02/11/2021
धनतेरस की हार्दिक मुबारक हो।
धनतेरस का आध्यात्मिक रहस्य
ऐतिहासिक कथा कहानियों में धनवंतरी के विषय में जो भी कुछ वर्णन है, हम उसका यहां वर्णन नहीं कर रहे हैं। आयुर्वेद के प्रवर्तक धनवंतरी के बारे में जिस विशेष विषय को हम यहां स्पर्श करना चाह रहे हैं वह है कि शारीरिक और मानसिक ऊर्जाओं को संतुलित करने में धनवंतरी का क्या योगदान रहा। धनवंतरी किस विषय के ज्ञान और उसके उपयोग से मनुष्य के जीवन को सकारात्मक रूप से बदलने व सुखद बनाने के महापुण्य के कार्य करने के निमित्त बने।
उपलब्ध संज्ञान के अनुसार हमारे ऐतिहासिक ऋषियों में से धनवंतरी भी एक श्रेष्ठतम ऋषिवर से कम नहीं थे। उनमें अतिन्तद्रिय क्षमता जन्मजात ही थी। क्योंकि मनुष्य के मन और शरीर के अन्दर जाकर देखने की क्षमता एक दिव्य पुरुष में ही हो सकती है। वनस्पति के मन को मनुष्य के मन की समानता या असमानता से जोड़कर देख समझ लेना, यह सामर्थ्य एक योगी के अन्दर ही हो सकती है। वनस्पति जगत और पदार्थ जगत की सटीक गुणवत्ता को अतीन्द्रिय क्षमता से देखने व समझने की योग्यता जिसमें है वह आत्मा एक श्रेष्ठ योगी से कम नहीं हो सकती।
मनुष्य का जीवन ऊर्जाओं का एक संयोजन है। वस्तुतः ऊर्जा तो एक ही है। लेकिन एक ही ऊर्जा कई प्रकार के रूप लिए हुए है। इसलिए ही यह कहा जाता है कि मनुष्य का जीवन कई प्रकार की ऊर्जाओं का संयोजन है। उन ऊर्जाओं के प्रकारों को मुख्यतः तीन में विभक्त किया जा सकता है। भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक। मनुष्य के जीवन में ये तीनों प्रकार की ऊर्जाएं इकट्ठे काम करती हैं।
जब भी मानसिक और शारीरिक ऊर्जाओं में किसी भी कारण से असंतुलन पैदा हो जाता है (निमित्त कारण काल देश परिस्थिति से संबंधित अनेक हो सकते हैं), या यूं कहें कि ये जब भी ये नकारात्मक रूप ले लेती हैं तब ही जीवन अस्त व्यस्त हुआ अनुभव होता है। अस्त व्यस्त हुआ होने का भावार्थ है कि जीवन में सुखद अहसास नहीं रहता। चूंकि मनुष्य चिंतनशील प्राणी है, इसलिए उसकी अपनी परिस्थिति या शारीरिक या मानसिक स्थिति का कारण जानने और उसका उपाय खोज निकालने की जिज्ञासा बनी ही रहती है। समयांतर में मनुष्य की चेतना की स्थिति पदार्थगात बन गई थी और प्रकृति की स्थिति भी नकारात्मक रूप में लेती जा रही थी। इसलिए इन दोनों ऊर्जाओं के असंतुलित या नकारात्मक होने की परिस्थिति किसी एक व्यक्ति के जीवन में पैदा नहीं हुई, बल्कि ऊर्जाओं के असंतुलन से अधिकांश मानवजाति प्रभावित हुई। तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार यह समझा जा सकता है कि ज्यादातर लोग घायल भी अवश्य हुए होंगे। शारीरिक वेदनाओं के कष्ट से कराह भी रहे होंगे। मानसिक विकार तो पैदा हो ही गए थे। इसके इलावा नकारात्मक मनोवेगों के प्रभाव से शरीर के स्वास्थ्य में भी अनेक विसंगतियां आ गई थीं। इसलिए उस समय प्रायः सभी का शारीरिक स्वास्थ्य असंतुलित हो चुका था। पूरी सृष्टि पर अनेक रोग पैदा होने लगे थे। प्रायः सभी की दुख दर्द की स्थिति अपनी चरम सीमा पर थी। ऐसी स्थिति में मनुष्यों के चिंतन में और अनेक विषयों के होने के साथ साथ शारीरिक स्वास्थ्य का विषय भी सर्वोपरि था। ऐसा लगता है कि शारीरिक स्वास्थ्य ही पहली आवश्यकता थी। उस समय सीधे सीधे आध्यात्मिक ज्ञान या योग की शिक्षा देना समयोचित ना था।
