Ashok Verma

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21/12/2022

मेरे स्कूल के दिनों में टीचर के पेन माँगते ही हम बच्चों के बीच राकेट गति से गिरते पड़ते सबसे पहले उनकी टेबल तक पहुँच कर पेन देने की अघोषित प्रतियोगिता होती थी | जब कभी मैम किसी बच्चे को क्लास में कापी वितरण में अपनी मदद करने पास बुला ले तो मैडम की सहायता करने वाला बच्चा अकड़ के साथ "अजीमो शाह शहंशाह " बना क्लास में घूम घूम कर कापियाँ बाँटता और बाकी के बच्चें मुँह उतारे गरीब प्रजा की तरह अपनी चेयर से न हिलने की बाध्यता लिए बैठे रहते | मैडम की उपस्थिति में क्लास के भीतर चहल कदमी की अनुमति कामयाबी की तरफ पहला कदम माना जाता । उस मासूम सी उम्र में उपलब्धियों के मायने कितने अलग होते थे _ मैम ने क्लास में सभी बच्चो के बीच गर हमें हमारे नाम से पुकार लिया .....या फिर अपना रजिस्टर स्टाफ रूम में रखकर आने बोल दिया तो समझो कैबिनेट मिनिस्टरी में चयन का गर्व होता था | मुझे आज भी याद है जब बहुत छोटे थे तब बाज़ार या किसी समारोह में हमारी टीचर दिख जाए तो भीड़ की आड़ ले छिप जाते थे | किसी भी सार्वजनिक जगह पर टीचर को देख बच्चें जाने क्यों छिप जाते है ? अब कोई भरी भीड़ में वो अपने छात्र को चमाट तो जमाते नही थे |

हम कैसे भूल सकते है अपने उन गणित के टीचर को जिनके खौफ से 17 और 19 का पहाड़ा याद कर पाए थे लेकिन सिर्फ स्कूल के दिनों तक अब तो फिर याद नही | ब्लैक बोर्ड को गणित टीचर कास ,थीटा , अल्फा ,साइन से सफ़ेद कर देते थे जैसे ब्लैक बोर्ड पर अनगिनत कीड़े मकोड़ों की महफ़िल जुट गई | हम सहेलियों को और कुछ पल्ले पड़े न पड़े एक बात जरूर याद रहती थी “देख चाक पावडर से सर की मूंछ सफ़ेद हो गयी |” कैसे भूल सकते है उन सौम्य हिंदी शिक्षिका को जिनके आवेदन पत्रों से ये गूढ़ ज्ञान मिला कि बुखार नही ज्वर पीड़ित होने के साथ सनम्र निवेदन कहने के बाद ही तीन दिन का अवकाश मिल सकता है | परीक्षा की उत्तरपुस्तिका में कविता के भावार्थ की व्याख्या से पहले सन्दर्भ , फिर प्रसंग और अंत में व्याख्या लिखते थे | जिन महाज्ञानी बच्चों को मैडम पर अपनी विद्वता का अतिरिक्त प्रभाव जमाना होता था वो एक कदम और आगे बढ़ाते थे | वे पांखडी छात्र अपनी उत्तरपुस्तिका में भावार्थ में सबसे पहले प्रसंग, फिर सन्दर्भ फिर व्याख्या और अंत में ज्ञानप्रदर्शन के निचोड़ की पूर्णाहुति के रूप में ‘विशेष’ लिखते । विशेष लिख डेश (-) लगाकर कवि द्वारा किन पँक्तियों में समास , सन्धि, उपमा , अलंकार का कहाँ कहाँ प्रयोग हुआ है आदि आदि ।

कैसे विस्मृत हो सकते है सामाजिक विज्ञान के वो सर जिनके लिखाए लम्बे नीरस उत्तरों में पानीपत के तीनों युद्ध से लेकर दोनों विश्व युद्ध के कारण और प्रभाव याद करने में सुबह से शाम हो जाती थी | ऊऊफ़्फ़्फ़ कौन समझ सकता है बाल मन में उपजी भूगोल की उस जटिल उलझन को कि इतनी बड़ी पृथ्वी से चिपककर कौन से स्पाइडमैन ने देशांतर ,मध्यांतर और भूमध्य रेखाए खींची थी | साइंस प्रैक्टिकल रूम में पहली बार प्रवेश का रोमांच आज भी याद है |चारों तरफ परखनली और रसायन में डूबे कीड़े मकोड़ों के बीच सफ़ेद एप्रेन पहनकर हमें किसी हॉलीवुड फिल्म में डाइनासोर के अण्डों या शहर में तबाही मचाती मकड़ी को मारने वाले रसायन पर रिसर्च करने वाले स्कॉलर की अनुभूति होती थी | तभी लैब में अचानक साइंस मैम की गरजती आवाज़ "ये परखनली किसने तोड़ी ?" जैसे घातक प्रश्नों के बाद ही डाइनासोर के डी. एन. ए .पर शोध करते हम महान जीव वैज्ञानिक चेतना के वास्तविक धरातल में वापस आते | जिस बच्चे की किस्मत ज्यादा खराब होती थी प्रैक्टिकल रूम में उसके हाथ से बड़े बीकर छूटते थे | आज भी याद आती है वो अंग्रेजी टीचर जिनके सानिध्य में टेन्स सीखते वक़्त पास्ट परफेक्ट और प्रेजेंट परफेक्ट में वर्ब के तीनों फ़ार्म याद करते करते अंग्रेजी साहित्य में हम अपना फ्यूचर डार्क देखते थे |

