31/07/2026
पुस्तक: मेरे भाई बलराज
लेखक भीष्म साहनी
पुस्तक के कुछ अंश।।
बलराज साहनी किताबी किस्म के युवक नहीं थे। वे अलग-थलग रहने वाले, अपने विचारों में डूबे रहने वाले या अपने आप में खोए रहने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे घंटों किसी कोने में बैठकर किताबें नहीं पढ़ते थे। इसके विपरीत उनका स्वभाव अत्यंत मिलनसार था। उन्हें घूमना-फिरना, नई-नई जगहों की खोज करना और तरह-तरह के जोखिम उठाना पसंद था। वे अंतर्मुखी नहीं, बल्कि बेहद सामाजिक और जीवंत व्यक्तित्व के धनी थे।
यद्यपि वे बहुत बड़े खिलाड़ी नहीं थे, फिर भी खेल-कूद का उन्हें हमेशा शौक रहा। स्कूल और कॉलेज के दिनों में वे अपने कुछ मित्रों को साथ लेकर कभी साइकिलों पर तो कभी पैदल लंबी यात्राओं पर निकल पड़ते थे। यह उनका प्रिय शौक था। कई बार वे अचानक उत्साह से कहते, "चलो यार, साइकिलों पर कोहमरी चलते हैं।"
सुनने वालों को यह प्रस्ताव अजीब लगता, क्योंकि कोहमरी रावलपिंडी से लगभग चालीस मील दूर एक पहाड़ी नगर था। लेकिन बलराज साहनी कभी दूरी की परवाह नहीं करते थे। वे बिना किसी योजना या तैयारी के साइकिल उठाकर चल पड़ते। कई बार तो साथ में खाने का सामान या जेब में पैसे तक नहीं होते थे। उनके ऐसे अनेक यात्राओं का उल्लेख मिलता है—रावलपिंडी से कोहमरी, कोहमरी से कोहाला, श्रीनगर से गुलमर्ग आदि।
जब भी वे किसी पहाड़ के सामने खड़े होते, उनकी पहली इच्छा उसकी चोटी तक पहुँचने की होती। किसी झील के किनारे पहुँचते तो मन करता कि उसमें कूदकर उसे तैरते हुए पार कर जाएँ। बचपन से ही उनके स्वभाव में एक सकारात्मक बेचैनी और कुछ नया करने की ललक थी।
वे हमेशा किसी न किसी व्यक्ति को अपना आदर्श भी बनाए रखते थे। बचपन में जसवंत राय और बाद के वर्षों में पी. सी. जोशी उनके ऐसे ही प्रेरणास्रोत रहे, जिनके प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था और जिनका वे अनुकरण करने का प्रयास करते थे।
उनके पिता चाहते थे कि बलराज साहनी वाणिज्य (कॉमर्स) की पढ़ाई करें और लाहौर के हेली कॉलेज ऑफ कॉमर्स में प्रवेश लें। स्वयं व्यापारी होने के कारण वे अपने दोनों बेटों को व्यापार के क्षेत्र में स्थापित देखना चाहते थे। वे अक्सर बड़े उत्साह से कहते थे कि एक बेटा लंदन में कार्यालय खोले और दूसरा कराची में। एक विदेश से माल भेजे और दूसरा भारत में उसका वितरण करे। उनका मानना था कि बड़े व्यापार के लिए बड़े सपने देखने चाहिए।
लेकिन बलराज साहनी की व्यापार में कोई रुचि नहीं थी। उनका मन साहित्य, समाज और सृजनात्मक कार्यों में लगता था। पिता ने यह सोचकर उनका विवाह भी कर दिया कि शायद वे घर-गृहस्थी और पारिवारिक व्यवसाय से जुड़ जाएँ, परंतु वे अपने सपनों से समझौता करने वाले नहीं थे। वे अपने पैरों पर खड़े होना चाहते थे।
