New Raza Islamic Mission

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अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम करने वाला है।आज हम एक ऐसे विषय पर बात करने जा रहे हैं जो बेहद संवेदनशील ...
16/07/2026

अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम करने वाला है।
आज हम एक ऐसे विषय पर बात करने जा रहे हैं जो बेहद संवेदनशील है, लेकिन आज के दौर में इस पर खुलकर बात करना वक्त की सबसे बड़ी ज़रूरत बन चुका है। इन्तेहाई माअज़रत (माफ़ी) के साथ, लेकिन आज हमें खुद से और अपने समाज से एक कड़वा सवाल पूछना होगा—क्या सिर्फ आलीशान मस्जिदें तामीर करने से या दरगाहों को बेहतरीन रोशनी और फूलों से सजा देने से हमारी बख्शीश हो जाएगी?
क्या सिर्फ ईंट-पत्थरों की इमारतों को खूबसूरत बना देने से हमारी आख़िरत सुधर जाएगी? इसका सीधा और साफ़ जवाब है—हरगिज़ नहीं! आज का कड़वा सच यह है कि हमने इमारतों को तो आलीशान बना दिया, लेकिन अपनी रूह और सुन्नतों को वीरान कर दिया है।

मस्जिद बनाने का असल मक़सद क्या है? (The Real Purpose of a Mosque)
आज हमारे समाज में एक अजीब सा कॉम्पिटिशन (प्रतियोगिता) शुरू हो गया है। लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके बड़ी-बड़ी मस्जिदें बनाई जा रही हैं, संग-ए-मरमर (मार्बल) लगाए जा रहे हैं, और महंगे झूमर लटकाए जा रहे हैं। यकीनन, अल्लाह के घर को खूबसूरत बनाना सवाब का काम है, लेकिन इसका असल मक़सद क्या था?
मस्जिद बनाने का मक़सद सिर्फ उसकी इमारत खड़ी करना नहीं, बल्कि उसे आबाद करना है।

मस्जिद की असली आबादी पत्थरों या सजावट से नहीं, बल्कि नमाजियों के सजदों से होती है।

अफ़सोस की बात यह है कि जब फज्र की अज़ान होती है, तो वही करोड़ों की लागत से बनी आलीशान मस्जिद नमाजियों के लिए तरसती है। सफें खाली पड़ी रहती हैं। अगर हम मस्जिद को नमाज़, ज़िक्र और इबादत से आबाद नहीं कर पा रहे हैं, तो सिर्फ उसकी बाहरी सजावट हमारी बख्शीश का ज़रिया नहीं बन सकती।

दरगाहों की आबादी: दिखावा या रूहानियत? (The Essence of Dargahs)
ठीक यही हाल आज हमारी दरगाहों का भी हो चुका है। हमने दरगाहों को लाइटों से जगमगा दिया है, वहां उर्स के बड़े-बड़े आयोजन होते हैं, और महंगी चादरें चढ़ाई जाती हैं। लेकिन क्या हमने कभी ठंडे दिमाग से सोचा कि जिन अल्लाह के वलियों (बुजुर्गों) के आस्ताने पर हम जाते हैं, उनकी ज़िंदगी का पैग़ाम क्या था?
उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अल्लाह की इबादत, शरीअत और सुन्नत के सांचे में ढाल दी थी। अगर कोई दरगाह बनाई गई है या आप वहां हाज़िरी देते हैं, तो उसकी असली आबादी का तरीका यह है:

* फ़ातिहा ख्वानी: वहां सुबह-शाम अदब और पाकीज़गी के साथ फ़ातिहा ख्वानी की जाए।
* वसीले से दुआ: उन अल्लाह के नेक बंदों के वसीले और सदके से अल्लाह की बारगाह में रो-रोकर अपने गुनाहों की माफ़ी मांगी जाए (क्योंकि मांगना सिर्फ अल्लाह से ही है, वली सिर्फ ज़रिया होते हैं)।
* उनकी तालीमात पर अमल: उन्होंने जो सादगी, भाईचारा और नमाज़ की पाबंदी सिखाई, उसे अपनी ज़िंदगी में लागू किया जाए।

सिर्फ दरगाह की इमारत को सजा देना और खुद नमाज़ों और नेक अमलों से दूर रहना, सरासर नादानी है।