अपनी उस कक्षा शिक्षिका को कैसे भूले जो शोर मचाते बच्चों से भी ज्यादा ऊँची आवाज़ में गरजती ..” मछली बाज़ार है क्या ?”.... मैंने तो मछली बाज़ार में मछलियों के ऊपर कपड़ा हिलाकर मक्खी उड़ाते खामोश दुकानदार ही देखे है| कही कोई हल्ला गुल्ला नही होता | मैम ने किसी और फिश मार्केट की बात की होगी | नही भूल सकते उन स्नेहिल नर्सरी मैम को जिन्होंने हमारे आंसुओ से भीगे चेहरे और “मम्मी पास जाना” को रुमाल से पोछ मीठी आवाज़ में कहा था .”बस बेटा अभीईईईईइ घंटी बजेगी और मम्मा आ जाएगी |” कैसे भूलू उस टीचर को जो महज़ एक गुलाब देकर गुड मार्निंग बोलने से गुलाब सी खिल जाती थी । वो टीचर तो आपको भी बहुत अच्छे से याद होंगे जिन्होंने आपकी क्लास को स्कूल की सबसे शैतान क्लास की उपाधि से नवाज़ा था | उन टीचर को तो कतई नही भुलाया जा सकता जो होमवर्क कापी भूलने पर ये कहकर कि ... “ कभी खाना खाना भूलते हो? ” ...बेइज़्ज़त तकिया कलाम से हमें शर्मिंदा करते थे | टीचर के महज़ इतना कहते ही कि "एक कोरा पेज़ देना" पूरी क्लास में फड़फड़ाते 50 पन्ने फट जाते थे । क्या आप भूल सकते है गिद्ध सी पैनी नज़र वाले अपने उस टीचर को जो बच्चों की टेबल के नीचे छिपाकर कापी के आखरी पन्नों पर चलती दोस्तों के मध्य लिखित गुप्त वार्ता को ताड़ कर अचानक खड़ा कर पूछते "तुम बताओ मैंने अभी अभी क्या पढ़ाया ?" अपराधी बच्चे फक्क जर्द चेहरे के साथ बगले झाँकने लगते । टीचर की ऐसी छापामारी में कभी कभार उदार , सहयोगी पड़ोसी छात्र हौले से फुसफुसा कर मदद कर देते तो बात बन भी जाती थी ।क्लास में राउंड लगाती टीचर यदि सीट के बाजू से गुजरती हुई एक नजर हमारी खुली कापी में डाल दे तो 440 वोल्ट का करंट लगता था । अधूरे होमवर्क को उनके पीरियड आने के पहले पड़ोसियों की उधार ली कापियों से हड़बड़ी में पूरा करते थे । उनके टेबल के पास खड़े रहकर कॉपी चेक कराने के बदले यदि मुझे सौ दफा सूली पर लटकना पड़े तो वो ज्यादा आसान था । क्लास में मैम के प्रश्न पूछने पर उत्तर याद न आने पर कुछ लड़कों के हाव भाव ऐसे होते थे कि उत्तर तो जुबान पर रखा है बस जरा सा छोर हाथ नही आ रहा । ये ड्रामेबाज छात्र उत्तर की तलाश में कभी छत ताकते ,कभी आँखे तरेरते ,कभी हाथ झटकते । देर तक आडम्बर झेलते झेलते आखिर मैम के सब्र का बांध टूट जाता --you , yes you get out from my class ....। वह ढोंगी सर झुकाकर बाहर निकलता तब जाकर क्लास के कई बच्चों के कलेजे में ठंडक पड़ती ।

