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07-06-2026     प्रात:मुरली  ओम् शान्ति 31.03.2010 "बापदादा"    मधुबनपूर्वज और पूज्य के स्वमान में रह मन्सा द्वारा सर्व क...
07/06/2026

07-06-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 31.03.2010 "बापदादा" मधुबन

पूर्वज और पूज्य के स्वमान में रह मन्सा द्वारा सर्व की पालना करो, पूरे वृक्ष को सकाश दो


आज बापदादा अपने चारों ओर के पूर्वज और पूज्य आत्माओं को देख रहे हैं। पूर्वज आत्मायें अपने को समझते हो ना। पूज्य आत्माओं का निवास कहाँ है? अपने झाड़ को सामने लाओ, उसमें देखो आपका स्थान कहाँ है? जानते हो कि आप पूर्वजों का स्थान जड़ में है। झाड़ के जड़ में भी है, तना में भी है। तो जड़ के द्वारा ही सारे वृक्ष को पालना मिलती है। तो आप इस सारे वृक्ष के टाल टालियां वा पत्तों की पालना करने वाले, सकाश देने वाले पूर्वज हो। पूर्वज के साथ पूज्य भी हो। तना द्वारा लास्ट पत्ते को भी सकाश मिलती है। तो अपने को सारे वृक्ष को सकाश देने वाले अनुभव करते हो? नशा रहता है कि हम पूर्वज सर्व आत्माओं रूपी टाल टालियां या पत्तों को सकाश दे रहे हैं! जैसे ब्रह्मा बाप को ग्रेट ग्रेट ग्रैण्ड फादर कहते हैं तो उनके आप साथी बच्चे भी मास्टर ग्रेट ग्रेट ग्रैण्ड फादर हो। सारे वृक्ष के आत्माओं की आप पूर्वज आत्माओं की तरफ आकर्षण है। आप पूर्वज आत्मायें उन्हों की पालना शक्तियों द्वारा करते हो। जैसे आप सभी पूर्वज आत्माओं की पालना बाप ने की तो बाप ने कैसे की? शक्तियों द्वारा। वैसे आप भी पूर्वज के नाते से शक्तियों द्वारा उन्हों की पालना करने वाले हो। आजकल देखते हो कि सभी आत्मायें दु:खी हैं, पुकार रही हैं, अपने-अपने देवी देवताओं को, आओ हमारी रक्षा करो, हमें शान्ति दो, हमें शक्ति दो। ओ क्षमा के सागर पूर्वज हमें पालना दो। तो यह आवाज आप पूर्वज आत्माओं के कानों में सुनाई दे रहा है? अनुभव करते हो कि हम ही पूर्वज हैं? सारे वृक्ष में देखो जो अन्य धर्म वाली आत्मायें भी हैं तो वृक्ष में टाल टालियां होने के कारण वह भी आपको उसी नज़र से देखते हैं। उन्हों के भी पूर्वज आप ही हो। कोई भी धर्म वाली आत्माओं से आप जब मिलते हो तो यह समझते हो कि यह भी हमारे ही वृक्ष की टाल टालियां हैं! वह भी जब आपसे मिलते हैं तो समझते हैं कि यह अपने हैं! अपनेपन का अनुभव उन आत्माओं को भी हो रहा है और होना है। तो इतना नशा, इतना अन्दर से आप लोगों के पास रहम आता है? वह चिल्ला रहे हैं रहम करो... तो अभी समय अनुसार आप सभी पूर्वज आत्माओं को मन्सा द्वारा शक्तियों की पालना करनी है। उन्हों को आवश्यकता है। तो जितना आप अपने पूर्वज के नशे में रहेंगे उतना ही आप द्वारा उन्हों की पालना होगी। वैसे भी देखो किसी की भी पालना लौकिक में भी बड़ों से होती है। वही उन्हों के शरीर के खाने पीने, पढ़ाई जो सोर्स आफ इनकम है, उनका प्रबन्ध करते हैं। तो जैसे बाप ने आप सभी बच्चों की भिन्न-भिन्न शक्तियों से पालना की है वैसे अभी आपका कार्य है सारे वृक्ष के टाल टालियों और पत्तों की पालना करना। ऐसा उमंग आप पूर्वज आत्माओं को आता है? नशा है? पूज्य भी हो। देखो, सारे ड्रामा में जितनी आप आत्माओं की कायदे प्रमाण पूजा होती है उतनी पूजा कोई भी महात्मा, धर्म पिता की नहीं होती। आपकी पूजा नियम प्रमाण आरती होना, भोग लगना, ऐसी किसकी भी नहीं होती। गायन देखो आपका कायदे प्रमाण कीर्तन होता है। किसी का भी ऐसे गायन नहीं होता। तो आप पूर्वज के साथ पूज्य भी हो। ड्रामा में आप जैसा पूजन और गायन किसी का भी नहीं है।

बापदादा ऐसी आप पूज्य और पूर्वज आत्माओं को देख कितना खुश होते हैं! बाप के दिल से बार-बार यह गीत बजता वाह मेरे सर्व वृक्ष के पूर्वज और पूज्य आत्मायें वाह! तो आजकल बापदादा आप सभी बच्चों को जो आपका स्वमान है, बाप समान सम्पन्न सम्पूर्ण बनने का, वही रूप देखने चाहते हैं। उसके लिए एक बात बच्चों को ध्यान में रखनी है, बापदादा ने देखा कि सभी बच्चे पुरुषार्थ बहुत अच्छा भी करते हैं लेकिन सदा शब्द हर एक को अपने पुरुषार्थ में एड करना है। अटेन्शन देना है। बापदादा बच्चों से पूछते हैं कि जैसे बापदादा आप सभी बच्चों को श्रेष्ठ स्वमानधारी आत्मा के रूप से देखते हैं, वैसे आप अपने को भी ऐसे स्वमानधारी समझते हो?