मुआशरे (समाज) की सबसे बड़ी भूल: दिखावा बनाम अमल
हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हमेशा सादगी को पसंद फ़रमाया है। इस्लाम दिल की पाकीज़गी और अमलों की सचाई पर ज़ोर देता है। अल्लाह तआला कुरान और हदीस के मुताबिक हमारी नीयतें और हमारे अमल देखता है, हमारी बनाई हुई आलीशान इमारतें या हमारा बैंक बैलेंस नहीं।
आज हम नाम कमाने के लिए या समाज में अपनी धाक जमाने के लिए धार्मिक कामों में पैसा तो पानी की तरह बहा देते हैं, लेकिन जब बात अपने अख़्लाक़ (व्यवहार) को सुधारने, गरीबों की मदद करने या पांच वक्त की नमाज़ कायम करने की आती है, तो हम पीछे हट जाते हैं। अगर दिल में तक़्वा (अल्लाह का खौफ) और आख़िरत की फिक्र नहीं है, तो दुनिया की सबसे खूबसूरत मस्जिद बनाने के बाद भी इंसान महरूम रह सकता है।

वक्त आ चुका है कि हम इस ज़ाहिरी (बाहरी) दिखावे और कॉम्पिटिशन के जाल से बाहर निकलें। सब कुछ करें, मस्जिदें भी बनाएं और दरगाहों का अदब भी करें, लेकिन उनकी आबादी की शर्त के साथ।
आइए आज हम सब मिलकर यह पक्की नीयत (इरादा) करें:

1. अगर हमारे मोहल्ले में मस्जिद है, तो हम पांचों वक्त वहां हाज़िर होकर उसे नमाजियों से आबाद करेंगे।
2. अगर हम अल्लाह के वलियों से मोहब्बत करते हैं, तो उनकी दी हुई हिदायत और सुन्नतों को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपनाएंगे।
3. दिखावे की सजावट से ज़्यादा ध्यान हम अपने दिल और अपने किरदार (Character) को साफ़ करने में लगाएंगे।

बख्शीश सिर्फ और सिर्फ सच्चे अमल, सच्ची तौबा और अल्लाह रब्बुल आलमीन की रहमत से ही मुमकिन है। अल्लाह हम सबको कहने-सुनने से ज़्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाए। आमीन।

अज़ीज़ दोस्तों, इस विषय पर आपकी क्या राय है? क्या आपको भी लगता है कि आज हम दिखावे की तरफ ज़्यादा बढ़ रहे हैं? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर शेयर करें और इस नेक पैग़ाम को अपने दोस्तों के साथ साझा (Share) करें।

ज़िना के लिये न उम्र देखी न रंग देखा न शक्ल देखीनिकाह के लिये उम्र देखी रंग देखा शक्ल देखी रुपया देखा, जात देखी खानदानी ...
29/06/2026

ज़िना के लिये न उम्र देखी न रंग देखा न शक्ल देखी

निकाह के लिये उम्र देखी रंग देखा शक्ल देखी रुपया देखा, जात देखी खानदानी पस मंज़र देखा

हराम को आम कर दिया और हलाल को मुश्किल कर दिया, कड़वी हक़ीक़त है ये सुन्नत को आसान बनाओ गुनाह से बचो.!

फ़रमाने उमर फ़ारूक़े आज़म رضي الله عنه

जब तुम्हारी औलाद बालिग़ हो जाए तो उनका निकाह करदो, और उनके गुनाहों का बोझ अपने कंधों पर मत उठाओ, माँ बाप गौर करें.!

📕(مناقب امیر المومنین عمر بن خطاب لابن جوزی ص 199)

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10/04/2026

Celebrating my 10th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉

⚠️ पैर क़ब्र में पहुंच जाने के बा'द शादी ⚠️इमाम दारक़ुत़्नी रह़मतुल्लाहि अ़लैह ने एक वाक़िआ़ नक़ल फ़रमाया है के इ़बाद बि...
04/04/2026

⚠️ पैर क़ब्र में पहुंच जाने के बा'द शादी ⚠️

इमाम दारक़ुत़्नी रह़मतुल्लाहि अ़लैह ने एक वाक़िआ़ नक़ल फ़रमाया है के इ़बाद बिन इ़बादुल महलबी फ़रमाते हैं:

मैंने एक औ़रत को देखा के वो अठारह साल की उ़म्र में नानी बन गई; नौ साल की उ़म्र में, उसने बेटी को जन्म दिया और उसकी बेटी ने भी नौ साल की उ़म्र में, बच्चे को जन्म दिया।

