Tantra Sadhna

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यथार्थ ज्ञान का प्रस्फुटन और प्रसारण तन्त्र है .. 🌾

27/04/2025

ॐ तत्सत् 🌷

मानिनी मनोनुकूलन प्रयोग ❤️

सज्जन बंधुओं ! वर्तमान सामाजिक परिवेश में किसी की पत्नी या जीवन साथी का किसी अन्य के प्रति आकर्षित हो जाना बड़ी बात नही रहा। अधिसंख्यक मामलों में पुरुष असहाय होकर कुंठित होते रहते हैं।
इस कलिकाल में सज्जनों के लिए समस्या कुछ ज्यादा ही प्रभावित करती है। ऐसे लोग मुल्लों फकीरों ढोंगी अघोरियों आदि के द्वारा भी शोषित होते रहते हैं। ऐसे ही आस्थावान किन्तु अज्ञानी बन्धुओं के लिए ये अथर्व वेदीय सूक्त प्रस्तुत किया जा रहा है।

☝️ ध्यान रखें दैवी शक्तियों का आवाहन मात्र स्वार्थ सिद्धि या अन्य किसी भी प्रकार से दुरुपयोग होने पर होने वाले हानि के कर्ता स्वयं जिम्मेदार होंगे। यह मन्त्र विधान वैदिक विधि निष्ठ जनों हेतु हैं। सशंकित मन वाले अल्पज्ञ केवल पाठ कर सकते हैं।

🌷कामदेव और कामेश्वरी का पूजन अवश्य करें। मन्त्र आवाहन समय अभिलषित मानिनी का सम्मुख भाव से संवाद करें।

💘 उत्तुदस्त्वात् तुदतु मा धृथाः शयने स्वे।
इषु: कामस्य या भीमा तया विध्यामि त्वा हृदि।।

अर्थात् -- उत्कृष्ट रूप से व्यथित करने वाले उत्तुद नाम वाले देवता तुमको कामार्त करें। काम कण्टक से विदीर्ण मदन विकारों से व्यथित हुई तुम पलँग पर शयन मे तुम आदर मत कर ! काम का भय देने वाला जो बाण है, उससे मैं तेरे हृदय को ताड़ित करता हूँ।

🔥 आधीपर्णाम् कामशल्यामिषुम् संकल्पकुल्मलाम्।
तां सुसंनतां कृत्वा कामो विध्यतु त्वा हृदि ।।

अर्थात् -- मानसी पीड़ाएं जिसके पर्ण हैं और रमण करने की इच्छा ही जिसका मर्मभेदक शल्य है। यह मेरा हो जाए यह मेरा हो जाए, ऐसा भोगविषयक संकल्प ही जिसका काठ और शल्य को मिलाने वाला मसाला रूप है, उस बाण को धनुष पर भली प्रकार खेंच कर कामदेव उस बाण से, हे कामिनी ! तेरे हृदय को बींधे।

💘 या प्लीहानं शोषयति कामस्येषु: सुसंनता।
प्राचीन पक्षा ब्यो.षा तया विध्यामि त्वा हृदि।।

अर्थात् -- कामदेव का विधिवत खेंचा हुआ सरलगामी वाण हृदय में प्रवेश करके प्राण को आश्रय देने वाले प्लीहा नामक मांसखण्ड को शुष्क करे। सरल फर वाले अनेक प्रकार से विरहाग्नि भड़काने वाले वाण से हे कामिनी ! मैं तेरे हृदय को बींधता हूँ ।

🔥 शुचा विद्धा व्यो.षया शुष्कास्याभि सर्प मा।
मृदुर्निमन्यु: केवली प्रियवादिन्यनुव्रता ।।

हे स्त्री ! दाह देने वाले शोकात्मक वाण से ताड़ित होने पर तेरा कण्ठ सूख जाय और उपताप के कारण तू अपने अभिप्राय को प्रकाशित करने में असमर्थ होकर मेरे पास आ। और आकर प्रणय के कलह को छोड़ मृदुभाषिणी और केवल मेरी शरण लेती हुई अनुकूल भाषण करने वाली बन कर मेरे अनुकूल कार्य करने वाली हो।

