भ्रूण हत्या सामाजिक अपराध है, हमें यह अधिकार नहीं है कि हम किसी जीवन का अंत कर दें। यह मानव अधिकारों का भी पूरी तरह से उल्लंघन है। केवल अपनी ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों से बचने के लिए, और कुछ मामलों में अपनी या किसी और की नैतिक गिरावट को छुपाने के लिए गर्भपात को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस्लाम ने भ्रूण हत्या को महापाप साबित किया है, कुरआन कहता है: "और जब जिंदा गाड़ी हुई लड़कियों से पूछा जाएगा की किस पाप के कारण उसकी हत्या की गई" (सूर: तकवीर: 8-9) अज्ञानता काल का यह अपराध आज के युग में भ्रूण हत्या के नाम से मानव समाज में प्रचलित है, कुरआन हमें इस घिनावने जुर्म से रोकते हुए कहता है: "अपनी संतान को निर्धनता के कारण कत्ल मत करो हम तुमको और उनको भी आजीविका देते हैं" (सूर: अल-अनआम: 151) दूसरी जगह कुरआन ने कहा: निर्धनता के डर से अपनी संतान को न मार डालो उनको तुमको हम ही रोज़ी देते हैं" (सूर: अल-इस्रा: 31)
हदीस में आता है कि अल्लाह तआला 120 दिन (लगभग 4 महीने) के बाद भ्रूण में रूह फूंकते हैं। इसके बाद वह जीवित माना जाता है। इसका मतलब है कि 120 दिन के बाद गर्भपात करना हत्या है। अगर किसी से यह गुनाह हो चुका हो, तो अल्लाह से सच्चे दिल से तौबा करे। #भ्रूण_हत्या
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जुमा का दिन सप्ताह की ईद है, जिस दिन सारे मुसलमान स्नान करके मस्जिद में नमाज के लिए इकट्ठा होते हैं और इमाम का भाषण सुनते हैं जिसमें अच्छा और नेक इंसान बनने की प्रेरणा मिलती है, मानव सेवा और रब की उपासना के लिए एनर्जी हासिल होती है, लेकिन केवल जुमा की नमाज़ एक आदमी के मुसलमान होने के लिए पर्याप्त नहीं, जब तक जान में जान है पाँच समय की नमाज़ें हर मुसलमान पुरुष एवं महिला पर अनिवार्य हैं, इस दिन सूरः कहफ़ की तिलावत और नबी ﷺ पर दरूद भेजने की बड़ी अहमियत है।
मुसलमानों के त्यौहारः
ईदुल-फित्रः ईद का यह त्यौहार हिजरी कैलेंडर के अनुसार शव्वाल के महीने की पहली तिथि को रमज़ान का उपवास रखने की खुशी में मनाया जाता है, यह एक दिन का त्यौहार होता है।
ईदुल-अज़हाः यह त्यौहार ज़ुल-हिज्जा की दसवीं तिथि को और उसके बाद 3 दिनों तक मनाया जाता है, इन्हीं दिनों में हज़रत इब्राहीम के आदर्श को ज़ींदा करते हुए मुसलमान पशुओं की क़ुरबानी करके उसका मांस निर्धनों और जरूरतमंदों में बांटते हैं, और स्वयं से संकल्प लेते हैं कि हम ईश्वर के लिए हर प्रकार का बलिदान देने के लिए तैयार हैं, यह त्यौहार तीन या चार दिन मनाया जाता है। इन्हीं दिनों में हाजी हज के काम पूरा करते हैं। #इस्लाम_यह_है
सप्ताह का अंतिम दिन:
शुक्रवार का दिन मुसलमानों के पास साप्ताहिक ईद का दिन समझा जाता है, इस दिन पुरुषों के लिए अनिवार्य है कि वे मस्जिद जाकर जुमा का ख़ुत्बा (उपदेश) सुनें, फिर सामूहिक नमाज अदा करें। शुक्रवार का दिन विभिन्न अरब और मुस्लिम देशों में सप्ताहांत की छुट्टी (Weekend Breaks) का दिन माना जाता है। #इस्लाम_यह_है
खान-पान:
इस्लाम में सूअर, मरे हुए जानवरों तथा चीर फाड़ करने वाले पशुओं का मांस खाना मना है। इस्लाम में झटके का मांस हराम है, इस्लामी कानून ने जानवर ज़ब्ह करने की विधि निर्धारित कर दी है और जानवर ज़ब्ह करते समय उस पर ईश्वर का नाम लेना आवश्यक ठहराया है। हर प्रकार की मछली तथा समुद्री भोजन इस्लाम में जायज़ है। पेय पदार्थों में खून पीना उसके नुकसान के कारण वर्जित है, और सभी प्रकार की शराब का सेवन भी मना है क्योंकि यह नशा लाने और दिमाग पर पर्दा डालने का कारण बनती है। #इस्लाम_यह_है
इस्लाम में आदेश और निषेध:
इस्लाम में आस्था और व्यवहार दोनों के बीच चोली दामन का साथ है, और मामलात में मूल सिद्धांत यह है कि हर चीज़ जाइज़ है, सिवाय उसके जिससे ईश्वर ने मना किया है। निम्न क़ुरआनी आयत में कुछ वर्जित चीज़ों का संक्षिप्त वर्णन हैः
"कह दो, "आओ, मैं तुम्हें पढ़ कर सुनाऊँ कि तुम्हारे रब ने तुम पर कौनसी बातें हराम की हैं: वह यह हैं कि उसके साथ किसी को साझीदार न ठहराओ और माँ-बाप के साथ सद्व्यवहार करो और निर्धनता के कारण अपनी सन्तान की हत्या न करो; हम तुम्हें भी रोज़ी देंगे और उन्हें भी। और अश्लील कामों के निकट भी न जाओ, चाहे वह अश्लीलता खुली हुई हो या छिपी हुई। और किसी जीव की, जिसे अल्लाह ने आदरणीय ठहराया है, हत्या न करो। यह और बात है कि हक़ के लिए ऐसा करना पड़े। ये हैं वह बातें जिनकी अल्लाह ने ताकीद की है शायद कि तुम बुद्धि से काम लो। और अनाथ के धन को हाथ न लगाओ, किन्तु ऐसे तरीक़े से जो (उसके हक़ में) उत्तम हो, यहाँ तक कि वह अपनी युवावस्था को पहुँच जाए। और इनसाफ़ के साथ पूरा-पूरा नापो और तौलो। हम किसी व्यक्ति पर उसकी सामर्थ्य से ज़्यादा ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं डालते। और जब बात कहो, तो न्याय की कहो, चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो, और अल्लाह की प्रतिज्ञा को पूरा करो। लोगो! ये बातें हैं, जिनकी उसने तुम्हें ताकीद की है। आशा है तुम ध्यान रखोगे। और यही मेरा सीधा मार्ग है, तुम इसी पर चलो और दूसरे मार्गों पर न चलो कि वे तुम्हें उसके मार्ग से हटाकर इधर-उधर कर देंगे। यह वह बात है जिसकी उसने तुम्हें ताकीद की है, ताकि तुम (पथभ्रष्टता से) बचो।" (सूरः अल-अंआमः 151-153) #इस्लाम_यह_है
इस्लाम में अनिवार्य उपासनायें:
जब एक व्यक्ति सच्चे मन से इस वाक्य का उच्चारण करता है कि "मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के अलावा कोई सत्य पूजा योग्य नहीं तथा मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद ﷺ अल्लाह के अंतिम संदेष्टा हैं" तो इस उच्चारण द्वारा वह इस्लाम में प्रवेश करता है, जिसमें वह इस बात का इक़रार करता है कि वह केवल एक अल्लाह की उपासना करेगा और मुहम्मद ﷺ के आदेशानुसार उसकी उपासनायें होंगी। इस इक़रार के तुरंत बाद उस पर दिन और रात में पाँच समय की नमाज़ें अनिवार्य हो जाती हैं, जिनसे उसकी आत्मा को शांति मिलती है। और माल की ज़कात (अनिवार्य दान) साल में एक बार दी जाती है ताकि समाज के गरीबों की मदद हो सके और वे सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सकें। उसी प्रकार एक मुसलमान को हर साल रमज़ान के महीने में एक महीना के लिए रोज़ा (उपवास) रखना होता है और यदि आर्थिक क्षमता प्राप्त है तो जीवन में एक बार काबा का हज करना भी अनिवार्य है। #इस्लाम_यह_है
