28/12/2025
शाकैः पालितविष्टपा शतदृशा शाकोल्लसद्विग्रहा
शङ्कर्यष्टफलप्रदा भगवती शाकम्भरी पातु माम् 🙏
शाकम्भरी देवी माँ आदिशक्ति देवी दुर्गा का एक सौम्य अवतार हैं। माँ शाकम्भरी ही रक्तदंतिका, छिन्नमस्तिका, भीमादेवी, भ्रामरी और श्री कनकदुर्गा है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां भगवती धरती को अकाल और खाद्य संकट से बचाने के लिए देवी शाकंभरी के रूप में अवतरित हुईं थीं। देवी शाकम्भरी वनस्पतियों, फलों और सब्जियों की देवी माना जाता है।
शाकंभरी नवरात्र का यह पर्व मुख्य रूप से राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है।
शाकंभरी नवरात्रि पौष माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन शुरू होती है और पूर्णिमा के दिन इसका समापन होता है।
इस वर्ष शाकंभरी नवरात्र 28 दिसंबर 2025 से शुरू होगी जिसका समापन 03 जनवरी 2026 को होगा।
19/11/2025
सुन्दर स्त्री बाद में शूर्पणखा निकली।
सोने का हिरन बाद में मारीच निकला।
भिक्षा माँगने वाला साधू बाद में रावण निकला।
लंका में तो निशाचार लगातार रूप ही बदलते दिखते थे।
हर जगह भ्रम, हर जगह अविश्वास, हर जगह शंका लेकिन बावजूद इसके जब लंका में अशोक वाटिका के नीचे सीता माँ को रामनाम की मुद्रिका मिलती है तो वो उस पर 'विश्वास' कर लेती हैं।
वो मानती हैं और स्वीकार करती हैं कि इसे प्रभु श्री राम ने ही भेजा है।
जीवन में कई लोग आपको ठगेंगे, कई आपको निराश करेंगे, कई बार आप भी सम्पूर्ण परिस्थितियों पर संदेह करेंगे लेकिन इस पूरे माहौल में जब आप रुक कर पुनः किसी व्यक्ति, प्रकृति या अपने ऊपर 'विश्वास' करेंगे तो रामायण के पात्र बन जाएंगे।
राम और माँ सीता केवल आपको 'विश्वास करना' ही तो सिखाते हैं। माँ कठोर हुईं लेकिन माँ से विश्वास नहीं छूटा, परिस्थितियाँ विषम हुई लेकिन उसके बेहतर होने का विश्वास नहीं छूटा, भाई-भाई का युद्ध देखा लेकिन अपने भाइयों से विश्वास नहीं छूटा, लक्ष्मण को मरणासन्न देखा लेकिन जीवन से विश्वास नहीं छूटा, सागर को विस्तृत देखा लेकिन अपने पुरुषार्थ से विश्वास नहीं छूटा, वानर और रीछ की सेना थी लेकिन विजय पर विश्वास नहीं छूटा और प्रेम को परीक्षा और वियोग में देखा लेकिन प्रेम से विश्वास नहीं छूटा।
भरत का विश्वास, विभीषण का विश्वास, शबरी का विश्वास, निषादराज का विश्वास, जामवंत का विश्वास, अहिल्या का विश्वास, कोशलपुर का विश्वास और इस 'विश्वास' पर हमारा-आपका अगाध विश्वास।
सच बात यही है कि जिस दिन आपने ये 'विश्वास' कर लिया कि ये विश्व आपके पुरुषार्थ से ही खूबसूरत बनेगा उसी दिन ही आप 'राम' बन जाएंगे और फिर लगभग सारी परिस्थितियाँ हनुमान बनकर आपको आगे बढ़ाने में लग जाएंगी
यहाँ हर किसी की रामायण है, आपकी भी होगी। जिसमें आपके सामने सब है - रावण, शंका, भ्रम, असफलता, दुःख। बस आपको अपनी तरफ 'विश्वास' रखना है.. आपका राम तत्व खुद उभर कर आता जायेगा।
सभी को अपने जीवन का संघर्ष स्वयं ही करना पड़ता है 🙏
31/10/2025
