15/10/2022
आज की काव्य हलचल
उपन्यासों के बूढ़े पृष्ठ, सीता के अन्याय तक सीमित रह गए,
कवियों की युवा कलमें सारी, चीरहरण तक सीमित रह गईं।
पर किसी ने कभी भी सोचा उस राम का?
जिसने छुटपन वशिष्ठ— आश्रम में गुजार दिया,
जिसने युवावस्था विपिन की कुटियों में,
और बुढ़ापा दुःख— शुचि में बिगाड़ दिया।
इतिहास के जर्जर पन्नों की सियाही का,
सीता के क्रंदन में ही अवसान हुआ,
पर सोचा किसने उस राम का,
जिसका जीवित जीवन शमशान हुआ?
किसने सोचा उसके बारे में,
जो सत्ता— लिप्सा का शिकार हुआ,
पितृ— वचन निभाने हेतु,
उसका स्वजीवन बेकार हुआ।
राजभवन की सुख— वृष्टि को त्याग,
कांतार— अनल में झुलसना स्वीकार किया,
राजभोग को त्यागके उसने,
कंद - मूल स्वीकार किया।
सोचा कभी कितना कठिन था,
महिपति से एक वनवासी होना,
पर इस नृशंस भुवन को तो बस,
स्मरण है सीता माँ का रोना।
जब छोड़ अरण्य फिर भूप बना,
तब समाज— भय से पत्नी त्यागी,
त्रीलोक नरेश होते हुए भी,
बना रह गया वह वैरागी।
पर्यक होते हुए भी वह,
महि की अंक में सोया था,
सीता के साथ तो सकल भुव था,
पर वह असह्य तो अकेला रोया था।
इतिहास के बंजर पन्नों पर तो,
बस बनी हुई चीरहरण की हवेली,
पर कौन जाने उन पांडवों को,
जिनके संग थी विपदाएँ खेली।
युधिष्ठिर का जुआ तो सबके,
हिय में घृणा का धाम हुआ,
पर सोचा सबने द्रौपदी का,
जिसके कारण संग्राम हुआ।
इस क्रूर भूमि की सठ बुद्धि में,
बस नारी का क्रंदन स्पंदित हुआ,
पर उस पुरुष का अंतर— रुदन,
न किसी के कर्ण में स्पंदित हुआ।
क्योंकि पुरुष का क्रंदन मूक था,
पर नारी के क्रंदन ने कोलाहल किया,
इस मूक क्रंदन की मूक गूँज में,
उस पुरुष को सबने “निष्ठुर” का दर्जा दिया।
इतिहास की भीषण तरंगों में किसने,
पुरुष के गूढ़ दुःख को देखा?
“नारीशक्ति” की समस्या को उठाकर,
पुरुष को कह दिया — “निर्मम”।