16/08/2026
भारतीय संस्कृति में #नागपंचमी:-
इतिहास, पौराणिक कथाएँ,
क्षेत्रीय परंपराएं,
काशी में अखाड़ा परंपरा और काशी का #नागकूप उत्सव व मेला,
भारतीय सनातन संस्कृति में #नागपंचमी का त्योहार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, जीव संरक्षण, वैदिक ज्ञान, तंत्र शास्त्र, खेल भावना और लोक-जीवन के अद्भुत ताने-बाने को समेटे हुए एक व्यापक सांस्कृतिक पर्व है। यह त्योहार मुख्य रूप से श्रावण (सावन) मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को संपूर्ण भारतवर्ष में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
1. #इतिहास और #पौराणिकपृष्ठभूमि:-
नाग पंचमी की ऐतिहासिक और पौराणिक जड़ें अति प्राचीन हैं, जिनका उल्लेख वेद, पुराण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों में मिलता है।
#जनमेजय का सर्प सत्र यज्ञ:- महाभारत की कथा के अनुसार, राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हुई थी। पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए उनके पुत्र राजा जनमेजय ने 'सर्प सत्र यज्ञ' आयोजित किया। इस आहुति-यज्ञ के प्रभाव से संसार भर के नाग खिंचे चले आए और यज्ञ-कुंड में भस्म होने लगे। सर्प जाति के अस्तित्व को बचाने के लिए आस्तीक मुनि (जो माता मनसा के पुत्र थे) ने अपनी अगाध विद्वत्ता और तप से राजा जनमेजय को प्रसन्न किया और यज्ञ रुकवाया। जिस दिन नागों के प्राणों की रक्षा हुई, उस दिन श्रावण शुक्ल पंचमी थी। यज्ञ की अग्नि से झुलसे नागों के शरीर के ताप को शांत करने के लिए उन पर कच्चा दूध अर्पित किया गया।
#समुद्र मंथन और वासुकी नाग: देवों और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग को मथानी की रस्सी बनाया गया था। मंथन के घर्षण और विष के प्रभाव से वासुकी का शरीर संतप्त हो गया था। नाग पंचमी के दिन ही दूध और शीतल जल से उनका औपचारिक उपचार व पूजन किया गया था।
#कालिया नाग मर्दन: द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने बालक रूप में यमुना नदी को अत्यंत विषैले कालिया नाग के प्रकोप से मुक्त कराया था। श्री कृष्ण द्वारा कालिया को नाथ कर नथुने से अभय दान देने तथा वापस रमणक द्वीप भेजने की घटना भी नाग पंचमी की तिथि से जोड़ी जाती है।
2. #धार्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक #मान्यताएँ:-
नाग पंचमी का पर्व मानव जीवन और प्रकृति के बीच गहरे सहअस्तित्व का संदेश देता है:-
#पर्यावरण और कृषि सुरक्षा: भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ नागों को 'क्षेत्रपाल' या खेतों का रक्षक माना गया है। नाग फसलों को नष्ट करने वाले चूहों और अन्य कीटों का भक्षण कर किसान के मित्र की भूमिका निभाते हैं। यह पर्व कृषि तंत्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है।
#भूमि की खुदाई पर निषेध: नाग पंचमी के दिन खेत जोतना, जमीन खोदना, नींव डालना या साग-सब्जी काटना पूर्णतः वर्जित माना गया है। इसके पीछे सामाजिक वैज्ञानिक दृष्टि यह है कि मानसून के दौरान नाग जमीन की ऊपरी परत के समीप या बिलों में रहते हैं; अतः खुदाई से किसी जीव की हिंसा न हो।
