13/08/2026
वैराग्य- विषयों से पलायन नहीं, चित्त पर विजय!
योगदर्शन में वैराग्य केवल संसार छोड़ देना नहीं है।
यह विषयों के प्रति तृष्णा से मुक्त होकर चित्त को स्वाधीन बनाने की साधना है।
इसके क्रमिक सोपान
यतमान → व्यतिरेक → एकेन्द्रिय → वशीकार → पर वैराग्य
🔸 यतमान — वैराग्य का प्रयत्न आरम्भ।
🔸 व्यतिरेक — अपनी आसक्तियों की पहचान।
🔸 एकेन्द्रिय— बाह्य संयम, किन्तु सूक्ष्म संस्कार शेष।
🔸 वशीकार— विषय सामने हों, फिर भी चित्त आकर्षित न हो।
🔸 पर वैराग्य— गुणों के प्रति भी वितृष्णा; पुरुषख्याति की ओर आरोहण।
📖 पतञ्जलि योगसूत्र १.१५–१.१६
“दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।”
वैराग्य का सार-
विषयों को छोड़ना नहीं, विषयों के प्रति अपनी तृष्णा पर विजय पाना।
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