बापदादा ने देखा कि बच्चे भी चाहते हैं कि हम भी अभी अपने राज्य में चलें। “अब घर जाना है''। यह भी गीत मन में गाते रहते हैं - अब घर जाना है, अब रिटर्न जरनी करनी है। इसके लिए बापदादा ने पहले ही कहा कि सारा समय अपने को कोई न कोई सेवा में बिजी रखो। बापदादा ने देखा है सेवा की रूचि, सेवा का उमंग-उत्साह अभी भी बच्चों में है। अच्छी सेवा के समाचार भी बापदादा सुनते हैं। लेकिन बापदादा तीव्रगति में आगे बढ़ने के लिए बच्चों को विशेष अटेन्शन दिलाते हैं कि सिर्फ एक वाचा की सेवा नहीं, सेवा करते हो तो एक ही समय पर तीन सेवायें इकट्ठी करो - मन्सा द्वारा सकाश दो, वाचा द्वारा ज्ञान दो और कर्मणा अर्थात् अपने सम्पर्क द्वारा, सम्बन्ध द्वारा, चेहरे द्वारा ऐसी सेवा करो जो उसका भी प्रभाव साथ-साथ सेवा में हो। एक समय में तीन सेवा इकट्ठी करो क्योंकि अभी आत्मायें सेवा के लिए चाहती हैं, कुछ फर्क हो। कुछ बदलना चाहिए। तो एक समय पर तीनों सेवा कर सकते हो? कर सकते हो? चेक करते हो कि जिस समय वाणी की सर्विस करते उस समय मन्सा द्वारा और कर्मणा अर्थात् सम्पर्क-सम्बन्ध द्वारा भी सेवा हो रही है! होती है साथ-साथ? जो समझते हैं कि हम एक ही समय में तीन सेवा करते हैं, वह हाथ उठाओ। एक ही समय तीन सेवा। तो अभी अटेन्शन प्लीज़। कभी कभी नहीं। क्या होता है? सेवा तो करते हैं लेकिन सेवा में साथ-साथ अपने में और साथियों में सन्तुष्टता क्योंकि सेवा का फल है सन्तुष्टता वा खुशी। तो चेक करो सेवा तो की लेकिन पहले भी सुनाया कि सेवा की खुशी तब होती है जब स्वयं, साथी और वायुमण्डल सभी सन्तुष्टता के वायब्रेशन में हो। सेवा के सफलता की तीन बातें विशेष सुनाई थी, याद होंगी। पहला नम्बर सेवा अर्थात् निमित्त भाव। दूसरा - निर्माण भावना। तीसरा - निर्मल वाणी। भाव, भावना और स्वभाव। यह सभी साथ-साथ सेवा में हैं तो स्वयं भी सन्तुष्ट और साथी भी सन्तुष्ट और जिन्हों की सेवा की वह भी आगे बढ़ते जायें। निमित्त भाव वाले बाप के तरफ सम्बन्ध जोड़ेंगे। अगर निमित्त भाव नहीं तो बाप के नजदीक इतने नहीं आयेंगे। तो जब भी सेवा करते हो तो यह चेक करो कि भाव, भावना और स्वभाव ठीक रहा? और आजकल बापदादा ने देखा कि जो मूल बात है बापदादा की कि हर एक को और अपने को चाहे कहाँ भी सेवा के लिए जाते हो, तो यह चेक करो कि साथी सन्तुष्ट रहे? क्योंकि सेवा की सफलता है - सन्तुष्टता का फल प्राप्त होना। खुशी प्राप्त हो। साथ-साथ एक बात बापदादा इशारा देते हैं कि चलते फिरते, संगठन में भी रहते हो, कोई न कोई का साथ सेवा में होता ही है, तो एक दो को आत्मा के रूप में देखो। आत्मा के रूप में देखते भी हैं, अभ्यास भी करते हैं, लेकिन जब आत्मा देखते हो तो आत्मा के ओरीज्नल संस्कार से देखते हो? या जो मिक्स संस्कार हैं, वह भी दिखाई देते हैं? आत्मा देखो, इसमें पास हो, लेकिन किस संस्कार से देखते हो? क्या आत्मा के ओरीज्नल संस्कार से कनेक्शन में आते हो? या वर्तमान संस्कार भी सामने आते हैं? तो बाप कहते हैं कि आज से किसी को भी एक तो आत्मा रूप में देखो लेकिन आत्मा के जो ओरीज्नल संस्कार हैं उस रूप में देखो। तो कभी भी आपस में जो कभी कभी बातें हो जाती हैं, वह नहीं होंगी। अभी आत्मा रूप में देखते हो लेकिन साथ में वर्तमान संस्कार भी सामने आ जाता है। तो आपस में जो सम्पूर्ण स्थिति होनी चाहिए, उसमें दूरी पड़ जाती है। तो ओरीज्नल संस्कार वाली आत्मा देखो। तो यह जो अभी संगठन में रुकावट आती है वह रुकावट खत्म हो जायेगी।

यह ब्राह्मण परिवार श्रेष्ठ परिवार है। परिवार की बहुत महिमा है। यह ईश्वरीय परिवार बार-बार नहीं मिलता। कल्प में एक ही बार यह ईश्वरीय परिवार मिला है, इतना बड़ा परिवार सारे कल्प में कभी नहीं मिलता। परिवार की भी विशेषता को जानना और परिवार में चलना, एक महान सब्जेक्ट है। पहले भी सुनाया था कि इस ज्ञान का फाउण्डेशन है निश्चय और निश्चय में चार बातें हैं। बाप, दादा साथ में है ही और नॉलेज में, ड्रामा में, परिवार में सभी में निश्चय हो। तो निश्चय बुद्धि हो, सहज पुरुषार्थी बन जाते हो। जैसे बापदादा में निश्चय है, ऐसे परिवार में भी निश्चय आवश्यक है। जैसे देखो जब आप कोई भी बात की पैंकिग करते हो तो क्या करते हो? चार ही तरफ टाइट करते हो ना, एक तरफ भी अगर टाइट नहीं किया तो हलचल होती है। ऐसे ही बाप, नॉलेज, नॉलेज में भी विशेष ड्रामा और परिवार। अगर चार ही बातें मजबूत नहीं हैं तो विघ्न आते हैं। विघ्नों को पार करने में अटेन्शन देना पड़ता है इसलिए परिवार की पहचान, परिवार से प्यार, एक दो को समझना, यह बहुत आवश्यक है।

पूर्वज हो, पूज्य हो, तो यह बातें भी अपने में या साथियों में लानी है। क्या भी हो, नम्बरवार तो हैं ना! लेकिन ब्राह्मण परिवार का विशेष कार्य है दुआ देना, दुआ लेना। कई बच्चे कहते हैं कि दूसरा क्रोध करता है, अभी दुआ लेगा कैसे! दुआ तो लेगा नहीं, क्रोध करेगा। बापदादा कहते हैं अच्छा संस्कार वश वह बददुआ देता है, आप दुआ देने चाहते हो लेकिन वह बददुआ देता है, लेकिन उसने बददुआ दी, लेने वाला कौन? लेने वाले आप हो या वह है? वह देने वाला है, आप लेने वाले हैं। तो उसकी बददुआ आपने ली क्यों? अगर आत्मा को ओरीज्नल संस्कार से देखो तो आपको रहम आयेगा। स्वयं भी सेफ रहो, बददुआ लो नहीं, लेने वाले आप हो। न दो, न लो।

