05/18/2024
14.5.2024
"किसी व्यक्ति या वस्तु में सामान्य रूप से आकर्षण होना 'राग' कहलाता है। और किसी व्यक्ति या वस्तु में बहुत अधिक आकर्षण होना, एक प्रकार से उसके पीछे पागल हो जाना, कि मुझे हर स्थिति में यह वस्तु या व्यक्ति चाहिए ही, इस प्रकार की स्थिति को 'मोह' कहते हैं।"
"संसार में अधिकतर ऐसा देखने में आता है, कि लोग अपने बच्चों से परिवार वालों से अथवा मित्रों से बहुत राग या मोह करते हैं।"
सामान्य रूप से तो कुछ मात्रा में अपनों में राग मोह होता ही है, उसके बिना तो कोई किसी का पालन रक्षा आदि नहीं करेगा। "परंतु यह राग और मोह इतना अधिक नहीं हो जाना चाहिए, कि एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के दोष दिखाई ही न दें।" क्योंकि मनोविज्ञान का एक यह नियम है, कि "यदि किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से राग या मोह बहुत अधिक हो जाए, तो फिर उसे दूसरे व्यक्ति के दोष दिखाई नहीं देते।" इसके कारण वह पक्षपात और दूसरों पर अन्याय करने लगता है। और अपने व्यक्ति को अनुचित रूप से बचाता रहता है।
इसी प्रकार से मनोविज्ञान का एक और नियम यह है, कि "जब किसी से द्वेष बहुत अधिक हो जाए, तो उसे दूसरे व्यक्ति में गुण होने पर भी उसके गुण नहीं दिखाई देते। बल्कि दूसरे के गुणों को भी वह दोषों के रूप में देखता है।" यह भी अन्याय है।
"इस प्रकार से राग द्वेष मोह आदि दोषों के कारण व्यक्ति पक्षपाती होकर दूसरों पर अन्याय करता है, और उन्हें अनेक प्रकार से दुख देता रहता है। इससे उसके पाप कर्म बढ़ते जाते हैं। परिणाम यह होता है, कि भविष्य में उसे ईश्वरीय दंड व्यवस्था से अनेक प्रकार के दुख भोगने पड़ते हैं।"
"यदि आप भी इस प्रकार के दंड और दुख से बचना चाहते हों, तो कृपया पक्षपात रहित होकर न्यायपूर्वक सबके साथ उचित व्यवहार करें। किसी व्यक्ति से अधिक मात्रा में राग मोह न करें। किसी से अधिक द्वेष भी न करें।"
"यदि आप सबके साथ उचित न्याय पूर्वक व्यवहार करेंगे, तो ही आपका यह जीवन भी सुखमय होगा और अगला जन्म भी आपको ईश्वर अच्छा देगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."