13/01/2026
#संघ_को_समझना_इतना_मुश्किल_नहीं_तो_उतना_आसान_भी_नहीं_है,
✍️विश्व संघ से यूँही परेशान नहीं 🌄
जो संयम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बीजेपी को सत्ता मिलने के बावजूद रखा है, वह उसे उन महान ऋषियों की श्रेणी का सिद्ध करता है जिनका एकमेव लक्ष्य "कामये दुःखतप्तानाम् प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्" है।
12 वर्षों का केंद्र शासन और लगभग 70% राज्य सत्ता मिलने के उपरांत भी संघ के किसी प्रचारक, कार्यवाह अथवा कार्यकर्ता ने न धीरज खोया न आपा।
अन्यथा सत्ता के अनुकूल होते ही बाहरी, भीतरी अनेक संकट खड़े होते हैं। इन वर्षों में संघ को अपने कार्यकर्ताओं को न केवल सम्भाल कर सक्रिय रखना था, सत्ता के एंटी इनकम्बेंसी के वज्र मासूम और वीतरागी कार्यकर्ताओं पर न गिरें, यदि गिर जाए तो वे सहन कर लें, बल्कि समानांतर जो सत्ता के लाभ या आनुकूल्य है, उससे भी बचना था।
इस अवधि में अनेक कार्यकर्ता हताश निराश हुए लेकिन वह हताशा व्यक्तिगत कार्य न होने को लेकर नहीं थी, जिन मित्रों ने आशा रखी अथवा उलाहने दिए उनको लेकर भी न थी, निराशा का कारण राष्ट्र यज्ञ की धीमी गति अथवा नई उपजी चुनौतियों को लेकर थी।
देश का जैसा और जितना कल्याण चाहा था वैसा क्यों नहीं हो रहा, उस गति से क्यों नहीं हो रहा, और अब क्यों देरी हो रही है? वे जो कभी साथ न थे, उनको साधने की अकाशकुसुम संभावना क्यों?
सच में, एक कार्यकर्ता के लिए ये बहुत पीड़ादायक और मन विचलित करने वाली चुनौतियां थीं। इतनी भयावह की कई महानुभावों को कई कई रात नींद नहीं आती थी, कि अब तक मंदिर क्यों नहीं बना, या अब भी सेना पर हमला क्यों हो रहा है, अथवा लव जिहाद और डेमोग्राफी जैसे विषय, और सामान्य जनता के बीच इन पर बात करना भी कठिन था।
जो प्रश्न बीजेपी या सत्ता से पूछे जाने चाहिए, वे संघ से पूछे गए क्योंकि संघ ही समाज के बीच सहज रूप से हर समय उपलब्ध था।
हताश, निराश, दूध के जले हिन्दू समाज को, जिसने कि अपने कल्याण की सभी संभावनाओं को मार दिया था, जो अत्यंत प्रताड़ित होने के बावजूद भयंकर उत्पीड़क जैसी सजा पाता था, जो हिन्दू होने की घोषणा करने में भी अपराधबोध महसूस करता था, बहुत आहिस्ता आहिस्ता विश्वास में लेना था, जातिवादियों के व्यंग्य वचन और विघटन की वे सभी संभावनाएं इन द्वादश वर्षों में चरमता से उभर कर सामने आईं। संघ चाहता तो इन समस्याओं को बाईपास कर सकता था, सत्ता की हुनक से ठीक कर सकता था, नहले पर दहले जैसा खेल कर सकता था, यह नहीं करता तो भी उसके सामने कांग्रेसी चरित्र की लकीर तो थी ही कि कैसे मात्र 5 वर्ष की सत्ता में ही सभी कांग्रेसी कैसे छुट्टे बैल बन जाते हैं या लूट और बंदरबांट की वे सभी योजनाएं जो केवल उन्हें या ोंको पोषण के लिए बनाई जाती हैं, उसका अर्द्धांश भी करते तब भी बहुत लोगों को व्यक्तिगत लाभ तो होता ही, लेकिन संघ ने स्वयं के मामले में ऐसा नहीं होने दिया।
न धीरज खोया न संयम। अपने अनुकूल सत्ता होने के बावजूद उसका रंचमात्र भी घमंड नहीं बल्कि और अधिक जिम्मेदारी से दक्ष-आरम् की स्थितियों को सुधारने की साधना में लग गए।
इधर सरकारों को भी यह नवीन विजन मिला कि सबके लिए शौचालय, सबको घर, बिजली, पानी, उद्योग की स्वाभाविक सुविधा दो, कोई स्वयंसेवक इसके दायरे में आएगा तो सहज ही उपकृत हो जाएगा, यह सचमुच संसार का अब तक का सबसे निष्पक्ष, सबसे अधिक न्यायोचित और वास्तविक कल्याणकारी पथ था।
यद्यपि यह बहुत बहुत कठिन था, कदम कदम पर गिरावट, प्रतिपक्षियों की गिद्ध दृष्टि और खाने न दो, गिरा दो की आसुरी आशंका से रहित नहीं था, उस हालत में जब भारत भूमि अनेक प्रकार के लोगों से भरी हुई है, जहां की प्राथमिकताओं और प्रकृति में इतनी विविधता है कि एक स्थान का अमृत दूसरे स्थान पर जहर बन सकता था, जैसा कि इतिहास बोध के उदाहरण अथवा समरसता की बातों को लेकर हमें सुनना पड़ा, लेकिन संघ विचलित नहीं हुआ।
इतने विशाल और व्यापक संगठन में, एक भी फिसलने न पाए, एक भी स्थान भ्रष्ट न हो, एक एक को संभाल लो ताकि एक भी उपेक्षित अनुभव न करे, यह कितना कठिन था?