बापदादा आज सभी बच्चों को होमवर्क देते हैं कि कभी भी किसी को आत्मा रूप में देखो, वर्तमान संस्कार के रूप में नहीं देखो। आत्मा कहा तो उस आत्मा के जो निज़ी संस्कार हैं, उस निजी संस्कार के रूप में, सम्बन्ध में भी आओ और दृष्टि में भी उसी दृष्टि से देखो तो यह जो विघ्न पड़ते हैं जिसके कारण पुरुषार्थ में तीव्रता नहीं आती है, तो अभी वृत्ति बदलेंगे, दृष्टि बदलेंगे तो बातें समाप्त हो जायेंगी। किसी की क्या भी बातें देखते हो, बापदादा ने पहले भी कहा है तो सदा आप ब्राह्मण परिवार का एक एक का फर्ज है - शुभ भावना, शुभ कामना देना और शुभ भावना, शुभ कामना लेना। उस संस्कार से देखो और चलो। एक और भी बात बताते हैं - पहले भी बताया है तो कहाँ कहाँ संगठन में कभी-कभी परदर्शन, परचिंतन और परमत के तरफ आकर्षित हो जाते हैं। अभी इन तीन पर को काट दो, एक पर रखो - वह एक पर है पर उपकार। पर उपकार करना है, पर उपकारी हैं। ब्राह्मणों का स्वभाव है पर उपकारी। परदर्शन नहीं, यह पर काट दो। यह तीनों बहुत नुकसान देते हैं। इसीलिए अपना स्वमान सदा यही याद रखो कि मुझ ब्राह्मण आत्मा का स्वमान ही है “पर उपकारी''। तो दूसरी सीजन में बापदादा हर एक बच्चे में यह परिवर्तन देखने चाहते हैं। हो सकता है? बापदादा मुबारक देते हैं, एक दो को अटेन्शन दिलाते रहना। क्या करना? रोज़ रात को सोने के पहले बापदादा को गुडनाइट करने के पहले अपने सारे दिन का पोता-मेल देना। अच्छा किया या बुरा किया? जो भी किया वह बाप को पोतामेल देके, अपने बुद्धि को खाली करके गुडनाइट करना और बाप की याद में ही सो जाना। फिर आपकी नींद बहुत अच्छी होगी। पहले अपने को खाली करना, बुद्धि में कोई बात नहीं रखना, बाप के रूप में सारा पोतामेल सच्ची दिल का दे दिया तो आपको धर्मराजपुरी में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। सच्ची दिल पर साहेब राज़ी हो जायेगा। तो होम वर्क मिला! एक तो अपने पूर्वज और पूज्य स्वरूप की सेवा चलते फिरते कर सकते हो। बाप ने देखा यह जनक बच्ची ने तबियत खराब होते, कराची की सेवा में विशेष मन्सा सकाश दी, चाहे निमित्त कोई भी है लेकिन इसने प्रैक्टिकल में किया। वहाँ की आत्माओं को सकाश मिली। और आगे-आगे उमंग में बढ़ रहे हैं। तो ऐसे बापदादा ने प्रैक्टिकल एक्जैम्पुल देखा। तो आप सभी भी कर सकते हो। दु:खी को, चिल्लाने वाले को खुशी की लहर पहुंचा सकते हो। आपके भक्त आपको ही पुकार रहे हैं - हमारी देवी हमारा देवता कब आके रहम करेंगे। आपको सुनाई नहीं देता लेकिन बाप को बहुत सुनाई देता है। हर एक ईष्ट को पुकार रहे हैं। आप नहीं जानते हो कि हमारे भक्त कौन से हैं लेकिन भक्त तो जानते हैं ना। वह तो पुकारते हैं और आप हर ब्राह्मण आत्मा के भक्त हैं। चाहे ढीले हों चाहे होशियार हों, भक्त आपके भी हैं क्योंकि जड़ में बैठे हो ना, तो आपका सकाश का पार्ट है। तो अभी मन्सा सेवा को बढ़ाओ। और जितना बिजी रहेंगे ना उतना निर्विघ्न रहेंगे। कर सकते हो ना! मन्सा सेवा करना जानते हो ना! अच्छा नियम पूर्वक करते हो या कभी कभी? अगर कभी कभी करते हैं तो उसको रेग्युलर करो और अगर थोड़ी करते हैं तो उसको और बढ़ाओ क्योंकि सारे कल्प का आधार अभी की सेवा का फल है। चाहे पुजारी बनेंगे, चाहे राज्य अधिकारी बनेंगे दोनों का आधार अभी की सेवा, अभी की अवस्था, अभी का बोल, अभी का सम्बन्ध-सम्पर्क है इसलिए बापदादा यही चाहते हैं कि जितनी परसेन्ट अभी है, उससे बढ़नी चाहिए। वैसे तो बापदादा पहले से ही कहते हैं - करना है तो अभी करो। कभी नहीं। बापदादा को कभी के गीत बहुत सुनाते हैं। बहुत अच्छे अच्छे करके सुनाते हैं लेकिन बापदादा को कभी के गीत अच्छे नहीं लगते। अभी अभी के गीत अच्छे लगते। तुरत दान महापुण्य। तो समझा अभी क्या करना है? अच्छा।

बापदादा सभी चारों ओर के बच्चों को देख खुश भी होते हैं क्योंकि बापदादा बच्चों के सिवाए अकेला कुछ नहीं करने चाहता इसलिए हर रोज़ बच्चों का आह्वान करते रहते हैं। तीव्र पुरुषार्थी बच्चे, मीठे बच्चे, प्यारे बच्चे अब चलो। अच्छा।

चारों ओर के बच्चों को बापदादा देखकर चाहे सम्मुख बैठे हैं, चाहे कहाँ भी बैठे हैं लेकिन सभी को बाप याद है। और बाप को भी कौन याद है? चारों ओर के बच्चे याद हैं क्योंकि बाप हर बच्चों के लिए यही आशा रखते हैं कि हर बच्चा बाप समान बनना ही है। बाप की हर एक बच्चे में जो आशायें हैं, वह जानता है कि नम्बरवार हैं लेकिन फिर भी अपने नम्बर अनुसार भी सम्पन्न तो बनना है ना। हर एक के पुरुषार्थ को भी देखते हैं क्या-क्या कर रहे हैं, बाप को बहुत प्यार आता है, बच्चे जब मेहनत करते हैं ना तो बहुत प्यार आता है कि मेहनत से छूट जाएं। प्यार में खो जायें। प्यार में मैजारिटी पास हैं लेकिन बातों में आ जाते तो बाप को भूल जाते।

चारों ओर के बच्चों को बापदादा का पदम पदम गुणा प्यार और दिल का दुलार स्वीकार हो। सभी को, मालिक बच्चों को बाप लाख-लाख बधाईयां दे रहे हैं। उड़ते चलो, उड़ाते चलो। अच्छा।

वरदान:-
स्व-स्थिति द्वारा सर्व परिस्थितियों को पार करने वाले निराकारी, अलंकारी भव

जो अलंकारी हैं वे कभी देह-अहंकारी नहीं बन सकते। निराकारी और अलंकारी रहना - यही है मन्मनाभव, मध्याजीभव। जब ऐसी स्व-स्थिति में सदा स्थित रहते तो सर्व परिस्थितियों को सहज ही पार कर लेते, इससे अनेक पुराने स्वभाव समाप्त हो जाते हैं। स्व में आत्मा का भाव देखने से भाव-स्वभाव की बातें समाप्त हो जाती हैं और सामना करने की सर्व शक्तियां स्वयं में आ जाती हैं।

स्लोगन:-
संकल्प का एक कदम आपका तो सहयोग के हजार कदम बाप के।

ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।

जो अपनी वा दूसरों की बीती को नहीं देखते हैं, सेकण्ड में फुलस्टाप लगाते हैं वह सरलचित होते हैं और जो सरलचित होते हैं उनके नयनों से, मुख से, चलन से मधुरता व हर्षितमुखता प्रत्यक्ष रूप में देखने में आती है। ऐसी सरलचित स्थिति वाले दूसरों को भी सरलचित बना देते हैं। सरलचित माना जो बात सुनी, देखी, की, वह सार-युक्त हो और सार को ही उठाये।

06-06-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन“मीठे बच्चे - अमृतवेले का समय बहुत-बहुत अच्छा है, ...
07/06/2026

06-06-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - अमृतवेले का समय बहुत-बहुत अच्छा है, इसलिए सवेरे-सवेरे उठकर एकान्त में बैठ बाबा से मीठी-मीठी बातें करो''

प्रश्नः-
कौन-सी नॉलेज निरन्तर योगी बनने में बहुत मदद करती है?