अपनी पत्नी के साथ वे घर छोड़कर लेखन की दुनिया में आ गए। शुरुआती दिनों में उन्होंने अपने मित्रों की सहायता से "मंडे मॉर्निंग" नामक पत्रिका में लेखन किया। यह पत्रिका इसलिए शुरू की गई थी क्योंकि अधिकांश पत्रिकाएँ सोमवार को प्रकाशित नहीं होती थीं। आरंभिक दिनों में पत्रिका में कई कमियाँ थीं और आर्थिक कठिनाइयाँ भी लगातार बनी रहीं। बलराज साहनी की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब हो गई थी और वे शारीरिक रूप से भी कमजोर हो चुके थे।
इसी दौरान वे अपनी पत्नी के साथ रवीन्द्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन और महात्मा गांधी के सेवाग्राम में रहे। वहाँ उन्हें टैगोर और गांधी को निकट से समझने और उनके विचारों से प्रभावित होने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने लगभग चार वर्षों तक बीबीसी में रेडियो उद्घोषक के रूप में कार्य किया। इस दौरान उनके सोचने-समझने का दृष्टिकोण और अधिक व्यापक हुआ। उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की तानाशाही के विरुद्ध लाल सेना के संघर्ष को देखा तथा कार्ल मार्क्स के विचारों का गंभीर अध्ययन किया।
चार वर्ष बाद जब वे बीबीसी की नौकरी छोड़कर भारत लौटे, तो रेलवे स्टेशन पर उनके पिता, माता, रिश्तेदार और मित्र बड़ी उत्सुकता से उनका इंतजार कर रहे थे। सबको लगा था कि वे एक "विलायती बाबू" की तरह प्रथम श्रेणी के डिब्बे से उतरेंगे। लेकिन सभी आश्चर्यचकित रह गए जब बलराज साहनी द्वितीय श्रेणी के डिब्बे से उतरे। उनके पैरों में साधारण चप्पलें थीं, उन्होंने हाफ पैंट पहन रखी थी, अपना सामान स्वयं उठा रखा था और उनकी पत्नी भी सादे सलवार-सूट में थीं। उनकी सादगी ने सभी को प्रभावित किया।
संघर्ष के दिनों में बलराज साहनी ने फिल्मों में एक्स्ट्रा कलाकार के रूप में भी काम किया। बाद में वे Indian People's Theatre Association (IPTA) से जुड़े। 1946 में फिल्म इंसाफ और उसके बाद धरती के लाल से उन्हें अभिनेता के रूप में पहचान मिली।
बलराज साहनी अपने संवेदनशील व्यक्तित्व, कलात्मक दृष्टि और गहरी सामाजिक चेतना के कारण फिल्मों में अत्यंत जीवंत और प्रामाणिक चरित्रों को प्रस्तुत कर सके। उनके निभाए गए पात्र आज भी याद किए जाते हैं—गर्म कोट का क्लर्क, दो बीघा ज़मीन का किसान, औलाद का घरेलू नौकर, काबुलीवाला का पठान, वक्त का शरणार्थी, एक फूल दो माली का उद्योगपति और गर्म हवा का मुस्लिम व्यापारी। वे हर भूमिका में स्वयं को पूरी तरह उस चरित्र में ढाल देते थे।
अपनी पुस्तक "मेरी फ़िल्मी आत्मकथा" में उन्होंने लिखा है—
"मार्क्सवाद ने मुझे भाषा की समस्या को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने की शिक्षा दी है। टैगोर और गांधी जैसी विभूतियों के विचारों से प्रभावित होकर मेरे विचार इस दिशा में मुड़ने लगे थे कि प्रत्येक कलाकार और लेखक के लिए उसकी मातृभाषा आत्माभिव्यक्ति का सबसे सक्षम माध्यम है। मार्क्सवाद के अध्ययन ने मेरे इस विश्वास को और भी पक्का कर दिया।"
आगे वे लिखते हैं—
