Sir Chhotu Ram Volunteer Corps

Sir Chhotu Ram Volunteer Corps Sir Chhotu Ram Volunteer Corps is a dedicated organisation to spread awareness among agrarian and pe

28/10/2025

जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में पढ़ा कि चौधरी छोटूराम जी की सलाह पर चौधरी लालचन्द ने निम्नलिखित तीन प्रस्ताव कौंसिल में रखे-
1. देहाती तथा शहरी इलाके अलग-अलग हों।
2.जनसंख्या और करों की वसूली की दृष्टि से 90 प्रतिशत सीटें देहात को और 10 प्रतिशत शहरों को दी जाएं।
3. देहाती हलकों से देहाती उम्मीदवार ही खड़े हो सकें।
ये तीनों प्रस्ताव स्वीकृत हो गये।
इस पर चौधरी छोटूराम ने प्रेस विज्ञप्ति दी, जोकि 12 March 1920 को The Tribune में छापी गई, जिसका शीर्षक था –
SUPPORTS THE REFORM ACT OF 1919 REGARDING THE COMPOSITION OF THE PUNJAB LEGISLATIVE COUNCIL

मांटेग्यू कमीशन से भेंटयुद्ध के पश्चात् की परिस्थिति में भारत में क्या राजनैतिक सुधार किये जायें, इस सम्बन्ध में तत्काली...
28/10/2025

मांटेग्यू कमीशन से भेंट

युद्ध के पश्चात् की परिस्थिति में भारत में क्या राजनैतिक सुधार किये जायें, इस सम्बन्ध में तत्कालीन भारतमन्त्री सर मांटेग्यू की अध्यक्षता में एक कमीशन भारत आया। इस कमीशन के सामने पंजाब जमींदार एसोसियेशन की तरफ से चौ० छोटूराम जी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मण्डल उपस्थित हुआ जिसमें कई बड़े सिख नेता भी सम्मिलित थे। परन्तु सिख फौजी अफसरों में से केवल कप्तान जीमजासिंह रईस, ठोठर जिला लाहौर वाले उनके साथ थे, बाकी सब सिख फौजी अफसर सरदार सुन्दरसिंह वाले प्रतिनिधि मण्डल में थे। सरदार सुन्दरसिंह का कहना था कि सिखों को जाट-गैर-जाट का भेदभाव छोड़कर एक जगह रहना चाहिए। इसलिए उन्होंने अपने साथी सिख फौजी अफसरों को कप्तान जीमजासिंह के पास इस आशय से भेजा कि उन्हें समझा-बुझाकर जाटों के प्रतिनिधि मण्डल से फोड़ लें। परन्तु जब उन लोगों ने चौधरी साहिब से बातें कीं और उन्होंने समझाया तो केवल एक को छोड़कर बाकी सब सिख फौजी अफसर उनके साथ हो गये। मांटेग्यू तहकीकात के सिलसिले में प्रत्येक प्रान्त से सम्मति ली गई थी और यह प्रश्न पंजाब कौंसिल के सामने भी आया। चौधरी छोटूराम जी की सलाह पर चौधरी लालचन्द ने निम्नलिखित तीन प्रस्ताव कौंसिल में रखे-
१. देहाती तथा शहरी इलाके अलग-अलग हों।
२. जनसंख्या और करों की वसूली की दृष्टि से ९० प्रतिशत सीटें देहात को और १० प्रतिशत शहरों को दी जाएं।
३. देहाती हलकों से देहाती उम्मीदवार ही खड़े हो सकें।
ये तीनों प्रस्ताव स्वीकृत हो गये। देहाती अधिकारों की यह शहरी क्षेत्रों पर पहली विजय थी और इसी से चौधरी छोटूराम के भावी राजनैतिक कार्यक्रम की रूपरेखा की एक झलक स्पष्ट रूप से सामने आ गई थी। इस कमीशन की रिपोर्ट के पश्चात् जो सुधार किये गये वे मांटेग्यू- चेम्सफोर्ड योजना के नाम से भारतीय राजनैतिक इतिहास में प्रसिद्ध हैं।