उत्तर:-
ड्रामा की। जो कुछ बीता, ड्रामा की भावी। ज़रा भी स्थिति हलचल में न आये। भल कैसी भी परिस्थिति हो, अर्थक्वेक आ जाए, धन्धे में घाटा पड़ जाए लेकिन ज़रा भी संशय पैदा न हो - इसको कहते हैं महावीर। अगर ड्रामा की यथार्थ नॉलेज नहीं तो आंसू बहाते रहेंगे। निरन्तर योगी बनने में ड्रामा की नॉलेज बहुत मदद करती है।

गीत:-
ओम् नमो शिवाए........

ओम् शान्ति।
बच्चे अब अच्छी रीति समझते हैं पतित दुनिया का अब अन्त हो रहा है। पावन दुनिया की आदि हो रही है। यह सिर्फ तुम बच्चे ही जानते हो। और बच्चों को ही यह डायरेक्शन वा श्रीमत मिलती है। कौन देते हैं? ऊंच ते ऊंच भगवान। समझाते रहते हैं कि पतित से पावन बनना है। यह नॉलेज तुम्हारे लिए है और तो सब पतित हैं। यह पतित दुनिया विनाश जरूर होनी है। पतित कहा जाता है विकारी को। बाप समझाते हैं कि तुम जन्म-जन्मान्तर एक-दो को दु:ख देते आये हो, इसलिए तुम आदि-मध्य-अन्त दु:ख पाते हो। एक-दो को पतित बनाते हो। पुकारते भी हैं कि हम पतित हैं, परन्तु बुद्धि में पूरा बैठता नहीं है। कहते भी हैं पतित-पावन आओ परन्तु फिर भी पतितपना छोड़ते नहीं हैं। अभी तुम समझते हो सारी बात है पावन बनने की। यह समझाने वाला भी तो कोई चाहिए। समझाने वाला है ही एक। बाकी यह जो गुरू लोग हैं, ये किसको पावन बना नहीं सकते। पावन भी सिर्फ एक जन्म के लिए नहीं, जन्म-जन्मान्तर के लिए बनना है। तुम्हारे में भी जो ज्ञानवान हैं वे तीखे होते हैं। ड्रामा अनुसार वह नूँध है। तुम्हारे में भी महावीरपना चाहिए। वह आयेगा बाप की याद में रहने से। बाप बहुत अच्छी रीति बैठ समझाते हैं। जैसे बाबा कहते हैं कि सवेरे उठकर याद करो। वह समय बहुत सुन्दर है याद करने का, जिसको प्रभात कहा जाता है। भक्ति मार्ग में भी कहते हैं राम सिमर प्रभात मोरे मन। बाप भी कहते हैं सवेरे उठ बाप को याद करो तो बड़ा मज़ा आयेगा। बाप की याद में बैठ यही ख्याल करना चाहिए कि कैसे किसको समझायें? अमृतवेले का वायुमण्डल बड़ा शुद्ध रहता है। दिन में तो गोरखधन्धा रहता है। रात को 12 बजे तक तो विकारी वायुमण्डल रहता है। साधू-सन्त, भक्त आदि सब भक्ति भी प्रभात को करते हैं। यूँ तो याद दिन में भी कर सकते हैं। धन्धे में भल रहे, बुद्धि का योग, जिस देवता का पुजारी होगा उनके पास होगा। परन्तु ऐसा किसका रहता नहीं है। भक्ति मार्ग में सिर्फ दर्शन के लिए मेहनत करते हैं। मिलता कुछ भी नहीं। उनको भी भक्ति करते-करते तमोप्रधान बनना ही है। भक्ति मार्ग में भी शिव पर बलि चढ़ते हैं, जिसको काशी कलवट कहते हैं। शिव को याद करते-करते कुएं में कूद पड़ते हैं। शिव के ऊपर बलि चढ़ते हैं, वह है भक्ति मार्ग की बलि। यह है ज्ञान मार्ग की बलि। वह भी मुश्किल, यह भी मुश्किल। भक्ति मार्ग में इससे कुछ फायदा नहीं। यह जैसे आत्मा अपने शरीर का घात करती है। यह कोई ज्ञान नहीं है। वह भी कह देते आत्मा सो परमात्मा। आत्म-अभिमानी तो एक बाप ही है, जो बच्चों को समझाते हैं कि परमात्मा तो मैं एक ही हूँ। हम आत्मा सो परमात्मा कहना - यह बड़े से बड़ी झूठ है। यह तो हो नहीं सकता।