जीवन में हमेशा तो नहीं परन्तु एक बार ऐसा समय आता है जब आपको वह अमृत मिल सकता है जो केतु के पास है । और केतु ही ऐसा वक्त देता है। आप केतु के एक ऐसे भाव स्वरूप का अनुभव करेंगे कि यकीन मानिए उसने आपको संकेत दे दिए हो । हो सकता है आप में से कितने अभी उस स्थिति में हो भी क्योंकि ज्योतिष में दुख में ही लोग आते है । होता क्या है कई बार हम थक जाते है ,हम मनुष्यों की भी सीमा है , हम ताकत लगा लगा कर थक जाते है ,मन , वह संकल्प शक्ति , वह विश्वास सब डगमगा जाता है , दर दर की ठोकरें, मनुष्यों पर अत्याधिक निर्भर रहना हमारी आंखे खोल देता है,हम उस परेशानी ,चुनौती ,समस्या ,दुविधा ,आपतकाल,संकट , जो कह सकते है कहिए इनसे लड़कर टूट जाते है परन्तु इसके पीछे केतु होता है जो आपको एक बहुत बढ़े मकसद के कारण ढूंढता है। फिर जब व्यक्ति अपना सारा जोर लगाकर थक जाता है तो हथियार डाल देता है बस यही वह समय है जब व्यक्ति कहता है बहुत हुआ अब भगवान तुम देखो , मैं इतना ही कर सकता हूं । फिर आप घटनाओं के प्रति ताकत लगाने वाली स्थिति से हटकर बस दृष्टा बन जाते है और जो हो रहा होता है बस होने देते है क्योंकि एक भाव उत्पन्न हो जाता है कि भगवान देख लेंगे । केतु उस समस्या से अहंकार तोड़ता है और आपको ले आता है उसके चरणों में बिल्कुल surrender की स्थिति में । द्रौपदी ने जोर लगाया ,वहां एक से बढ़कर उसके अपने बाहुबली योद्धा थे ,भीष्म थे सब थे लेकिन कोई नहीं बचा पाया जब द्रौपदी ने हार मानकर छोड़ दिया भगवान अब तुम देखो तो नारायण को आना पड़ा। खास बात यह है कि जोर लगाने तक द्रौपदी को भी भरोसा था कि वह संभालेगी लेकिन स्तिथि बिगड़ी तो उसने समर्पण किया परन्तु उसे ये भाव कदापि नहीं आया कि भगवान आयेंगे भी या नहीं!! । यही स्तिथि केतु की है । गजराज को देखे मगरमच्छ ने पैर पकड़ लिया , वह स्वयं इतना बलशाली ,परन्तु क्या करे काल ने जकड़ ही लिया लेकिन जब उसने भगवान पर छोड़ दिए कि अब नहीं हो सकता तो अहंकार टूटा भगवान तुरंत आ गए। हर किसी के जीवन में ये घटना आती है कोई निखर जाता है और उसे अहसास हो जाता है भगवान से ऊपर कुछ नहीं, मनुष्य हर चीज कंट्रोल नहीं कर सकता कभी उस पर छोड़ देना ही ठीक होता है,उसकी ये सृष्टि है मुझे बस उसके पैर पकड़ने है वह देख लेगा । न सिर्फ ये आपको राहत देगा बल्कि विचार उच्च कर देगा । वही दूसरे व्यक्ति बिखर जाते है क्योंकि वह ऐसे आपतकाल को दुर्भाग्य मानते है कि मेरे साथ ही ये क्यों हुआ वगैरह वगैरह ,वह भगवान के निकट जाने का मौका गवां दिया।
राहु चाहेगा कि आप लोगो का सहारा लो,आप भटकों ,आप जोर लगाओ ,अहंकार युक्त होता है केतु विपरीत है इसलिए जीवन भी इनके अक्ष में घूमते रहता है। जब नहीं हो रहा तो उसपर छोड़ दो ये नहीं की बहुत पूजा पाठ से इसका आशय है ये मनःस्थिति है अर्थात भगवान देख लेंगे, वह जो करेगा मेरे हित के लिए करेगा ।
द्रौपदी ने जब तक जोर लगाया
भगवान नहीं आएं।
द्रौपदी ने जैसे उसपर छोड़ा
भगवान आ गए।
गजराज ने जब तक जोर लगाया
भगवान नहीं आएं।
गजराज ने जैसे उसपर छोड़ा
भगवान आ गए।
उस पर छोड़ देना ही केतु का परिचय है।
18/10/2025
*पत्नी वामांगी क्यों कहलाती है ?*