वो टीचर तो पक्का याद होंगी जिनका जन्मदिन पता चलने पर क्लास का ब्लैक बोर्ड रंग बिरंगी चाक से “हैप्पी बर्थडे” लिख सजा दिया गया था | परीक्षाओं के नज़दीक आने पर हमारी फ़िक्र में रविवार को भी एक्स्ट्रा क्लासेस लेते टीचर्स | सुबह की प्रार्थना में जब हम दौड़ते भागते देर से पहुँच कर भी "लेट कमर" की लाइन से बचने चोरी चोरी मुख्य पंक्ति में जाकर सबसे पीछे खड़े होते तभी सी .आई. डी. निरीक्षण वाली वो कड़ी नज़र जो सिर्फ आँख के इशारे से हमें लाइन से बाहर करती थी | हमारे शिक्षकों को रत्तीभर भी अंदाजा न होता था कि हम शातिर छात्रों का ध्यान प्रार्थना में कम और आज के सौभाग्य से कौन कौन सी टीचर अनुपस्थित है के मुआयने में ज्यादा रहता था । आपको भी वो टीचर याद है न जिन्होंने ज्यादा बात करने वाले दोस्तों की सीट्स बदल उनकी यारी कमजोर करने की साजिश की थी | मैं आज भी दावा कर सकती हूँ कि एक या दो टीचर्स शर्तिया ऐसे होते है जिनके सर के पीछे की तरफ़ अदृश्य नेत्र का वरदान मिलता है | ये टीचर ब्लैक बोर्ड में लिखने में व्यस्त रहकर भी चीते की फुर्ती से पलटकर कौन बात कर रहा है का सटीक अंदाज़ लगाते थे | रब्बा ! हम बच्चे हिरण के छौनो से सहम जाते थे | वो टीचर याद आये या नही जो चाक का उपयोग लिखने में कम और बात करते बच्चों पर भाला फेक शैली में ज्यादा लाते थे ? उन खिलंदड़े टीचर को भला कौन भूल सकता है जो खेल के मैदान में अचानक दौड़ते हुए छात्रों की टीम में सम्मिलित हो जाते थे और फिर बच्चों के लिए हार जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके साथ खेलने का जश्न हो जाता था | जब टीचर एग्जाम हाल में प्रश्न पत्र पकड़कर घूमते और पूछते " एनी डाउट " तब मुझे तो मैथ्स पेपर में हमेशा एक ही डाउट रहता है कि हमें ये ग्राफ पेपर क्यो मिला है जबकि प्रश्रपत्र में ग्राफ किसमें बनाना है मुझे तो यही नही समझ आ रहा । सभी लोग राउंडर का इस्तेमाल किस कोश्च्यन में कर रहे है ? मैं अपनी मूर्खता जग जाहिर ना करके चारों ओर सर घुमाकर देखते चुप बैठी रहती । हर क्लास में एक ना एक बच्चा होता ही है जिसे अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करने में विशेष महारत होती है और ये प्रश्नपत्र थामे एक अदा से खड़े होते है... मैम आई हैव आ डाउट इन कोश्च्यन नम्बर 11 ....हमें डेफिनेशन के साथ एग्जाम्पल भी देना है क्या? उस इंटेलिजेंट गणितज्ञ की शक्ल देख खून खौलता - अरे ससुर के नाती तू डेफिनेशन में एग्जाम्पल भी लिखना चाह रहा है वो शब्द हमने पहली दफा एक सेकेंड पहले तेरे मुँह से ही सुना है । एग्जाम हाल में मैडम प्रश्नपत्र में करेक्शन के लिए कहती कि.. सवाल नम्बर फला फला गलत छप गया है , इस सवाल के बदले आप लोग नया सवाल लिखिए । "कौन बनेगा करोड़पति" के स्वीच द कोश्च्यन वाली लाभ की स्थिति में भी मैं हमेशा ही नो प्रॉफिट नो लॉस में रही । बाद में बदला गया प्रश्न भी मुझे हमेशा पहले गलत छपे प्रश्र जितना ही अबूझा गुप्त कोडिंग लैंग्वेज का लगता । परीक्षा के बाद जाँची हुई कापियों का बंडल थामे कॉपी बाँटने क्लास की तरफ आते शिक्षक साक्षात सुनामी लगते थे। ये वो दिन थे जब कागज़ के एक पन्ने को छूकर खाई 'विद्या कसम' के साथ बोली गयी बात संसार का अकाट्य सत्य हुआ करता थी।

मेरे लिए आज तक एक रहस्य अनसुलझा ही है | खेल के पीरियड का 40 मिनिट छोटा और गणित पीरियड का वही 40 मिनिट लम्बा कैसे हो जाता था ?? जब कभी स्कूल में अलग अलग सदन (हाउस) की प्रतियोगिता होती थी तब हमारे शिक्षक भी शोर मचाते हुए अपने सदन का उत्साहवर्धन करते थे | कभी हमारी टिफ़िन से एक निवाला खा हमें उपकृत करते थे तो कभी हमारे टिफिन भूल जाने पर दोस्तों को साथ खिलाने कह जीवन में साझेदारी का सुख समझाते | जब कभी कोई खूंखार टीचर मुस्कुरा कर चमत्कृत करते तो उनकी मारक मुस्कान बच्चों के बीच एक सुखद चर्चा का विषय होती | स्कूल के गलियारे में कभी हम दोस्तों के साथ उछलते कूदते , सांमने चल रहे बच्चे के जूते पीछे की तरफ से अपने पैर में दबाकर निकालते हुए ,धौलधप्पा और खी खी कर जा रहे हो तभी एकाएक सामने से आते शिक्षक की उपस्थिति मात्र से पैरों में सेना के नियंत्रित कदमताल का हुनर आ जाता | अनुशासित सर झुकाकर “गुड मार्निंग सर” कह पतली गली पकड़ भाग निकलते |