बाप कहते हैं - मैं आता ही हूँ पतितों को पावन बनाने, सो पावन बना रहा हूँ। बाकी तो ड्रामा में जो होना है सो होगा ही। समझो अर्थक्वेक होती है, छत गिर जाती है, कहेंगे भावी, कल्प पहले भी ऐसे हुआ था। इसमें ज़रा भी हिलने की दरकार नहीं। ड्रामा पर पक्का खड़ा रहना है। इसको ही महावीर कहा जाता है। एक्सीडेंट आदि तो ढेर के ढेर होते रहते हैं। फिर किसकी रक्षा करते हैं क्या? यह तो ड्रामा में नूँध है। ऐसा ही ड्रामा में पार्ट है। जो ड्रामा को नहीं जानते वह देह को याद कर आंसू बहाते हैं। वह कभी शिवबाबा को याद नहीं कर सकते क्योंकि शिवबाबा से प्यार नहीं है। सच्ची प्रीत नहीं है। बाप के साथ तो पूरी प्रीत होनी चाहिए। शिवबाबा के साथ प्रीत बुद्धि तुम कल्प-कल्प बनते हो। देवताओं की बाप के साथ प्रीत बुद्धि थी, ऐसे नहीं कहेंगे। उन्होंने इस प्रीत से वह पद पाया है। वहाँ तो मालूम भी नहीं रहेगा - सारे कल्प में तुमको शिवबाबा का पता भी नहीं रहता है जो प्रीत रख सको। अभी बाप ने अपना परिचय दिया है। अब बाप कहते हैं कि और संग तोड़ मुझ एक साथ जोड़ो। यह विनाश काल तो जरूर है। यह भी तुम बच्चे जानते हो। मनुष्य तो बिल्कुल ही घोर अन्धियारे में हैं। तुम अभी समझते हो हमको तो बाप से पूरा वर्सा लेना है। याद बिगर सतोप्रधान नहीं बन सकेंगे। सर्जन बन अपने रोग को देखना है। श्रीमत पर देखना है कि हमारी बाप के साथ कितनी प्रीत है? अमृतवेले ही बाप को याद करना अच्छा है। प्रभात का समय बहुत अच्छा है। उस समय माया के तूफान नहीं आयेंगे। रात को 12 बजे तक तपस्या करने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि टाइम ही गन्दा होता है। वायुमण्डल खराब रहता है। तो एक बजे तक छोड़ देना चाहिए। एक के बाद वायुमण्डल अच्छा रहता है। बाप कहते हैं - अपना तो है ही सहज राजयोग, भल आराम से बैठो। बाबा अपना अनुभव भी सुनाते हैं। कैसे बाबा से बातें करता हूँ। बाबा कैसा वन्डरफुल यह ड्रामा है! आप कैसे आकर पतित से पावन बनाते हो! सारी दुनिया को कैसे पलटाते हो! बड़ा वण्डर है! जैसे बाप को ख्याल आते हैं वैसे बच्चों को भी आने चाहिए। कैसे मनुष्यों का बेड़ा पार करें अथवा कैसे नईया पार करें। बाप कहते हैं - तुम पुकारते रहते हो हे पतित-पावन आओ। अब मैं आया हूँ, अब तुम पतित न बनो। पतित होकर सभा में आकर नहीं बैठो। नहीं तो वायुमण्डल अशुद्ध कर देते हो। बाबा को मालूम तो पड़ता है। देहली में, बाम्बे में ऐसे विकार में जाने वाले आकर बैठ जाते थे। गाया हुआ है असुर आकर विघ्न डालने बैठते थे। विकार में जाने वालों को असुर कहा जाता है। वायुमण्डल को खराब करते हैं। उनके लिए सज़ा बहुत कड़ी है। बाबा समझाते तो सभी बातें हैं फिर भी अपना घाटा करने के सिवाए रहते नहीं। झूठ भी बोलते हैं। नहीं तो फौरन लिख देना चाहिए - बाबा, हमसे यह भूल हुई, क्षमा करना। अपना पाप लिख दो। नहीं तो वृद्धि को पाते रहेंगे और रसातल में चले जायेंगे। आते हैं कुछ लेने लिए और ही कान कटा लेते। यह भी ड्रामा में पार्ट है। ऐसे असुर कल्प पहले भी थे, अब भी हैं। अमृत छोड़ विष पीते हैं। अपना भी घात करते हैं और औरों को भी नुकसान पहुँचाते हैं। वायुमण्डल खराब कर देते हैं। ब्राह्मणियाँ भी सब एक समान नहीं हैं। महारथी, घोड़ेसवार, प्यादे सब हैं।

तुम बच्चों को अथाह खुशी होनी चाहिए - बाबा मिला और बाकी क्या। हाँ, अपने बच्चों आदि को जरूर सम्भालना है। ऐसे नहीं कि बाबा यह सब आपके हैं, अब आप सम्भालो। हम तो आपके बन गये। बाप समझाते हैं कि गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र बनो। कोई भी पतित काम नहीं करो। बस पहली बात है काम की। द्रोपदी ने भी इस पर पुकारा कि हमको यह नंगन करते हैं। पुकारा भी तब था जब बाप सुनने वाला आया था। बाप के आने के पहले कोई भी पुकारते नहीं हैं। किसको पुकारेंगे? बाबा आया है तब ही पुकारते हैं। पतित से पावन बनकर फिर कहाँ जायेंगे? वापिस जाना है, वह तो यही समय है। सबका सद्गति दाता, लिबरेटर एक ही है। यहाँ तो दु:ख है। साधू-सन्त आदि कोई भी सुखी हो न सकें। सबको कोई न कोई दु:ख, रोग आदि होता ही है। कोई गुरू अन्धा लूला भी होता है। जरूर कोई ऐसा काम किया है तब तो अन्धा लूला आदि बनते हैं। सतयुग में कोई अन्धा लूला आदि थोड़ेही होगा। मनुष्य थोड़ेही समझते हैं। बाप ही आकर समझाते हैं। बाप ही ज्ञान का सागर पतित-पावन है। बाकी तो सब है भक्ति। वह भक्ति मार्ग ही अलग है। वह है सीढ़ी उतरने का मार्ग। उतरने में, जीवनबन्ध में आने में 84 जन्म लगते हैं और फिर एक सेकण्ड लगता है जीवनमुक्त बनने में। अगर उनकी मत पर चल बाप को याद करे तो। नम्बरवार तो हैं ना। कहते हैं हमको फलानी टीचर मिले तो अच्छा है। तो जरूर खुद कमजोर है तब तो कहते हैं फलानी को 2-4 मास के लिए भेज दो। बाबा कहते हैं यह भी भूल है। तुम ब्राह्मणी को क्यों याद करते हो जबकि बाप सहज बात बताते हैं - सिर्फ बाप को याद करो और स्वदर्शन चक्र फिराओ, औरों को भी समझाओ। बस। इसमें ब्राह्मणी आकर क्या करेगी? यह तो सेकण्ड की बात है। तुम धन्धे-धोरी में यह भूल जाते हो फिर भी ब्राह्मणी यही कहेगी मनमनाभव। कई बुद्धू लोग समझते नहीं हैं सिर्फ कहते हैं ब्राह्मणी अच्छी चाहिए। ज्ञान तो तुमको मिला है ना। बाप और वर्से को याद करो। देह-अभिमान को छोड़ो। यह हमारा सेन्टर है, यह इनका सेन्टर है। यह जिज्ञासू यहाँ क्यों जाते हैं... यह सब देह-अभिमान है। सब शिवबाबा के सेन्टर्स हैं, हमारा थोड़ेही सेन्टर है। तुमको यह क्यों होता है कि फलाना हमारे सेन्टर पर क्यों नहीं आता। कहाँ भी जाये। बाबा हमेशा कहते हैं कोई से भी मांगों नहीं। यह समझ सकते हैं कि बीज नहीं बोयेंगे तो मिलेगा क्या? भक्ति मार्ग में भी दान-पुण्य किया जाता है। तुम सब भक्ति मार्ग में ईश्वर अर्थ इनडायरेक्ट करते थे। फिर संन्यासियों को भी बहुत देते हैं। नहीं तो दान गरीबों को दिया जाता है, न कि साहूकारों को। इसमें अनाज का दान सबसे अच्छा होता है। सो भी बाप समझाते हैं दान करने से दूसरे जन्म में उसका फल मिल जाता है। ईश्वर ही सबको फल देते हैं। साधू-सन्त आदि कोई रिटर्न नहीं दे सकते हैं। देने वाला एक ही बाप है। किसके भी थ्रू देवे। बाप समझाते हैं कि तुम ईश्वर अर्थ देते थे तो भी दूसरे जन्म में तुमको एवजा दिलाते थे। अभी तो मैं डायरेक्ट आया हूँ। अभी तुमको 21 जन्म के लिए रिटर्न मिलेगा। फिर तो मौत सामने खड़ा है। भक्ति मार्ग में तुमको ऐसे नहीं कहते थे कि मौत सामने खड़ा है इसलिए अपना सफल करो। नहीं। तो अब बाप समझाते हैं - जिसको भी चाहिए यह रूहानी हॉस्पिटल खोल दो। कोई कहते हैं मकान बनायें, उसमें यह हॉस्पिटल खोलें। बाप कहते हैं - आज मकान बनाओ और कल मर जाओ तो यह सब खत्म हो जायेगा। शरीर पर भरोसा नहीं है। जो है उसमें ही तब तक एक कमरा रख दो, जिसमें रूहानी हॉस्पिटल, रूहानी कॉलेज बनाओ। बहुतों का कल्याण करेंगे तो बहुत ऊंच पद पायेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर अपने आपको देखना है कि इस विनाश काल में मेरी एक बाप से सच्ची प्रीत है? और सब संग तोड़ एक संग जोड़ी है? कभी कोई विकर्म करके असुर तो नहीं बनते? ऐसी चेकिंग कर स्वयं को परिवर्तन करना है।

