Arvind Gyan Vatika, Birupur, Barahiya Lakhisarai -811302.

Arvind Gyan Vatika, Birupur, Barahiya Lakhisarai -811302. An English Medium School, Pre Nursery to Eight Class.

Happy vasant Panchami
02/02/2025

Happy vasant Panchami

07/12/2024
थोड़ा प्यार, थोड़ी तकरार, झगड़ना, रुठना, मनाना,यही है भाई-बहन के रिश्ते का प्याररक्षाबंधन की बधाई एवं शुभकामनाएं
19/08/2024

थोड़ा प्यार, थोड़ी तकरार, झगड़ना, रुठना, मनाना,

यही है भाई-बहन के रिश्ते का प्यार

रक्षाबंधन की बधाई एवं शुभकामनाएं

10/03/2024

संस्कृत में

1 से 100 तक की गणना-

English (अंग्रेजी) संस्कृत में गिनती

1 (One) एकः
2 (Two) द्वितीयः
3 (Three) त्रयः
4 (Four) चत्वारः
5 (Five) पञ्च
6 (Six) षट्
7 (Seven) सप्त
8 (Eight) अष्ट
9 (Nine) नव
10 (Ten) दश
11 (Eleven) एकादश
12 (Twelve) द्वादश
13 (Thirteen) त्रयोदश
14 (Fourteen) चतुर्दश
15 (Fifteen) पञ्चदश
16 (Sixteen) षोडश
17 (Seventeen) सप्तदश
18 (Eighteen) अष्टादश
19 (Nineteen) नवदश
20 (Twenty) विंशति:
21 (Twenty-one) एकविंशति:
22 (Twenty-two) द्वाविंशति:
23 (Twenty-three) त्रयोविंशति:
24 (Twenty-four) चतुर्विंशतिः
25 (Twenty-five) पञ्चविंशति:
26 (Twenty-six) षड् विंशति:
27 (Twenty -seven) सप्तविंशति:
28 (Twenty- eight) अष्टाविंशति:
29 (Twenty- nine) नवविंशति:
30 (Thirty) त्रिंशत्
31 (Thirty-one) एकत्रिंशत्
32 (Thirty-two) द्वात्रिंशत्
33 (Thirty-three) त्रयस्त्रिंशत्
34 (Thirty-four) चतुस्त्रिंशत्
35 (Thirty-five) पञ्चत्रिंशत्
36 (Thirty-six) षट् त्रिंशत्
37 (Thirty- seven) सप्तत्रिंशत्
38 (Thirty- eight) अष्टत्रिंशत्
39 (Thirty-nine) नवत्रिंशत्
40 (Forty) चत्वारिंशत्
41 (Forty-one) एकचत्वारिंशत्
42 (Forty-two) द्विचत्वारिंशत्
43 (Forty-three) त्रिचत्वारिंशत्
44 (Forty-four) चतुश्चत्वारिंशत्
45 (Forty-five) पञ्चचत्वारिंशत्
46 (Forty-six) षट्चत्वारिंशत्
47 (Forty-seven) सप्तचत्वारिंशत्
48 (Forty-eight) अष्टचत्वारिंशत्
49 (Forty-nine) नवचत्वारिंशत्
50 (Fifty) पञ्चाशत्
51 (Fifty-one) एकपञ्चाशत्
52 (Fifty-two) द्विपञ्चाशत्
53 (Fifty- three) त्रिपञ्चाशत्
54 (Fifty-four) चतुःपञ्चाशत्
55 (Fifty-five) पञ्चपञ्चाशत्
56 (Fifty-six) षट्पञ्चाशत्
57 (Fifty-seven) सप्तपञ्चाशत्
58 (Fifty-eight) अष्टपञ्चाशत्
59 (Fifty-nine) नवपञ्चाशत्
60 (Sixty) षष्टिः
61 (Sixty-one) एकषष्टिः
62 (Sixty-two) द्विषष्टिः
63 (Sixty-three) त्रिषष्टिः
64 (Sixty-four) चतुःषष्टिः
65 (Sixty-five) पञ्चषष्टिः
66 (Sixty-six) षट्षष्टिः
67 (Sixty-seven) सप्तषष्टिः
68 (Sixty-eight) अष्टषष्टिः
69 (Sixty-nine) नवषष्टिः
70 (Seventy) सप्ततिः
71 (Seventy-one) एकसप्ततिः
72 (Seventy-two) द्विसप्ततिः
73 (Seventy-three) त्रिसप्ततिः
74 (Seventy-four) चतुःसप्ततिः
75 (Seventy-five) पञ्चसप्ततिः
76 (Seventy-six) षट्सप्ततिः
77 (Seventy- seven) सप्तसप्ततिः
78 (Seventy- eight) अष्टसप्ततिः
79 (Seventy- nine) नवसप्ततिः
80 (Eighty) अशीतिः
81 (Eighty-one) एकाशीतिः
82 (Eighty-two) द्वयशीतिः
83 (Eighty-three) त्र्यशीतिः
84 (Eighty-four) चतुरशीतिः
85 (Eighty-five) पञ्चाशीतिः
86 (Eighty-six) षडशीतिः
87 (Eighty- seven) सप्ताशीतिः
88 (Eighty-eight) अष्टाशीतिः
89 (Eighty-nine) नवाशीतिः
90 (Ninety) नवतिः
91 (Ninety-one) एकनवतिः
92 (Ninety-two) द्विनवतिः
93 (Ninety-three) त्रिनवतिः
94 (Ninety-four) चतुर्नवतिः
95 (Ninety-five) पञ्चनवतिः
96 (Ninety-six) षण्णवतिः
97 (Ninety- seven) सप्तनवतिः
98 (Ninety-eight) अष्टनवतिः
99 (Ninety-nine) नवनवतिः
100 (One- hundred) शतम्