सामने की सीट पर बैठने के नुकसान थे तो कुछ फायदे भी थे ।मसलन चाक खत्म हुई तो मैम के इतना कहते ही कि " कोई भी जाओ बाजू वाली क्लास से चाक ले आना। " सामने की सीट में बैठा बच्चा लपक कर क्लास के बाहर । दूसरी क्लास में "मे आई कम इन" कह सिंघम एंट्री करते । कई बार "सरप्राइज़ चेकिंग" के नाम पर हम पर कापियाँ जमा करने की बिजली भी गिरती थी | सभी बच्चों को चेकिंग के लिए कापी टेबल पर ले जाकर रखना अनिवार्य होता था | टेबल पर रखे जा रहे कापियों के ऊँचे ढेर में अपनी कापी सबसे नीचे दबा आने पर तूफ़ान को जरा देर के लिए टाल आने की तसल्ली मिलती थी | कौन भूल सकता है ‘साइंस वायवा टेस्ट’ जिसमें बाहर से आये "एक्सटर्नल" के सामने हमारे टीचर बारात की तीमारदारी करते नज़र आते थे । ये आव भगत हमें अच्छे अंक दिलाने की ही एक सोची समझी रणनीति होती थी | 15 अगस्त की परेड के मार्चपास्ट में चयनित होने की उम्मीद लिए खेल के मैदान में कड़ी धूप में खड़े घण्टों लेफ्ट राईट करते स्पोर्ट्स टीचर के साथ कदमताल मिलाते | क्या आप भी परीक्षा कक्ष में घुसने से पहले बाजू वाली कक्षा में झांकते चलते थे कि वहाँ किस शिक्षक की ड्यूटी है ? अगर सीधे ,सज्जन और थोड़े से सुस्त शिक्षक परीक्षा कक्ष में आ जाते तो बच्चों के भाग्य से झीका टूटता | ऐसा भी होता था कि जब हम नयी कक्षा में जाने वाले होते थे तो मार्च माह से ही तनाव भरा माहौल शुरू हो जाता क्योंकि "नयी वाली क्लास प्रिंसिपल रूम के ठीक बाजू में है ।" उस कक्षा में पहुँचने के बाद तो हर समय एक ही डायलाग सुनते “तुम लोगो का शोर प्रिंसिपल रूम तक सुनाई दे रहा है ।“ अमा हद है यार ! अब प्रिंसिपल रूम बाज़ू में है इस बात पे हम बच्चों की लिप्स सर्जरी कर सिलवा दोगे या जीभ कटवा दोगे क्या ? हमें भी तो प्रिंसिपल रूम की सारी बातें सुनाई देती है | हमने तो कभी शिकायत नही की | बहुत नाइंसाफी थी जी । किस किस की याद करे , कहाँ कहाँ तक दुखड़ा रोवे ।

वो निर्दयी टीचर जो पीरियड खत्म होने के बाद का भी पाँच मिनिट पढ़ाकर हमारे लंच ब्रेक को छोटा कर देते थे ।हम पढ़ रहे होते थे और दूसरे बच्चें हमारी कक्षा के सामने से झाँकते हुए मुस्कुराते , घूमते ,बतियाते नसीबों वाले लगते थे ।कई बार कुछ शातिर बच्चे “शेर आया, शेर आया” की तर्ज़ पर भयभीत करने हमारी शोर मचाती कक्षा को पल भर में शांत करने के मज़े लेते थे | क्लास के ये नौटंकीबाज छात्र “मैम इज़ कमिंग” का गगनभेदी झूठा एलान कर स्वयं भी गिरते पड़ते अपनी सीट की तरफ लपक शांत बैठ जाते | सभी बच्चे मैडम की एंट्री से पहले अपनी अपनी सीट पर पहुँचने के लिए अफरा तफरी दौड़ते । पल भर का विध्वंशकारी भूचाल और दूसरे ही क्षण सारे आज्ञाकारी ,मासूम बच्चे व्यवस्थित अपनी सीट पर साँस थामे मैम के आने की प्रतीक्षा करते | सभी लोगों पर अपने फरेब का शानदार असर देख जब वो मक्कार बच्चा छिछोरी हंसी हंसता तब सत्य का उदघाटन होता _ मुआ सबको उल्लू बनाकर खीसे निपोरते लोट पोट हो रहा है । चंद होशियार बच्चे हर क्लास में होते है जो मैम के क्लास में घुसते ही याद दिलाने का सेक्रेटरी वाला काम करते है " मैम कल आपने होमवर्क दिया था ।" जी में आता था इस आइंस्टीन की औलाद को डंडों से धुन के धर दो । आपको याद है न जब टीचर आपके टिफिन से एक टुकड़ा रोटी तोड़ खाने से मिली आनंदअनुभूति अगले हप्ते भर उनके पीरियड में बनी रहती । ❣️ कभी कभी ऐसा भी होता था कि मैम की नजर बचा जरा सा दाँत निपोरा नही कि...."स्टैंड अप..यस यू ....खड़े हो जाओ अपनी सीट पर ।आपको किस बात पर इतनी हँसी आ रही थी। हमें भी बताओ सब मिलकर हँसेंगे । " कसम से नानी याद आ जाती थी ।

