01/08/2016
आत्मस्वरूप में स्थित बाबा मस्तराम जी
गायत्री योगाचार्यां
वेद और त्रषियों की इस धरती पर कोटि-कोटि संतों, महात्माओं ने आत्म साक्षात्कार को अपने जीवन का अलौकिक लक्ष्य बनाया। सरल परन्तु चिन्तन में गम्भीर उच्च विचारों से सुसज्जित जीवनयापन करते हुए सामान्य जनों के मन पर एक ऐसी अमिट छाप छोड़ जाते हैं, ऐसे महान आत्मा। त्रषिकेश में बाबा मस्तराम जी से 1981 में हमारी प्रथम भेंट भी इसी प्रकार हमारे जीवन को एक महत्त्वपूर्ण दिशा दे गईं। 1987 में बाबा जी का योगनी एकादशी के दिन निर्वाण हुआ। उन 6 वर्षो में दर्जनों बार बाबा जी के दर्शन हुए। उनके मन की गहराईंयों से निकले विचारों और उनके व्यवहार को बहुत करीब से देखने समझने का अवसर प्राप्त हुआ। योगीराज श्रीकृष्ण ने गीता में जो स्थित प्रज्ञ आत्मा को परिभाषित करने का प्रयास किया है वह शत-प्रतिशत बाबा जी के जीवन पर खरा उतरती है। एक अवधूत साधु की तरह जीवन जीने वाले बाबा जी के परिवार, जन्म, बचपन आदि का कुछ भी परिचय नहीं मिलता। परन्तु 14 वर्ष की आयु में भगवत् प्राप्ति के लिए गृह त्याग करके उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
स्थान-स्थान पर यात्राओं के दौर में वे कभी भी किसी गाँव के अन्दर किसी घर में नहीं रूके। गाँव के बाहर किसी भी साफ स्थल पर वे अपना तात्कालिक आवास निर्धारित कर लेते थे। एक गाँव के बाहर नदी में स्नान करते हुए उन्हें जहरीली मछली ने पाँव पर काट लिया।
गाँव के लोग इस मछली के विष और उसके उपचार से भली-भांति परिचित थे।
उपचार के रूप में लोहे की सलाख गर्म करके उन्होंने बाबा जी के पाँव पर दाग दिया। परन्तु बाबा जी के चेहरे की निर्मल छवि ज्यों की त्यों बनी रही। कुछ दिन के उपरान्त जब वे जंगल में विश्राम कर रहे थे तब एक सियार आया, जो उनके पाँव को चाटने लगा। शांत चित्त बाबा जी ने उस सियार को भी भगाने का प्रयास नहीं किया। अन्तत: सियार के चाटने से ही उनका घाव ठीक हो गया। बाबा जी का कहना था कि उन्होंने इस सारे घटनाचा में कष्ट को इसलिए महसूस नहीं किया क्योंकि वे हर कार्यं प्रारब्ध का परिणाम मानते थे।
ईंश्वर के न्याय पर उनको रत्तीभर भी किसी प्रकार सन्देह नहीं था। ईंश्वर प्रणिधान अर्थात ईंश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित भावना ही ऐसे पूर्ण पुरुषों को मुक्ति का मार्ग उपलब्ध कराती है। आज का व्यक्ति अपने छोटे से छोटे कर्म पर भी घमण्ड करता नजर आता है जबकि बाबा जी ने जीवन पर्यंत वेदान्त के विज्ञान को कार्यं रूप में अपने अन्दर उतार कर दिखाया।
बिहार के आरा जिले के एक जंगल में भयंकर सर्दी की रात गर्भस्थ शिशु की भाँति बिताकर प्रात: सूर्योदय की पहली किरण के साथ ही उन्होंने आत्म साक्षात्कार का प्रत्यक्ष अनुभव किया। इस अनुभव का वर्णन उस कवि हृदय ने अपनी रचना विरक्तगीतम् में किया है।
