15/06/2026
ध्यान दें: कुछ देशों में चाँद देखने के अनुसार तारीख़ में एक दिन का फ़र्क़ हो सकता है। इसलिए अपने इलाके में चाँद की पुष्टि का इंतज़ार करें और ख़ास तौर पर 9 और 10 मुहर्रम को नोट कर लें।
9 और 10 मुहर्रम के रोज़ों की बड़ी फ़ज़ीलत है।
यौम-ए-आशूरा (10 मुहर्रम) के दिन अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और बनी इस्राईल को फ़िरऔन के ज़ुल्म से निजात दी थी। इस नेमत पर शुक्र अदा करने के लिए हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने इस दिन रोज़ा रखा। हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ ने भी इस दिन रोज़ा रखा और अपनी उम्मत को इसकी तरग़ीब दी।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "रमज़ान के बाद सबसे अफ़ज़ल रोज़ा अल्लाह के महीने मुहर्रम का रोज़ा है।" [📖 सहीह मुस्लिम: 1163]
नबी ﷺ ने फ़रमाया: "आशूरा के दिन का रोज़ा पिछले एक साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाता है।" [📖 सहीह मुस्लिम]
दूसरी क़ौमों से अलग पहचान बनाए रखने के लिए नबी ﷺ ने इरादा फ़रमाया था कि 10 मुहर्रम के साथ 9 मुहर्रम का भी रोज़ा रखा जाए।
इन मुबारक दिनों में हमें चाहिए कि हम अल्लाह तआला से
मग़फ़िरत तलब करें, उसका शुक्र अदा करें, ज़्यादा से ज़्यादा इबादत करें और अपने रब से अपने रिश्ते को मज़बूत बनाएं।
अल्लाह तआला हमारे रोज़ों को क़ुबूल फ़रमाए, हमारी कोताहियों को माफ़ फ़रमाए और हमें अपनी क़ुर्बत नसीब फ़रमाए। #आमीन। 🤍
07/06/2026
जेफ़्री एपस्टीन का मामला भले ही अब सुर्खियों से गायब हो गया हो, लेकिन जवाबदेही की हक़ीक़त कभी गायब नहीं होती। इस्लाम में कोई भी गुनाह, ज़ुल्म, शोषण या नाइंसाफ़ी कभी भुलाई नहीं जाती।
अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और तुम्हारा रब कभी भूलने वाला नहीं है।" (सूरह मरयम 19:64)
बहुत से लोग दुनिया की पकड़ से बच जाते हैं। कुछ लोग इस दुनिया में पूरी सज़ा पाए बिना ही मर जाते हैं। कुछ राज़ अदालतों, सरकारों और मीडिया से छिपे रह जाते हैं। लेकिन हर अमल दर्ज किया जा रहा है, और हर इंसान को क़यामत के दिन अल्लाह के सामने खड़ा होना होगा।
"फिर जिसने राई के दाने के बराबर भी भलाई की होगी, वह उसे देख लेगा। और जिसने राई के दाने के बराबर भी बुराई की होगी, वह भी उसे देख लेगा।" (सूरह अज़-ज़लज़ला 99:7-8)
एपस्टीन का मामला सिर्फ़ एक व्यक्ति के अपराधों की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि आज भी हमारे समाज में बहुत से शिकारी, मानव तस्कर, अत्याचारी और शोषक मौजूद हैं। कुछ लोगों को दुनिया जानती है, लेकिन बहुतों को नहीं। कुछ सत्ता, दौलत और प्रभाव के ऊँचे पदों पर बैठे हुए हैं। एक मोमिन होने के नाते हमें ग़ाफ़िल नहीं होना चाहिए और यह नहीं समझना चाहिए कि ऐसी बुराइयाँ सिर्फ़ अतीत की बात हैं।
भले ही दुनिया किसी एक मामले को भूल जाए, लेकिन हमारी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं होती। हमें कमज़ोरों और बेबस लोगों की हिफ़ाज़त करनी है, ज़ुल्म के ख़िलाफ़ जागरूक रहना है, और जहाँ भी सच और इंसाफ़ का साथ देने का मौक़ा मिले, वहाँ डटकर खड़ा होना है।
जब अल्लाह ख़ुद गवाह हो, तो किसी और गवाह की ज़रूरत नहीं रहती। और जब अल्लाह हर अमल को महफ़ूज़ कर चुका है, तो कोई सबूत कभी गुम नहीं हो सकता।
दुनिया शायद एक एपस्टीन को भूल जाए, लेकिन आज भी ऐसे न जाने कितने लोग समाज में मौजूद हैं। इसलिए होशियार रहिए, मासूमों की हिफ़ाज़त कीजिए, ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाइए, और हमेशा याद रखिए जो चीज़ लोगों से छिपी हुई है, वह अल्लाह से कभी नहीं छिप सकती।
06/06/2026
अच्छे अख़लाक़ वाले | रसूलुल्लाह ने फ़रमाया :
मोमिन अपने अच्छे अख़लाक़ की वजह से रातों को क़याम करने वाले और दिन को रोज़ा रखने वाले शख़्स का मक़ाम हासिल कर लेता है।
آپ صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا۔
مومن اپنے اچھے اخلاق کی وجہ سے رات کو بیدار رہنے والے اور دن کو روزہ رکھنے والے کا درجہ پاتا ہے۔
The Prophet (peace be upon him) said:
A believer, by virtue of his good morals, attains the status of one who stays awake at night and fasts during the day.
(सुनन तिर्मीज़ी, हदीस नं : 4798)