(चौधरी छोटूराम जीवन–चरित, पृष्ठ ९७; लेखक –रघुबीर सिंह शास्त्री)

09/01/2025

”कौन्सिल की सदस्यता की उम्मीदवारी"
(चौ० छोटूराम, जाट गजट, 30 जून 1920, पृ. 3)

जो लोग अखबार पढ़ते हैं, उनको अच्छी तरह से मालूम है कि आजकल कौन्सिल की सदस्यता के उम्मीदवार इधर-उधर अपनी उम्मीदवारी का प्रचार कर रहे हैं और मतदाताओं के मत हासिल करने के लिए दौड़-धूप कर रहे हैं। कहीं अखबारों में छापा जा रहा है। कहीं अपनी पॉलिसी और प्रोग्राम को दिखाया जा रहा है। कहीं दोस्तों और रिश्तेदारों से गुहार लगवाई जा रही है और कहीं कागजी चीड़े दौड़ रहे हैं। सदस्यों का चुनाव नवम्बर महीने में होगा मगर प्रत्याशी पांच-छः महीने पहले ही से वोटरों मतदाताओं के गले की घण्टी बन गए हैं। बहुत से आदमी तो जिनको मत देने का अधिकार प्राप्त है सोचते होंगे कि बेकार में ही यह अधिकार प्राप्त हुआ।

जान जोखिम में आ गई है। हम इस परेशानी में फंसे हुए लोगों के लिए समाधान पेश करते हैं। जो कम से कम कुछ दिनों के लिए और किसी हद तक उनकी परेशानी में कुछ कमी जरूर पैदा कर देगा। वह समाधान यह है कि वह वोट मांगने वालों से यह कह दें कि जब तक तमाम प्रत्याशी खड़े न हो जाए और उम्मीदवारी के लिए अर्जी देने की आखिरी तारीख न निकल जाए वह किसी को वोट देने का वादा नहीं करेंगे। यह बात नियमों के अनुसार भी सही है, क्योंकि संभव है कि यह उस समय वादा कर ले और बाद में कोई और प्रत्याशी खड़ा हो जाए जो पहले तमाम प्रत्याशियों से अच्छा हो और वोट का सबसे अधिक जरूरतमन्द हो ऐसी हालत में उनको तकलीफ होगी। इसलिए सबसे अच्छा उपाय यह है कि वह अन्तिम तारीख के समाप्त हो जाने और पूरी तरह से प्रत्याशियों के नामों का एलान हो जाने तक किसी को अपना वोट देने का वादा न करें।

मगर हम साथ ही यह भी जानते हैं कि इस नुस्खे का प्रयोग करना हर किसी के लिए आसान काम नहीं है। इसलिए हम कुछ नियम और अच्छी बातें बताना चाहते हैं जिन पर मतदाताओं को अपना मत देने का वादा करने से पहले सोच लेना चाहिए।

अच्छे और काबिल लोगों का हो चुनाव

(1) वर्तमान नियमों की सहायता से कौन्सिल के सदस्यों का चुनाव केवल दस साल तक होगा। दस साल के बाद एक रॉयल कमिशन बनेगी, जो कौन्सिलों का दस साल का कार्यभार देखकर आगे के लिए अनुरोध करेगा। अगर आगे दस साल में सावयलों का कार्यभार अच्छा रहा तो अधिक राजनीतिक अधिकार दिए जाएंगे कौन्जितार कार्यभार अच्छा नहीं रहा तो वर्तमान अधिकारों में भी कमी कर दी जाएगी और अगर कार्यभार ठीक ठाक रहे तो यह अधिकार न घटेंगे न बढ़ेंगे मतलब यह कि हिन्दुस्तान की आगे की प्रगति इन कौन्सिलों की कारगुजारी पर टिकी हुई होगी। इसलिए हमारा दायित्व है कि हम इन कौन्सिलों में अच्छे और काबिल सदस्य चुनकर भेजें।

(2) इन कौन्सिलों का काम नए कानून बनाना और पुराने कानून को समाप्त करना या उनमें बदलाव करना होगा। इसलिए सदस्य ऐसे होने चाहिए जो कानून की हालत को समझने के लिए काफी पढ़े-लिखे हों।