🌵आजामि त्वाजन्या परि मातुरथो पितुः ।
यथा मम क्रतावसो मम चित्तमुपायसि।।

हे कामिनी ! अभिमुख प्रेरण करने वाली कशा से ताड़न करके मैं तुझे अभिमुख प्रेरित करता हूँ। माता के समीप से भी और पिता के समीप तक से मैं तुझे अपने अभिमुख करता हूँ। तू जिस प्रकार मेरे संकल्प या कर्म के और मेरी बुद्धि के अनुकूल होकर आवे उसी प्रकार मैं तुझे कशा से ताड़ित कर अभिमुख करता हूँ।

🔥 व्य.स्ये मित्रा वरुणौ हृदश्चित्तान्यस्यतम्।
अथैनामक्रतुं कृत्वा ममैव कृणुतं वशे ।।

हे मित्र और वरुण देवताओं ! इस स्त्री के हृदय से ज्ञानों को दूर करो तदनन्तर इस स्त्री को कार्य और अकार्य के विभाग के ज्ञान से शून्य करके मेरे वश में करिये।

🌷🔥💘🌺❤️🏵️
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धर्मो रक्षति रक्षितः 🔥

03/02/2025

ॐ तत्सत्
आज वसंत पंचमी तिथि का दिन है। आज दीक्षा कर्म का विशेष मुहूर्त है।
दीक्षा कर्म मे सद्गुरु द्वारा समर्पित भाव वाले जिज्ञासु के शिष्यत्व को स्वीकारा जाता है। तदुपरांत शिष्य को ज्ञान प्राप्ति की पात्रता निर्धारित होती है।
सद्गुरु बिना दीक्षा नहीं।
दीक्षा बिना ज्ञान नहीं और ज्ञान बिना मुक्ति नहीं।
व्रतेन दीक्षां आप्नोति... व्रत से दीक्षा प्राप्त होती है...
ज्ञान की देवी 'भगवत्कृपा' हमसबका कल्याण करें.. ॐ।

आज के सद्गुरु सानिध्य मे जो मार्गदर्शन मिला है उसके अनुसार अब सत्यानंद का गुरु वाला रोल को सार्वजनिक रूप मे सक्रिय करने का समय आ गया है। आज के विशेष मुहूर्त से गुरु शिष्य संबंध को सार्वजनिक रूप मे बनाने बढ़ाने का निर्देश हुआ।
अब मै शिष्य स्वीकार करने और ज्ञानदान के लिए सक्रिय रूप मे प्रस्तुत हूँ और सार्वजनिक घोषणा करता हूँ। सद्भावी शरणागत जिज्ञासु को शिष्य स्वीकार करते हुए शिष्य को जीव ईश्वर परमेश्वर के ज्ञान से जोड़ना और आत्मकल्याण को सिद्ध कराना मेरा कर्तव्य हुआ। 'आत्मतत्त्वम्' ज्ञान की जिम्मेदारी मेरी। शिष्य के कर्तव्य पालन की जिम्मेदारी शिष्य की।
शिष्य को ही ज्ञान प्राप्ति का अधिकार है, सद्भावी जिज्ञासु के शंका समाधान का निर्देश है। अतः अब शिष्य बनाना सुरु कर रहा हूँ। जिनको भी ज्ञान चाहिए आत्म कल्याण चाहिए तो शिष्यत्व स्वीकार करें। यदि मात्र शंका समाधान चाहते हैं तो सद्भावी जिज्ञासु रह कर भी जिज्ञासा शांत कर सकते है।
सब भगवत्कृपा 🪷

02/02/2025

ॐ तत्सत्
शारदा आराधना... 🪷(वसंत पंचमी विशेषांक )

अकचटतपयाद्यै: सप्तभिर्वर्णवर्गैर्विरचित मुखबाहापाद मध्याख्यहृत्का।
सकलजगद्धीशा शाश्वता विश्वयोनिर्वितरतु परिशुद्धिं चेतसः शारदा वः।।।

अ, क, च, ट, त, प और य - इन सात वर्गों वाली मातृकाओं से जिसके मुख, बाहु, पाद, मध्य भाग, हृदय और मस्तक की रचना हुई, समस्त जगत् की अधीश्वरी और समस्त विश्व को जन्म देने वाली वह शाश्वती शारदा हम सब की चेतना को विशुद्ध बनाये ।
५१ वर्णमयी पराशक्ति को शारदा कहने का कारण --
' शीर्यते इति शारं स्थूलादिलक्षणं
कर्मफलं तद्ददातीति शारदा,
तत्कारणं च ब्रह्मविद्याधिरूढा
सतीद्यति खण्डयतीति च शारदा इति ' ।
'वह शार अर्थात विनाशशील स्थूल कर्मों का फल देती है तथा ब्रह्मविद्या के रूप में उन कर्मों और कर्मफल को खण्डित भी करती है, इसलिए इसे 'शारदा' कहते हैं '।