📙 (सुनने दारक़ुत़्नी, जिल्द 3, किताबुन् निकाह़, रक़म 3836; ब ह़वाला ब वक़्ते रुख़्सती उ़म्रे आ़इशा)

ये एक ही ऐसा वाक़िआ़ नहीं है, बल्कि ऐसे और भी कई वाक़िआ़त हैं; इसे पढ़कर आपको ता'ज्जुब हुआ होगा, मगर इसमें ता'ज्जुब की कोई बात नहीं;
ता'ज्जुब तो इस पर होना चाहिए के आज काॅलेज की फ़ित्ना भरी पढ़ाई के नाम पर आधी से ज़ियादा उ़म्र कुंवारेपन में गुज़ारी जा रही है।

हमने Matrimony Site पर ऐसे Profiles भी देखे हैं, जिनके उ़म्र 40 साल से ज़ियादा है;
जब इतनी उ़म्र के लोग कुंवारे होंगे, तो ज़िना आ़म नहीं होगा, तो क्या होगा?
बल्कि अब तो ज़माना इतना नाज़ुक है के 15 साल से कम उ़म्र के लड़कों की भी अलग कहानी है।
अल्लाह (अ़ज़्ज़ व जल्ल) हमें निकाह़ को आ़म करने की तौफ़ीक़ अ़त़ा फ़रमाए।

📖 दीन किससे सीखना चाहिए? — एक अहम नसीहतआज का दौर बड़ा अजीब दौर है…यह वही क़ौम है जो दुनियावी मामलात में बड़ी समझदारी दिख...
23/03/2026

📖 दीन किससे सीखना चाहिए? — एक अहम नसीहत

आज का दौर बड़ा अजीब दौर है…

यह वही क़ौम है जो दुनियावी मामलात में बड़ी समझदारी दिखाती है—
दर्जी से जूते नहीं बनवाती, मोची से कपड़े नहीं सिलवाती, और हज्जाम से जूते की मरम्मत नहीं करवाती…
क्योंकि हर काम के लिए उसके माहिर (Expert) को तलाश करती है।

लेकिन अफ़सोस!
जब बात दीन-ए-इस्लाम जैसी सबसे कीमती नेमत की आती है,
तो वही क़ौम कभी डॉक्टर, कभी इंजीनियर, कभी यूट्यूबर, कभी टिक-टॉकर और यहाँ तक कि बेहयाई फैलाने वाले अदाकारों से भी दीन सीखने लगती है।

📜 क़ुरआन की रहनुमाई

अल्लाह तआला क़ुरआन में इरशाद फ़रमाता है:

"فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ"
(सूरह अन-नहल 16:43)

“अगर तुम नहीं जानते, तो अहले-ज़िक्र (इल्म वालों) से पूछो।”

यह आयत साफ़ बताती है कि दीन का इल्म सिर्फ उन्हीं से लिया जाए जो उसके अहल हैं — यानी उलमा-ए-किराम।

📖 हदीस की रोशनी

हुज़ूर नबी करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:

"إِنَّ الْعُلَمَاءَ وَرَثَةُ الْأَنْبِيَاءِ"
(सुनन अबू दाऊद)

“बेशक उलमा, अंबिया के वारिस हैं।”

एक और हदीस में आता है:

“जिसके साथ अल्लाह भलाई का इरादा करता है, उसे दीन की समझ अता फ़रमा देता है।”
(सहीह बुखारी)

⚠️ असल मसला क्या है?

एक बुज़ुर्ग फ़रमाया करते थे:

👉 “लोगों को यह तो मालूम है कि ख़ालिस दूध कहाँ मिलता है,
लेकिन यह नहीं मालूम कि ख़ालिस दीन कहाँ से मिलता है।”

यही हमारी ज़िल्लत (गिरावट) की असली वजह है।

🌙 हमारी ज़िम्मेदारी

आज के इस फ़ितनों भरे दौर में हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है:

दीन को सिर्फ सहीहुल अकीदा सुन्नी उलमा से सीखना
सोशल मीडिया के हर बोलने वाले को अपना रहबर न बनाना
इल्म और दीन के मामले में तहक़ीक (verification) करना

🤲 दुआ है कि ऐ रब्बुल आलमीन!
इस फ़ितनों के दौर में हमारे ईमान की हिफ़ाज़त फ़रमा,
हमें सहीहुल अकीदा सुन्नी उलमा-ए-किराम से दीन-ए-मतीन सीखने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा,
और हमें गुमराही से महफूज़ रख।
आमीन या रब्बल आलमीन।