2) इस शरीर पर कोई भरोसा नहीं इसलिए अपना सब कुछ सफल करना है। अपनी स्थिति एकरस, अचल बनाने के लिए ड्रामा के राज़ को बुद्धि में रखकर चलना है।

वरदान:-
बार-बार हार खाने के बजाए बलिहार जाने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान् विजयी भव

स्वयं को सदा विजयी रत्न समझकर हर संकल्प और कर्म करो तो कभी भी हार हो नहीं सकती। मास्टर सर्व-शक्तिमान् कभी हार नहीं खा सकते। यदि बार-बार हार होती है तो धर्मराज की मार खानी पड़ेगी और हार खाने वालों को भविष्य में हार बनाने पड़ेंगे, द्वापर से अनेक मूर्तियों को हार पहनाने पड़ेंगे इसलिए हार खाने के बजाए बलिहार हो जाओ, अपने सम्पूर्ण स्वरूप को धारण करने की प्रतिज्ञा करो तो विजयी बन जायेंगे।

स्लोगन:-
“कब'' शब्द कमजोरी सिद्ध करता है इसलिए “कब'' करेंगे नहीं, अब करना है।

ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।

इस बेहद की स्टेज पर मैं खिलाड़ी हूँ। यह खिलाड़ी की स्टेज सदा हर्षितमुख रहने का अनुभव कराती है। किसी भी प्रकार की कोई भी बात, जिसको दुनिया वाले आपदा समझते हैं लेकिन खिलाड़ी बन खेल करने वाले और साक्षी हो खेल देखने वाले, ऐसी आपदा के रूप को खेल समझ, सहनशीलता की शक्ति से मनोरंजन का अनुभव करते हैं।

05-06-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन“ मीठे बच्चे - बाप के साथ - साथ तभी चल सकेंगे जब इ...
07/06/2026

05-06-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“ मीठे बच्चे - बाप के साथ - साथ तभी चल सकेंगे जब इस पुरानी दुनिया से बेहद का वैराग्य होगा ''

प्रश्नः-
भगवान समर्थ होते हुए भी उसके रचे हुए यज्ञ में विघ्न क्यों पड़ते हैं?

उत्तर:-
क्योंकि रावण भगवान से भी तीखा है। जरूर जब उसका राज्य छीना जायेगा तो वह विघ्न डालेगा ही। शुरू से लेकर ड्रामा अनुसार इस यज्ञ में विघ्न पड़ते ही आये हैं, पड़ने ही हैं। हम पतित दुनिया से पावन दुनिया में ट्रांसफर हो रहे हैं तो जरूर पतित मनुष्य विघ्न डालेंगे।

गीत:-
ओ दूर के मुसाफिर...

ओम् शान्ति।
मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत की लाइन सुनी। जैसे वेद शास्त्र आदि भक्ति मार्ग का रास्ता बताते हैं वैसे गीत भी थोड़ा रास्ता बताते हैं। वह तो कुछ समझते नहीं। शास्त्रों की कथायें आदि सुनना, वह जैसे है कनरस। अब बच्चे जानते हैं - दूरदेश का मुसाफिर किसको कहा जाता है। आत्मा जानती है - हम भी दूर के मुसाफिर हैं, हमारा घर शान्तिधाम है। मनुष्य इन बातों को नहीं समझे तो गोया कुछ नहीं समझे। बाप को न जानने से सृष्टि चक्र को कोई नहीं जानते हैं। यह आत्मा समझती है कि शिवबाबा कहते हैं - मैं टैप्रेरी जीव आत्मा बनता हूँ। तुम स्थाई जीव आत्मा हो। मैं सिर्फ संगम पर ही टैप्रेरी जीव आत्मा हूँ। सो भी तुम्हारे मुआफिक नहीं बनता। मैं इस जीव में प्रवेश करता हूँ, अपना परिचय देने। नहीं तो तुमको परिचय कैसे मिले? बाप ने समझाया है - रूहानी बाप एक ही है, जिसको शिवबाबा अथवा भगवान कहते हैं। दूसरा कोई नहीं जानते। इसमें पवित्रता का भी बन्धन है। बड़े ते बड़ा बन्धन है अपने को आत्मा समझना, जिस दूर के मुसाफिर पतित-पावन को भक्ति मार्ग में याद करते हैं। वह रूहानी बाप समझाते हैं कि मैं सबको ले चलूँगा। किसको भी छोड़ नहीं जाऊंगा, वापिस तो सबको जाना है। प्रलय भी नहीं होनी है। भारत खण्ड तो रहता ही है। भारत खण्ड का कभी विनाश नहीं होता है। सतयुग आदि में सिर्फ भारत खण्ड ही रहता है। कल्प के संगम पर जब बाप आते हैं तो आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन करना होता है। बाकी सब धर्म विनाश होने हैं। तुम भी आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन करने में मदद कर रहे हो। तो गीत सुना - कहते हैं बाबा हमको भी साथ ले चलो। बाप कहते हैं - ऐसे साथ में कोई चल न सके, जब तक पुरानी दुनिया से वैराग्य न आये। नया मकान बनता है तो पुराने से दिल टूट जाती है। तुम भी जानते हो यह पुरानी दुनिया खत्म होनी है। अब नई दुनिया में चलना है। जब तक सतोप्रधान नहीं बनेंगे तब तक सतोप्रधान देवी-देवता बन नहीं सकेंगे इसलिए बाबा बार-बार समझाते हैं - अपने को आत्मा समझ बाप को याद करते रहो। सद्गति करने वाला दूर का मुसाफिर एक ही आया हुआ है, उनको दुनिया नहीं जानती। सर्वव्यापी कह दिया है। अभी तुम बच्चे नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार जानते हो कि हम शिवबाबा की सन्तान हैं। आते भी हैं तो समझते हैं हम बापदादा के पास जाते हैं, तो यह फैमली हो गई। यह है ईश्वरीय फैमली। किसको बहुत बच्चे होते हैं तो बड़ी पलटन हो जाती है। शिवबाबा के बच्चे जो इतने बी.के. भाई-बहिन हैं, यह भी बड़ी पलटन हो जाती है। ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ सब जानते हैं - हम बेहद के बाप से वर्सा लेते हैं। शास्त्रों में दिखाते हैं पाण्डवों और कौरवों ने खेल खेला। राजाई दांव में रखी। अब राजाई न कौरवों की है, न पाण्डवों की हैं। ताज आदि कुछ भी नहीं है। दिखाते हैं उनको शहर निकाला मिला। हथियार आदि छिपाकर जाए रखा। यह सब हैं दन्त कथायें। न पाण्डव राज्य है, न कौरव राज्य है। न उन्हों की आपस में लड़ाई चली है। लड़ाई राजाओं की लगती है। यह तो भाई-भाई हैं। लड़ाई हुई है कौरवों और यौवनों की। बाकी भाई एक दो को कैसे खत्म करेंगे। दिखाते हैं पाण्डव, कौरव लड़े। बाकी 5 पाण्डव बचे और एक कुत्ता रहा। वह भी सब पहाड़ पर गल मरे। खेल ही खलास। राजयोग का अर्थ ही नहीं निकला।

