Gautama Buddha - बुद्धं शरणं गच्छामि

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Buddhism is the with over 520 million followers, or over 7% of the global population, known as Buddhists.[Buddhists don’t believe in a supreme being or creator god.

07/05/2026

🌻 भिक्खू संघ को भोजन दान का क्या महत्त्व 🌻
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बुद्ध परम्परा में भिक्खू संघ को भोजन दान देना केवल एक सामाजिक परम्परा नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक साधना है। जब कोई गृहस्थ श्रद्धा से भिक्खुओं को अन्न अर्पित करता है, तब वह केवल शरीर का पोषण नहीं करता, बल्कि धम्म की धारा को प्रवाहित करता है। भगवान बुद्ध ने संघ की स्थापना इसलिए की कि धम्म पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहे। भिक्खू साधना, अध्ययन और उपदेश में जीवन अर्पित करते हैं, उनका जीवन गृहस्थों के सहयोग पर आधारित होता है। इसलिए भोजन दान, संघ और गृहस्थ — दोनों के बीच पवित्र सेतु है।

भोजन दान देने से चार चीजों की वृद्धि होती है — आयु, वर्ण, सुख और बल।

1️⃣ आयु की वृद्धि : जब हम भिक्षुओं को भोजन देते हैं, तो हम उनके साधना-जीवन को सहारा देते हैं। उनकी दीर्घ साधना से धम्म जीवित रहता है। इस पुण्य कर्म से दाता के जीवन में भी दीर्घायु और कल्याणकारी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

2️⃣ वर्ण (आभा) की वृद्धि : श्रद्धा और विनम्रता से दिया गया अन्न हृदय को निर्मल बनाता है। निर्मल मन का तेज चेहरे पर झलकता है। दान से भीतर की प्रसन्नता बाहर की आभा बन जाती है।

3️⃣ सुख की वृद्धि : भिक्खू को भोजन देते समय जो संतोष मिलता है, वह अद्भुत होता है। यह केवल पेट भरने का कार्य नहीं, बल्कि कृतज्ञता और करुणा का अनुभव है।यही सच्चा धम्म-सुख है — जो मन को हल्का और आनंदित करता है।

4️⃣ बल की वृद्धि : दान से लोभ घटता है और त्याग की शक्ति बढ़ती है। यह मानसिक दृढ़ता और आध्यात्मिक साहस प्रदान करता है। ऐसा बल साधक को धम्म मार्ग पर स्थिर बनाता है। भिक्खू संघ को भोजन देना, धम्म की सेवा करना है। यह पुण्य कर्म केवल आज का नहीं, भविष्य का भी आधार बनता है।

👉 दान से संबंध बनता है — गृहस्थ और संघ के बीच, श्रद्धा और साधना के बीच। तो आइए, हम भोजन दान को केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि श्रद्धा और करुणा की जीवित अभिव्यक्ति बनाएं।

सभी का मंगल हो - कल्याण हो - सब सुखी रहें

🍁 नमो बुद्धाय • जय भीम • जय प्रबुद्ध भारत 🍁 ✍️ ☸️

05/03/2025
14/10/2023

बुद्ध कहते हैं मनुष्य सर्वोपरि है,
जबकि अन्य ईश्वर वादी धर्मों में ईश्वर सर्वोपरि है।

यद्यपि सभी ईश्वर वादी धर्मों में मानवता का पाठ तो पढ़ाया जाता है, लेकिन मानव सेवा को भी ईश्वर की मर्जी के अंतर्गत ही बताया जाता है।