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शास्त्रों में पत्नी को वामंगी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है बाएं अंग का अधिकारी। इसलिए पुरुष के शरीर का बायां हिस्सा स्त्री का माना जाता है।
भगवान शिव के बाएं अंग से स्त्री की उत्पत्ति हुई है जिसका प्रतीक है शिव का अर्धनारीश्वर शरीर।
हस्तरेखा विज्ञान की कुछ पुस्तकों में पुरुष के दाएं हाथ से पुरुष की और बाएं हाथ से स्त्री की स्थिति देखने की बात कही गयी है।
शास्त्रों में कहा गया है कि स्त्री पुरुष की वामांगी होती है इसलिए सोते समय और सभा में, सिंदूरदान, द्विरागमन, आशीर्वाद ग्रहण करते समय और भोजन के समय स्त्री पति के बायीं ओर रहना चाहिए। इससे शुभ फल की प्राप्ति होती।
वामांगी होने के बावजूद भी कुछ कामों में स्त्री को दायीं ओर रहने के बात शास्त्र कहता है।
शास्त्रों में बताया गया है कि कन्यादान, विवाह, यज्ञकर्म, जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के समय पत्नी को पति के दायीं ओर बैठना चाहिए।
पत्नी के पति के दाएं या बाएं बैठने संबंधी इस मान्यता के पीछे तर्क यह है कि जो कर्म संसारिक होते हैं उसमें पत्नी पति के बायीं ओर बैठती है। क्योंकि यह कर्म स्त्री प्रधान कर्म माने जाते हैं।
यज्ञ, कन्यादान, विवाह यह सभी काम पारलौकिक माने जाते हैं और इन्हें पुरुष प्रधान माना गया है। इसलिए इन कर्मों में पत्नी के दायीं ओर बैठने के नियम हैं।
पत्नी ही पति के जीवन को पूरा करती है, उसे खुशहाली प्रदान करती है, परिवार का ख्याल रखती है, और उसे वह सभी सुख प्रदान करती है जिसके वह योग्य है.
पति-पत्नी का रिश्ता दुनिया भर में बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है.
हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ महाभारत में भी पति-पत्नी के महत्वपूर्ण रिश्ते के बारे में काफी कुछ कहा गया है.
भीष्म पितामह ने कहा था कि पत्नी को सदैव प्रसन्न रखना चाहिये, क्योंकि, उसी से वंश की वृद्धि होती है, वह घर की लक्ष्मी है और यदि लक्ष्मी प्रसन्न होगी तभी घर में खुशियां आयेगी, इसके अलावा भी अनेक धार्मिक ग्रंथों में पत्नी के गुणों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है।
गरूड पुराण, जिसे लोक प्रचलित भाषा में गृहस्थों के कल्याण की पुराण भी कहा गया है, उसमें उल्लिखित पत्नी के कुछ गुणों की संक्षिप्त व्याख्या करेंगे.
गरुण पुराण में पत्नी के जिन गुणों के बारे में बताया गया है, उसके अनुसार जिस व्यक्ति की पत्नी में ये गुण हों, उसे स्वयं को भाग्यशाली समझना चाहिये.
पत्नी के सुख के मामले में देवराज इंद्र अति भाग्यशाली थे, इसलिये गरुण पुराण के तथ्य यही कहते हैं।
सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा।
सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता।।
गरुण पुराण में पत्नी के गुणों को समझने वाला एक श्लोक मिलता है, यानी जो पत्नी गृहकार्य में दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं और जो पतिपरायणा है, वास्तव में वही पत्नी है.