कई बार ऐसा भी हादसा हुआ कि टीचर की अनुपस्थिति में किसी फ्री पीरियड में हम में से कुछ बच्चे आनंद मनाते कुर्सियों नही बल्कि टेबल पर बैठे हँसी ठिठोली में मशगूल होते थे , कुछ लोग ब्लैक बोर्ड को अपनी कलात्मक चित्रकारी से सजाने में व्यस्त होते ,कुछ फर्श पर पड़े चाक के टुकड़ो को एक दूसरे पर फेकने में मस्त , कुछ लोग आज टिफिन में क्या लाए है खोल कर दिखाते हुए , कुछ बच्चें ऊँचाई पर टेबल में खड़े हो उस दिन उपस्थित छात्रों को गिनने , कुछ छात्र अपनी पेंसिल को इस तरह छिल रहे होते कि उसका छिलका बिना टूटे एक फूल की तरह गोल बनकर बाहर आये कहने का अर्थ है कि सभी लोग बेमतलब के अति महत्वपूर्ण कार्यों में लगे रहते थे | तात्पर्य है कि क्लास का माहौल स्वर्ग सा उत्सवी होता था | तभी क्लास की ऐसी रंगीन फिजा में अचानक ही अबूझा तनाव महसूस होता | आनन्द में डूबे लोग एकाएक गज़ब की फुर्ती से बेआवाज़ ,आतंकित , तीतर बितर अपनी अपनी सीट की तरफ क्यों भाग रहे हैं ??? मामला संदेहास्पद जान दरवाज़े की तरफ पलटकर देखो तो पता चले हाय रब्बा ! खूंखार मुद्रा में सर जी जाने कब से अपनी खूनी आँखों से ये मस्त मंजर खामोश देख रहे थे | "बचा लियो भगवान" की प्रार्थना करते चुप उसी टेबल से फिसलते कुर्सी पर आ जाते ।कई बार क्लास में मची ऐसी ही अफरा तफरी, धक्का मुक्की , भागदौड ,जान बचाने की रेलमपेल और त्राहिमाम में जहाँ हमारी निर्धारित सीट होती वहाँ तक पहुँचने के रास्ते में ही क्रोध से काँपते टीचर तनकर खड़े होते थे । अपनी सीट तक पहुँचने के लिए भूखे शेर के बाजू से निकलने का रिस्क लेना मुनासिब ना जान पड़ता । चुपचाप दोस्तों की सीट पर भी बैठना पड़ा |वहाँ न हमारा बैग , न हमारी कापी । दूसरे के बैग से कापी निकाल ढक्कन लगी पेन को कागज के ऊपर घुमाते हुए सर झुकाये लिखने का झूठा उपक्रम भी करना पड़ा ।