आप सभी सुन्नी सहीउल अकीदाह मुस्लिम भाइयों को दिल की गहराइयों से🌙 ईद मुबारक 🌙अल्लाह तआला इस मुबारक दिन के सदके मेंआपकी हर...
21/03/2026

आप सभी सुन्नी सहीउल अकीदाह मुस्लिम भाइयों को दिल की गहराइयों से
🌙 ईद मुबारक 🌙

अल्लाह तआला इस मुबारक दिन के सदके में
आपकी हर दुआ कबूल फरमाए 🤲
आपके घरों को खुशियों, बरकतों और रहमतों से भर दे ✨

रमज़ान में की गई इबादतों को कबूल फरमाए
और हमें हमेशा अपनी राह पर चलने की तौफीक अता करे 🤍

🤲 दुआ है कि ये ईद आपके लिए सुकून, मोहब्बत और कामयाबी का पैग़ाम लेकर आए

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मोबाइल पर वक्त बर्बाद करने के बजाय इल्म हासिल करेंआज के दौर में अक्सर देखा जाता है कि लोग मोबाइल पर घंटों रील्स और फिजूल...
11/03/2026

मोबाइल पर वक्त बर्बाद करने के बजाय इल्म हासिल करें

आज के दौर में अक्सर देखा जाता है कि लोग मोबाइल पर घंटों रील्स और फिजूल वीडियो देखते हुए अपना कीमती वक़्त बर्बाद कर देते हैं। जबकि यही वक़्त अगर दीन का इल्म सीखने, सुन्नी उलमा के बयान सुनने और मसाइल-ए-दीन समझने में लगाया जाए तो यह दुनिया और आख़िरत दोनों के लिए फ़ायदेमंद बन सकता है।

क़ुरआन शरीफ़ में अल्लाह तआला फरमाता है:

“कहो, क्या जानने वाले और न जानने वाले बराबर हो सकते हैं?”
(सूरह अज़-ज़ुमर: 9)

इस आयत से साफ़ मालूम होता है कि इल्म की अहमियत बहुत बड़ी है और अल्लाह के नज़दीक इल्म रखने वालों का दर्जा बुलंद है।

इसी तरह एक और जगह अल्लाह तआला फरमाता है:

“अल्लाह तुममें से ईमान वालों और जिनको इल्म दिया गया है उनके दर्जे बुलंद करेगा।”
(सूरह अल-मुजादिला: 11)

नबी-ए-करीम ﷺ ने भी इल्म हासिल करने की बड़ी फ़ज़ीलत बयान फरमाई है।

हदीस शरीफ़ में है:

“इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है।”
(सुनन इब्न माजह)

एक और हदीस में आता है:

“जो शख्स इल्म की तलाश में रास्ता तय करता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है।”
(सहीह मुस्लिम)

आज अगर हम मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर में दिन के 2–2 घंटे फिजूल चीज़ों में लगा सकते हैं, तो क्या हम 10–15 मिनट दीन का इल्म सीखने के लिए नहीं निकाल सकते?

ख़ास तौर पर माह-ए-रमज़ान तो अल्लाह की बहुत बड़ी नेमत है। यह वह मुबारक महीना है जिसमें नेकियों का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है।

अल्लाह तआला फरमाता है:

“माहे रमज़ान वह महीना है जिसमें क़ुरआन उतारा गया जो लोगों के लिए हिदायत है।”
(सूरह अल-बक़रा: 185)

इसलिए हमें चाहिए कि इस मुबारक महीने में अपने दिन और रात को ज़्यादा से ज़्यादा दीन का इल्म सीखने, क़ुरआन सुनने, उलमा के बयान सुनने और अपने अमल को सुधारने में गुज़ारें।

अगर हम रोज़ थोड़ा-थोड़ा भी मसाइल-ए-दीन, सुन्नतें और इस्लामी तालीमात सीखते रहेंगे, तो धीरे-धीरे हमारी ज़िंदगी भी सुन्नत के मुताबिक बनती चली जाएगी।

अल्लाह तआला से दुआ है कि
अल्लाह करीम हमें सही इल्म हासिल करने, उसे समझने और उस पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए।