(3) इन कौन्सिलों को बजट पर चर्चा करनी होगी। उसकी तैयारी के लिए अच्छे सुझाव रखने होंगे। राज्यों की कमाई और खर्च पर निगाह रखनी होगी। वर्तमान साधनों के अच्छा उपयोग करने के सुझाव समझाने पड़ेंगे और कमाई के ऐसे साधन ढूंढने पड़ेंगे, जिनसे जनता को कम परेशानी हो और उनसे अधिक से अधिक कमाई प्राप्त हो। इसलिए सदस्य ऐसे होने चाहिए जो इन मुख्य जिम्मेदारियों को निभाने की योग्यता रखते हों।

प्रत्याशियों में जिम्मेदारी पूरी करने की योग्यता हो

(4) वर्तमान प्रबन्धन के नियमों में जरूरी फेर बदल और वर्तमान पॉलिसी का रुख बदलने के लिए सबसे आसान और साथ ही सबसे कारगर सुझावों को सोचना और उनको पास कराना ही सदस्यों की जिम्मेदारियों में से होगी। इसलिए प्रत्याशियों के अन्दर इन जिम्मेदारियों को पूरा करने की योग्यता भी होनी चाहिए।

(5) कौन्सिल के अन्दर जहां देश की आम प्रगति और देश का आम कानून से काम होगा, वहां राय के अलग होने की हालत में गैर सरकारी हिन्दुस्तानी सदस्यों को प्रशिक्षित और पढ़े लिखे और खासतौर पर योग्य सरकारी सदस्यों से मुकाबला पड़ेगा और उनकी बातों और दलीलों का उत्तर देने के लिए गैर सरकारी सदस्य जहां तक हो सके, ज्यादा योग्यता वाले चुने जाने चाहिए।

(6) देश की आम प्रगति और आम राजनीतिक अधिकारों के समस्याओं के अतिरिक्त कभी-कभार कौन्सिल के अन्दर ऐसे प्रश्न भी पेश होंगे, जिनमें अलग क्षेत्रों और अलग समूहों की जनसंख्या के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों का आपसी बंटवारों पर चर्चा होगी जैसे बजट की तैयारी के समय यह प्रश्न हो सकता है कि रावलपिण्डी के जिलों के लिए सड़क बनाने हेतु कितने रुपये दिए जाए और अम्बाला के जिलों को कितना शिक्षा के बढ़ावे के लिए कमेटियों के हवाले कितना रुपया किया जाए और जिला के बोडों के हवाले कितना रुपया दिया जाए। शहरों पर स्वास्थ्य की देखरेख के लिए कितना पैसा खर्च किया जाए और देहातों पर कितना। शहरों में हाईस्कूल खोलने पर ज्यादा रुपया खर्च किया जाए या देहातों में प्राइमरी स्कूल खोलने पर, शहरों में केन्द्रीय स्वास्थ्य केन्द्र ज्यादा खोले जाए या देहातों में गश्ती अस्पताल ज्यादा जारी किए जाए, खेतीबाड़ी से सम्बन्धित स्कूल ज्यादा खोले जाए या कारीगरी से सम्बन्धित स्कूल ज्यादा खोले जाए। भूमि हस्तांतरण कानून को बाकी रखा जाए या समाप्त किया जाए, सूदखोरी के कानून को कठिन बनाया जाए या जो वर्तमान कानून है उसे ही समाप्त कर दिया जाए। कमाई के नए साधन के लिए टैक्स बढ़ाया जाए या कोर्ट फीस बढ़ाई जाए। जमीन के मामलों की फीस को बढ़ाया जाए या सिंचाई की दर को बढ़ाया जाए आदि, ऐसे प्रश्न पैदा होने पर आपकी बात रखने के लिए बहुत ही योग्य आदमियों की आवश्यकता है और हर एक क्षेत्र के मतदाताओं को ऐसा सदस्य चुनना चाहिए, जो उस क्षेत्र की जनसंख्या के अधिकारों को अच्छी तरह से बचाव करने की और उसके ऊपर कोई नाजायज बोझ न पड़ने दें।