गृह कार्य में दक्ष से तात्पर्य है वह पत्नी जो घर के काम काज संभालने वाली हो, घर के सदस्यों का आदर-सम्मान करती हो, बड़े से लेकर छोटों का भी ख्याल रखती हो।
जो पत्नी घर के सभी कार्य जैसे- भोजन बनाना, साफ-सफाई करना, घर को सजाना, कपड़े-बर्तन आदि साफ करना, यह कार्य करती हो वह एक गुणी पत्नी कहलाती है.
बच्चों की जिम्मेदारी ठीक से निभाना, घर आये अतिथियों का मान-सम्मान करना, कम संसाधनों में भी गृहस्थी को अच्छे से चलाने वाली पत्नी गरुण पुराण के अनुसार गुणी कहलाती है, ऐसी पत्नी हमेशा ही अपने पति की प्रिय होती है।
प्रियवादिनी से तात्पर्य है मीठा बोलने वाली पत्नी, सदैव संयमित भाषा में बात करने वाली, धीरे-धीरे व प्रेमपूर्वक बोलने वाली पत्नी ही गुणी पत्नी होती है। ऐसी स्त्री जिस घर में हो वहां कलह और दुर्भाग्य कबीनहीं आता।
शादी के बाद नए लोगों से जुड़े रीति-रिवाज को स्वीकारना ही स्त्री की जिम्मेदारी है, पत्नी को एक विशेष प्रकार के धर्म का भी पालन करना होता है, विवाह के पश्चात उसका सबसे पहला धर्म होता है कि वह अपने पति व परिवार के हित में सोचे, व ऐसा कोई काम न करे जिससे पति या परिवार का अहित हो।।
25/05/2025
विवाह से पूर्व नाड़ी दोष क्यों देखना अनिवार्य है ?
नाड़ी दोष परिहार
आद्यैक नाड़ी कुरूते वियोगं,
मध्याख्य नाड्यामृतयोर्विनाशं।
अन्ते च वैधव्यमतीव्र दुःखं,
तस्माच्च तिस्रः परिवर्जनीयाः। ..-( वराह मिहिर)
अर्थात-
वाराहमिहिर जी के अनुसार दोनों की आदि नाडी हो तो यह अलगाव या तलाक नतीजा देने वाला होगा, यदि दोनों की मध्य नाडी हो तोयह मृत्यु कारक या विनाशकारी होगा और यदि दोनों की अंत्य नाडी है, यह वैधव्य के साथ बेहद दुखी वैवाहिक जीवन का फल देगा।
अग्रनाड़ी व्यधेभर्ता मध्य नाड़ी व्यधेद्वयम्।
पृष्ठनाडी व्यधेत्कन्या म्रियतेनात्र संशय ..- (ज्योतिष सार)
अर्थात-
दोनों अंत्य नाडी हो तो पति की मौत में परिणाम होगा , दोनों की मध्य नाड़ी हो तो दोनों की मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट होता है, इसका मतलब है कि मध्य नाड़ी घातक है।और दोनों की अन्त्य नाड़ी हो तो कन्या की मृत्यु होती है।
नाड़ी दोषोस्ति विप्राणाम्....के अनुसार नाडी दोष ब्राह्मणों के लिए सबसे ज्यादा मायने रखती है, इसका मतलब दो प्रकार से है-
कर्क ,वृश्चिक और मीन राशिया ब्राह्मण राशिया हैं।इस श्लोक का तात्पर्य ब्राह्मण राशियों के बजाय ब्राह्मण जाति से भी लिया जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार, नाडी दोष संतान के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
विवाह हेतु कुण्डली मेलापक में नाडी दोष का शास्त्रीय परिहार ~
१-ज्योतिष के सूत्र अनुसार जब वर एवं कन्या के नक्षत्र यदि रोहिणी, आर्द्रा,मृगशिरा, विशाखा, पुष्य ,श्रवण, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती में से हो तो नाड़ी दोष नहीं लगता। नियम-