संसार को प्रकाशित करने वाली शब्दज्योति मातृका सरस्वती परा, पश्यन्ति, मध्यमा और बैखरी के रूप में अभिव्यक्त होती हुई अर्थ का प्रकाशन करती है । मातृका को 'अक्षर' भी कहा जाता है । समस्त संसार ‘अक्ष’ से वाच्य है, अर्थात् संसार का निर्वचन अ से लेकर क्ष पर्यन्त मातृकाओं द्वारा ही संभव है ।
'अक्षर' शब्द का अंतिम वर्ण 'र' अग्नि बीज है । इसका स्वभाव प्रकाशित करना और प्रकाशित होना है । अ-क्ष मय संसार पराशक्ति के 'र'कार रूप तेजस् से प्रकाशित होता है । यह 'अक्ष' और उसे प्रकाशित करने वाला 'र' भगवती का अपना ही स्वरुप है, क्योंकि, जो कुछ भी प्रकाश्य एवं प्रकाश है, वह स्वयं 'परा' ही है ।

अक्षरात्मिका पराशक्ति को सरस्वती भी कहते हैं, क्योंकि वो रसस्वती, रस स्रवित करने वाली, विश्व-वृक्ष को जीवन रस देने वाली रसात्मिका शक्ति है। इसी का नाम शारदा भी है, क्योंकि वह 'शार+दा' है ।

भोग-मोक्ष प्रदायनी शारदा का स्थूल शरीर अवर्ग आदि सात वर्गों में विभक्त ५१ मातृकाओं से निर्मित है । अवर्ग की अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, दीर्घ ऋ, लृ, दीर्घ लृ, ए, ऐ, ओ, औ, अं और अः'- ये १६ मातृकाएँ भगवती के मुख मण्डल के क्रमशः ब्रह्मरंध्र, मुखवृन्त, दक्षिण नेत्र, वाम नेत्र, दक्षिण कर्ण, वाम कर्ण, दक्षिण नासापुट, वाम नासापुट, दक्षिण कपोल, वाम कपोल, उर्ध्व ओष्ठ,अधः ओष्ठ, उर्ध्वदन्तपंक्ति, अधः दन्तपंक्ति, तालु और जिह्वा-- ये सोलह अंग हैं ।
कवर्ग की क्रमशः क, ख, ग, घ, ङ, ये पांच मातृकाएँ क्रमश: उनकी दक्षिण बाहु के बाहु मूल, कूर्पर, मणिबन्ध, अंगुलीमूल और अंगुल्यग्र है। चवर्ग की क्रमशः च, छ, ज, झ और ञ, ये पांच मातृकाएँ भगवती के वाम बाहु के क्रमशः बाहुमूल, कूर्पर, मणिबन्ध, अंगुलीमूल और अंगुल्यग्र भाग हैं ।
ट वर्ग की क्रमशः ट, ठ, ड, ढ और ण, इन पाँचों मातृकाओं से भगवती पराम्बा के दक्षिण पाद की जंघा, जानु(घुटना), गुल्फ (टखना), अंगुलीमूल तथा अंगुल्यग्र का निर्माण हुआ है । इसीप्रकार तवर्ग की क्रमशः त, थ, द, ध और न, इन पांच मातृकाओं से क्रमशः वामपाद के उक्त उक्त अंगों का निर्माण हुआ है । क्रमशः प वर्ग के प, फ, ब, भ और म, ये पांच मातृकाएँ भगवती के दक्षिण कुक्षि, वाम कुक्षि, पृष्ठ, नाभि तथा जठर नामक पांच मध्य अंग हैं। यवर्ग के क्रमशः य, र, ल, व, श, ष, स, ह, ळ तथा क्ष, ये दश मातृकाएँ भगवती के ह्रदय प्रदेश के क्रमशः ह्रदय, दक्षिण स्कंध, ककुद (गर्दन), वाम स्कन्ध, ह्रदय से दक्षिणकर पर्यन्त भाग, ह्रदय से वामकर पर्यन्त भाग, हृदयादि दक्षिण पाद पर्यंतभाग, हृदयादि वामपाद पर्यन्त भाग, नाभि से ह्रदय पर्यन्त भाग और हृदयादि भ्रूमध्य पर्यन्त भाग हैं ।

