Shrimad Bhagavad Gita

Shrimad Bhagavad Gita

Share

हरे कृष्णा !! पाए भगवद गीता ज्ञान रोजाना।
आज ही फ़ॉलो करे।

Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 26/06/2025

Read Caption 👉 कृष्ण को ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान के रूप में विभिन्न रूपों में अनुभव किया जाता है। कृष्णभावनामृत का अर्थ है, संक्षेप में, भगवान की दिव्य प्रेममयी सेवा में सदैव संलग्न रहना। किन्तु जो लोग निराकार ब्रह्म या अन्तर्यामी परमात्मा में आसक्त हैं, वे भी आंशिक रूप से कृष्णभावनामृत ही हैं, क्योंकि निराकार ब्रह्म कृष्ण की आध्यात्मिक किरण है तथा परमात्मा कृष्ण का सर्वव्यापी आंशिक विस्तार है। इस प्रकार निराकारवादी तथा ध्यानी भी अप्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनामृत ही हैं। प्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनामृत व्यक्ति सर्वोच्च पारमार्थिकवादी होता है, क्योंकि ऐसा भक्त जानता है कि ब्रह्म तथा परमात्मा का क्या अर्थ है। परम सत्य का उनका ज्ञान पूर्ण है, जबकि निर्विशेषवादी तथा ध्यानयोगी अपूर्ण रूप से कृष्णभावनाभावित हैं। फिर भी, इन सभी को निरंतर अपने-अपने कार्यों में लगे रहने का निर्देश दिया गया है, ताकि वे देर-सवेर सर्वोच्च सिद्धि को प्राप्त कर सकें।

एक योगातीतवादी का पहला कार्य है मन को सदैव कृष्ण पर केन्द्रित रखना। उसे सदैव कृष्ण का चिंतन करना चाहिए तथा उन्हें एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना चाहिए। मन को परब्रह्म पर केन्द्रित करने को समाधि या समाधि कहते हैं। मन को एकाग्र करने के लिए, व्यक्ति को सदैव एकान्त में रहना चाहिए तथा बाह्य वस्तुओं से होने वाली बाधा से बचना चाहिए। उसे अपने बोध को प्रभावित करने वाली अनुकूल परिस्थितियों को स्वीकार करने तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को अस्वीकार करने में बहुत सावधान रहना चाहिए। तथा, पूर्ण निश्चय के साथ, उसे अनावश्यक भौतिक वस्तुओं के पीछे नहीं भागना चाहिए, जो उसे स्वामित्व की भावना से उलझाती हैं।

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 06 chant 10
भगवद्-गीता » अध्याय 6: ध्यानयोग » श्लोक 10



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag










Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 24/06/2025

Read Caption 👉 मनुष्य के मन का स्वभाव है कि वह अपने मित्रों और शत्रुओं के प्रति अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है। लेकिन उच्च योगी का स्वभाव अलग होता है। ईश्वर के ज्ञान से संपन्न उच्च योगी संपूर्ण सृष्टि को ईश्वर के साथ एकता में देखते हैं। इस प्रकार वे सभी जीवों को समान दृष्टि से देख पाते हैं। दृष्टि की यह समता भी विभिन्न स्तरों की होती है:

“सभी जीव दिव्य आत्माएं हैं, और इसलिए ईश्वर के अंश हैं।” इस प्रकार, उन्हें समान माना जाता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु यः पश्यति स पंडितः “सच्चा पंडित वह है जो सभी को आत्मा के रूप में देखता है, और इसलिए अपने समान देखता है।”

दृष्टि उच्चतर होती है: “ईश्वर सभी में विराजमान हैं, और इसलिए सभी समान रूप से सम्मान के पात्र हैं।”

उच्चतम स्तर पर, योगी यह दृष्टि विकसित करता है: “सभी ईश्वर का रूप हैं।” वैदिक शास्त्रों में बार-बार कहा गया है कि पूरा संसार ईश्वर का साक्षात रूप है: ईशावास्यम् इदं सर्वं यत् किंच जगत्यां जगत (ईशोपनिषद् 1)[v2] “संपूर्ण ब्रह्मांड, इसके सभी जीवित और निर्जीव प्राणियों के साथ, सर्वोच्च सत्ता की अभिव्यक्ति है, जो इसके भीतर निवास करती है।” पुरुष एवेदं सर्वं (पुरुष सूक्तम्)[v3] “ईश्वर इस संसार में हर जगह है, और सब कुछ उसकी ऊर्जा है।” इसलिए, सर्वोच्च योगी सभी को ईश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में देखता है। इस स्तर की दृष्टि से संपन्न, हनुमान कहते हैं: सिया राम माया सब जग जानी (रामायण)[v4] “मैं सभी में सीता राम का चेहरा देखता हूँ।”

