01/11/2022
हमारी एक मित्र डेनमार्क के आरहुस यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ा रही हैं. आज बातचीत में उन्होंने बताया कि वहां के बच्चों में हिंदी सीखने को लेकर बड़ी जिज्ञासा है. वह सब हिंदी से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं. उन्हें शून्य स्तर से सिखाना पड़ता है और वो बड़े मजे से सीखते हैं. उनमें यह जानने की तीव्र उत्कंठा रहती है कि राम के जाने के लिए जाता शब्द का प्रयोग होता है तो सीता के लिए जाती का क्यों! और फिर उन्हें यह सब बताने में बड़ा मजा आता है. वास्तव में हर भाषा के निर्माण का अपना विज्ञान है, अपनी अलग तकनीक है. भाषाएं महज संचार का माध्यम नहीं होती. भाषाओं की अपनी संस्कृति होती है, अपना साहित्य होता है. हम जितनी अधिक भाषाएं सीखते हैं, अपने ज्ञान के फलक को उतना ही विस्तृत करते हैं.
उत्तर भारत में 'हमें अंग्रेज़ी नहीं आती और इसका हमें गर्व है' वाला सिंड्रोम भयानक फैल रहा है. अच्छी हिंदी आना गर्व की बात हो सकती है, हिंदी हमारी अपनी भाषा है, हम सबको आनी चाहिए पर अंग्रेज़ी नहीं आना गर्व की बात कैसे हो सकती है! अपने आपको सिर्फ हिंदी तक समेट कर हम अपना ही दायरा सीमित कर रहे हैं. अपने नीले छाते को ही हमने अपना आसमान समझ लिया है. यह सब राजनेताओं के फैलाये हुए जाल हैं, जिसमें आम जनता फंस रही है. यह बहुभाषिक काल है. बड़े-बड़े प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मन, मैंडरिन सिखाया जा रहा और इधर हम अभी हिंदी का झंडा लिए घूम रहे हैं. राजनेताओं को भाषा की, संस्कृति की इतनी ही चिंता होती तो शुरुआत अपने घर से ही करते.!
जो नई भाषा सीखना चाहते हैं, सीखिए. हिंदी का लेखक बनने के लिए भी हर भाषा साहित्य को पढ़ना पड़ेगा. वर्तमान समय में देश-दुनिया में क्या चल रहा, समझना होगा. और इसमें मददगार साबित होंगी भाषाएं! हमारी सीखने की उम्र है, हममें हर नयी बात, नयी संस्कृति, नयी भाषा को सीखने की ललक होनी चाहिए. अभी की बंदबुद्धि हमें जीवन भर के लिए मंदबुद्धि बना देगी. भाषा बस भाषा होती है, हर भाषा की अपनी सुंदरता है. नेताओं द्वारा भाषा के किए गए वर्गीकरण माँ, मौसी, रखैल, चुड़ैल से बचिए. अपनी स्थिति को बदलना है तो हमें यह करना ही होगा. नयी भाषा सीखिए, नया देश देखिए. हां, जो भी अच्छी बात आपने अन्य भाषा से सीखी हो उसे सबको हिंदी में बताइएगा जिससे देश के ज्यादा से ज्यादा लोग समझ सकें!
Aman Aakash