27/08/2026
#अनोखा_लोकपर्व_हिलजात्रा'
#मुखौटों के पीछे छिपी #सदियों पुरानी #आस्था:
हिलजात्रा: कृषि संस्कृति, लोकजीवन और अलौकिक आस्था का जीवंत रंगमंच
देवभूमि का एक ऐसा लोकपर्व, जहां भय नहीं, बल्कि अपार श्रद्धा का साम्राज्य होता है। पिथौरागढ़ का कुमौड़ गांव जब ढोल-दमाऊं की थाप पर थिरकता है, तो सदियों पुरानी कृषि संस्कृति और आस्था का एक अद्भुत संगम जीवंत हो उठता है।
हिलजात्रा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पिथौरागढ़ के जनजीवन की आत्मा है। सुबह की पहली किरण के साथ ही ग्रामीण रंग-बिरंगे काष्ठ (लकड़ी) के मुखौटों को सजाने में जुट जाते हैं। मैदान में जैसे ही उत्सव शुरू होता है, पूरा गांव एक जीवंत रंगमंच में बदल जाता है:
* #लोकजीवन की झलक: झाड़ू लगाते स्त्री-पुरुष, हुक्का गुड़गुड़ाते मछुआरे, शिकार पर निकले शिकारी और साधना में लीन साधु।
* #खेती की सजीव झांकी: खेत जोतता हलवाहा, अटखेलियां करते 'गैल्या बैल' और धान की रोपाई करती महिलाएं—यह दृश्य बताता है कि यहां संस्कृति और खेती एक साथ झूमती हैं।
* #वन्यजीवों का सौंदर्य: हिरण और चीतल की सजीव चाल हर किसी के चेहरे पर मुस्कान बिखेर देती है।
#नेपाल के राजदरबार से #कुमौड़ के मैदान तक: इतिहास की देन
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इस अनोखी परंपरा की जड़ें पड़ोसी देश नेपाल से जुड़ी हैं। नेपाल के राजा ने पिथौरागढ़ के चार महर भाइयों की वीरता से प्रसन्न होकर उन्हें यह जात्रा, पारंपरिक मुखौटे और काष्ठ के हल भेंट स्वरूप दिए थे।
चारों भाई जब इन धरोहरों को लेकर कुमौड़ पहुंचे, तो उत्तराखंड की धरती पर हिलजात्रा का बीज बोया गया। #नेपाल में आज भी इसे ' #इंद्रजात्रा' के रूप में मनाया जाता है, जबकि कुमौड़ में यह परंपरा पीढ़ियों से उसी उल्लास के साथ रची-बसी है।
जब गरजते हुए अवतरित होते हैं ' #लखिया_बाबा'
उत्सव अपने चरम पर तब पहुंचता है, जब ढोल-दमाऊं का ताल तेज़ हो जाता है और माहौल में एक अलौकिक ऊर्जा भर जाती है।
* #रौद्र रूप और अटूट आस्था: लोहे की भारी जंजीरों में बंधे, रौद्र रूप धारे जब 'लखिया भूत' मैदान में कदम रखते हैं, तो हजारों भक्तों की सांसें थम सी जाती हैं।
* #शिव के महागण: जिन्हें दुनिया 'भूत' कहती है, वे दरअसल भगवान शिव के प्रिय गण वीरभद्र का स्वरूप हैं।
* #संरक्षक देवता: लखिया बाबा का यह अवतार डरावना नहीं, बल्कि अभय देने वाला है। जंजीरों से बंधे बाबा को संभालना ग्रामीणों के लिए चुनौती होता है, लेकिन भक्त डरने की बजाय हाथ जोड़कर शीश नवाते हैं, अक्षत और पुष्प वर्षा कर उनका स्वागत करते हैं।
मान्यता है कि लखिया बाबा का प्रसन्न होना नई फसल के आगमन, गांव की खुशहाली और आपदाओं से रक्षा की गारंटी है। रौद्र रूप में दिखने वाले बाबा हर श्रद्धालु को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर अंततः शांत होते हैं।
हिलजात्रा महज़ एक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, प्रकृति और पुरखों की विरासत को नमन करने का कुमाऊं का सबसे अनोखा तरीका है।
"जय लखिया बाबा"