आमीन।

07/03/2026

#एअ़तिकाफ़_का_बयान

एअ़तिकाफ़ इस्लाम की एक बेहद अहम और मुबारक इबादत है, खास तौर पर रमज़ान के आख़िरी अशरे में इसकी बहुत ज्यादा फज़ीलत बयान की गई है। इस इबादत में बंदा दुनिया के कामों से अलग होकर मस्जिद में सिर्फ़ अल्लाह की इबादत, ज़िक्र और तिलावत में मशगूल हो जाता है।

क़ुरआन करीम में एअ़तिकाफ़

अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:

"और औरतों से संबंध न रखो जबकि तुम मस्जिदों में एअ़तिकाफ़ से बैठे हो।"

📗 (पारा 2, सूरह बक़रह, आयत 187)

एक और जगह मस्जिदों की अहमियत बयान करते हुए अल्लाह तआला फरमाता है:

और मस्जिदें अल्लाह ही के लिए हैं, तो अल्लाह के साथ किसी और को मत पुकारो।

📗 (सूरह जिन्न, आयत 18)

इन आयतों से मालूम हुआ कि मस्जिद अल्लाह की इबादत का खास मकाम है और एअ़तिकाफ़ उसी इबादत का एक अहम तरीका है।

एअ़तिकाफ़ की हदीसों में फज़ीलत

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

"मोअ़तकिफ़ (एअ़तिकाफ़ करने वाला) गुनाहों से बचा रहता है और उसे तमाम नेकियों का वही सवाब मिलता है जो नेक काम करने वालों को मिलता है।"

📕 (इब्न माजा, हदीस 1781)

एक दूसरी रिवायत में है कि:

मोअ़तकिफ़ ना तो किसी मरीज़ की इयादत को जा सकता है, ना जनाज़े में शामिल हो सकता है, ना किसी औरत को छू सकता है और ना मस्जिद से बाहर निकल सकता है।

📕 (अबू दाऊद, जिल्द 2, सफ़ह 492)

एअ़तिकाफ़ की बड़ी फज़ीलत

हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि
हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फरमाया:

"जिसने रमज़ान में दस दिनों का एअ़तिकाफ़ किया तो उसे दो हज और दो उमरे का सवाब मिलेगा।"

📙 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 146)

और उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं:

" नबी करीम ﷺ रमज़ान के आख़िरी दस दिनों में एअ़तिकाफ़ फरमाते थे, यहाँ तक कि आपका विसाल हो गया।"

📕 (सहीह बुखारी, हदीस 2026)

एअ़तिकाफ़ की परिभाषा

मस्जिद में अल्लाह की रज़ा के लिए ठहरना एअ़तिकाफ़ कहलाता है।

📘 (बहारे शरीअत)

एअ़तिकाफ़ की तीन किस्में

1️⃣ वाजिब एअ़तिकाफ़

अगर किसी ने मन्नत मानी कि मेरा यह काम हो जाएगा तो मैं 1 या 2 या 3 दिन का एअ़तिकाफ़ करूंगा। तो जितने दिन की मन्नत मानी है उतने दिन का एअ़तिकाफ़ उस पर वाजिब हो जाएगा।

2️⃣ सुन्नते मुअक़्किदा एअ़तिकाफ़

रमज़ान के आख़िरी 10 दिनों का एअ़तिकाफ़।

यानि 20 रमज़ान को मगरिब के वक्त नीयत के साथ मस्जिद में दाखिल हो जाना।

यह सुन्नते मुअक्किदा अलल किफाया है।

यानि अगर पूरे शहर से एक आदमी भी एअ़तिकाफ़ में बैठ जाए तो सबकी तरफ से काफी है लेकिन अगर एक भी आदमी नहीं बैठा तो पूरे शहर के लोग गुनाहगार होंगे।

📘 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 147-148)

3️⃣ मुस्तहब एअ़तिकाफ़

जब भी मस्जिद में दाखिल हों तो यह नीयत कर लें:

"नवैतु सुन्नतल एअ़तिकाफ़"

तो जब तक मस्जिद में रहेंगे एअ़तिकाफ़ का सवाब मिलता रहेगा।

📘 (बहारे शरीअत)

औरतों का एअ़तिकाफ़

मर्दों के लिए मस्जिद में एअ़तिकाफ़ करना ज़रूरी है।

लेकिन अगर औरत एअ़तिकाफ़ करना चाहे तो वह घर में जिस जगह नमाज़ पढ़ती है उसी जगह एअ़तिकाफ़ में बैठ सकती है।

