Mumtaz Ahmad Jaamai

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ایک اصلاحی، دعوتی، سماجی اور مذہبی پلیٹ فارم —
جس کا مقصد علم، اخلاق، تربیت اور خدمتِ انسانیت کے ذریعے معاشرے میں مثبت تبدیلی لانا ہے۔
� سچائی، شعور اور اصلاح کے اس سفر میں شامل ہوں اور روشنی بانٹنے والے بنیں۔

29/01/2026

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी,
आपने कहा कि औरंगज़ेब का नाम नहीं लिया जाता।
यह इतिहास नहीं, राजनीतिक झूठ है।
औरंगज़ेब आलमगीर कोई चुनावी नारा नहीं थे।
वे विश्व इतिहास की स्थापित शख़्सियत हैं।
उनके नाम के साथ 49 साल का शासन, प्रशासन और दस्तावेज़ जुड़े हैं।
तथ्य सुनिए—भावना नहीं।
औरंगज़ेब के मूल शाही फ़रमान आज भी मौजूद हैं,
जिनमें काशी, मथुरा, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र
के हिंदू मंदिरों और पुजारियों को ज़मीन, जागीर और अनुदान दिए गए।
अगर औरंगज़ेब मंदिर-विरोधी थे,
तो मंदिरों को ग्रांट किसने दी?
और अगर उनका नाम नहीं लिया जाता,
तो उनके फ़रमान आज भी क्यों पढ़े जाते हैं?
जहाँ कार्यवाही हुई,
वह धर्म नहीं बल्कि राज्य-विरोधी विद्रोह के कारण थी।
समस्या औरंगज़ेब नहीं हैं,
समस्या इतिहास को पढ़ने के बजाय
उसे चुनावी हथियार बनाना है।
इतिहास मिटता नहीं,
वह झूठ को बेनकाब करता है।
#सीاسی_طنز #جمہوریت
#इतिहास_का_सच





िहास

لکھنوی تہذیب، انتخاب اور صحتِ شہر — ایک ادبی کالم 20/01/2026

لکھنؤ کی تہذیب، انتخابی شعور اور سیاسی طنز کا ایک نادر امتزاج—
یہ محض ایک قصہ نہیں، بلکہ اس سماج کی اجتماعی نفسیات کا آئینہ ہے جہاں
دل کسی کو دیا جاتا ہے، مگر ووٹ عقل کے نام پر پڑتا ہے۔
دلرُبا جان اور حکیم شمش الدین کی یہ معروف لکھنوی حکایت
آج کے انتخابی شور میں ہمیں یہ سوچنے پر مجبور کرتی ہے کہ
ہم ووٹ نعروں پر دیتے ہیں یا علاج کی امید پر؟
یہ کالم تاریخ کا دعویٰ نہیں،
بلکہ تہذیب، طنز اور سیاست کے بیچ
عوامی شعور کی ایک گہری تمثیل ہے۔
پورا کالم یہاں پڑھیں👇
🔗 https://majaamai.blogspot.com/2025/10/blog-post_18.html
✍️ قاری ممتاز احمد جامعی
#جمہوریت

لکھنوی تہذیب، انتخاب اور صحتِ شہر — ایک ادبی کالم لکھنؤ کی تہذیب، انتخابی سیاست اور سماجی نفسیات پر مبنی ایک دلکش طنزیہ و فکری کالم، جس میں حکیم شمس الدین اور دلربا جان کی معروف روایت کے ذریعے آج کے س

04/01/2026

कल भारत की अदालत से किसी “बड़े फ़ैसले” की चर्चा है।
सोशल मीडिया पर सवाल यह नहीं है कि
फ़ैसला क्या आएगा —
सवाल यह है कि
न्याय बचेगा या न्याय का तमाशा बनेगा?
भारत में अदालतें
फ़ैसले देने में कभी नहीं चूकतीं,
लेकिन इंसाफ़ अब अपवाद बन चुका है।
यहाँ क़ानून की किताबें दिन-ब-दिन मोटी होती जा रही हैं,
और ज़मीर की आवाज़
उतनी ही धीमी, उतनी ही कमज़ोर।
यहाँ तारीख़ें मिलती हैं,
उम्मीदें नहीं।
यहाँ कमज़ोर को
संयम, सब्र और प्रतीक्षा सिखाई जाती है,
और ताक़तवर को
तुरंत राहत, स्टे और संरक्षण।
और फिर इसे
“न्याय प्रक्रिया” कहकर
इतिहास के हवाले कर दिया जाता है।
अगर अदालतें
सिर्फ़ ताक़त का संतुलन बनाए रखने का औज़ार बन जाएँ
और इंसाफ़ देने का साहस खो दें,
तो फिर आने वाला हर फ़ैसला
सिर्फ़ एक दस्तावेज़ होगा —
न्याय नहीं।
👉 मुल्क
काग़ज़ी फ़ैसलों से नहीं,
ज़िंदा इंसाफ़ से चलता है।

यह व्यक्तिगत राय है।
यह अभिव्यक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) — Freedom of Speech — के अंतर्गत है।





ریاست، عورت اور آئین: جب اقتدار خود وقار کا منکر بن جائے 18/12/2025

क्या किसी भी लोकतंत्र में राज्य की शक्ति नारी की गरिमा और व्यक्तिगत पहचान से ऊपर हो सकती है?
हमारे ताज़ा विश्लेषण में, संविधान की मूलभावना और एक सार्वजनिक घटना के ज़रिए यह सवाल गहराई से उठाया गया है — जहां सत्ता की वैधानिक सीमाएं, धर्म की स्वतंत्रता और नारी के आत्मसम्मान का संघर्ष सामने आया।

👉 राज्य, महिला और संविधान – जब सत्ता स्वाभिमान का उल्लंघन करे
📌 इस लेख में: ✔️ भारतीय संविधान के प्रमुख अनुच्छेदों का संदर्भ
✔️ व्यक्तिगत आज़ादी बनाम राज्य शक्ति का संरक्षण
✔️ महिला के अधिकारों और धार्मिक पहचान का संवैधानिक दृष्टिकोण

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#राज्य #संविधान #महिलाधिकार #विचारशीललेख

ریاست، عورت اور آئین: جب اقتدار خود وقار کا منکر بن جائے Bihar CM Nitish Kumar Pulls Woman Doctor’s Hijab (YouTube) An analytical column examining constitutional morality in India through women’s d...

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