आत्मा परमात्मा, पुनर्जन्म और परलोक इत्यादि बातें इन धर्मों के आधार स्तम्भ हैं ।

बौद्ध धम्म के दो आधार स्तम्भ हैं: अनीश्वरवाद तथा अनात्मवाद ।
बुद्ध ने अनात्मवाद–अनत्ता का सिद्धांत चलाया ।
बुद्ध ने आत्मा जैसी बात को मानने से ही इंकार कर दिया। बुद्ध ने कहा कोई आत्मा नही है,
चेतना है। मृत्यु के बाद मनुष्य का शरीर चार महाभूतों में विलीन हो जाता है और चेतना शुन्य में खो जाती है, जैसे कि दीपक की लौ बुझ जाने पर प्रकाश शुन्य हो जाता है। बुद्ध कहते हैं- स्वर्ग, नर्क सब यहीं है। सभी अपने कर्मों का फल यहीं भोगते हैं।
सभी ईश्वरवादी धर्मों की सोच के एकदम विपरीत तथागत बुद्ध ने मानवमात्र के कल्याण को आधार बनाकर एक नई सोच दी, नया दर्शन
दिया और एक नये धर्म की स्थापना की और वह है बौद्ध धर्म, जिसकी शिक्षायें हैं मानवता, शान्ति, समता, मैत्री, प्रज्ञा, शील, और करूणा ।
भगवान बुद्ध के सारे उपदेश त्रिपिटक में संग्रहित हैं। त्रिपिटक का बौद्ध धम्म में वही महत्व है जैसे हिन्दुओं में वेद, गीता और रामायण का,
मुसलमानों में कुरान का इसाइयों में बाइबिल का, जैनों में जिन वाणी तथा मोक्ष मार्ग शास्त्र का और सिक्खों में गुरु ग्रंथ साहब का महत्व है।
त्रिपिटक में धम्मपद एक छोटा सा किन्तु मूल्यवान रत्न है। इन पदों ने
विचारकों के हृदय में चिन्तन की आग जलाई है।

14/10/2023

संसार में प्रचलित धर्मों में दो ही वाद
मूल रूप से परिलक्षित होते है।
1. ईश्वर वाद और
2. मानवता वाद
बुद्ध का धम्म मानवता वादी धर्म है जो
कि मनुष्य केन्द्रित है। बुद्ध के लिये मनुष्य
से उपर कोई सत्य नहीं ।

08/07/2023

गांव-देहात में एक कीड़ा पाया जाता है, जिसे
गोबरैला कहा जाता है। उसे गाय, भैंसों के ताजे गोबर की बू बहुत भाती है! वह सुबह से गोबर की तलाश में निकल पड़ता है और सारा
दिन उसे जहां कहीं गोबर मिल जाता है, वहीं उसका गोला बनाना शुरू कर देता है। शाम तक वह एक बड़ा सा गोला बना लेता है। फिर
उस गोले को ढ़केलते हुए अपने बिल तक ले जाता है। लेकिन बिल पर पहुँच कर उसे पता चलता है कि गोला तो बहुत बड़ा बन गया मगर उसके बिल का द्वार बहुत छोटा है। बहुत परिश्रम और कोशिशों के बाद भी वह उस गोले को बिल के अन्दर नहीं ढ़केल पाता, और उसे वहीं पर
छोड़कर बिल में चला जाता है। यही हाल हम मनुष्यों का भी है। पूरी जिन्दगी हम दुनियाभर का मालमत्ता जमा करने में लगे रहते हैं, और
जब अन्त समय आता है, तो पता चलता है कि ये सब तो साथ नहीं ले जा सकते। और तब हम उस जीवन भर की कमाई को बड़ी हसरत से देखते हुए इस संसार से विदा हो जाते हैं

Photos from Gautama Buddha - बुद्धं शरणं गच्छामि's post 27/01/2023
Himalayan Buddhist Yogini from Bhutan (Sanskrit: योगिनी, IAST: yoginī) is a female master practitioner of ta**ra and yoga, as well as a formal term of respect for female Hindu or Buddhist spiritual teachers in Indian subcontinent, Southeast Asia and Greater Tibet.

This is a video of yoginis from Bhutan who have participated in annual Tsalung(Anuyoga) Practice this year . The program takes place in Bumthang, Larung Chodeypung Monastery every winter.
To participate in Tsalung, regardless of age and gender, the following four conditions must be met:    

1. The individual should have completed the preliminary practices (Ngondro), guru yoga and development phase of practice (kyerim) before attendingTsalung. 
                                                           2. The individual should have received the four empowerment from a qualified Lama (guru or master) and haven’t broken any dharma vows/ samaya.
                                             3.The individual shouldn’t have broken any samaya vows with his/her root master, even if they did so, broken samaya vows should be purified before attending Tsalung.

4. Lastly, one should have determination and commitment to attend the full course of Tsalung with interest without having interaction with opposite gender.