वर्णेश्वरीं पराशक्ति की आराधना करते समय साधक शारदा के अंग रूप उक्त इक्यावन वर्णों को अपने शरीर के उक्त सिर आदि अंगों में न्यास करके अपने शरीर को पराशक्ति का अधिष्ठान बनाता है । वर्णेश्वरीं सरस्वती की साधना वर्णों या मातृकाओं के पूजन, जप एवं हवनादि द्वारा की जाती है। वर्णतनु मातृका सरस्वती की व्यष्टि रूप से प्रत्येक तथा समष्टि रूप से सभी ५१ मातृकाएँ मंत्रमय हैं ।
.. वुद्धिप्रदां शारदाम् 🙏🪷

12/01/2025

The ta**ra in which English liquor is used is not a divine ritual but a ghostly act. The ta***ic who does this also becomes a ghost or vampire. Even if it is organized in a Shakti Peeth.

12/01/2025

जिस तन्त्र मे अंग्रेजी शराब प्रयुक्त होती है वो दैवी अनुष्ठान नहीं प्रेतिक कर्म ही रहता है। ऐसा तांत्रिक प्रेत पिशाच ही होने वाला है। चाहे वह शक्ति पीठ मे ही क्यों न आयोजित किया जाए।

12/01/2025

ॐ तत्सत्

#नवनाथ .. एक परिचय

महादेव शिव कहते हैं .. हे देवि!
अब मैं अपने समान स्वरुप वाले अविनाशी उन नव नाथों का वर्णन करता हूँ जो विद्यावतारों की सीढ़ियाँ हैं अतः वे पूज्य है।
ये नव नाथ मेरे ही प्रकाश, विमर्श और आनन्द के अतिरिक्त और भी रूपों में विद्यमान हैं। ये दिव्य रूप हैं। इन्हें #दिव्यौघ कहते हैं।
इनके नाम हैं -- १. प्रकाशानन्द, २. विमर्शानन्द और ३. आनन्दानन्द ।

इन तीनों से तीन #सिद्धौघों की उत्पत्ति हुई।
१. श्रीज्ञानानन्द, २. श्रीसत्यानन्द, ३. श्रीपूर्णानन्द ।
तीनों दिव्यौघ मेरे निकट रहते हैं । सिद्धौघ मेरे निकट और भूमि पर विचरण करते हैं । उनसे उत्पन्न तीन मानवौघ पृथ्वी पर ही रहते हैं।
ये तीन #मानवौघ है - स्वभावानन्द, प्रतिभानन्द और सुभगानन्द ।
ये तीनों मानवौघ पृथ्वी पर विचरण करते हुए भी मेरे स्वरुप हैं।
इन नवों के साथ 'नाथ' शब्द लगाने से इन्हें १. प्रकाशानन्द नाथ, २. विमर्शानन्द नाथ, ३. आनन्दानन्द नाथ,
४. श्रीज्ञानानन्द नाथ, ५. श्रीसत्यानन्द नाथ, ६. श्रीपूर्णानन्द नाथ, ७. स्वभावानन्द नाथ, ८. प्रतिभानन्द नाथ, ९. सुभगानन्द नाथ कहते हैं।
इन्ही नवनाथों के द्वारा संसार में श्री विद्या के कादि मत सहित अन्य मतों का निर्माण और प्रचार सतयुग में होता है जो अन्य युगों में भी विद्यमान रहता है।
ये सभी दो नयन एवं दो भुजा वाले श्रीविद्या के साथ उन्ही के रूप में रहते हैं। सदा प्रसन्नमुख मुस्कान वाले, एक हाथ मे वर मुद्रा और दूसरे में अभय मुद्रा युक्त रहते हैं।
इन सबकी अपने अपने मंडलों में पूजा होती है । किन्तु श्रीविद्या ललिता की आज्ञा से इनकी पूजा देवीरूपा मान कर श्रीचक्र या श्रीयन्त्र में ही होती है।
नवनाथों के हमारे शरीर में प्रतिष्ठित होने वाले अंग हैं -
दिव्यौघ हेतु दो कान और एक मुख, सिद्धौघ के लिए दो आँख और एक लिङ्ग एवं मानवौघ के लिए दो नासाछिद्र और एक मलद्वार।
शरीर के ये नौ अंग नव नाथों का प्रतिनिधित्व करते हैं । ये नौ गुरु या नाथ जाग्रतावस्था में उपदेश देते रहते हैं।
Guru Satyanand