इस्लाम आस्था और कानून दोनों पर आधारित है:
इस्लाम आस्था और कानून दोनों पर आधारित धर्म है। इस्लामी आस्था यह है कि केवल एक ईश्वर पर ईमान लाया जाए, उसका किसी को भागीदार न ठहराया जाए, उसके स्वर्गदूतों (Angels), उसकी उतारी हुई पुस्तकों, उसके भेजे गए संदेष्टाओं, महाप्रलय के दिन तथा भाग्य (किस्मत) की अच्छाई और बुराई पर विश्वास रखा जाए।
जबकि इस्लामी कानून से अभिप्राय ईश्वर द्वारा अवतरित किये गए वह सारे नियम हैं जो लोगों के जीवन को नियंत्रित करते हैं, जिन्हें तीन भागों में विभाजित किया गया है:
(1) उपासना
(2) नैतिकता
(3) लोगों के बीच के मामलात, इसमें सामाजिक संबंध, वित्तीय लेन-देन और सामान्य रूप से जीवन के मुद्दे शामिल हैं। #इस्लाम_यह_है
ईद के हर्षोल्लास भरे अवसर पर, मैं आपको और आपके परिवार को दिल की गहराई से मुबारकबाद देता हूँ। दुआ है कि यह पवित्र दिन आपके जीवन में खुशियाँ, आशीर्वाद, प्रेम और दया का संदेश लेकर आए। अल्लाह आपके दिल को शांति प्रदान करे, आपके जीवन को सुख-शांति से भर दे, तथा आपका हर पल खुशी और सफलता से जगमगाता रहे।
पवित्र कुरआन ईश्वर की वाणी हैः
मुसलमानों की आस्था है कि पवित्र कुरआन ईश्वर का अवतरित किया हुआ सब से अंतिम ग्रन्थ है जो अपने से पहले अवतरित होने वाले प्रत्येक आसमानी ग्रन्थों की पुष्टि करता है, जैसे हज़रत इब्राहीम के सहीफ़े और ज़बूर जो हज़रत दाऊद को दी गई, तौरात जो हज़रत मूसा को दी गई और इंजील जो हज़रत ईसा पर अवतरित हुई। परन्तु लोगों ने उन पुस्तकों में संशोधन किया और उनकी असली प्रतियाँ नष्ट हो गईं।
लेकिन पवित्र कुरआन धरती पर एक मात्र आसमानी ग्रन्थ है जिसे ईश्वर ने महा-प्रलय के दिन तक विकृति, कमी या वृद्धि से सुरक्षित रखने की गारंटी दी है, आज क़ुरआन के शब्द और अर्थ पूर्ण रूप में सुरक्षित हैं। यह हर युग के लिए एक जींदा चमत्कार है। इस पुस्तक में ईश्वर के कानून, आदेश और निषेध सब शामिल हैं। इस में सभी मनुष्यों के लिए विश्वव्यापी संदेश है, जो लोग इस पर चिंतन-मनन करते हैं इसके संदेश से अद्भुत रूप में प्रभावित होते हैं। हर युग में और आज तक अधिकांश मुसलमान पूरे कुरआन को कंठस्थ करते आ रहे हैं। यदि आप पवित्र कुरआन में वैज्ञानिक चमत्कारों को जानने के इच्छुक हैं तो पुस्तिका "इस्लाम सबसे सरल मार्गदर्शक" का अध्ययन करें। #इस्लाम_यह_है
विश्व में मुसलमानों की संख्याः
नवीनतम वैश्विक आँकड़ों के अनुसार विश्व में मुसलमानों की संख्या लगभग 1.8 अरब तक पहुँच गई है। इस्लाम पृथ्वी पर दूसरा सबसे बड़ा धर्म है। 50 देशों में मुसलमान बहुसंख्यक आबादी में हैं, और केवल 20% मुसलमान अरब समुदाय से संबंध रखते हैं। #इस्लाम_यह_है
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