ रीकॉग्नीशन उसे कहते हैं, जिसमें कि मान्यताएँ, आस्थाएँ, निष्ठाएँ और विश्वास जम जाते हैं। एक के बाद एक परत मिलती हुई चली जाती हैं। जप के द्वारा, उपासना के द्वारा अपनी जीवात्मा को उस स्थिति पर ले जाना पड़ता है जिसमें कि ‘रीकॉग्नीशन’ की स्थिति पैदा हो जाती है।

‘सियाराममय सब जग जानी’ यह वाक्य हमने हजार बार पढ़ा और हजार बार सुना है, लेकिन हमारे भीतर न राम के प्रति भावना पैदा होती है और न सिया के प्रति भावना पैदा होती है। हर आदमी हमें शिकार मालूम पड़ता है, हर मर्द शिकार मालूम पड़ता है, हर औरत शिकार मालूम पड़ती है। जबान से हम कहते हैं तो क्या बना? रीकॉग्नीशन नहीं हो सका। मान्यताएँ, निष्ठाएँ परिपक्व नहीं हो सकीं। निष्ठाओं को परिपक्व करने के लिए बराबर रस्सी से जिस तरीके से पत्थर के ऊपर निशान बनाने के लिए रगड़ करनी पड़ती है, उसी तरीके से जप के द्वारा, उपासना के द्वारा बार-बार रगड़ बना करके अपनी अन्तःचेतना के ऊपर निष्ठाएँ जमानी पड़ी हैं। इसीलिए हम आपको जप कराते हैं, इस तथ्य को आप लोग ध्यान रखना। आप जप करने का स्वरूप समझिए, कारण समझिए। किस कारण से जप कराते हैं, वह वजह समझिए। अगर आप समझ जाएँगे तो ठीक है, फिर आपको जप करना हो तो करना और न करना हो तो मत करना, पर कम से कम आपकी मान्यता तो सही होनी चाहिए। मान्यताएँ सही हो जाएँ, जानकारी सही हो जाए तो ठीक है। तब आप समझना कि पचास फीसदी मंजिल पार कर ली। आगे आपकी मर्जी।

पूज्यवर की अमृतवाणी वाङ्मय ६८, पृ.२.६१-६४

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