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 06 chant 09
भगवद्-गीता » अध्याय 6: ध्यानयोग » श्लोक 09



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 23/06/2025

Read Caption 👉 "कोई भी व्यक्ति अपनी भौतिक रूप से दूषित इंद्रियों के माध्यम से श्री कृष्ण के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की पारलौकिक प्रकृति को नहीं समझ सकता। केवल जब कोई व्यक्ति भगवान की पारलौकिक सेवा से आध्यात्मिक रूप से संतृप्त हो जाता है, तभी भगवान के पारलौकिक नाम, रूप, गुण और लीलाएँ उसके सामने प्रकट होती हैं।" (भक्तिरसामृतसिंधु 1.2.234)

यह भगवद्गीता कृष्णभावनामृत का विज्ञान है। कोई भी व्यक्ति केवल सांसारिक विद्वत्ता से कृष्णभावनामृत नहीं बन सकता। किसी व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति की संगति करने का सौभाग्य प्राप्त होना चाहिए जो शुद्ध चेतना में हो। एक कृष्णभावनामृत व्यक्ति को कृष्ण की कृपा से ज्ञान का साक्षात्कार होता है, क्योंकि वह शुद्ध भक्ति सेवा से संतुष्ट होता है। प्राप्त ज्ञान से व्यक्ति सिद्ध हो जाता है। दिव्य ज्ञान से व्यक्ति अपने विश्वासों में स्थिर रह सकता है, लेकिन मात्र शैक्षणिक ज्ञान से व्यक्ति आसानी से भ्रमित हो सकता है और प्रत्यक्ष विरोधाभासों से भ्रमित हो सकता है। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त आत्मा ही वास्तव में आत्म-संयमी होती है, क्योंकि वह कृष्ण के प्रति समर्पित होती है। वह दिव्य होती है, क्योंकि उसका सांसारिक विद्वत्ता से कोई लेना-देना नहीं होता। उसके लिए सांसारिक विद्वत्ता और मानसिक चिंतन, जो दूसरों के लिए सोने के समान हो सकता है, कंकड़ या पत्थर से अधिक मूल्यवान नहीं होते।

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 06 chant 08
भगवद्-गीता » अध्याय 6: ध्यानयोग » श्लोक 08



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 30/04/2024

Read Caption 👉 वस्तुतः प्रत्येक जीव उस भगवान् की आज्ञा का पालन करने के निमित्त आया है, जो जन-जन के हृदयों में परमात्मा-रूप में स्थित है | जब मन बहिरंगा माया द्वारा विपथ पर कर दिया जाता है तब मनुष्य भौतिक कार्यकलापों में उलझ जाता है | अतः ज्योंही मन किसी योगपद्धति द्वारा वश में आ जाता है त्योंही मनुष्य को लक्ष्य पर पहुँच हुआ मान लिया जाना चाहिए | मनुष्य को भगवद्-आज्ञा का पालन करना चाहिए | जब मनुष्य का मन परा-प्रकृति में स्थिर हो जाता है तो जीवात्मा के समक्ष भगवद्-आज्ञा पालन करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता | मन को किसी न किसी उच्च आदेश को मानकर उनका पालन करना होता है | मन को वश में करने से स्वतः ही परमात्मा के आदेश का पालन होता है | चूँकि कृष्णभावनाभावित होते ही यह दिव्य स्थिति प्राप्त हो जाती है, अतः भगवद्भक्त संसार के द्वन्द्वों, यथा सुख-दुख, सर्दी-गर्मी आदि से अप्रभावित रहता है | यह अवस्था व्यावहारिक समाधि या परमात्मा में तल्लीनता है |

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 06 chant 07
भगवद्-गीता » अध्याय 6: ध्यानयोग » श्लोक 07