कौंसिल सदस्यों में हो बलिदान और आजादी के गुण

(7) कौन्सिल के सदस्य ऐसे होने चाहिए, जिनके अन्दर बलिदान और आजादी का गुण हो ताकि वह बेबाकी के साथ विना स्वार्थ के लोगों की सेवा कर सके। जो लोग निजी लाभ या नियम, मर्यादा के लिए कौन्सिल का सदस्य बनना चाहते है। उनको वोट बिलकुल नहीं देना चाहिए। जो सदस्यता को मर्यादा और लाभ का कारण समझकर आपका वोट लेना चाहते हो या देश और कौम की सेवा के लिए जरूरी योग्यता या रुचि न रखते हो। उनको आपकी तरफ से उत्तर साफ मिलना चाहिए।

(8) जिन लोगों ने आज तक कोई सामाजिक सेवा नहीं किया उनको कोई अधिकार नहीं है कि वह चुनाव के अवसर पर आपसे आपका वोट मांगे।

(9) हर एक प्रत्याशी से यह प्रश्न होना चाहिए कि उसने आज तक कौन से जन आन्दोलनों में भाग लिया और किस पब्लिक सोसायटी के साथ मिलकर काम किया है। किसी पब्लिक संस्थान के सदस्य या जिम्मेदार के पद पर रहकर कोई काम आजतक किया। किसी राजनीतिक या सामाजिक या शैक्षणिक सभा के साथ उसका सम्बन्ध है और उसने कोई अमली काम समाज या समुदाय के लिए किया।

(10) जिस क्षेत्र से कोई प्रत्याशी खड़ा होना चाहता है उससे यह भी पूछना चाहिए कि उसने इस क्षेत्र की जनसंख्या के लिए आज तक कोई काम किया है।

प्रश्न संख्या 9,10 सबसे अन्तिम में है, लेकिन यह उस बात की कसौटी है कि क्र काई प्रत्याशी केवल अपने निजी लाभ और निजी मर्यादा के चक्कर में खड़ा हुत्रा

है या देश की सेवा का ध्यान भी उसकी उम्मीदवारी के रोल है। इन प्रश्नों के पूछने पर तुरन्त पता चल जाएगा कि उम्मीदवार को पहले भी जन आन्दोलनों के साथ लगाव था या सेवा भाव की धार उसके दिल में फूटा है अगर नया है ती समझ लेना चाहिए कि बनावटी है।

जमींदार और देहातियों को सोच-समझकर वोट देने की अपील

चूंकि हमारा सम्बन्ध अधिकतर जमींदार पेशा कौम और देहाती आबादी के साथ है इसलिए हम पाठकों से यह भी कहना चाहते हैं कि अगर कोई ऐसा प्रत्याशी उनके वोटों को चाहने वाला हो जिसने अखबारों में या पिछली कौन्सिल में जमींदार पेशा कौम या देहाती आबादी के अधिकारों का विरोध किया है जो उनको अपना वोट बिलकुल नहीं देना चाहिए हमने अखबारों में देखा है कि कुछ ऐसे लोग भी देहाती क्षेत्र में खड़े हो गए हैं, जिन्होंने वोट देने के गुणों को तय करते समय और सीटों के बंटवारे के समय देहाती आबादी के अधिकारों का विरोध किया और शहरी आबादी के अधिकारों का समर्थन किया। ऐसे लोगों को देहाती क्षेत्रों के वोट का कोई अखलाकी अधिकार बाकी नहीं रहा है। हां अगर कोई आदमी गैर जमींदार पेशा होने के बावजूद शहरी आबादी के साथ रिश्ते को अपने दयालुपन के कारण जमींदार पेशा कौम और देहाती आबादी के साध वास्तविक प्रेम कहता हो। उसको अपना वोट देने में कोई शंका नहीं करना चाहिए। इस शर्त के साथ कि उसके मुकाबले में कोई योग्य जमींदार खड़ा न हो। इसी तरह से अगर कोई जमींदार प्रत्याशी गैर जमींदार पेशा कौमों का वोट चाहने वाला हो और उसका दिल ईर्ष्या से पाक हो तो गैर जमींदार पेशा लोगों को उसकी सहायता करना आवश्यक है। इस शर्त के साथ कि वह काफी योग्य हो और देशी योग्यता का गैर जमींदार खड़ा हुआ न हो। बहरहाल जमींदारों को हर एक प्रत्याशी से यह अवश्य पूछ लेना चाहिए कि लैण्ड ट्रांसफर एक्ट के बारे में उनका क्या ख्याल है और अगर जमीन के मामले या सिंचाई के दर में वृद्धि का प्रश्न आया तो उसका क्या बर्ताव होगा।