"हमारा देश अनेक जातियों और तरह-तरह के लोगों का साझा परिवार है। उनमें से प्रत्येक को समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए। जो लोग बिना सोचे-समझे 'एक देश–एक भाषा' का नारा देते हैं, उन्हें पाकिस्तान के अनुभव से सीख लेनी चाहिए। यह एकता का मार्ग नहीं, बल्कि गिरावट और पिछड़ेपन की ओर ले जाने वाला मार्ग है।"
बलराज साहनी अनुशासन और प्रतिबद्धता की अद्भुत मिसाल थे। वे प्रत्येक पत्र का उत्तर स्वयं और बिना विलंब दिए करते थे। यात्राओं के दौरान भी उनका अधिकांश समय गंभीर पुस्तकों के अध्ययन में बीतता था। भीष्म साहनी ने लिखा है कि एक बार उन्होंने मुंबई की लोकल ट्रेन में बलराज साहनी को फ़्रेडरिक एंगेल्स की प्रसिद्ध पुस्तक "एंटी-ड्यूरिंग (Anti-Dühring)" बड़े ध्यान से पढ़ते हुए देखा।
उनकी सार्वजनिक प्रतिबद्धता और जनपक्षधरता को देखते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत करने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। लगभग दो महीने बाद उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि यह निर्णय उनकी भूल थी, क्योंकि राज्यसभा की सदस्यता उन्हें पूरे देश की यात्रा करने और भारत की वास्तविक परिस्थितियों को निकट से समझने का अवसर दे सकती थी।
एक दिन एक पुलिस अधिकारी, अपने साथ सिपाहियो की एक टुकडी को लिए हमारे घर पर पहुंच गया। वह अपने साथ हमारे घर की तलाशी लेने का का हुक्मनामा लेकर आया था। पिता जी तो भौचक्के रह गये और बेहद घबरा गये । पूरे तीन दिन तक हमारे घर की तलाशी ली जाती रही, पर बलराज के विरुद्ध कोई आपत्ति जनक सूत्र नहीं मिला। अंत मे तलाशी खत्म हुई और बलराज के खिलाफ जारी किये गये गिरफ्तारी के वारंट वापिस ले लिये गये । यह सारा हंगामा बलराज की एक बचकाना हरकत के कारण हुआ। उन्होने मेरठ में हमारी फुफेरी बहिन उर्मिला शास्त्री को-जो स्थानीय कांग्रेस की एक जानी-मानी नेता थी- एक पत्र लिखा कि शीघ्र ही घर में दो बम पहुंच जायेंगे, क्योंकि हमने उनके लिए आर्डर भेज रखा हैं। चिट्ठी रास्ते में पकड़ ली गयी थी, और पुलिस उन दो बमों को खोज निकालने के लिए हमारे घर पहुंच गयी थी। पंजाबी मे अग्रेजी के शब्द Bomb' को 'बम' के रूप में लिखा जाता है, और इस शब्द के दो अर्थ होते है। एक तो विस्फोटक बम, परं दूसरा, बांस के उस लवे छड़ को भी पंजाबी में बम कहते हैं, जो तांगे मे लगाया जाता है-जिन बास की दो घड़ों के बीच घोड़े को जोता जाता है, उन्हें भी 'बम' कहते है। बलराज का मतलब बांस के बमो से था। घर पर उन दिनों तांगा हुआ करता था, और पिता 'जी ने उसके लिए दो नये 'बम' 'खरीदने का फैसला किया था, यह मजाक घर वालों को बड़ा महंगा पड़ा, क्योकि कुछ दिन तक इस बात का सचमुच खतरा बना हुआ था कि बलराज को गिरफ्तार करके जेलखाने में डाल देंगे ।
इन सभी प्रसंगों का उल्लेख भीष्म साहनी द्वारा लिखित पुस्तक "मेरे भाई बलराज" में मिलता है, जहाँ उन्होंने अपने बड़े भाई के व्यक्तित्व, संघर्ष, सादगी, वैचारिक विकास और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत आत्मीय और प्रामाणिक चित्र प्रस्तुत किया।