उनकी संस्कृत विद्वत्ता भी उच्च कोटि की थी। उनकी महान रचनाओं में शामिल हैं - हे अनन्त नित्यमुक्त, जय-जय सकलसर्गमय अव्यय, गीतागुाम्, आत्मचिन्तनम्, हिमाचल-चित्रेषु गंगावर्णनम्, बद्रीश स्तवनम्, गीतामहात्म्यम्, संतोषोत्पत्तिविवेक:, वेद प्रबोध:, कुहकवर्णनम्, गोविमर्शनम्।
बाबा जी की आध्यात्मिक यात्रा नंगे पाँव सम्पूर्ण भारत की नदियों - यमुना, गंगा आदि के किनारे, पर्वतों की कन्दराओं सहित गाँव-गाँव के बाद त्रषिकेश में उस स्थान पर आकर विराम को प्राप्त हुईं, जो गंगा के पार लक्ष्मण झूला और राम झूला के बीच के क्षेत्र में हनुमान शिला परिसर के नाम से प्रसिद्ध है।
एक सामान्य सी गुफा और छप्पर के नीचे जीवन के अन्तिम दशक बिताने वाले बाबा जी का नाम भी लोगों ने ही बाबा मस्तराम रख दिया। वे अत्यन्त शान्त भाव के थे। उनके निर्मल छवि को देखकर उनके दर्शन करने वाले लोग गद्गद् हो जाते थे।
उनकी भावनाओं की तरंगे आज भी उस परिसर में जाने वाले अध्यात्म प्रेमियों को वैराग्य की ओर प्रेरित करती है। इस पावन स्थल पर जब बाबा जी ने निवास प्रारम्भ किया उस समय यह स्थान इतना एकान्त और सुनसान था कि चीता भी वहाँ पानी पीने आता था। इस स्थली के सामने गंगा के बीच एक बड़ी शिला है जिस पर चारो तरफ रेत फैली हुईं है। इसी स्थल पर दर्जनों गऊएँ सारा दिन विश्राम करती और हरी वनस्पतियों का सेवन करती हैं।
अपने मन और आत्मा से निर्मल हो चुके बाबा जी ने अहिंसा को पूर्ण रूप से धारण किया हुआ था।
मन, वचन और कर्म से अहिंसक व्यक्ति ही निर्मल बनकर अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकता है। योग दर्शन में अहिंसा का फल बताया गया है - अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्याग:। अर्थात् पूर्ण अहिंसा का पालन करने वाले व्यक्ति के सामने आने पर सभी प्राणी हर प्रकार का वैर भाव त्याग देते हैं। बाबा जी स्वयं बताते थे कि एक बार जंगल में भ्रमण के दौरान अचानक उनका सामना एक शेरनी से हो गया।
परन्तु जैसे ही उस शेरनी की आँखे बाबा जी की आँखों में निर्मलता के दर्शन करती है, अहिंसा भाव महसूस करती है, आत्मा का उत्थान स्वत: एक चुम्बक की तरह उस हिंसक शेरनी को भी ऐसे उच्च आत्मा का आतिथ्य सत्कार करने के लिए प्रेरित कर देता है।
उस शेरनी ने अपने शरीर से एक वृक्ष को टक्कर मार-मारकर उस वृक्ष के अनेकों पके फल नीचे गिरा दिये और चली गईं। उच्च आत्मा बाबा जी को लगा कि जैसे एक मातृशक्ति उन्हें इन फलों के रूप में अपना आतिथ्य सत्कार रूपी आशीर्वाद प्रदान कर गईं है।
ऐसा जीवन कितनी विशाल प्रेरणा बन सकता है हम सब सामान्य जनों के लिए। महान त्रषियों का जीवन सुनकर हमें यह विचार मन में नहीं लाना चाहिए कि वो तो महान थे, हम उस स्तर पर नहीं पहुँच सकते। प्रयास करने पर ही प्रारब्ध चमकता है।
प्रयास और प्रारब्ध मिलकर ही आत्मिक विकास का माध्यम बनते हैं।