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24/06/2023

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‘धमार’ एक गायन शैली है जो प्राचीन काल से प्रचलित रही है। मतंग, दुर्गशक्ति, चाष्टिक, शार्दूल तथा शारंगदेव आदि विद्वानों न...
18/08/2021

‘धमार’ एक गायन शैली है जो प्राचीन काल से प्रचलित रही है। मतंग, दुर्गशक्ति, चाष्टिक, शार्दूल तथा शारंगदेव आदि विद्वानों ने इसे ‘भिन्नागीति’ नाम से पुकारा और आज इसे धमार गायकी कहा जाता है। जैसे भिन्ना गीति में स्वर, शब्द और लय का प्रयोग भिन्न-भिन्न प्रकार से किया जाता था वैसे ही आधुनिक धमार गायकी को विभिन्न प्रकार के बोल-बांटों से अलंकृत किया जाता है। धमार विभिन्न शब्दयुक्त स्वर लहरियों द्वारा गायी जाती है।...

धमार गायन शैली - ‘धमार’ एक गायन शैली है जो प्राचीन काल से प्रचलित रही है। मतंग, चाष्टिक, शार्दूल तथा शारंगदेव आदि वि.....

ठुमरी की परिभाषा ध्रुपद और धमार गायकियों की भांति ‘ठुमरी’ गायन शैली में भी प्राचीन कलाकारों का ही योगदान है। मतंग ने अपन...
18/08/2021

ठुमरी की परिभाषा ध्रुपद और धमार गायकियों की भांति ‘ठुमरी’ गायन शैली में भी प्राचीन कलाकारों का ही योगदान है। मतंग ने अपनी सप्तगीतियों एवं शारंगदेव ने पंचगीतियों में इसे गौड़ी नाम से प्रस्तुत किया और मुगल दरबारों में इसे ठुमरी नाम प्रदान किया गया। गौड़ी गीति स्वर, शब्द और य का भावुक रूप व्यक्त करती है। ठुमरी गायकी का प्रदर्शन 14 मात्रा की दीपचन्दी-चांचर ताल में तबला वादन द्वारा किया जाता है। कहीं-कहीं ठुमरी का गान कहरवा, जत अथवा पंजाबी तीनताल में भी सुनने को मिलता है। ये तालें भी ठुमक-ठुमक की प्रतीक हैं। इस गायकी में कण, मींड, मुर्की और खटका आदि से लंकृत टे-छोटे भावुक आलाप, शब्दालाप, तान एवं बोल तानों का योग होता है। इसमें बहलावा अधिक मात्रा में श्रवणगोचर होता है। शब्द श्रृंगार और करूण रस के होते हैं। इसे कुछ देर दीपचन्दी ताल में गायन के पश्चात द्रुत तीनताल में गाते हैं और इस शैली को ‘लग्गी’ कहते हैं। यह ठुमरी में भावाभिव्यक्ति का चरमोत्कृष्ट रूप कहलाता है।...

ठुमरी की परिभाषा - ध्रुपद और धमार गायकियों की भांति ‘ठुमरी’ गायन शैली में भी प्राचीन कलाकारों का ही योगदान है। इस ग....

वाद्य Test - 42 में प्राचीन कालीन, मध्य कालीन एवं आधुनिक तत एवं सुषिर वाद्यों के प्रश्नोत्तर दिए गए है। वैदिक कालीन वीणा...
13/08/2021

वाद्य Test - 42 में प्राचीन कालीन, मध्य कालीन एवं आधुनिक तत एवं सुषिर वाद्यों के प्रश्नोत्तर दिए गए है। वैदिक कालीन वीणाओं के नाम Facebook - Telegram - Whatsapp -

वाद्य - Test - 42 में प्राचीन कालीन, मध्य कालीन एवं आधुनिक तत एवं सुषिर वाद्यों के प्रश्नोत्तर दिए गए है। वाद्यों की उत्प....

मध्यकालीन वीणाओं के नाम मध्यकाल में ‘वीणा’ तत् वाद्यों के लिए सामान्य संज्ञा थी। सभी तंतु वाद्यों को वीणा कहा जाता था। म...
10/08/2021

मध्यकालीन वीणाओं के नाम मध्यकाल में ‘वीणा’ तत् वाद्यों के लिए सामान्य संज्ञा थी। सभी तंतु वाद्यों को वीणा कहा जाता था। मध्य युगीन ग्रन्थों में वीणा के निम्न प्रकार उल्लिखित हैं- चित्रा - शार्ङदेव ने चित्रा के सम्बन्ध में यह उल्लेख किया है- ‘तंत्रीभिः सप्तभिश्चित्रा’ इससे केवल यही अनुमान किया जा सकता है कि उसमें सात तार होते थे। इसके अतिरिक्त उस वीणा का रूप वर्णन नहीं मिलता है। चित्रा वीणा में तारों को मिलाने की क्या व्यवस्था थी, इस सम्बन्ध में यदि अन्य ग्रन्थों का अध्ययन करें तो देखेंगे कि भरत, नान्यदेव, सोमेश्वर, शार्ङदेव, पाश्र्वदेव किसी ने भी वर्णन नहीं किया है। शार्ङदेव के श्लोक से केवल तार-संख्या का ज्ञान होता है।...

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