तमाम शरारतों के बावजूद ये बात सौ आने सही हैं कि बरसों बाद उन टीचर्स के प्रति स्नेह और सम्मान और बढ़ गया है | काश किसी मोड़ पर अचानक वो मिल जाए तो बचपन की तरह अब हम छिपेंगे नही बल्कि पूरी श्रद्धा से एक बार चरणस्पर्श कर लेंगे | माता, पिता और गुरु ये तीन प्राणी है जो निर्विवाद , निःस्वार्थ हमको अपने से आगे देख प्रसन्न होते है | वास्तव में हम प्रति दिन 8 घण्टे के हिसाब से पूरा बचपन और तरुणाई टीचर्स के साथ ही बिता देते है | जीवन के सबसे खुबसूरत , बेफिक्र ,अबोध ,सपनीले , सम्भावनाओं से लबरेज़ , ऊर्जा से भरपूर , ख़्वाबों से भीगे और भावी योजनाओं के भरे स्कूल बैग के साथ की सारी यादे हमारे शिक्षको के आस पास ही मंडराती है | आज हम जो कुछ भी हैं इस बेहतरी की नीव का पत्थर उन शिक्षकों की मेहनत का ही परिणाम हैं | आज भी जब मैं स्कूल या कालेज की बिल्डिंग के सामने से गुजरती हूँ तो लगता है कि एक दिन था जब ये बिल्डिंग मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा थी | अब उस बिल्डिंग में न मेरे दोस्त है , न हमकों पढ़ाने वाले वो टीचर्स । बच्चो को लेट एंट्री से रोकने गेट बंद करते मोहन भइय्या भी नही जिन्हें देखते ही हम दूर से चिल्लाते थे “गेट बंद मत करो भैय्या प्लीज़ |” वो बूढी सरस्वती अम्मा भी नही है जो मैम से सिग्नेचर लेने जब जब लाल रजिस्टर के साथ हमारी क्लास में घुसती तो बच्चों में ख़ुशी की लहर छा जाती “कल छुट्टी है |” अब स्कूल के सामने से निकलने से एक टिस सी उठती है जैसे मेरी कोई बहुत अजीज चीज़ छीन गयी हो । आज भी जब उस ईमारत के सामने से निकलती हूँ तो छुट्टी के बाद निकलते बच्चों के चेहरे वैसे ही खिले खिले है ,वही मेरा जाना पहचाना यूनिफार्म और टाई लेकिन अजनबी चेहरों का परायापन है | स्कूल_कालेज की शिक्षा पूरी होते ही व्यवहारिकता के कठोर धरातल में, अपने उत्तरदाईत्वो को निभाते , दूसरे शहरो में रोजगार का पीछा करते , दुनियादारी से दो चार होते , जिम्मेदारियों को ढोते हमारा संपर्क उन सम्मानित शिक्षको से टूट जाता है | उनसे मिले मार्गदर्शन , स्नेह , अनुशासन , ज्ञान ,ईमानदारी , परिश्रम की सीख और लगाव की असंख्य कोहिनूरी यादें किताब में दबे मोरपंख सी साथ होती है जब चाहा खोल कर उस मखमली अहसास को छू लिया । स्कूल, कालेज,कोचिंग, ट्यूसन , हॉबी क्लास , स्पोर्ट्स कोचिंग , यूनिवर्सिटी से लेकर उन समस्त व्यक्तियों को जिनसे जीवन में कुछ सीखने मिला धन्यवाद कहने साल में एक बार शिक्षक दिवस का दिन ही जरूरी नही है । हर दिन उन्हें सादर चरणस्पर्श और समंदर भर आभार | ......Madhu
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MADHU - writer at film association MUMBAI

18/07/2021

किसी ने मुझसे पूछा “कैसी है अब जिंदगी”….

मैने मुस्कुरा कर जवाब दिया… “वो खुश है ….

29/04/2021

पहली बार बहुत मजबूर महसूस कर रहा हूँ।
शायद ये मेरे जीवन का पहला अवसर हैं। जब मैं लोगों की मदद नहीं कर पा रहा हूँ।
मेरे पास जरूरत मंद लोगों के phone आ रहे हैं। सामने से कोई bed, कोई, gas तो कोई दवा मांग रहा होता है।
किसी की मदद न कर पाने से विचलित सा महसूस कर रहा हूँ। हर फ़ोन के बाद अपने आप को असहाय महसूस कर रहा हूँ। मैं क्षमा प्रार्थी हूँ कि जरूरतमंद लोगों की मदद नहीं कर पा रहा हूँ।

कर्मवीर को फर्क न पड़ता किसी जीत या हार कायह क्रम है संसार काजो भी होता है घटना-क्रम रचता स्वयं विधाता हैआज लगे जो दंड व...
17/04/2021

कर्मवीर को फर्क न पड़ता किसी जीत या हार का
यह क्रम है संसार का
जो भी होता है घटना-क्रम रचता स्वयं विधाता है
आज लगे जो दंड वही कल पुरस्कार बन जाता है
निश्चित होगा प्रबल समर्थन अपने सत्य विचार का
कर्मोंका रोना रोने से कभी न कोई जीता है
जो विष-धारण कर सकता है वह अमृत को पी जाता है
संबल और विश्वास में है अपने दृढ आधार का
त्रुटियोंसे कुछ सीख मिले तो त्रुटियाँ हो जाती वरदान
मानव सदा अपूर्ण रहा है पूर्ण रूप होते भगवान
चिंतन मंथन से पथ मिलता त्रुटियों के परिहार का
कर्मवीर को फर्क न पड़ता किसी जीत या हार का
यह क्रम है संसार का

जब इलाहाबाद तैयारी के लिए कोई छात्र/ छात्रा घर से पहली बार निकलता है तब उसके माता-पिता यही कहते है कि बेटा मेरे पास पैसा...
07/04/2021