आवश्यकता अविष्कार की जननी है। तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार सभी की यह आंतरिक पुकार उठना स्वाभाविक था कि हमारे शारीरिक दुख दर्द का कोई उपाय होना चाहिए। ऐसी आवश्यकता के समय पर धनवंतरी आयुर्वैदिक अविष्कारक के रूप में पैदा हुए। हालांकि उन्हें जड़ियों बूटियों को खोज निकालने में समय तो अवश्य लगा ही होगा। लेकिन वे ठीक समय पर जब सामान्य मनुष्य की यह पुकार थी, उसी समय उनका अस्तित्व में आना हुआ। ऐसा माना जाता है कि जब जिस समय पर जिस परमार्थ के कार्य की अति अनिवार्यता होती है उस समय यदि वह कार्य कर दिया जाए तो उसे महापुण्य होता है। यह बात बिल्कुल सटीक है। समय निकल जाने के बाद यदि कोई परमार्थ या उपयोगी अनिवार्य कार्य किया जाए तो उसका कोई भी मूल्य नहीं रह जाता। इसी संदर्भ में यह कहा जाता है कि "का वर्षा जब कृषि सुखानी" अर्थात फसल के सूख जाने के बाद वर्षा होने से फसल के लिए कोई भी लाभ नहीं मिलता। जिस कार्य का जो समय होता है वह कार्य उसी समय शोभता है अर्थात उसी समय करना उचित होता है। समय निकल जाने के बाद उस कार्य को करने का कोई लाभ नहीं होता है। धनवंतरी जी ऐसी अति जरूरत के समय ही धरती पर पदार्पण हुआ। कालांतर में दिवोदास, शुश्रुत, चरक आदि ने उनके आयुर्विज्ञान (स्वास्थ्य विज्ञान की विद्या) का और भी ज्यादा विकास किया और इसे भावी पीढ़ियों तक कायम रखने का कार्य विशेष किया।
यह जो पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि सृष्टि पर भारी संकट था और इसी कारण देवताओं और असुरों का सागर मंथन हुआ और उस सागर मंथन से 24 रत्न निकले। उनमें से धनवंतरी जी 12वें थे और अमृत कलश लेकर समुंद्र से बाहर प्रकट हुए। धनवंतरी को भी विष्णु का अवतार कहा गया है। इसका यही आध्यात्मिक रहस्य है कि जब सृष्टि की स्थिति चरमराकर ठहर सी जाती है तब उसे सक्रियता देने में जो भी आत्मा विशेष रोल प्ले करने के निमित्त बनती है उसे ही विष्णु का अवतार माना गया है। संकट अर्थात किसी परिस्थिति विशेष में जरूरत का समय आता है और उपाय का होना अपरिहार्य हो जाता है। तो ऐसी आवश्यकता के समय पर अविष्कार होने अर्थात उपाय के पैदा होने का संयोग बनता है। इस संयोग के बनने में संपूर्ण प्रकृति भी सहयोग करती है। पौराणिक वैदिक कथाओं में दिखाया गया है कि जब वह संयोग बना तो देवताओं और असुरों ने मिलकर सागर मंथन किया। वास्तव में मनुष्य के मन बुद्धि में ही दैवी और आसुरी वृत्तियां निहित हैं। जब इन दोनों वृतियों में मंथन होता तो जो दैवी वृत्तियां हैं वे विजयी होती हैं और उनसे ही विष और अमृत दोनों निकलते हैं। विष अर्थात नेगेटिव विनाशकारक दुखकारी भाव और विचार। अमृत अर्थात सकारात्मक और सृजनात्मक उपयोगी सुखकारी भाव और विचार। सागर मंथन का अर्थ है मनुष्य के अन्दर ही वृतियों का परस्पर धरातलीय स्तर पर विचार सागर मंथन होना। विचार सागर मंथन के परिणामस्वरूप धनवंतरी का प्रगट होना और हाथ में अमृत (ज्ञान) कलश लिए हुए प्रकट होना इस बात का द्योतक है कि उस समय जैसे ज्ञान की आवश्यकता थी उस आवश्यकता के अनुसार ज्ञान के माध्यम (धनवंतरी) का प्रगट होना।
हिन्दू धर्म में महर्षि धनवंतरी के जन्म दिन को खूब चाव से मानते हैं। जिस दिन उनका जन्म दिन मानते हैं उस दिन को धनतेरस कहते हैं। इसके बाद लगातार चार पर्वों का वर्णन है। हिन्दू धर्म में ये त्यौहार बहुत ही उमंग उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। पहला - धनतेरस, दूसरा - दिवाली, तीसरा - गोवर्धन पूजा, चौथा - भैया दूज। यह चारों का जो क्रम है यह मात्र एक संयोग है या इसके पीछे कोई श्रृंखलाबद्ध प्रयोजन है। यह विचारणीय है। बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ऐसा लगता है कि मनुष्य के जीवन की इन चारों स्थितियों में एक गहरी तारतम्यता है।