"रोहिण्यार्द्रा मृगेन्द्राग्नि पुष्य श्रवणयौष्णभम्।अहिर्बुघ्नभमेतेषां नाड़ी दोषो न विद्यते ।।"
क्यो कि ज्योतिष के सूत्र अनुसार जब वर एवं कन्या के नक्षत्र यदि रोहिणी, आर्द्रा,मृगशिरा, विशाखा, पुष्य ,श्रवण, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती में से हो तो नाड़ी दोष नहीं लगता। सूत्र-
रोहिण्यार्द्रा मृगेन्द्राग्नि पुष्य श्रवणयौष्णभम्।अहिर्बुघ्नभमेतेषां नाड़ी दोषो न विद्यते ।।
26/12/2024
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21/09/2024
।।पितृपक्ष में कर्तव्य।।
अपि धन्यः कुले जायादस्माकं मतिमान्नरः ।
अकुर्वन्वित्तशाठ्यं यः पिण्डान्नो निर्वपिष्यति ।।
रत्नं वस्त्रं महायानं सर्वभोगादिकं वसु ।
विभवे सति विप्रेभ्यो योsस्मानुद्दिश्य दास्यति ।।
पितृगण कहते हैं --- क्या, हमारे कुल में कोई ऐसा मतिमान् पुरुष होगा जो लालच त्याग कर हमारे उद्देश्य से पिण्डदान करेगा तथा ब्राह्मणों को रत्न, वस्त्र, यान और सम्पूर्ण भोग-सामग्री देगा ।
अन्नेन वा यथाशक्त्या कालेsस्मिन्भक्तिनम्रधीः ।
भोजयिष्यति विप्राग्र्यांस्तन्मात्रविभवो नरः ।।
अथवा श्राद्धकाल में भक्ति-विनम्र चित्त से ब्राह्मणों को यथाशक्ति अन्न ही भोजन करायेगा।
असमर्थोsन्नदानस्य धान्यमामं स्वशक्तितः ।
प्रदास्यति द्विजाग्र्येभ्यः स्वल्पाल्पां वापि दक्षिणाम् ।।
तत्राप्यसामर्थ्ययुतः कराग्राग्रस्थितांस्तिलान ।
प्रणम्य द्विजमुख्याय कस्मैचिद्भूप दास्यति ।।
तिलैस्सप्ताष्टभिर्वापि समवेतं जलाञ्जलिम् ।
भक्तिनम्रस्समुद्दिश्य भुव्यस्माकं प्रदास्यति ।।
यतः कुतश्चित्सम्प्राप्य गोभ्यो वापि गवाह्निकम् ।
अभावे प्रीणयन्नस्माञ्छ्रद्धायुक्तः प्रदास्यति ।।
अन्नदान में असमर्थ होने पर थोड़ा सा कच्चा धान्य और दक्षिणा ही देगा ।
यह भी न होने पर एक मुट्ठी तिल ब्राह्मण को प्रणाम कर देगा ।
इतनी सामर्थ्य न होने पर केवल सात-आठ तिलों से युक्त जलाञ्जलि ही भूमि पर देगा ।
इसका भी अभाव होने पर कहीं से एक दिन का चारा लाकर प्रीति और श्रद्धा पूर्वक हमारे उद्देश्य से गाय को खिलायेगा ।।
सर्वाभावे वनं गत्वा कक्षमूलप्रदर्शकः ।
सूर्यादिलोकपालानामिदमुच्चैर्वदिष्यति ।।
न मेsस्ति वित्तं न धनं च नान्य-
च्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितृ्ऋन्नतोsस्मि ।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ
कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य ।।
कुछ न हो और शरीर भी असमर्थ हो तब वन में जाकर हवा में दोनों हाथ उठाकर सूर्यादि लोकपालों के समक्ष उच्चवाणी से कहेगा --
"मेरे पास श्राद्ध के योग्य न धन है न धान्य है और न शरीर स्वस्थ है, अत: मैं अपने पितरों के समक्ष हाथ वायुमार्ग में जोड़कर श्रद्धा पूर्वक प्रणाम निवेदन करता हूँ।
इसी से मेरे पित्रगण तृप्त हों ।।"
01/09/2023
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