जब इलाहाबाद तैयारी के लिए कोई छात्र/ छात्रा घर से पहली बार निकलता है तब उसके माता-पिता यही कहते है कि बेटा मेरे पास पैसा कम है मन से पढ़ना ।
इलाहाबाद में 10×10 का कमरा भी आज 3000 प्रति माह के हिसाब से मिलता है पढ़ने वाले इलाहाबाद में अपनी किताब ख़रीदने के लिए ऑटो से नही बल्कि पैदल चलते है ताकि 20 रुपया किराए का बच गया तो दो टाइम सब्जी खरीद लूंगा।
सलोरी , गोबिंदपुर , राजापुर , बघाड़ा जैसे किसी स्थान पर रहते रहते सर का आधा बाल झड़ जाता है , चेहरे की रौनक धंस जाती है माथे पर तनाव की लकीरें साफ दिखाई देने लगती है। दो टाइम के बजाय एक टाइम खाना बनता है ताकि इससे पैसा बचेगा तो कोई फार्म भर सकूँगा ।
क्योकि घर से पैसा बहुत लिमिट में मिलता है कभी कभी बाहर की मिठाई खाने का मन हुआ तो चीनी खा कर अनुभव करना पड़ता है कि हमने रसमलाई खा लिया है।
बहुत ही सँघर्ष और तप जैसी जिंदगी इलाहाबाद जैसे शहर में जीने के बाद जब कोई भर्ती आती है तब 1000 पद के लिए लाखों आवेदन आता है। पढ़ने वाले के घर से फोन आता है कि बेटा इस भर्ती में बढ़िया से पढ़ना घर वालो की उम्मीदों के बोझ ने फिर से टेंशन दे दिया फिर भी लाखों लोगों को पीछे धकेल के परीक्षा में पास हुआ घर परिवार समाज और स्वयं को लगता है कि अब इसकी नौकरी मिल गयी है कोई टेंशन की बात नही है बस ज्वैनिग तो रह गयी है दोस्तो और रिस्तेदार को पार्टी भी दे दिया फिर दो साल तक इंतजार कर रहे है कि अब ज्वैनिग होगी लेक़िन उसी बीच नया आदेश आता है कि भर्ती की परीक्षा रद्द हुआ।
क्या महसूस हुआ होगा उस पास छात्र/ छात्रा के ऊपर...
दस साल से पढ़ाई कर रहे है कोई भर्ती आती नही है एक भर्ती आ गयी पास भी हुआ अब उसको रद्द करना क्या न्यायोचित है.?
आटा गर्मी में गूथते समय पसीना इस कदर गिरता है जैसे लगता है कि शरीर से चिल्का झील का पानी निकल रहा है।
सर का बाल तख्त पर , टेबल पर , कुर्सी पर ऐसे गिरते है जैसे किसी नाई का दुकान है।
रोटियां बनाते बनाते जिंदगी रोटी जैसी हो जाती है , पढ़ाई करने वाले छात्र घर पर ही रोटी- सब्जी - चावल- दाल सब एक साथ खाने को पाता है रूम पर तो कभी एक साथ नही बनता है बनेगा भी कैसे क्योकि घर से इतना पैसा नही मिलता है।
जब गैस भराना होता है तो दोस्तो से या बगल वाले भैया से उधार लेना पड़ता है । जिस दिन रूम का किराया देना पड़ता है उस दिन लगता है कि आज किसी ने

क्या आप चाहते हैं कि आपके बच्चे के लिए पढ़ाई आसान और दिलचस्प बन जाये ?
16/03/2021

क्या आप चाहते हैं कि आपके बच्चे के लिए पढ़ाई आसान और दिलचस्प बन जाये ?

13/10/2020

नासमझ तो वो ना थे इतना..
के प्यार को हमारे समझ ना सके..

11/10/2020

जब पहले दिन तुम्हें देखा तो लगा जिंदगी रुक गयी है
जिसकी मैं तलाश में था वो आज मुझे मिल गयी है
मुझे नही पता कि तुम किसको चाहती हो
लेकिन उसके बाद हर सपने में तुम ही नजर आती हो

तुम्हारे आने के बाद तुम्हें छिप कर देखता हूं,
अगर नजरे मिल जाये तो नजरें पलट देता हूं, क्यों हो जाता है ये एक तरफा इश्क़,
जो लफ्जो से बयान नही होता
और आंखों से समझा नही जाता

काश तुम समझ जाती मेरी आंखों की बात
और हम भी कर पाते तुमसे अपनी दिल की बात

धीरे धीरे समय बीत गया मुलाकाते बढ़ी
मुलाकाते बढ़ी तो बाते बढ़ी बातो में नंबर मिल गया और मेरे दिल मे तुम्हारे लिए गुलाब खिल गया
बस ये गुलाब तुम्हें देना चाहता हु बातो बातो iloveyou कहना चाहता हु
उसके बाद कॉलेज आने का कुछ मतलब सा लगता था
और जिस दिन तुम नही आती वो बुरा ख्वाब से लगता था
नही जानता था इश्क़ की परिभाषा लेकिन
तेरे इश्क़ में पूरी किताब लिख सकते है
हम तो नही जानते है तो आप ही बता दे कि
हम आपसे इश्क़ का इज़हार कब कर सकते है