08/01/2025
12/12/2024

तांत्रिक अनुष्ठान के नाम पर बाजार लगाने वालों से बचिए . तन्त्र विद्या गोपनीय क्रिया है और गोपनीयता में ही सिद्ध होती है . अपात्र के लिए घातक हो जाती है ।

06/10/2024

ॐ तत्सत् 💞

#उपासना.. 🪷

इष्ट को सदैव अपने समीप समझना, उनके साहचर्य का अनवरत अनुभव करते हुए आनंदित रहना, इष्ट के भाव प्रभाव युक्त होकर निरन्तर भावित प्रभावित रहना 'उपासना' है ।
‘उप’ सामीप्यता का द्योतक है। इष्ट का सामीप्य पाने के लिए ये चार अंग क्रमशः सहायक होते हैं।

उपासना के चार अंग होते हैं – अर्चना, स्तुति, जप और ध्यान।
सबसे पहला अंग है अर्चना। अर्चना शारीरिक क्रिया से सम्बंधित है। इष्ट की साकार मूर्ति बनाकर उसका उपचार अनुसार पूजन 'अर्चना' कहलाता है।
अर्चना के अंतर्गत आवाहन, आसन, अर्ध्य, पाद्य, अर्घ्य, पत्र, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, आरती आदि सोलह क्रियाएं हैं। जिन्हें ‘षोडशोपचार’ कहते हैं।

उपासना का द्वितीय अंग है- स्तुति। स्तुति में इष्ट के दिव्य विभूतियों का गुणगान किया जाता है। स्तोत्र, सूक्त, भजन, कीर्तन, पाठ, परायण आदि सभी स्तुति में आते हैं।
कालिदास कहते हैं - #स्तोत्रम्_कस्य_न_तुष्टये.. स्तुति किसे नही तुष्ट करती है, अर्थात् स्तुति सबको तुष्ट करती है।
अर्चना की अपेक्षा स्तुति श्रेष्ठ है। अर्चना कायिक उपासना है जबकि स्तुति वाचिक उपासना है। स्तुति वाणी के माध्यम से सम्पन्न की जाती है।

उपासना का तीसरा क्रम ‘जप’ है जो मानस पटल पर क्रियान्वित किया जाता है। किसी भाव, कामना संकल्प सिद्धि हेतु बीजाक्षर, मन्त्र, ऋचा, श्लोक, स्तोत्र, सूक्त आदि का , एक निश्चित आवृत्ति में अनवरत स्मरण जप कहलाता है। जप वाचिक भी होता है और मानसिक भी। मानसिक जप अधिक प्रभावी होता है क्योंकि मानसिक जप का मन के तल से अधिक गहरा सम्बन्ध बनता है। वाचिक जाप लोक लुभावन हो सकते हैं किंतु जबतक वो मानसिक तल को क्रियाशील न कर सके तो प्रभावहीन ही रहते हैं। अतः जप को मानसिक स्तर पर किया जाना चाहिए। उत्तम जप सम्पादन के लिए मन का अनुशासित होना आवश्यक है। चंचल मन वाले के लिए जप करना अत्यंत कठिन है।

उपासना का चौथा स्तर ध्यान है - ध्यान का सम्बन्ध बुद्धि से है। मन जैसे जैसे संयमित और एकाग्र होता जाता है ध्यान उतना ही परिपक्व होता जाता है। मन की एकाग्र अवस्था बुद्धि की श्रेष्ठता को दर्शाती है। #मनसस्तु_परा_बुद्धि:’ .. बुद्धि मन से श्रेष्ठ है ।
जिन्होंने आध्यात्मिक साधना के अभ्यास से मन को अनुशासित कर रखा है जप और ध्यान में वो अधिकारी हैं किंतु जिन साधक का अभी मन पर संयम नही हो पा रहा उनको अर्चना, स्तुति आदि में ही अधिक सक्रिय रहना चाहिए।
अर्चना स्तुति के द्वारा भी मन अनुशासित होता जाता है। नाना पुराण निगम आगम में स्तुति की प्रचुरता है। स्तुति का महत्व जगत विदित है । प्रयास यह होना चाहिए कि स्तुति का भाव भी हृदयंगम रहे तो सिद्धि शीघ्रातिशीघ्र फलित होती है।
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सब भगवत्कृपा 🌾

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