31/12/2024

मुजफ्फरनगर जाट हाई स्कूल में चौ० छोटूराम का भाषण
(जाट गजट, 29 जनवरी 1941, पृष्ठ 6)
... हमको अपने आदमी की चाहे वह चून का ही क्यों न हो बात माननी चाहिए। यू.पी. में जाट कांग्रेस में रहकर दूसरों की लीडरी में चले गए तथा दूसरों के पीछे लगे। क्या यहां कोई जाट इस योग्य नहीं था जो कि जाटों की लीडरी कर सके? यू.पी. की हालात पर मुझे अफसोस होता है कि यू.पी. बारह लाख जाटों की आबादी, बारह लाख गुजरों की 38 लाख राजपूतों की और 42 लाख अहीरों की आबादी, इस प्रकार एक करोड़ चार लाख की आबादी में इन कौमों में से न एक वजीर, न एक सेक्रेटरी, न कोई जिम्मेदार पद पर और फिर भी इसको स्वराज कहा जाये, मैं ऐसे स्वराज की ओर मुंह करके सोने के लिए भी तैयार नहीं।

31/12/2024

मुजफ्फरनगर जाट हाई स्कूल में चौ० छोटूराम का भाषण
(जाट गजट, 29 जनवरी 1941, पृष्ठ 6)
... मैं आर्य समाजी हूं। समाज में मैंने भी एक बात देखी कि उसके कार्यकर्ताओं ने जाटों की लीडरी उनके हाथ में नहीं दी। उनकी चोटी अपने हाथ में रखी। हम अपने हाथ में अपनी लीडरी चाहते हैं। चाहे अपना खद्दर खुरदाद है तो भी हमें जापान के रेशम से अच्छा है। हमने कह दिया कि चाहे अपना लीडर विद्वान भी कम हो लेकिन जाटों की अगुवाई की डोर हम अपने हाथों में चाहते हैं। अगर हम पंजाब में इस पर अमल न करते तो 90 लाख 92 हजार जाटों की आबादी में उनकी शान को किस तरह से बढ़ाते। यही उनकी शान बढ़ाने का सबसे बड़ा कारण है कि हमने अपनी लीडरी की बागडोर दूसरों के हाथ में नहीं दी। जब हमारे पुराोहित और पढ़ाने वाले हमारे अपने होंगे उस समय हमारी उन्नति होगी, यही हमारी उन्नति का असली रहस्य है।

30/12/2024

मुजफ्फरनगर जाट हाई स्कूल में चौ० छोटूराम का भाषण
(जाट गजट, 29 जनवरी 1941, पृष्ठ 6)
... कांग्रेस का दावा केवल कागज पर है और हमारी पार्टी ने उस पर पंजाब में अमल करके दिखाया है। आप रावलपिंडी से मुजफ्फरगढ़ और गुड़गांव तक, जाकर देहात में पता करें तो आपको इसकी वास्तविकता मालूम हो जाएगी कि हम इस प्रोग्राम को सफल बनाने के लिए कहां तक क्या कर रहें हैं? हमारे यहां जमींदार और किसान के बीच अंतर नहीं है। आपके यहां अंतर है, हमारे यहां एक बिसवां का भी जमींदार है और बीघे का मालिक भी जमींदार है। आप हमारे यहां किसी भी जमींदार कौम के व्यक्ति से मालूम करेंगे तो वह अपने आपको जमींदार कहेगा, और अगर किसी के यहां ब्याज में भी जमीन आ गई है और वह जमींदार कौम से नहीं है तो वह अपने आपको गैर जमींदार कहेगा चाहे उसके पास जमीन लिखत में भी हो। पंजाब में दो करोड़ 35 लाख की आबादी में चालीस लाख लोग जमीन के मालिक हैं, जबकि यू.पी में साढ़े चार करोड़ की आबादी में बारह लाख लोग जमीन के मालिक हैं। पंजाब में जमींदार कौम वाले को जमींदार कहेंगे। हमारे जमींदार शब्द कौमों के लिहाज से प्रयोग होता है, इसलिए मैं यहां जमींदार शब्द का प्रयोग करूं तो आप वही अर्थ निकालें जो मैने बताए हैं।

