02/10/2026
ग़ज़ल
मेरी तन्हाई का पहला-पहला ख़ुमार सा हो तुम,
मेरी सदियों की दुआओं का क़रार सा हो तुम।
इस मोहब्बत के सफ़र में और क्या माँगूँ भला,
मेरी धड़कन का पहला-पहला इक़रार सा हो तुम।
ज़िंदगी यूँ सूनी थी जैसे कोई हो वीरान-सा शहर,
मेरे आँगन में मुद्दत बाद खिला जो गुलज़ार सा हो तुम।
दर्द जब हद से गुज़र जाए तो दिल कहता है बस,
मेरे अश्कों को मिले जिससे वो क़रार सा हो तुम।
चाँद भी फीका लगे, तारों की महफ़िल भी ख़ामोश,
मेरी आँखों से जो उतरता ही नहीं वो ख़ुमार सा हो तुम।
नाम तेरा लिख दिया है दिल की हर धड़कन पे अब,
मेरी साँसों में अब तक बचा हुआ है जो प्यार सा हो तुम।
मशानवी तेरे बिना क्या है ये ग़ज़ल, क्या है ये दिल,
मेरी हर साँस में वसा हुआ है जो अंतिम इज़हार सा हो तुम।
~ रमन मशानवी