अभी तुम बच्चे जानते हो बाप कल्प-कल्प आकर एक धर्म की स्थापना करते हैं। बुलाते भी हैं हे पतित-पावन बाबा आओ, आकर पतित से पावन बनाओ। सतयुग में सूर्यवंशी राजधानी ही होती है। ब्रह्मा द्वारा विष्णुपुरी की स्थापना हो रही है। अब बाप आये हैं तो उनके डायरेक्शन पर चलना है। कमल पुष्प समान पवित्र रहना है। कन्याओं को तो नहीं कहेंगे कि गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहो। वह तो हैं ही पवित्र। यह गृहस्थियों के लिए कहा जाता है। कुमार और कुमारियों को तो शादी करनी ही नहीं चाहिए। नहीं तो वह भी गृहस्थी हो पड़ेंगे। कुछ गन्धर्वी विवाह का नाम भी है। कन्या पर मार पड़ती है तो लाचारी हालत में गन्धर्वी विवाह कराया जाता है। वास्तव में मार भी सहन करनी चाहिए, परन्तु अधरकुमारी नहीं बनना चाहिए। बाल ब्रह्मचारी का नाम बहुत होता है। शादी की तो हाफ पार्टनर हो गये। कुमारों को कहा जाता है - तुम तो पवित्र रहो। गृहस्थ व्यवहार वालों को कहा जाता है - गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल के समान बनो। उन्हों को ही मेहनत होती है। शादी न करने से बन्धन नहीं रहेगा। कन्या को तो पढ़ना है और ज्ञान में बहुत मजबूत रहना है। छोटी कुमारियां जो सगीर हैं, उनको तो हम ले नहीं सकते। वह अपने घर में रहकर पढ़ सकती हैं। माता-पिता ज्ञान में आये तो सगीर को ले सकते हैं। यह तो स्कूल का स्कूल है, घर का घर है और सतसंग का सतसंग। सत माना एक बाप, जिसके लिए ही कहते हैं ओ दूर के मुसाफिर। आत्मा गोरी बनती है। बाप कहते हैं - मैं मुसाफिर सदा गोरा रहता हूँ। प्योरिटी में रहने वाला हूँ। मैं आकर सभी आत्माओं को पवित्र गोरा बनाता हूँ और तो कोई ऐसे मुसाफिर हैं नहीं। बाप समझाते हैं - मैं आया हूँ रावण राज्य में। यह शरीर भी पराया है। तुम्हारी आत्मा कहेगी - यह हमारा शरीर है। बाबा कहेंगे यह हमारा शरीर नहीं है। यह इनका शरीर है। यह पतित शरीर हमारा नहीं है। आते ही हैं इनके बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में। जो नम्बरवन पावन था, वही नम्बर लास्ट अर्थात् अन्त में विकारी बनते हैं। पहला नम्बर 16 कला सम्पूर्ण था। अब कोई कला नहीं रही है। पतित तो सब हैं ही। तो बाप दूरदेश का मुसाफिर हुआ ना। तुम आत्मायें भी मुसाफिर हो। यहाँ आकर पार्ट बजाती हो। इस सृष्टि चक्र को कोई नहीं जानते हैं। भल कोई कितना भी शास्त्र आदि पढ़ा हो परन्तु यह ज्ञान कोई नहीं दे सकते। बाप समझाते हैं - मैं इस तन में प्रवेश कर इन आत्माओं को ज्ञान देता हूँ। वह तो मनुष्य, मनुष्य को शास्त्रों का ज्ञान देते हैं। वह हो गये भगत। सद्गति दाता तो एक ही है। वही ज्ञान का सागर है, उनको न जानने कारण देह-अभिमान आ जाता है। वह कोई यह तो समझाते नहीं हैं कि अपने को आत्मा निश्चय करो। आत्मा पढ़ती है। यह कोई समझाते नहीं हैं क्योंकि देह-अभिमान है। अभी दूर का मुसाफिर तो शिव-बाबा को ही कहेंगे। तुम जानते हो हम 84 जन्म का चक्र लगा चुके हैं।