30/12/2024

”राजपूत गजट और इत्तेहाद पार्टी”, लेख से ...
(चौ० छोटूराम, जाट गजट, 22 जुलाई 1936, पृ. 6)
... अब नया कानून लागू होने वाला है और प्रश्न उठता है कि जमींदार आजाद होना चाहते हैं या गुलाम ही रहना चाहते हैं। सत्ताधारी बनना चाहते हैं या यह चाहते हैं कि उन पर शासन किया जाए।
अगर जमींदार राज चाहते हैं तो उन्हें इत्तेहाद पार्टी के झंडे के नीचे जमा होना चाहिए। अगर वह राजनीतिक और आर्थिक गुलामी चाहते हैं तो उसका सबसे आसान तरीका हिंदू महासभा पार्टी में सम्मिलित होना है। अगर जमींदार हुकूमत चाहते हैं तो उनको इत्तेहाद पार्टी की फौज में सम्मिलित हो जाना चाहिए और अगर वह यह चाहते हैं कि उन पर हुकूमत की जाए तो उन्हें राजा नरेंद्रनाथ और मास्टर तारा सिंह की कमान में चला जाना चाहिए।
जमींदारों की आजादी की लड़ाई जल्द ही आरंभ होने वाली है। राजपूत गजट इस लड़ाई में काफी सहायता दे सकता है।

पंजाब में दलितों को जमीन एलॉट की गई, जिस पर असेंबली में चौधरी छोटूराम की स्पीच। राजस्व मंत्री (माननीय चौधरी सर छोटू राम)...
18/10/2024

पंजाब में दलितों को जमीन एलॉट की गई, जिस पर असेंबली में चौधरी छोटूराम की स्पीच।

राजस्व मंत्री (माननीय चौधरी सर छोटू राम) (उर्दू): महोदय, मैं एक संक्षिप्त भाषण देना चाहता हूँ जिसमें मैं कुछ माननीय सदस्यों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर विचार करना चाहता हूँ। सबसे पहले मैं अपने द्वारा की गई टिप्पणियों पर विचार करूँगा।