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









07/12/2023

Read Caption 👉 प्रसंग के अनुसार आत्मा शब्द का अर्थ शरीर, मन तथा आत्मा होता है | योगपद्धति में मन तथा आत्मा का विशेष महत्त्व है | चूँकि मन ही योगपद्धति का केन्द्रबिन्दु है, अतः इस प्रसंग में आत्मा का तात्पर्य मन होता है | योगपद्धति का उद्देश्य मन को रोकना तथा इन्द्रियविषयों के प्रति आसक्ति से उसे हटाना है | यहाँ पर इस बात पर बल दिया गया है कि मन को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाय कि वह बद्धजीव को अज्ञान के दलदल से निकाल सके | इस जगत् में मनुष्य मन तथा इन्द्रियों के द्वारा प्रभावित होता है | वास्तव में शुद्ध आत्मा इस संसार में इसीलिए फँसा हुआ है क्योंकि मन मिथ्या अहंकार में लगकर प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व जताना चाहता है | अतः मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि वह प्रकृति की तड़क-भड़क से आकृष्ट ण हो और इस तरह बद्धजीव की रक्षा की जा सके | मनुष्य को इन्द्रियविषयों से आकृष्ट होकर अपने को पतित नहीं करना चाहिए | जो जितना ही इन्द्रियविषयों के प्रति आकृष्ट होता है वह उतना ही इस संसार में फँसता है | अपने को विरत करने का सर्वोत्कृष्ट साधन यही है कि मन को सदैव कृष्णभावनामृत में निरत रखा जाय | हि शब्द इस बता पर बल देने के लिए प्रयुक्त है अर्थात् इसे अवश्य करना चाहिए |

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 06 chant 05
भगवद्-गीता » अध्याय 6: ध्यानयोग » श्लोक 05



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 14/10/2023

Read Caption 👉 जब मनुष्य भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में पूरी तरह लगा रहता है तो वह अपने आप में प्रसन्न रहता है और इस तरह वह इन्द्रियतृप्ति या सकामकर्म में प्रवृत्त नहीं होता | अन्यथा इन्द्रियतृप्ति में लगना ही पड़ता है, क्योंकि कर्म किए बिना कोई रह नहीं सकता | बिना कृष्णभावनामृत के मनुष्य सदैव स्वार्थ में तत्पर रहता है | किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही सब कुछ करता है, फलतः वह इन्द्रियतृप्ति से पूरी तरह विरक्त रहता है | जिसे ऐसी अनुभूति प्राप्त नहीं है उसे चाहिए कि भौतिक इच्छाओं से बचे रहने का वह यंत्रवत् प्रयास करे, तभी वह योग की सीढ़ी से ऊपर पहुँच सकता है |

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 06 chant 04
भगवद्-गीता » अध्याय 6: ध्यानयोग » श्लोक 04



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 13/10/2023

Read Caption 👉 परमेश्र्वर से युक्त होने की विधि योग कहलाती है | इसकी तुलना उस सीढ़ी से की जा सकती है जिससे सर्वोच्च आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की जाती है | यह सीढ़ी जीव की अधम अवस्था से प्रारम्भ होकर अध्यात्मिक जीवन के पूर्ण आत्म-साक्षात्कार तक जाती है | विभिन्न चढ़ावों के अनुसार इस सीढ़ी के विभिन्न भाग भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते हैं | किन्तु कुल मिलाकर यह पूरी सीढ़ी योग कहलाती है और इसे तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है – ज्ञानयोग, ध्यानयोग और भक्तियोग | सीढ़ी के प्रारम्भिक भाग को योगारुरुक्षु अवस्था और अन्तिम भाग को योगारूढ कहा जाता है |

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 06 chant 03
भगवद्-गीता » अध्याय 6: ध्यानयोग » श्लोक 03