#भय मुक्ति और पारिवारिक सुरक्षा: धार्मिक मान्यता के अनुसार, अष्टनागों (अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंखपाल, कुलिक) की विधि-विधान से पूजा करने पर सर्पदंश का भय समाप्त होता है। इस दिन घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर गोबर, गेरू, मिट्टी या हल्दी से नाग देव की आकृति बनाई जाती है और उन पर दूध, अक्षत, दूर्वा तथा फूल अर्पित किए जाते हैं। द्वार पर “सर्पापसर्प भद्रं ते...” जैसे वैदिक रक्षा मंत्र लिखे जाते हैं ताकि वर्ष भर घर में विषैले जीवों का प्रवेश न हो।
#आयुर्वेदिक महत्व: वर्षा ऋतु में बिलों में पानी भर जाने से सर्प और अन्य जीव बाहर आते हैं। प्राचीन काल में संक्रामक रोगों व विषैले प्रभाव को रोकने के लिए घरों के बाहर नीम के पत्ते लटकाने और हल्दी का छिड़काव करने की वैज्ञानिक परंपरा इस पर्व से जुड़ी है।
3. #विविधता में #एकता: भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उत्सव की विधियाँ
नाग पंचमी को देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय लोक परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है:-
अलग अलग क्षेत्र / राज्य में मनाने की विशेष विधि व परंपरा :-
#उत्तरभारत (यूपी, एमपी, राजस्थान) | दीवारों पर नाग चित्र बनाकर पूजा, शिवलिंग पर दुग्धाभिषेक, महिलाओं द्वारा झूला झूलना और अखाड़ों में कुश्ती प्रतियोगिताओं का आयोजन। राजस्थान व मध्य प्रदेश में इस दिन तवा न चढ़ाने और एक दिन पूर्व बने भोजन (बासोड़ा) का भोग लगाने की परंपरा है। |
#महाराष्ट्र एवं गुजरात | सांगली जिले के बत्तीसा शिराला गाँव में जीवंत नागों को पकड़कर उनकी पूजा करने और बाद में उन्हें सुरक्षित जंगल में छोड़ने की परंपरा रही है। लोग बाजरे की रोटी और चूर्ण का भोग लगाते हैं।
#दक्षिणभारत (कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु) | इसे 'नाग चतुर्थी' या 'नाग पंचमी' के रूप में मनाते हैं। यहाँ 'नाग कल्लु' (पत्थर पर उकेरी गई नाग मूर्तियों) पर दूध, हल्दी और मक्खन से अभिषेक किया जाता है। बहनें अपने भाइयों की सुरक्षा और लंबी आयु के लिए 'गरुड़ पंचमी' का व्रत रखती हैं।
#पूर्वी भारत (पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा) | नागों की देवी 'माता मनसा' की विशेष पूजा का विधान है। झांतियों और नीम की डालियों से मंडप सजाकर देवी मनसा को प्रसन्न करने हेतु अनुष्ठान किए जाते हैं।
#केरल | मंदिरों में सर्प कावों (पवित्र सर्प उपवनों) में विशेष 'नूरम पालुम' (दूध और चावल के आटे का लेप) का अभिषेक किया जाता है। इसके साथ ही प्रसिद्ध नौका दौड़ (वल्लमकली) की तैयारियाँ भी इसी समय से गति पकड़ती हैं।
4. #तंत्रशास्त्र, #ज्योतिष और विशेष मंदिर:-
#कुंडलिनी जागरण से संबंध: योग और तंत्र साधना में मानव शरीर के मूलाधार चक्र में सोई हुई चेतना शक्ति को 'कुंडलिनी' या 'सर्पिणी' कहा जाता है। नाग पंचमी की तिथि को साधक अपनी आंतरिक ऊर्जा के संतुलन और कुंडलिनी जागरण के लिए अत्यंत अनुकूल मानते हैं।
#कालसर्प दोष निवारण: ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार राहु (नाग का मुख) और केतु (नाग की पूंछ) के मध्य सभी ग्रहों के आ जाने से कालसर्प योग बनता है। इस दोष की शांति हेतु नाग पंचमी के दिन रुद्राभिषेक और नाग पूजा को सर्वोपरि माना गया है।
#उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर: मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित 'नागचंद्रेश्वर मंदिर' वर्ष में केवल एक बार, नाग पंचमी के दिन (24 घंटे के लिए) ही आम भक्तों के लिए खुलता है। 11वीं शताब्दी की इस दुर्लभ प्रतिमा में भगवान शिव और माता पार्वती 10 फनों वाले नागराज के सिंहासन पर विराजमान हैं।
5. #वाराणसी (काशी) में नाग पंचमी का अद्भुत रूप:-
मोक्षदायिनी काशी में नाग पंचमी का पर्व धार्मिक आस्था, पतंजलि व्याकरण परंपरा, लोक-उल्लास और अखाड़ा संस्कृति का एक अत्यंत जीवंत और अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है।
#नागकूप और महर्षि पतंजलि की तपोस्थली वाराणसी के जैतपुरा मोहल्ले में स्थित 'नाग कूप' (नाग कुआं) ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से एक अद्वितीय स्थान है।
#स्थापत्य व धार्मिक मान्यता: -यह एक पाताल-गहरी सीढ़ीदार बावली (Stepwell) है। मान्यता है कि नाग कूप का संबंध सीधे पाताल लोक से है। यहाँ स्नान और दर्शन से कालसर्प दोष और सर्प दंश के भय से मुक्ति मिलती है।
#महाभाष्य की रचना स्थल: -महर्षि पतंजलि को शेषनाग का अवतार माना जाता है। पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार, महर्षि पतंजलि ने इसी नाग कूप के समीप साधना की थी और महर्षि पाणिनी के 'अष्टाध्यायी' पर प्रसिद्ध 'महाभाष्य' (व्याकरण ग्रंथ) की रचना पूर्ण की थी। आज भी नाग पंचमी पर यहाँ देश-विदेश के दिग्गज संस्कृत विद्वान एकत्र होते हैं और पतंजलि व्याकरण पर शास्त्रार्थ तथा महाभाष्य का पाठ करते हैं।
#काशी की लोक-संस्कृति:- 'छोटे गुरु' और 'बड़े गुरु' का अर्थ
काशी की बनारसी मस्ती और अखाड़ा संस्कृति में नाग पंचमी पर "छोटे गुरु" और "बड़े गुरु" का प्रयोग बहुआयामी संदर्भों में होता है:-
#अखाड़ा और गुरु-शिष्य परंपरा: - अखाड़ों में कुश्ती सिखाने वाले मुख्य उस्ताद को 'बड़े गुरु' और उनके वरिष्ठ शिष्य, जो नए पहलवानों को दांव-पेच सिखाते हैं, उन्हें 'छोटे गुरु' कहा जाता है। नाग पंचमी पर अखाड़े के सभी पहलवान अपने छोटे व बड़े गुरुओं का चरण स्पर्श कर लंगोट, गमछा और मिठाई भेंट कर उनका आशीर्वाद लेते हैं।
#कागज़ की पतंगें और चित्र: बनारस की गलियों में नाग पंचमी के दिन कागज़ के बने नाग के छोटे और बड़े चित्रों को 'छोटे गुरु' और 'बड़े गुरु' कहकर बेचा जाता है। बच्चे और युवा इन्हें खरीदकर अपने घर के द्वारों पर चिपकाते हैं।
* पतंगबाज़ी का पर्व: काशी में नाग पंचमी से ही पतंगबाज़ी के सीज़न का औपचारिक आगाज़ होता है। छतों पर 'छोटे गुरु' और 'बड़े गुरु' की विशेष पतंगों के पेंच लड़ाए जाते हैं।
व्यायामशालाओं और अखाड़ों में विशेष तैयारियाँ
नाग पंचमी का दिन वाराणसी के पारंपरिक अखाड़ों (जैसे तुलसी घाट का स्वामी नाथ अखाड़ा, गया सेठ अखाड़ा, छोटा गाबी आदि) के लिए सबसे बड़ा वार्षिक उत्सव होता है:-
* मिट्टी की कोड़ाई और शृंगार: पर्व से सप्ताह भर पूर्व अखाड़े की मिट्टी की गहराई से गोड़ाई की जाती है। मिट्टी को नरम बनाने के लिए उसमें दूध, दही, छाछ, हल्दी, सरसों का तेल, गंगाजल और सुगंधित द्रव्यों को मिलाया जाता है, जो पहलवानों की त्वचा को निरोग और बलिष्ठ बनाता है।
* अखाड़ा देव व हनुमान पूजन: नाग पंचमी की सुबह अखाड़े की मिट्टी की पूजा की जाती है, हनुमान जी को चोला चढ़ाया जाता है और अखाड़ा ध्वज फहराया जाता है।
