Kiran Gurjar

Kiran Gurjar I m advocate and loyal for my profession.

“I’m the parliamentary draftsman
I compose the country’s laws
and of half the litigation
I’m undoubtedly the cause.”

The judicial Church of India needs a powerful protestant movement with constructive intent. A planned process of development in necessitous and the planning commission must set up a Judicial Wing for reform which is the need of the hour.

25/03/2023

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https://youtu.be/U0PJ6WePe-oसाल 2022 का आखरी चंद्र ग्रहण कब है?
07/11/2022

https://youtu.be/U0PJ6WePe-o
साल 2022 का आखरी चंद्र ग्रहण कब है?

Tomorrow, the last lunar eclipse of the year 2022 will take place on Kartik Purnima. This will be the second lunar eclipse of the year. Due to the sighting...

16/10/2022

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं

अपने दिल की किसी हसरत का पता देते हैं
मेरे बारे में जो अफ़वाह उड़ा देते हैं

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बंट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं

जिसके कारण फ़साद होते हैं
उसका कोई अता-पता ही नहीं

कैसे अवतार कैसे पैग़मबर
ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं

ज़िंदगी की तल्ख़ियाँ अब कौन सी मंज़िला पाएं
इससे अंदाज़ा लगा लो ज़हर महँगा हो गया

ज़िंदगी अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं

सच घटे या बढ़े तो सच ना रहे
झूठ की कोई इँतहा ही नहीं

धन के हाथों बिके हैं सब क़ानून
अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं

चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
आईना झूठ बोलता ही नहीं

अपनी रचनाओं में वो ज़िन्दा है
‘नूर’ संसार से गया ही नहीं

- कृष्ण बिहारी 'नूर'

15/10/2022

आज की काव्य हलचल

उपन्यासों के बूढ़े पृष्ठ, सीता के अन्याय तक सीमित रह गए,

कवियों की युवा कलमें सारी, चीरहरण तक सीमित रह गईं।
पर किसी ने कभी भी सोचा उस राम का?
जिसने छुटपन वशिष्ठ— आश्रम में गुजार दिया,
जिसने युवावस्था विपिन की कुटियों में,
और बुढ़ापा दुःख— शुचि में बिगाड़ दिया।
इतिहास के जर्जर पन्नों की सियाही का,
सीता के क्रंदन में ही अवसान हुआ,
पर सोचा किसने उस राम का,
जिसका जीवित जीवन शमशान हुआ?
किसने सोचा उसके बारे में,
जो सत्ता— लिप्सा का शिकार हुआ,
पितृ— वचन निभाने हेतु,
उसका स्वजीवन बेकार हुआ।
राजभवन की सुख— वृष्टि को त्याग,
कांतार— अनल में झुलसना स्वीकार किया,
राजभोग को त्यागके उसने,
कंद - मूल स्वीकार किया।
सोचा कभी कितना कठिन था,
महिपति से एक वनवासी होना,
पर इस नृशंस भुवन को तो बस,
स्मरण है सीता माँ का रोना।
जब छोड़ अरण्य फिर भूप बना,
तब समाज— भय से पत्नी त्यागी,
त्रीलोक नरेश होते हुए भी,
बना रह गया वह वैरागी।
पर्यक होते हुए भी वह,
महि की अंक में सोया था,
सीता के साथ तो सकल भुव था,
पर वह असह्य तो अकेला रोया था।
इतिहास के बंजर पन्नों पर तो,
बस बनी हुई चीरहरण की हवेली,
पर कौन जाने उन पांडवों को,
जिनके संग थी विपदाएँ खेली।
युधिष्ठिर का जुआ तो सबके,
हिय में घृणा का धाम हुआ,
पर सोचा सबने द्रौपदी का,
जिसके कारण संग्राम हुआ।
इस क्रूर भूमि की सठ बुद्धि में,
बस नारी का क्रंदन स्पंदित हुआ,
पर उस पुरुष का अंतर— रुदन,
न किसी के कर्ण में स्पंदित हुआ।
क्योंकि पुरुष का क्रंदन मूक था,
पर नारी के क्रंदन ने कोलाहल किया,
इस मूक क्रंदन की मूक गूँज में,
उस पुरुष को सबने “निष्ठुर” का दर्जा दिया।
इतिहास की भीषण तरंगों में किसने,
पुरुष के गूढ़ दुःख को देखा?
“नारीशक्ति” की समस्या को उठाकर,
पुरुष को कह दिया — “निर्मम”।

15/10/2022

इच्छा खुद की पूरी करू तो स्वार्थी,
दूसरो की पूरी करू तो हितार्थी।।

15/10/2022

कई पुरषों के चरित्र प्रमाण पत्र महिलाओं के इनबॉक्स में भरे पड़े हैं।

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