माननीय मित्र सरदार गोपाल सिंह खालसा ने कहा कि स्वर्गीय सर सिकंदर हयात खान की मृत्यु के बाद अनुसूचित जातियों के लाभ के लिए कुछ भी ठोस नहीं किया गया। मैं स्वर्गीय सर सिकंदर हयात खान के शासनकाल के दौरान और उसके बाद पंजाब सरकार ने इन लोगों के लिए क्या किया है, इसका विस्तृत विवरण देने का प्रस्ताव नहीं रखता। मुझे खुशी है कि मेरे माननीय मित्र ने स्वीकार किया कि स्वर्गीय सर सिकंदर के शासनकाल के दौरान अनुसूचित जातियों के लिए कुछ ठोस किया गया था। यदि उनका ध्यान एक पुस्तिका की ओर नहीं गया है, जिसकी एक प्रति मेरे हाथ में है, तो मैं उसे उन्हें भेंट करना चाहूंगा। इस पुस्तिका को पढ़ने पर उन्हें पता चलेगा कि 1940 से पहले उनके वर्ग के लिए कितना कुछ किया गया था। तब से लेकर अब तक उनके बीच लगभग 3,000 एकड़ जमीन वितरित की जा चुकी है। इसके अलावा, 1,000 एकड़ जमीन आपराधिक जनजातियों के सदस्यों के बीच वितरित की गई, जिनमें से पचहत्तर प्रतिशत उनके वर्ग के लोग हैं। मेरे माननीय मित्र ने शिकायत की है कि अनुसूचित जातियों के किसी भी सदस्य को एग्जेक्युटिव शपंक्ति में नियुक्त नहीं किया गया है। क्या मैं उन्हें यह बताने की स्वतंत्रता ले सकता हूं कि पिछले दो-तीन वर्षों से कार्यकारी पदों पर किसी हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई की भर्ती नहीं हुई है? ये सभी पद उन लोगों के लिए आरक्षित किए जा रहे हैं जो सेना में भर्ती हो चुके हैं। अब मैं बताऊंगा कि सरकार ने अतीत में अनुसूचित जातियों के लिए क्या किया है। यूनियनिस्ट सरकार के निर्णय के अनुसार उप-न्यायाधीश के पदों में से एक पद अनुसूचित जातियों में से किसी एक सज्जन की नियुक्ति से भरा गया था। यह पद उनके लिए आरक्षित था। सिंचाई विभाग में मुंशी और जिलेदार के पदों के लिए अनुसूचित जातियों के उम्मीदवारों के लिए रिक्तियां आरक्षित थीं। ऐसा ही एक उम्मीदवार श्री इस्माइल परवेज़, उप रजिस्ट्रार और सहकारी समितियों के कार्यालय के माध्यम से मिला। उन्हें जिलेदार के रूप में नियुक्त किया गया। कुछ सप्ताह पहले ही उसी पद के लिए एक और का चयन किया गया था। अनुसूचित जातियों के एक सदस्य को उम्र की शर्त माफ करके मुंशी नियुक्त किया गया। गुड़गांव से एक को नायब तहसीलदार, रोहतक से एक को आबकारी उपनिरीक्षक तथा अंबाला से एक को गिरदावर नियुक्त किया गया।

(PLAD, वॉल्यूम। XXII, 10 मार्च, 1944, पृ. 488-494)

इस स्पीच को सिविल एंड मिलिट्री गजट अखबार ने दिनांक 11 मार्च, 1944, शनिवार, पृष्ठ 4 पर प्रकाशित किया था। जिसकी कटिंग फोटो में देख सकते हैं।

यूनियनिस्ट सरकार ने पंजाब में हर वर्ग के उत्थान के बहुत काम किया था, इसीलिए आज पंजाब और उससे अलग हुए सूबे तरक्की पर है। पर अफसोस ये है कि उनको कभी भी पूरी तरह से पढ़ाया ही नहीं गया। और आज जो ये गैप आया है यह सिर्फ उसी एक तरफा प्रचार का नतीजा है। यह तो खूब प्रचार किया जाता है कि चौधरी छोटूराम ने जमींदारों के लिए बहुत कुछ किया परंतु उससे आगे का कुछ नहीं बताया जाता कि उन्होंने मजलूम मजदूर तबके के लिए क्या कुछ किया, क्योंकि उन्होंने भी सिर्फ इतना ही सुना पढ़ा है। कभी किसी ने शोध करने की कोशिश ही नहीं की गई। हमने इसी उद्देश्य से 2015 में यूनियनिस्ट मिशन और सर छोटूराम वॉलंटियर कॉर्प्स की बुनियाद रखी थी कि उनकी नीतियों और कार्यों को आमजन तक पहुंचाएं। यह भी बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि "सर छोटूराम वॉलंटियर कॉर्प्स" संगठन चौधरी छोटूराम जी के समय का ही संगठन था। बीच में यूनियनिस्ट मिशन और सर छोटूराम वॉलंटियर कॉर्प्स की गतिविधियों को किन्हीं कारणों से विराम दे दिया जाता था, जिसको अब सुचारू रूप से शुरू किया जा रहा है।

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
घर अँधेरा देख तू आकाश के तारे न देख,

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख

–यूनियनिस्ट राकेश सिंह सांगवान

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