2014 से पहले जो साइकिल पर चलते थे, आज कार में है। जिन बस्तियों में युगों तक अंधेरा था, आज वे ढाणियां जगमगाती हैं, कृषकबाला जो कीपैड पर डायल करना नहीं जानती थी, आज यूट्यूब पर देखकर सुंदर कपड़े सिलती है, देश में अकूत सुविधा और समृद्धि पनपी है लेकिन आपको #संघ_कार्यालय लगभग वैसे ही दिख रहे होंगे। वही सिंगल पाटा जिस पर एक कठोर गद्दा बिछाकर जिला प्रचारक सोता है, वही प्लास्टिक की सस्ती कुर्सियां, एक मटकी, जूते खोलने की जगह और स्वदेशी सस्ता साबुन मंजन और सरसों का तेल रखे हुए साधारण स्नानघर।
वृद्ध अधिकारियों की सुविधा के लिए कहीं कहीं सिटिंग टॉयलेट या बड़े कार्यालयों में लिफ्ट जरूर आयी होगी अन्यथा ज्यादातर जगह तो घोष सामग्री तक अपडेट नहीं हुई।
वही प्रचारक, मस्त सफेद पाजामा पहन कर किसी की गाड़ी मांगकर, तय समय से थोड़ा लेट भोजन को जाता हुआ और एक एक साधारण कार्यकर्ता के बारे में विचार करता हुआ मिलेगा। इधर किसी ने एक स्वेटर गिफ्ट दे भी दिया तो उधर ही वे किसी दूसरे को पास कर देते हैं।
कहने को लोग कुछ भी कह देंगे, कई बातें बनाएं लेकिन अब भी उनके पास बैंक अकॉउंट, फ़ोनपे या जीवन की नितांत प्राथमिक चीजें भी अपडेट नहीं है।
संघ वही कर रहा है जो वह 1925 में करने चला था। वह यहां तक पहुंचा है अपने जितेंद्रिय स्वभाव से, अपने स्वाभाविक चरित्र बल से, अपने संयम और दृढ़ता से।
उसके हृदय में मातृभूमि की दुरावस्था की पीड़ा की वह #सुलगती_अग्नि है जो उसे बिल्कुल भी विचलित नहीं होने देती। वे लोग दिन को मुस्कराकर सब सुनते हैं और रात के अंधेरे में आज भी दीन दुखियों के लिए जी भरकर सुबकते हैं।
उनकी करुणा, उनका धीरज, उनकी परदुःखकातरता उन्हें सदैव सजग रखती है।
वे भारत की सुप्त शक्तियों की वह ऋषि प्रज्ञा है जो अनकहे ही पाप को भस्म करने की तपस्या से अनुतप्त है।
इस भीषण कोलाहल में संघ आज भी वह सबकुछ सहन कर रहा है जो किसी सती को, किसी संत को, किसी शूर को या किसी गौ को सहना पड़ता है। नहीं कहेगा वह प्रत्युत्तर में। कोई उफ्फ नहीं, कोई शिकायत नहीं, कोई जल्दबाजी भी नहीं। वह मंथर गति से खेल खेल में ही विश्वविजय के खेल की तरफ मुड़ चुका है।
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