འདི་དག་ནི་འབྲུག་བུམ་ཐང་བླ་རུང་ཆོས་སྡེ་སྤུངས་དགོན་པའི་ལོ་རྒྱུན་གྱི་དགུན་ཆོས་རྩ་རླུང་ཉམས་ལེན་འགའ་ཞིག་སྟེ།  ད་ལོ་ལྕགས་གླང་2021 གི་དགུན་ཆོས་རྩ་རླུང་གི་ཉམས་ལེན་པ་ཆ་རྐྱེན་བཞི་དང་ཆོད་སེམས་གཅིག་ཚང་པའི་རྣལ་འབྱོར་མ་རྣམས་རེད།  ཆ་རྐྱེན་བཞི་ནི།  སྔོན་འགྲོ་ཆོས་བཅུའི་བསགས་སྦྱོངས་དང་དངོས་གཞི་བསྐྱེད་རིམ་གྱི་བསྙེན་པ་ལས་རུང་ཙམ་གྲུབ་ཡོད་པ།  གསང་སྔགས་བླ་མེད་བཀའ་གཏེར་ཟབ་མོའི་ཆོས་སྒོར་ཞུགས་ཏེ་དབང་བཞི་ཐོབ་ལ་མ་ཉམས་པར་ཡོད་པ།  སོ་སོའི་བླ་མ་མཆེད་ལྕམ་ལ་གསོ་མི་རུང་པའི་དམ་ཚིག་ཉམས་ཆག་མེད་པ།  རྩ་རླུང་ཞུས་པ་ནས་རྒྱུན་དུ་ཉམས་སུ་ལེན་པ་ལ་དད་སྤྲོའི་འདུན་པའམ་སེམས་ཤུགས་ཡོད་པ་བཅས་བཞི་དང་།  ཆོད་སེམས་གཅིག་ནི་ ཐ་ན་ཡང་རྩ་རླུང་ཟླ་ཆོས་ཀྱི་རིང་དུ་ཁྱིམ་སྔགས་པ་ཡིན་ཀྱང་བྱང་སེམས་རྒྱུའི་ཐིག་ལེ་སྲུང་པ་གལ་ཆེ་ཕྱིར་ཉམས་ལེན་པ་ཕོ་མོའི་བཞུགས་གནས་དང་འཚོགས་ཁང་རླུང་ར་སོགས་སོ་སོ་མཛད་ནས་ཉམས་སུ་ལེན་པར་དམ་བཅའ་བརྟན་པོ་ཡོད་པ་ཞིག་དགོས་སོ།  དེ་ནི་སྐབས་འདིར་གཙོ་བོ་རང་ལུས་ཐབས་ལྡན་གྱི་ཉམས་ལེན་ཡིན་པའི་གནད་ཀྱིས་སོ། 24/12/2022