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 12/10/2023

Read Caption 👉 वास्तविक संन्यास-योग या भक्ति का अर्थ है कि जीवात्मा अपनी स्वाभाविक स्थिति को जाने और तदानुसार कर्म करे | जीवात्मा का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता | वह परमेश्र्वर की तटस्था शक्ति है | जब वह माया के वशीभूत होता है तो वह बद्ध हो जाता है, किन्तु जब वह कृष्णभावनाभावित रहता है अर्थात् आध्यात्मिक शक्ति में सजग रहता है तो वह अपनी सहज स्थिति में होता है | इस प्रकार जब मनुष्य पूर्णज्ञान में होता है तो वह समस्त इन्द्रियतृप्ति को त्याग देता है अर्थात् समस्त इन्द्रियतृप्ति के कार्यकलापों का परित्याग कर देता है | इसका अभ्यास योगी करते हैं जो इन्द्रियों को भौतिक आसक्ति से रोकते हैं | किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को तो ऐसी किसी भी वस्तु में अपनी इन्द्रिय लगाने का अवसर ही नहीं मिलता जो कृष्ण के निमित्त न हो | फलतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति संन्यासी तथा योगी साथ-साथ होता है | ज्ञान तथा इन्द्रियनिग्रह योग के ये दोनों प्रयोजन कृष्णभावनामृत द्वारा स्वतः पूरे हो जाते हैं | यदि मनुष्य स्वार्थ का त्याग नहीं कर पाता तो ज्ञान तथा योग व्यर्थ रहते हैं | जीवात्मा का मुख्य ध्येय तो समस्त प्रकार की आत्मतृप्ति को त्यागकर परमेश्र्वर की तुष्टि करने के लिए तैयार रहना है |

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 06 chant 02
भगवद्-गीता » अध्याय 6: ध्यानयोग » श्लोक 02



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 11/10/2023

Read Caption 👉 इस अध्याय में भगवान् बताते हैं कि अष्टांगयोग पद्धति मन तथा इन्द्रियों को वश में करने का साधन है | किन्तु इस कलियुग में सामान्य जनता के लिए इसे सम्पन्न कर पाना अत्यन्त कठिन है | यद्यपि इस अध्याय में अष्टांगयोग पद्धति की संस्तुति की गई है, किन्तु भगवान् बल देते हैं कि कर्मयोग या कृष्णभावनामृत में कर्म करना इससे श्रेष्ठ है | इस संसार में प्रत्येक मनुष्य अपने परिवार के पालनार्थ तथा अपनी सामग्री के रक्षार्थ कर्म करता है, किन्तु कोई भी मनुष्य बिना किसी स्वार्थ, किसी व्यक्तिगत तृप्ति के, चाहे वह तृप्ति आत्मकेन्द्रित हो या व्यापक, कर्म नहीं करता | पूर्णता की कसौटी है – कृष्णभावनामृत में कर्म करना, कर्म के फलों का भोग करने के उद्देश्य से नहीं | कृष्णभावनामृत में कर्म करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है, क्योंकि सभी लोग परमेश्र्वर के अंश हैं | शरीर के अंग पुरे शरीर के लिए कार्य करते हैं | शरीर के अंग अपनी तृप्ति के लिए नहीं, अपितु पूरे शरीर की तुष्टि के लिए कार्य करते हैं | इसी प्रकार जो जीव अपनी तुष्टि के लिए नहीं, अपितु परब्रह्म की तुष्टि के लिए कार्य करता है, वही पूर्ण संन्यासी या पूर्ण योगी है |

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 06 chant 01
भगवद्-गीता » अध्याय 6: ध्यानयोग » श्लोक 01



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 10/10/2023

Read Caption 👉 माया से वशीभूत सारे बद्धजीव इस संसार में शान्ति प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहते हैं | किन्तु भगवद्गीता के इस अंश में वर्णित शान्ति के सूत्र को वे नहीं जानते | शान्ति का सबसे बड़ा सूत्र यही है कि भगवान् कृष्ण समस्त मानवीय कर्मों के भोक्ता हैं | मनुष्यों को चाहिए कि प्रत्येक वास्तु भगवान् की दिव्यसेवा में अर्पित कर दें क्योंकि वे ही समस्त लोकों तथा उनमें रहने वाले देवताओं के स्वामी हैं | उनसे बड़ा कोई नहीं है | वे बड़े बड़े देवता, शिव तथा ब्रह्मा से भी महान हैं | वेदों में (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ६.७) भगवान् को तमीश्र्वराणां परमं महेश्र्वरम् कहा गया है | माया के वशीभूत होकर सारे जीव सर्वत्र अपना प्रभुत्व जताना चाहते हैं, लेकिन वास्तविकता तो यः है कि सर्वत्र भगवान् की माया का प्रभुत्व है | भगवान् प्रकृति (माया) के स्वामी हैं और बद्धजीव प्रकृति के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत हैं | जब तक कोई इन तथ्यों को समझ नहीं लेता तब तक संसार में व्यष्टि या समष्टि रूप से शान्ति प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं है | कृष्णभावनामृत का यही अर्थ है | भगवान् कृष्ण परमेश्र्वर हैं तथा देवताओं सहित सारे जीव उनके आश्रित हैं | पूर्ण कृष्णभावनामृत में रहकर ही पूर्ण शान्ति प्राप्त की जा सकती है |