📗 (दुर्रे मुख़्तार, जिल्द 2, सफ़ह 129)

अगर घर में नमाज़ की जगह मुक़र्रर नहीं है तो पहले किसी जगह को नमाज़ के लिए खास कर ले, फिर वहीं एअ़तिकाफ़ करे।

📕 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 147)

एअ़तिकाफ़ के लिए रोज़ा

रमज़ान के एअ़तिकाफ़ के लिए रोज़ा रखना शर्त है।

अगर रोज़ा नहीं रखा तो वह नफ्ल एअ़तिकाफ़ होगा, सुन्नत नहीं।

📙 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 148)

मन्नत के एअ़तिकाफ़ में रोज़ा

अगर किसी ने मन्नत मानी कि:

"मैं एक महीने का एअ़तिकाफ़ करूंगा मगर रोज़ा नहीं रखूंगा"

तो फिर भी रोज़ा रखना वाजिब होगा।

📘 (बहारे शरीअत)

औरत की मन्नत और शौहर

अगर औरत ने एअ़तिकाफ़ की मन्नत मानी तो शौहर उसे रोक सकता है।

अगर रोक दिया तो वह तलाक़ के बाद या शौहर की मौत के बाद मन्नत पूरी करेगी।

अगर शौहर ने इजाज़त दे दी तो अब उसे रोक नहीं सकता।

📗 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 149)

एअ़तिकाफ़ टूटने का हुक्म

अगर मोअ़तकिफ़ मस्जिद से बाहर निकल गया तो एअ़तिकाफ़ टूट जाएगा और उसकी कज़ा वाजिब होगी।

📕 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 150)

इसी तरह औरत भी अगर घर से बिना शरई वजह के बाहर निकले तो उसका एअ़तिकाफ़ टूट जाएगा।

📙 (दुर्रे मुख़्तार, जिल्द 2, सफ़ह 132)

मस्जिद से बाहर निकलने के जायज़ उज़्र

मोअ़तकिफ़ दो वजहों से मस्जिद से बाहर जा सकता है।

1️⃣ हाजते शरई

जैसे:

जिस मस्जिद में एअ़तिकाफ़ है वहां जुमा नहीं होता
जुमा पढ़ने बाहर जाना
अज़ान देने के लिए मीनार पर जाना

2️⃣ हाजते तबई

जैसे:

पेशाब
पाखाना
वुज़ू
ग़ुस्ल

अगर मस्जिद में इनका इंतज़ाम नहीं है।

📘 (बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ह 150)

मोअ़तकिफ़ के लिए जरूरी बातें

मोअ़तकिफ़ को चाहिए कि:

फालतू बातों से बचे
ज़िक्र व तिलावत में लगे
नफ्ल नमाज़ ज्यादा पढ़े

हाँ अगर लोगों को दीन की तालीम देने के लिए महफ़िल करता है तो इसकी इजाज़त है।

📗 (दुर्रे मुख़्तार, जिल्द 2, सफ़ह 135)

मस्जिद में खाना पीना

मस्जिद में मोअ़तकिफ़ के अलावा दूसरों के लिए खाना पीना नाजायज़ है।

इसलिए जो लोग मस्जिद में अफ़्तार करते हैं उन्हें चाहिए कि एअ़तिकाफ़ की नीयत करके बैठें,
वरना गुनाहगार होंगे।

📕 (अलमलफूज़, हिस्सा 2, सफ़ह 108)

✅ नतीजा:
एअ़तिकाफ़ एक ऐसी इबादत है जो बंदे को अल्लाह के करीब कर देती है। खास तौर पर रमज़ान के आखिरी दस दिनों में एअ़तिकाफ़ करना सुन्नते मुअक्किदा है, इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि इस मुबारक इबादत की अहमियत को समझे और अपनी जिंदगी में इसे अपनाए।

28/02/2026

🚨 रमज़ान में दीन का मज़ाक़ – क्या हम अल्लाह के ग़ज़ब से बेख़ौफ़ हो गए हैं?