* दंगल (कुश्ती स्पर्धा): दोपहर बाद से ही अखाड़ों में पारंपरिक दंगलों का आयोजन होता है। ढोल की थाप पर काशी के नामचीन पहलवानों के साथ-साथ दूर-दराज के अखाड़ों से आए मल्ल अपने दांव-पेच (जैसे धोबी पाट, बगलडूब, बहुआ) का प्रदर्शन करते हैं।
* प्रसाद वितरण: कुश्ती प्रतियोगिता के समापन पर गुरुओं का सम्मान किया जाता है। इसके पश्चात उपस्थित जनसमूह और पहलवानों में अंकुरित चना, बादाम, घी और दूध से बनी विशेष बनारसी ठंडाई व जलेबी का प्रसाद वितरित किया जाता है।
इस प्रकार नाग पंचमी का त्योहार जहाँ एक ओर सनातन धर्म की पौराणिक जड़ों, अष्टनागों की पूजा, तंत्र साधना और उज्जैन व काशी के दिव्य तीर्थों से जुड़ा है; वहीं दूसरी ओर यह पर्यावरण संरक्षण, कृषि संस्कृति, स्वास्थ्य रक्षा, अखाड़ों के माध्यम से युवा शक्ति के संवर्धन और गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखने वाला एक अद्वितीय भारतीय उत्सव है।
नाग पंचमी के दिन प्रकृति संरक्षण, सर्प सुरक्षा और धार्मिक मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए कई कार्यों को करना वर्जित (मना) माना गया है।
1. भूमि से जुड़े कार्य और खुदाई पर पूर्ण प्रतिबंध
* खेतों की जुताई और खुदाई: इस दिन खेतों में हल चलाना, कुदाल या फावड़े से जमीन खोदना, नींव डालना या गार्डनिंग करना मना होता है। मानसून के समय सर्प और अन्य जीव जमीन की ऊपरी सतह या बिलों में रहते हैं, ताकि खुदाई से उन्हें कोई नुकसान न पहुँचे।
* पेड़-पौधे या साग-सब्जी काटना: इस दिन ताज़ी फसल, हरी सब्जियां, पेड़-पौधों की पत्तियाँ या लकड़ियाँ तोड़ना/काटना वर्जित है।
2. रसोई और भोजन से जुड़े नियम
* कढ़ाई और तवे का उपयोग: कई क्षेत्रों में नाग पंचमी पर चूल्हे पर तवा या गर्म तेल की कढ़ाई चढ़ाना सख्त मना होता है। मान्यता है कि तवे का गोल आकार नाग के फन का प्रतीक है, इसलिए इस दिन रोटियाँ या तली हुई चीज़ें नहीं बनाई जातीं।
* ताज़ा या गर्म भोजन का निषेध: राजस्थान, एमपी और यूपी के कुछ हिस्सों में इस दिन एक दिन पूर्व बना बासी भोजन (जैसे बासोड़ा/दही-बाजरा) ही ग्रहण किया जाता है।
* सुई-धागे और नुकीली चीज़ों का प्रयोग: चाकू, कैंची, सुई-धागा जैसी नुकीली या धारदार वस्तुओं का इस्तेमाल करने से परहेज किया जाता है।
3. पूजा और धार्मिक विधियों से जुड़े परहेज़
* जीवंत नागों को जबरन दूध न पिलाना: यद्यपि लोक परंपरा में सपेरों के नागों को दूध पिलाया जाता है, लेकिन जैविक रूप से नाग दूध नहीं पीते। अतः उन्हें जबरदस्ती दूध पिलाना या परेशान करना धार्मिक व व्यावहारिक दोनों दृष्टि से अनुचित है; इसके बजाय पत्थर की मूर्ति, चित्र या शिवलिंग पर ही दूध अर्पित करना चाहिए।
* तांबे के बर्तन से दूध चढ़ाना: शिवलिंग या नाग प्रतिमा पर दूध का अभिषेक करते समय तांबे के पात्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए। तांबे के संपर्क में आकर दूध दूषित हो जाता है। अभिषेक के लिए पीतल, चाँदी या मिट्टी के पात्र का प्रयोग करें।
4. आचरण और अन्य नियम:-
* तामसिक भोजन व कलह: इस दिन लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा का सेवन वर्जित है। घर में क्लेश, कटु वचन या किसी जीव को नुकसान पहुँचाना इस व्रत के फलों को नष्ट करता है।