शुरुवात हमने धनतेरस के पर्व से की है। धनतेरस का सीधा सा भावार्थ है शारीरिक स्वास्थ्य। शारीरिक स्वास्थ्य भी एक प्रकार का धन है। स्थूल शरीर हमारे पास एक किस्म का यंत्र है। मन बुद्धि भी हमारे पास दूसरे किस्म के यंत्र हैं। इसलिए स्थूल शरीर का संबंध मन और बुद्धि से भी अनिवार्य रूप से है। यदि स्थूल शरीर स्वस्थ है तो कई प्रकार के शारीरिक और बौद्धिक कार्य बखूबी किए जा सकते हैं। जब स्थूल कार्य बखूबी होते हैं तो कार्य की संपन्नता से स्थूल धन स्वत: ही प्राप्त होता है। इसलिए हेल्थ इज वेल्थ कहा गया है। वर्तमान समय हर मनुष्य की स्थिति ऐसी है कि उनके ये दोनों यंत्र आपस में संयुक्त हैं। सभी मनुष्यों को स्थूल शरीर की ही स्मृति रहती है जिसे देहाभिमान कहा गया है। जहां मनुष्य खड़ा है अर्थात जिस पायदान पर मनुष्य की चेतना सर्वाधिक रूप से कार्य कर रही है उसी पायदान को संतुलित और सकारात्मक समृद्ध करने से शुरू करना पड़ेगा। यदि स्थूल भौतिक देह पूरी तरह संतुलित ऊर्जा की आभा से युक्त हो जाता है। तब यह पूरी संभावना बनती है कि मानसिक यंत्र (मन) भी सकारात्मक समत्व गुण वाला प्रेमपूर्ण होगा ही।
धनतेरस के बाद हमने दिवाली के त्यौहार को मनाया है। जब शरीर पूरी तरह से खिल जाता है अर्थात स्वस्थ होता है। जब शरीर कमलवत अपनी पूरी पवित्रतम स्थिति में आ जाता है। जब मन का सुमन भी पूरी तरह से खिलता है। जब मन का कोना कोना शुभ भाव प्रेम भाव से तरबतर हो जाता है। उसके बाद ही आत्मा का दिया जल उठता है, उससे पहले नहीं। इसका अर्थ यह हुआ कि शरीर और मन की पवित्र स्थिति (स्वस्थ स्थिति) के बाद ही आत्मा तक पहुंचा जा सकता है। अर्थात तब ही आत्मा का दिया जल सकता है। जब पूरा का पूरा व्यक्तित्व दिव्य व्यक्तित्व के रूप में प्रकट होता है तब ही मानो कि आत्मा ने मनोविकारों पर विजय पाई। तब ही सच्चे मायने में स्वत: दीपावली मनाई जा सकती है। उस स्थिति में दीपावली मानने की बात कहना भी उचित नहीं। कहना चाहिए कि उस स्थिति में ही पूरा जीवन ही दीप के समान दिव्यता की आभा फैलाने वाला हो जाता है।
तीसरा हमने मनाया है गोवर्धन पूजा अर्थात कलयुग के दुखों के पर्वत रूपी गोवर्धन पर्वत की पूजा। इसका आध्यात्मिक गणित भी बिलकुल सटीक बैठता है। जब हमारे जीवन में शरीर, मन और आत्मा तीनों की ऊर्जा परिपूर्ण होगी अर्थात अपने पवित्र स्वरूप में होगी तब ही कलयुग में पैदा हुए दुखों से मुक्ति मिलना संभव है, उससे पहले नहीं। अर्थात तब ही सर्व आत्माओं में सहयोग की भावना जागती है। उससे पहले तो प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को बनाने संवारने और दुखद स्थितियों से निपटने में ही व्यस्त रहता है। बल्कि कटु सच्चाई तो यह है कि तीनों प्रकार की ऊर्जाओं के असंतुलन की स्थिति में व्यक्ति स्वयं को भी सहयोग करने में ही अक्षम रहता है। जब सब तीनों प्रकार से स्वस्थ होते हैं तब ही कलयुग के दुखों के पर्वत को उठाया जा सकता है अर्थात तब ही विश्व परिवर्तन करने में सब सहयोगी बनते हैं। तब आमूल रूपांतरण संभव होता है। उससे पहले नहीं।
चौथा त्यौहार हमने मनाया है भैया दूज का। भैया दूज का सरल सा भावार्थ है भाई चारा या भ्रातत्व भाव। भ्रातत्व भाव का हार्दिक भाव पैदा होना और यह भ्रातत्व भाव जीवन में उत्सव की तरह उतर जाए। यह तभी संभव होता है जब उपरोक्त तीनों स्थितियों में हम उत्तीर्ण होते हैं। उससे पहले सम्पूर्ण हार्दिक भ्रातत्व भाव सम्भव नहीं हो सकता। इन चारों त्यौहारों में क्रमबद्ध पारस्परिक संबंध है। इसलिए धनवंतरी के आयुर्विज्ञान को समझते हुए प्रत्येक का स्वयं के प्रति यह कर्तव्य बनता है कि वह अपने सर्वांगीण स्वास्थ्य की ओर पूरा ध्यान दे। शुरुवात शारीरिक ऊर्जा के संतुलन करने से करे। उसके बाद मानसिक ऊर्जा को दिव्य बनाएं। उसके बाद आध्यात्मिक ऊर्जा को उन्मुक्त उर्ध्वगामी बनाए। धन्यवाद।