हम ऐसे दौर-ए-जाहिलियत में जी रहे हैं जहाँ दीन का मज़ाक़ दुश्मन नहीं, बल्कि कुछ मुसलमान ख़ुद उड़ा रहे हैं।

बरकतों, रहमतों और मग़फ़िरत के महीने रमज़ान शरीफ़ में भी सोशल मीडिया पर ऐसे मैसेज घूम रहे हैं जो रोज़ा, नमाज़, ए‘तिकाफ़ और दुआ का खुला मज़ाक़ हैं।

ज़रा सोचिए…

“अल चटनी वल समोसा…”
“नियत करता हूँ 100 रकअ़त नमाज़ की…”
“ए‘तिकाफ़ में बैठ जाओ ताकि शॉपिंग से बच जाओ…”
“जो दुआ में याद न करे उसके पकौड़े जल जाएँ…”

क्या यह सब मज़ाक़ है?
या फिर अल्लाह की निशानियों का खुला इस्तिहज़ा (मज़ाक़ उड़ाना)?

📖 क़ुरआन क्या कहता है?

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

“क्या तुम अल्लाह, उसकी आयतों और उसके रसूल का मज़ाक़ उड़ाते थे? बहाने न बनाओ, तुम ईमान लाने के बाद काफ़िर हो चुके।”
(सूरह अत-तौबा 9:65-66)

यह आयत उन लोगों के बारे में उतरी जिन्होंने दीन की बातों को मज़ाक़ बनाया था।
सोचिए! अल्लाह ने इसे कितना संगीन मामला बताया।

एक और जगह इरशाद है:

“जब तुम सुनो कि अल्लाह की आयतों का इंकार किया जा रहा है और उनका मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है, तो उनके साथ न बैठो…”
(सूरह अन-निसा 4:140)

यानि सिर्फ मज़ाक़ बनाना ही नहीं, बल्कि ऐसे मज़ाक़ को सुनना और चुप रहना भी गुनाह है।

Muhammad ﷺ ने फ़रमाया:

“बन्दा कभी-कभी ऐसी बात कह देता है जिससे अल्लाह नाराज़ होता है, और वह उसे हल्की समझता है, मगर उसी की वजह से वह जहन्नम में बहुत दूर तक गिर जाता है।”
(सहीह बुख़ारी)

सोशल मीडिया पर मज़ाक़ में लिखा गया एक जुमला…
Forward किया गया एक मैसेज…
और क़ियामत के दिन वही हमारे लिए तबाही का सबब बन सकता है।

⚠️ रमज़ान – रहमत या ग़ज़ब?

Ramadan सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं।

Muhammad ﷺ ने फ़रमाया:

“जिसने झूठ बोलना और बुरे काम करना न छोड़ा, तो अल्लाह को उसके भूखे-प्यासे रहने की कोई ज़रूरत नहीं।”
(सहीह बुख़ारी)

अगर रोज़ा रखकर हम दीन का मज़ाक़ उड़ाएँ, तो क्या हमारा रोज़ा कबूल होगा?

❗ मज़ाक़ उड़ाने वाले ही नहीं, Forward करने वाले भी गुनाहगार

आज लोग कहते हैं:
“भाई मज़ाक़ है, दिल पर मत लो।”

लेकिन याद रखिए:

बनाने वाला गुनाहगार
शेयर/फॉरवर्ड करने वाला गुनाहगार
पढ़कर खुश होने वाला भी गुनाहगार

अल्लाह के यहाँ पकड़ बहुत सख़्त है।

“और तुम उस बात के पीछे मत पड़ो जिसका तुम्हें इल्म नहीं, यक़ीनन कान, आँख और दिल – सब से पूछ होगी।”
(सूरह बनी इस्राईल 17:36)

🤲 हमें क्या करना चाहिए?

✅ ऐसे मैसेज तुरंत डिलीट करें
✅ ग्रुप में नर्मी से समझाएँ
✅ खुद भी तौबा करें
✅ “अस्तग़फ़िरुल्लाह रब्बी मिन कुल्लि ज़म्बिन व अतूबु इलैह” पढ़ें

याद रखिए…

दीन ए इस्लाम हमें बड़ी नेमत के तौर पर मिला है।
इस पर शर्मिंदा नहीं, बल्कि फ़ख्र होना चाहिए।

💔 आख़िरी नसीहत

क्या फर्क़ रह गया हममें और उन लोगों में जो अल्लाह की आयतों का मज़ाक़ उड़ाते हैं?

आइए तौबा करें।
रमज़ान को इबादत, तिलावत, ज़िक्र और दुआ का महीना बनाएं।

अल्लाह तआला हमें कहने-सुनने से ज़्यादा अमल की तौफ़ीक़ अता फरमाए।

आमीन सुम्मा आमीन 🤲

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