22/08/2026
Writing beyond standard social media posts;
(Feeling pain & suffering of those who selflessly worked far from families for the families, for communities for country. )
Prakash K Ray की X पोस्ट का विस्तार
ओ जेरूसलम!
घर से इतनी दूर भारतीय मजदूर क्यों मर रहा है?
जेरूसलम में एक भारतीय घरेलू कामगार की बेरहमी से हत्या—यह सिर्फ एक crime story नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जिसके लाखों लोग अपने परिवार को पालने के लिए अपना घर-गांव छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर निकल रहे हैं। अक्सर ऐसी जगहों पर, जहां युद्ध चल रहा है, मिसाइलें गिर रही हैं और जान की कोई गारंटी नहीं।
राजीव आचार्य (40) पश्चिम बंगाल के गोरखा समुदाय से थे। वे इज़रायल में एक बुजुर्ग दंपति की देखभाल करते थे। आरोप है कि उसी परिवार के 31 वर्षीय पोते ने 23 जुलाई को धारदार हथियार से उन पर हमला कर दिया। उन्होंने बहुत खून बहने के चलते दम तोड़ दिया। आरोपी पर पूर्वचिन्हित हत्या का मुकदमा चल रहा है।
तेल अवीव में गोरखा समुदाय ने मोमबत्ती जलाकर प्रार्थना सभा की। सारा पेरी नाम की एक caregiver-support agency से जुड़ी महिला ने कहा—“जब युद्ध था, आप हमारे साथ खड़े रहे। आपने सुरक्षित देश लौटने की बजाय बूढ़ों की देखभाल के लिए यहीं रहना चुना। अब हमें आपका साथ देना चाहिए।”
राजीव की पत्नी, दो बच्चे और माता-पिता हैं। वे इज़रायल में पिछले पांच साल से काम कर रहे थे।
यह अकेली कहानी नहीं है।
यह सवाल सिर्फ राजीव का नहीं है। इज़रायल में 14,000 से 20,000 भारतीय caregivers काम करते हैं। हज़ारों और हैं जो construction, farming और दूसरे क्षेत्रों में हैं।
और यह सिर्फ इज़रायल नहीं। भारत की overseas workforce विशाल है। विश्व बैंक के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत को विदेश में काम कर रहे अपने कामगारों से लगभग $150 बिलियन (करीब ₹13 लाख करोड़) remittances मिले। भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा remittance पाने वाला देश है।
लेकिन इन डॉलरों के पीछे दुबई की 55 डिग्री की गर्मी में खड़ा मजदूर है, सऊदी अरब में construction site पर काम करता राजमिस्त्री है, कतर में driver है, इज़रायल में किसी बूढ़े को नहलाता-खिलाता caregiver है।
Hormuz की खाड़ी में खतरा
इसी साल हमने इसका दूसरा चेहरा देखा। Hormuz के आसपास international shipping पर हमले बढ़े हैं। एक जहाज पर 22 crew में 21 भारतीय थे—IRGC ने उन पर RPG से हमला किया।
जुलाई 2026 में 30 भारतीय seafarers वाले दो जहाजों पर हमला हुआ। एक भारतीय की मौत हो गई, कई घायल हुए। इसके बाद भारत सरकार को advisories जारी करनी पड़ीं कि Indian seafarers को Hormuz से गुजरने वाले जहाजों पर deploy न किया जाए। 15,000 से ज़्यादा भारतीय seafarers Strait के पश्चिम में फंसे बताए गए।
भारत दुनिया के सबसे बड़े seafarer-supplying देशों में है—तीन लाख से ज्यादा भारतीय नाविक दुनिया के समुद्री जहाजों पर काम करते हैं।
तो आदमी क्यों जाता है?
क्योंकि बिहार, UP, बंगाल, राजस्थान या झारखंड के एक आम परिवार के सामने अक्सर चुनाव यह नहीं होता—“भारत में सुरक्षित नौकरी या विदेश में खतरनाक नौकरी।”
चुनाव अक्सर यह होता है—यहां बेरोजगार रहो, अथवा बाहर जाकर जोखिम उठाकर इतना कमाओ कि घर बन जाए, बच्चों की फीस भर जाए, बहन की शादी हो जाए, बूढ़े मां-बाप का इलाज हो जाए।
इसीलिए युद्ध के बीच भी लोग इज़रायल के construction sector में जाने को तैयार मिल जाते हैं। इसीलिए Hormuz में मिसाइलों के बीच tanker चलाने वाले जहाज पर भारतीय मिलता है। इसीलिए अरब की तपती दोपहर में scaffolding पर भारतीय मजदूर मिलता है।
जब $150 बिलियन भेजने वाले की जान की कीमत...
यह सवाल सरकार से पूछा जाना चाहिए कि remittance पर हमें गर्व है तो remittance भेजने वाले आदमी की जान की कीमत क्या है?
जब $150 बिलियन सालाना घर भेजने वाला यह विशाल समुदाय हमारी अर्थव्यवस्था के लिए इतना महत्वपूर्ण है, तो उसकी सुरक्षा विदेश नीति का peripheral consular issue कैसे हो सकती है?
राजीव आचार्य की हत्या को इसलिए केवल जेरूसलम में हुई एक हत्या समझकर भूल जाना आसान होगा।
मुश्किल सवाल यह है—जिस देश की अर्थव्यवस्था को उसके प्रवासी कामगार सालाना लाखों करोड़ रुपये भेज रहे हैं, वहां से इतनी बड़ी संख्या में लोग परिवार से दूर, युद्ध और असुरक्षा के बीच, रोजी कमाने क्यों निकल रहे हैं?
मार्क्स और एंगेल्स ने डेढ़ सौ साल पहले लिखा था—"The working men have no country."
आज का भारतीय मजदूर शायद इसका एक नया अर्थ लिख रहा है।
देश उसका जरूर है। घर भी उसका है। मां-बाप, पत्नी और बच्चे भी उसके हैं।
बस रोजी उसके देश में नहीं है।
और इसलिए कभी वह दुबई में है, कभी दोहा में, कभी तेल अवीव और जेरूसलम में—और कभी Hormuz की खाड़ी में किसी जहाज के deck पर आसमान से आती मिसाइल को देख रहा है।
उसके भेजे डॉलर हमारे विदेशी मुद्रा खाते में दर्ज हो जाते हैं।
उसका डर, उसका अकेलापन और उसकी जान का जोखिम किसी GDP table में दर्ज नहीं होता।