समर निंद्य है धर्मराज, पर,      कहो, शान्ति   वह  क्या   है,जो  अनीति पर  स्थित होकर  भी        बनी   हुई    सरला       ...
29/02/2024

समर निंद्य है धर्मराज, पर,
कहो, शान्ति वह क्या है,
जो अनीति पर स्थित होकर भी
बनी हुई सरला है ?
सुख -समृद्धि का विपुल कोष
संचित कर कल, बल, छल से,

किसी क्षुधित का ग्रास छीन,
धन लूट किसी निर्बल से।
सब समेट, प्रहरी बिठला कर
कहती कुछ मत बोलो,
शान्ति-शुधा बह रही, न इसमें
गरल क्रांति का घोलो।
हिलो-डुलो मत, हृदय-रक्त,
अपना मुझको पीने दो,
अचल रहे साम्राज्य शान्ति का,
जियो और जीने दो।
सच है सत्ता सिमट-सिमट
जिनके हाथों में आयी,
शांतिभक्त वे साधु पुरुष
क्यों चाहें कभी लड़ाई?
सुख का सम्यक्-रूप विभाजन
जहां नीति से, नय से,
सम्भव नहीं; अशांति दबी हो
जहां खड्ग के भय से,
जहाँ पालते हों अनीति-पद्धति
को सत्ताधारी,
जहाँ सूत्रधार हों समाज के
अन्यायी अविचारी;
नीतियुक्त प्रस्ताव सन्धि के
जहाँ न आदर पायें;
जहाँ सत्य कहनेवालों के
सीस उतारे जायें;
जहाँ खड्गबल एकमात्र
आधार बने शासन का;
दबे क्रोध से भभक रहा हो
हृदय जहां जनजन का;
सहते सहते अनय जहाँ
मर रहा मनुज का मन हो;
समझ कापुरुष अपने को
धिक्कार रहा जन-जन हो;
अहंकार के साथ घृणा का
जहाँ द्वन्द्व हो जारी;
ऊपर शान्ति, तलातल में
हो छिटक रही चिनगारी;
आगामी विस्फोट काल के
मुख पर दमक रहा हो;
इंगित में अंगार विवश
भावों में चमक रहा हो;
पढ़कर भी संकेत सजग हों
किन्तु न सत्ताधारी;
दुर्मति और अनल में दें
आहुतियाँ बारी-बारी;..................................रामधारी सिंह 'दिनकर'

29/09/2022

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