बाप कहते हैं - 5 हजार वर्ष पहले भी समझाया था कि बच्चे तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो। मैं जानता हूँ - गीता में आटे में लून मिसल कुछ है। वही गीता का एपीसोड, वही महाभारत की लड़ाई, वही मनमनाभव-मध्याजी भव का ज्ञान है। मामेकम् याद करो। लड़ाई भी बरोबर लगी है। पाण्डवों की विजय हुई। विजय माला विष्णु की गाई जाती है। शास्त्रों में तो दिखाया है पाण्डव गल मरे। फिर माला कहाँ से बनी। अब तुम समझते हो कि हम विष्णु की माला बनने यहाँ आये हैं। ऊपर में है पतित-पावन बाप। उनका यादगार चाहिए ना। भक्ति मार्ग में यादगार गाया जाता है। कोई 8 की माला, कोई 108 की माला, कोई 16108 की बनाई है। गाते हैं - चढ़ती कला तेरे भाने सर्व का भला। अभी तुम जानते हो - हमारी चढ़ती कला है। हम चले जायेंगे अपने सुखधाम फिर हम वहाँ से नीचे कैसे उतरते हैं। 84 जन्म कैसे लेते हैं, यह सारा ज्ञान तुम्हारी बुद्धि में है। यह ज्ञान भूलना नहीं चाहिए। हमारे सब दु:ख दूर करने, श्राप मिटाए सुख का वर्सा देने बाप आया है। रावण के श्राप से सबको दु:ख होता है। तो अब बाप को और वर्से को याद करना है। तुम जानते हो हम सूर्यवंशियों ने भारत में राज्य किया। भारत में ही शिवबाबा आते हैं। भारत ही स्वर्ग था, यह घड़ी-घड़ी बुद्धि में याद करना पड़े। जिसने 84 का चक्र नहीं खाया होगा, वह न धारणा करेंगे, न करायेंगे उसके लिए समझा जायेगा कि इसने 84 जन्म नहीं लिये हैं। यह देरी से आते हैं। स्वर्ग में नहीं आते हैं। पहले-पहले जाना तो अच्छा है ना। नये मकान में पहले खुद रहते हैं फिर किराये पर चढ़ाते हैं। तो वह फिर सेकेण्ड हैण्ड हुआ ना। सतयुग है नई दुनिया। त्रेता सेकेण्ड हैण्ड कहेंगे। तो अब बुद्धि में आता है हम स्वर्ग नई दुनिया में जायें। पुरुषार्थ करना है, प्रजा भी बनती जायेगी। तुमको मालूम पड़ता जायेगा कि माला में कौन-कौन पिरो सकते हैं। अगर किसको सीधा कहा जाए कि तुम नहीं आयेंगे तो हार्टफेल हो जाए इसलिए कहा जाता है कि पुरुषार्थ करो, अपनी जांच करो कि हमारा बुद्धियोग भटकता तो नहीं है! तुम्हारा शिवबाबा से कितना लव होता जाता है! कहते भी हैं हम बापदादा के पास जाते हैं। शिवबाबा से दादा द्वारा वर्सा लेने जाते हैं। ऐसे बाप के पास तो कई बार जायें। परन्तु गृहस्थ व्यवहार भी सम्भालना है। भल बहुत धनवान हैं परन्तु इतनी फुर्सत नही। पूरा निश्चय नहीं। नहीं तो मास दो मास बाद आकर रिफ्रेश हो सकते हैं। उनको घड़ी-घड़ी कशिश होगी। सुई पर जंक चढ़ी हुई होती है तो चुम्बक इतना खींचता नहीं है। जिनका पूरा योग होगा उनको झट कशिश होगी, भाग आयेंगे। जितनी कट उतरती जायेगी, उतनी कशिश होगी। हम चुम्बक से मिलें। गीत है चाहे मारो, चाहे कुछ भी करो... हम दर से कभी नहीं निकलेंगे। परन्तु वह अवस्था तो पिछाड़ी में होगी। कट निकली हुई होगी तो वह अवस्था होगी। बाप कहते हैं - हे आत्मायें मनमनाभव, रहो भल अपने गृहस्थ व्यवहार में। ऐसे नहीं कि यहाँ भागकर आए बैठ जाना है। सागर पास बादलों को आना है - रिफ्रेश होने। फिर सर्विस पर जाना है। बन्धन जब खलास हो तो सर्विस पर जा सकें। माँ-बाप को अपने बच्चों को सम्भालना है। बाप की याद में रहना है। पवित्र बनना है।

बाप ने समझाया है - अनेक प्रकार के विघ्न ज्ञान यज्ञ में पड़ते हैं। कहते हैं ईश्वर तो समर्थ है फिर विघ्न क्यों? मनुष्यों को पता ही नहीं है, रावण भगवान से भी तीखा है। उनकी राजाई छीनी जाती है तो अनेक प्रकार के विघ्न पड़ते रहते हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार फिर भी विघ्न पड़ेंगे। शुरूआत से लेकर पतितों के विघ्न पड़ते हैं। शास्त्रों में भी लिख दिया है - श्रीकृष्ण को 16108 पटरानियां थी। सर्प ने डसा। राम की सीता चुराई गई। अब रावण स्वर्ग में कहाँ से आये। झूठ तो बहुत है। कहते हैं विकार बिगर बच्चे कैसे होंगे। उनको पता ही नहीं - जो वर्सा लेने वाले होंगे वही आकर समझेंगे। तो इस ज्ञान यज्ञ में असुरों के विघ्न पड़ते हैं। पतित को असुर कहा जाता है। है ही रावण सम्प्रदाय। अभी तुम संगम पर हो। रावण राज्य से किनारा कर लिया है फिर भी कुछ लैस आती है। यह बुद्धि में ज्ञान है कि हम जा रहे हैं। बैठे तो यहाँ ही हैं। बुद्धि में ज्ञान है। बैठे यहाँ हो परन्तु उनसे जैसे तुमको वैराग्य है। यह छी-छी दुनिया कब्रिस्तान बननी है। भिन्न-भिन्न प्वाइन्ट्स से समझाया जाता है। वास्तव में तो एक ही प्वाइन्ट है मनमनाभव। कितनों की चिट्ठियां आती हैं - बाबा हम बांधेली हैं। एक द्रोपदी तो नहीं हैं, हजारों हो जायेंगी। अभी तुम पतित दुनिया से पावन दुनिया में ट्रांसफर हो रहे हो। जो कल्प पहले फूल बने होंगे वही निकलेंगे। गॉर्डन ऑफ अल्लाह की यहाँ स्थापना होगी। कोई-कोई तो ऐसे अच्छे-अच्छे फूल होते हैं जो देखने से ही आराम आ जाता है। नाम ही है किंग ऑफ फ्लावर्स। 5 रोज़ से रखा हो तो भी खिला रहेगा। खुशबू फैलती रहेगी। यहाँ भी जो बाप को याद करते और याद दिलाते हैं उनकी खुशबू फैलती है। सदैव खुश रहते हैं। ऐसे मीठे-मीठे बच्चों को देख बाप हर्षित होते हैं। उन्हों के आगे बाबा की ज्ञान डांस अच्छी होती है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान और योग में मजबूत बनना है। अगर कोई बन्धन नहीं है तो बन्धनों में जानबूझकर फॅसना नहीं है। बाल ब्रह्मचारी होकर रहना है।

2) अभी हमारी चढ़ती कला है, बाबा हमारे सब दु:ख दूर करने, श्राप मिटाए वर्सा देने आये हैं। बाप और वर्से को याद कर अपार खुशी में रहना है। जांच करनी है कि हमारा बुद्धियोग कहाँ भटकता तो नहीं है।

वरदान:-
समाने और सामना करने की शक्ति द्वारा सेवा में सफलता प्राप्त करने वाले रूहानी सेवाधारी भव

रूहानी सेवाधारियों को सेवा के सिवाए कुछ भी सूझता नहीं, वे मन्सा-वाचा-कर्मणा सर्विस से एक सेकण्ड भी रेस्ट नहीं लेते इसलिए बेस्ट बन जाते हैं। वे सेवाओं में सफलता प्राप्त करने के लिए सदा यही याद रखते कि समाना और सामना करना - यही हमारा निशाना है। वे अपने पुराने संस्कारों को समाते हैं और सामना माया से करते न कि दैवी परिवार से। ऐसे बच्चे जो नॉलेजफुल के साथ-साथ पावरफुल भी हैं उन्हें ही कहा जाता है रूहानी सेवाधारी।

स्लोगन:-
छोटी बात को बड़ा नहीं करो, वातावरण को शक्तिशाली बनाओ।

ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ , सहनशील बनो।

दुनिया में लोग जिंदा होते भी नाउम्मींदी की चिता पर बैठे हुए हैं, ऐसी आत्माओं को मरजीवा बनाओ, नये जीवन का दान दो। अपने खुशनसीब, हर्षित मुख चेहरे द्वारा उन्हें मानव जीवन में जीना सिखाओ। आपको देखकर उनमें हिम्मत, उमंग-उत्साह आ जाये, इसके लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ और सदा कमल समान स्थिति के आसन पर डबल लाइट स्थिति में स्थित रहो।

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