जनता था की प्यार में होता है रिश्क
लेकिन पता न क्यों मुझे हो जाता है एक तरफा इश्क़

- राहुल अग्रवाल

बेशक उसकी  कमाई इतनी होगी कि वो साड़ी जरूर ले आयेगा....लेकिन जरा सोचो, क्या वो मेरी तरह साड़ी की प्लेट लगा पायेगा!!
08/10/2020

बेशक उसकी कमाई इतनी होगी कि वो साड़ी जरूर ले आयेगा....
लेकिन जरा सोचो, क्या वो मेरी तरह साड़ी की प्लेट लगा पायेगा!!

तकलीफेंतकलीफे बहुत सी रही हैं जिंदगी में। कुछ को हँस कर काट लेते हैं कुछ को संघर्षों में। तुमको जाने देना बहुत ज्यादा तक...
27/09/2020

तकलीफें
तकलीफे बहुत सी रही हैं जिंदगी में। कुछ को हँस कर काट लेते हैं कुछ को संघर्षों में। तुमको जाने देना बहुत ज्यादा तकलीफदेह था। मगर तकलीफों को सहन करना पड़ता है। ऐसा उस दिन भी हुआ था।

काश! तुम देख पाती, समझ पाती कि अपने ही हाथों से अपनी ही कीमती चीजों को अपने हाथों से तोड़ना कितना दुःखद था। ये उसी तरह से है जैसे आसमान में आपकी पतंग अकेले उड़ रही है। और आप अपने ही हाथों से उस पतंग की डोर तोड़ दो, हवा में बह जाने के लिए।

उस दिन तुम्हारे सवाल का जवाब हमें देना था। मगर दिया कुछ और था। तुमसे मोहब्बत की सारी भावनाएं, सारे सबूत चेहरे से मिटा दी गई है। केवल और केवल खोखली मुस्कान चेहरे पर तैर रही थी। ये बहुत मुश्किल था लेकिन ये सब करने का निर्णय दृढ़ था।

उस दिन तुम जा रही थी और मैं देख रहा था, सोच तो रहा था कि तुम्हारा नाम लेकर तुम्हे पुकारूँ और बुला कर तुम्हारे हाथों पर अपना हाथ स्पर्श कर कह दूँ दिल की हर बात, लेकिन ये मुमकिन नही था उस दिन। तुम्हें जाने देना ही मेरे प्यार की जीत थी। ना तो मैं हारना चाहता था और ना मैं तुम्हें हारते हुए देखना चाहता था और ना हारने देता।

बेईमानी कभी-कभी रिश्तो को बचाने के लिए जीवन में करनी पड़ती है आप हर रिश्ते के लिए ईमानदार नहीं हो सकते कभी भी वफादार नहीं रह सकते यूं तो बेईमानी अपने खून में नहीं थी, या तो घरवालों से बेईमान होना पड़ता, या तुमसे या फिर किसी और से। लेकिन बेईमान होना तो तय था। तो ये बेईमानी मैंने खुद से कर ली। इसमें किसी का नुकसान नही हुआ, थोड़ा दिल मेरा दुखा, और शायद तुम्हारा ज्यादा दुखा।

जानती हो मैने तुम्हें केंद्रित करते हुए, काफी कहानियां, विचार, लेख, शेर-शायरी लिखी, लेकिन अपना और तुम्हारा मिलन ना लिख सका। क्योंकि तुम अब दूसरे की अमानत हो, और मैं अब वो हक खो चुका हूँ।

रिश्ते, कितनी तेजी से करवट बदलते हैं। इसका एहसास मुझे तुमसे दूर होकर महसूस हुआ। मुझे ये भी पता है कि तुम भी मुझें हर पल याद करती हो, ये मुझपर तुम्हारा यकीन कहता है। तुम सोचती हो कि मैं तुम्हारी खबर लेता हूँ। ऐसा नहीं है लेकिन तुम्हारे ही इर्दगिर्द रहने वाले ही मुझे तुम्हारी याद दिलाते रहते हैं। दिल दुखाते रहते हैं। मैं जानता हूँ तुम तो शायद उस जगह से काफी दूर निकल चुकी हो, लेकिन अब भी मेरे लिए वक्त वहीं ठहरा हुआ है। जिंदगी में वो सब कुछ बदल गया, वो जोश,

20/08/2020

साथ छोड़ने बाले भी बड़े अजीव होते है, जरा सी भीड़ मिली तुरन्त हाथ छोड़ देते हैं ।😉😊

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