Himalayan Buddhist Yogini from Bhutan (Sanskrit: योगिनी, IAST: yoginī) is a female master practitioner of ta**ra and yoga, as well as a formal term of respect for female Hindu or Buddhist spiritual teachers in Indian subcontinent, Southeast Asia and Greater Tibet. This is a video of yoginis from Bhutan who have participated in annual Tsalung(Anuyoga) Practice this year . The program takes place in Bumthang, Larung Chodeypung Monastery every winter. To participate in Tsalung, regardless of age and gender, the following four conditions must be met: 1. The individual should have completed the preliminary practices (Ngondro), guru yoga and development phase of practice (kyerim) before attendingTsalung. 2. The individual should have received the four empowerment from a qualified Lama (guru or master) and haven’t broken any dharma vows/ samaya. 3.The individual shouldn’t have broken any samaya vows with his/her root master, even if they did so, broken samaya vows should be purified before attending Tsalung. 4. Lastly, one should have determination and commitment to attend the full course of Tsalung with interest without having interaction with opposite gender. འདི་དག་ནི་འབྲུག་བུམ་ཐང་བླ་རུང་ཆོས་སྡེ་སྤུངས་དགོན་པའི་ལོ་རྒྱུན་གྱི་དགུན་ཆོས་རྩ་རླུང་ཉམས་ལེན་འགའ་ཞིག་སྟེ། ད་ལོ་ལྕགས་གླང་2021 གི་དགུན་ཆོས་རྩ་རླུང་གི་ཉམས་ལེན་པ་ཆ་རྐྱེན་བཞི་དང་ཆོད་སེམས་གཅིག་ཚང་པའི་རྣལ་འབྱོར་མ་རྣམས་རེད། ཆ་རྐྱེན་བཞི་ནི། སྔོན་འགྲོ་ཆོས་བཅུའི་བསགས་སྦྱོངས་དང་དངོས་གཞི་བསྐྱེད་རིམ་གྱི་བསྙེན་པ་ལས་རུང་ཙམ་གྲུབ་ཡོད་པ། གསང་སྔགས་བླ་མེད་བཀའ་གཏེར་ཟབ་མོའི་ཆོས་སྒོར་ཞུགས་ཏེ་དབང་བཞི་ཐོབ་ལ་མ་ཉམས་པར་ཡོད་པ། སོ་སོའི་བླ་མ་མཆེད་ལྕམ་ལ་གསོ་མི་རུང་པའི་དམ་ཚིག་ཉམས་ཆག་མེད་པ། རྩ་རླུང་ཞུས་པ་ནས་རྒྱུན་དུ་ཉམས་སུ་ལེན་པ་ལ་དད་སྤྲོའི་འདུན་པའམ་སེམས་ཤུགས་ཡོད་པ་བཅས་བཞི་དང་། ཆོད་སེམས་གཅིག་ནི་ ཐ་ན་ཡང་རྩ་རླུང་ཟླ་ཆོས་ཀྱི་རིང་དུ་ཁྱིམ་སྔགས་པ་ཡིན་ཀྱང་བྱང་སེམས་རྒྱུའི་ཐིག་ལེ་སྲུང་པ་གལ་ཆེ་ཕྱིར་ཉམས་ལེན་པ་ཕོ་མོའི་བཞུགས་གནས་དང་འཚོགས་ཁང་རླུང་ར་སོགས་སོ་སོ་མཛད་ནས་ཉམས་སུ་ལེན་པར་དམ་བཅའ་བརྟན་པོ་ཡོད་པ་ཞིག་དགོས་སོ། དེ་ནི་སྐབས་འདིར་གཙོ་བོ་རང་ལུས་ཐབས་ལྡན་གྱི་ཉམས་ལེན་ཡིན་པའི་གནད་ཀྱིས་སོ།

30/10/2022

मकान जले तो बीमा ले सकते हैं
सपने जले तो क्या किया जाए...
आसमान बरसे तो छाता ले सकते हैं
आँख बरसे तो क्या किया जाए...
शेर दहाड़े तो भाग सकते हैं
अहंकार दहाड़े तो क्या किया जाए...
काँटा चुभे तो निकाल सकते हैं
कोई बात चुभे तो क्या किया जाए...
दर्द हो तो दवाई ले सकते हैं
वेदना हो तो क्या किया जाये..

30/10/2022

मौत
जिन्दगी से कितनी बेहतर है।
जिन्दा थे तो किसी ने पास बिठाया नहीं,
अब खुद मेरे चारों ओर बैठे जा रहे हैं।
पहले कभी किसी ने मेरा हाल न पूछा,
अब सभी आंसू बहाए जा रहे हैं।
एक रूमाल भी भेंट नहीं किया जब हम जिन्दा थे,
अब शॉलें और कपड़े ओढ़ाये जा रहे हैं।
सबको पता है कि शॉलें और कपड़े इसके काम के नहीं हैं,
मगर फिर भी बेचारे दुनियादारी निभाए जा रहे हैं।
कभी किसी ने एक वक्त का खाना तक नहीं खिलाया,
अब देसी घी मेरे मुंह में डाले जा रहे हैं ।
जिन्दगी में एक कदम भी साथ न चल सका कोई,
अब फूलों से सजाकर कन्धे पर उठाए जा रहे हैं।
आज पता चला कि,
मौत जिन्दगी से कितनी बेहतर है।

10/10/2022

हर समय मृत्यु! "घट
रही है! और ये जान लो कि,
प्रत्येक आदमी.. " मरघट पर
खड़ा है.! लेकिन आदमी
यहाँ, "बड़े-बड़े सपने संजोए
बैठा है, और "मौत! एक
दिन सब छीनने वाली
है

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