16/07/2026
अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम करने वाला है।
आज हम एक ऐसे विषय पर बात करने जा रहे हैं जो बेहद संवेदनशील है, लेकिन आज के दौर में इस पर खुलकर बात करना वक्त की सबसे बड़ी ज़रूरत बन चुका है। इन्तेहाई माअज़रत (माफ़ी) के साथ, लेकिन आज हमें खुद से और अपने समाज से एक कड़वा सवाल पूछना होगा—क्या सिर्फ आलीशान मस्जिदें तामीर करने से या दरगाहों को बेहतरीन रोशनी और फूलों से सजा देने से हमारी बख्शीश हो जाएगी?
क्या सिर्फ ईंट-पत्थरों की इमारतों को खूबसूरत बना देने से हमारी आख़िरत सुधर जाएगी? इसका सीधा और साफ़ जवाब है—हरगिज़ नहीं! आज का कड़वा सच यह है कि हमने इमारतों को तो आलीशान बना दिया, लेकिन अपनी रूह और सुन्नतों को वीरान कर दिया है।
मस्जिद बनाने का असल मक़सद क्या है? (The Real Purpose of a Mosque)
आज हमारे समाज में एक अजीब सा कॉम्पिटिशन (प्रतियोगिता) शुरू हो गया है। लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके बड़ी-बड़ी मस्जिदें बनाई जा रही हैं, संग-ए-मरमर (मार्बल) लगाए जा रहे हैं, और महंगे झूमर लटकाए जा रहे हैं। यकीनन, अल्लाह के घर को खूबसूरत बनाना सवाब का काम है, लेकिन इसका असल मक़सद क्या था?
मस्जिद बनाने का मक़सद सिर्फ उसकी इमारत खड़ी करना नहीं, बल्कि उसे आबाद करना है।
मस्जिद की असली आबादी पत्थरों या सजावट से नहीं, बल्कि नमाजियों के सजदों से होती है।
अफ़सोस की बात यह है कि जब फज्र की अज़ान होती है, तो वही करोड़ों की लागत से बनी आलीशान मस्जिद नमाजियों के लिए तरसती है। सफें खाली पड़ी रहती हैं। अगर हम मस्जिद को नमाज़, ज़िक्र और इबादत से आबाद नहीं कर पा रहे हैं, तो सिर्फ उसकी बाहरी सजावट हमारी बख्शीश का ज़रिया नहीं बन सकती।
दरगाहों की आबादी: दिखावा या रूहानियत? (The Essence of Dargahs)
ठीक यही हाल आज हमारी दरगाहों का भी हो चुका है। हमने दरगाहों को लाइटों से जगमगा दिया है, वहां उर्स के बड़े-बड़े आयोजन होते हैं, और महंगी चादरें चढ़ाई जाती हैं। लेकिन क्या हमने कभी ठंडे दिमाग से सोचा कि जिन अल्लाह के वलियों (बुजुर्गों) के आस्ताने पर हम जाते हैं, उनकी ज़िंदगी का पैग़ाम क्या था?
उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अल्लाह की इबादत, शरीअत और सुन्नत के सांचे में ढाल दी थी। अगर कोई दरगाह बनाई गई है या आप वहां हाज़िरी देते हैं, तो उसकी असली आबादी का तरीका यह है:
* फ़ातिहा ख्वानी: वहां सुबह-शाम अदब और पाकीज़गी के साथ फ़ातिहा ख्वानी की जाए।
* वसीले से दुआ: उन अल्लाह के नेक बंदों के वसीले और सदके से अल्लाह की बारगाह में रो-रोकर अपने गुनाहों की माफ़ी मांगी जाए (क्योंकि मांगना सिर्फ अल्लाह से ही है, वली सिर्फ ज़रिया होते हैं)।
* उनकी तालीमात पर अमल: उन्होंने जो सादगी, भाईचारा और नमाज़ की पाबंदी सिखाई, उसे अपनी ज़िंदगी में लागू किया जाए।
सिर्फ दरगाह की इमारत को सजा देना और खुद नमाज़ों और नेक अमलों से दूर रहना, सरासर नादानी है।
मुआशरे (समाज) की सबसे बड़ी भूल: दिखावा बनाम अमल
हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हमेशा सादगी को पसंद फ़रमाया है। इस्लाम दिल की पाकीज़गी और अमलों की सचाई पर ज़ोर देता है। अल्लाह तआला कुरान और हदीस के मुताबिक हमारी नीयतें और हमारे अमल देखता है, हमारी बनाई हुई आलीशान इमारतें या हमारा बैंक बैलेंस नहीं।
आज हम नाम कमाने के लिए या समाज में अपनी धाक जमाने के लिए धार्मिक कामों में पैसा तो पानी की तरह बहा देते हैं, लेकिन जब बात अपने अख़्लाक़ (व्यवहार) को सुधारने, गरीबों की मदद करने या पांच वक्त की नमाज़ कायम करने की आती है, तो हम पीछे हट जाते हैं। अगर दिल में तक़्वा (अल्लाह का खौफ) और आख़िरत की फिक्र नहीं है, तो दुनिया की सबसे खूबसूरत मस्जिद बनाने के बाद भी इंसान महरूम रह सकता है।
वक्त आ चुका है कि हम इस ज़ाहिरी (बाहरी) दिखावे और कॉम्पिटिशन के जाल से बाहर निकलें। सब कुछ करें, मस्जिदें भी बनाएं और दरगाहों का अदब भी करें, लेकिन उनकी आबादी की शर्त के साथ।
आइए आज हम सब मिलकर यह पक्की नीयत (इरादा) करें:
1. अगर हमारे मोहल्ले में मस्जिद है, तो हम पांचों वक्त वहां हाज़िर होकर उसे नमाजियों से आबाद करेंगे।
2. अगर हम अल्लाह के वलियों से मोहब्बत करते हैं, तो उनकी दी हुई हिदायत और सुन्नतों को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपनाएंगे।
3. दिखावे की सजावट से ज़्यादा ध्यान हम अपने दिल और अपने किरदार (Character) को साफ़ करने में लगाएंगे।
बख्शीश सिर्फ और सिर्फ सच्चे अमल, सच्ची तौबा और अल्लाह रब्बुल आलमीन की रहमत से ही मुमकिन है। अल्लाह हम सबको कहने-सुनने से ज़्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाए। आमीन।
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