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 05 chant 29
भगवद्-गीता » अध्याय 5: कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म » श्लोक 29



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









krishna

Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 31/07/2023

Read Caption 👉 कृष्णभावनामृत में रत होने पर मनुष्य तुरन्त ही अपने अध्यात्मिक स्वरूप को जान लेता है जिसके पश्चात् भक्ति के द्वारा वह परमेश्र्वर को समझता है | जब मनुष्य भक्ति करता है तो वह दिव्य स्थिति को प्राप्त होता है और अपने कर्म में भगवान् की उपस्थिति का अनुभव करने योग्य हो जाता है | यह विशेष स्थिति मुक्ति कहलाती है |

मुक्ति विषयक उपर्युक्त सिद्धान्तों का प्रतिपादन करके श्रीभगवान् अर्जुन को यह शिक्षा देते हैं कि मनुष्य किस प्रकार अष्टांगयोग का अभ्यास करके इस स्थिति को प्राप्त होता है | यह अष्टांगयोग आठ विधियों – यं, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि में विभाजित है | छठे अध्याय में योग के विषय में विस्तृत व्याख्या की गई है, पाँचवे अध्याय के अन्त में तो इसका प्रारम्भिक विवेचन हि दिया गया है |

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 05 chant 27 -28
भगवद्-गीता » अध्याय 5: कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म » श्लोक 27 - 28



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









Photos from Shrimad Bhagavad Gita 's post 29/07/2023

Read Caption 👉 मोक्ष के लिए सतत प्रयत्नशील रहने वाले साधुपुरुषों में से जो कृष्णभावनाभावित होता है वह सर्वश्रेष्ठ है | इस तथ्य की पुष्टि भागवत में (४.२२.३९) इस प्रकार हुई है –

यत्पादपंकजपलाशविलासभक्त्या
कर्माशयं ग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः |

तद्वन्न रिक्तमतयो यतयोSपि रुद्ध-
स्त्रोतोगणास्तमरणं भज वासुदेवम् ||

“भक्तिपूर्वक भगवन् वासुदेव की पूजा करने का प्रयास तो करो! बड़े से बड़े साधु पुरुष भी इन्द्रियों के वेग को अपनी कुशलता से रोक पाने में समर्थ नहीं हो पाते जितना कि वे जो सकामकर्मों की तीव्र इच्छा को समूल नष्ट करके और भगवान् के चरणकमलों की सेवा करके दिव्य आनन्द में लीन रहते हैं |”

बद्धजीव में कर्म के फलों को भोगने की इच्छा इतनी बलवती होती है कि ऋषियों-मुनियों तक के लिए कठोर परिश्रम के बावजूद ऐसी इच्छाओं को वश में करना कठिन होता है | जो भगद्भक्त कृष्णचेतना में निरन्तर भक्ति करता है और आत्म-साक्षात्कार में सिद्ध होता है, वह शीघ्र हि मुक्ति प्राप्त करता है | आत्म-साक्षात्कार का पूर्णज्ञान होने से वह निरन्तर समाधिस्थ रहता है

हरे कृष्णा !! रोजाना भगवद गीता पढ़ने के लिए आज ही हमारे पेज को फॉलो करे।
Double tap ♥️ if you love krishna

अगर हमारा ये प्रयास आपको अच्छा लग रहा है तो अपने दोस्तो एवं रिश्तेदारों से शेर जरूर करे। क्योंकि, अच्छी बाते शेर करने से आपका भी सम्मान बढ़ता है। धन्यवाद 🙏

Krishna Gyansagar
Jai shree Krishna

Bhagvad geeta chapter 05 chant 26
भगवद्-गीता » अध्याय 5: कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म » श्लोक 26



Like
Share
Comment

Hashtag

Hashtag









Want your school to be the top-listed School/college in Ahmedabad?

Click here to claim your Sponsored Listing.

Location

Category

Website

Address


Ahmedabad