Center for Studies in Science Communication

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15/10/2025

दवा उद्योग में क्वालिटी कण्ट्रोल से नहीं
बेईमानी ख़त्म करने से जाने बचेंगी

कोल्ड्रिफ नाम से कफ सीरप बनाने वाली स्रेशन कंपनी के मालिक को गिरफ्तार करने की कोई अहमियत नहीं है क्योंकि इससे गली-मौहल्लों या सही टेक्नोलॉजी और क्वालिफाइड केमिकल इंजिनियर्स की सेवायें न लेने वाली छुटभैय्या दवा निर्माता कंपनियों में कोई सुधार होने वाला नहीं है. कठोर कानून बनाने से भी कुछ न होगा. अंग्रेजी में एक कहावत है कि 'बुराई की जड़ें बहुत गहरी हैं' अर्थात the malice is deeper than we can think about. वकील जो केस लड़ेंगे या जज जो सुनवाई करेंगे उन्हें केमिस्ट्री की कितनी नॉलेज होती है. वे सिर्फ कॉमन सेंस से काम लेते हैं और बहुत जरूरी हुआ तो एक नजदीकी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर से कुछ सलाह कर लेंगें. पुलिस द्वारा लिखी गयी ऍफ़आई आर रिपोर्ट की कॉपी तो मैंने नहीं देखी, लेकिन मुझे नहीं लगता थाने के मुंशी में ऐसी एक रिपोर्ट लिखने की काबलियत होगी. मुंशी लोग या सीआई भी एक केमिकल साइंटिस्ट नहीं है. इसीमें खामियां हो सकती हैं, तो वकील केस कैसे लडेगा?

असल में सारा मामला टेक्नोलॉजी के स्तर, केमिकल प्रोसस्सेस, क्लीन मैन्युफैक्चरिंग, सही प्रोडक्ट या इन्ग्रेडिएंट्स, परीक्षण और पैकिंग पर निर्भर है. भारत में केमिकल साइंस और इंजीनियरिंग में वर्ल्ड क्लास साइंटिस्ट-इंजिनियर पैदा किये हैं. प्रोफेसर एम एम शर्मा इनमें से एक थे. घटिया या स्तरहीन माल बना कर रिश्वत और संपर्कों के जरिये से इसे बेचने की घटिया मानसिकता के चलते लाखों की संख्या में इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने वाली नासमझ जनता को दवा के बारे में मामूली सी समझ भी नहीं होती. वे सिर्फ डॉक्टर की सलाह और दूकानदार पर भरोसा करके दवा खरीदकर जोखम उठाते रहे हैं. नीयत और नियति को बदलने की ताकत ग्रासरूट्स पर सिर्फ ड्रग इंस्पेक्टर्स की होती है जो सिफारिश से नौकरी पाते हैं. ऊपर से डिस्ट्रिक्स के ज्यादातर सीएमओज हफ्ता वसूली में विश्वास रखते हैं. इन्हें न तो किसी ड्रग की थेराप्यूटिक्स की और न ही ड्रग या किसी केमिकल कंपाउंड की टॉक्सिसिटी का क, ख, ग मालूम होता है. एक ड्रग इंस्पेक्टर की मिनिमम क्वालिफिकेशन पीएचडी होनी चहिये और वह भी केमिकल इंजीनियरिंग विषय में. अब भला 30 हज़ार रुपये अगर कॉन्ट्रैक्ट सैलरी दी जाएगी तो एक बीएससी फेल कैंडिडेट ही इन्हें मिल सकता है. दवा निर्माण को अगर एमएसएमई उद्योग की केटेगरी में डालेंगे तो दवा घटिया ही बनेगी और उपभोक्ता मरते रहेंगे.

मेरा एक मित्र बता रहा था कि सिर्फ हरयाणा के ड्रग स्टोर्स वालों और होलसेल डीलरों से हर साल करीब 200 करोड़ रुपयों की रिश्वत के पैसे की उगाही होती है. त्योहारों पर जैसे कि दीवाली पर किसी भी ड्रग इंस्पेक्टर या डिस्ट्रिक्ट के चीफ मेडिकल ऑफिसर के घर जाकर देखें तो गिफ्ट्स और दारू की इतनी बोतलें मिलेंगी कि एक छोटा ट्रक भर सकता है. इंडस्ट्रियल महकमों के डायरेक्टर और मंत्री-संतरी तक बहुत पैसा बनाते हैं. ऐसे में स्रेशन के मालिक को गिरफ्तार करने मात्र से यह बड़ी बुराई कभी ख़त्म नहीं होने वाली. इसे रोकने के लिए मंत्रालय तो सिर्फ एक रेगुलेटर का काम कर सकता है. हमारे यहाँ मिनिस्ट्री ऑफ़ केमिकल्स और हेल्थ मिनिस्ट्री की दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने में पहली भूमिका है. लेकिन सिस्टम के निचले पायदानों पर बेईमानी, भ्रष्टाचार और गुणवत्ता परीक्षण के बाद मार्केटिंग के हथकंडे अपना कर घटिया और जानलेवा दवाओं का कारोबार खूब चलता है. ऐसे में हमारे वैज्ञानिक संस्थानों और रेगुलेटर की बदनामी होती है. विदेश में भी भारत की ड्रग इंडस्ट्री की मलिन छवि तुरत ट्रांसमिट हो जाती है.

जिला स्तर के अधिकारियों को नौकरी से निलंबित करने या दवा कंपनी के मालिक को सजा देने से कुछ भी नहीं होगा. यह तो सागर में बूँद के समान है. मैंने आजतक किसी ड्रग इंस्पेक्टर को अपने विषय में प्रोफेशनल रिफ्रेशर कोर्स करते नहीं देखा, प्रतिभा निखारना तो दूर की बात रही. अगर एक ड्रग इंस्पेक्टर ईमानदारी से काम करना भी चाहता है तो माफिया उसे जान से मारने की धमकी देता है. फिल्मों ने सिखा दिया है कि व्यक्ति को काबू में करने के लिए उसे नहीं बल्कि परिवार को निशाना बनाना अधिक कारगर है. फिर ड्रग इंस्पेक्टर भीगी बिल्ली की तरह काम करता है. इन्हें पुलिस प्रोटेक्शन भी दी जाए तो भी प्रोटेक्ट नहीं होते. इन्हें न फार्माकोलॉजी और न ही इससे एसोसिएटेड अन्य दस प्रक्रियाओं/विधियों जैसे कि फार्मा कॉग्नोसी और फार्माको काइनेटिक्स के बारे में कोई नॉलेज होती है. हेल्थ डिपार्टमेंट सन 1950 के स्टैंडर्ड्स से स्टेट्स में काम करता है जबकि नॉलेज 1000 गुना आगे जा चुकी है. यहाँ तक कि उसी जिले या आसपास स्थित टीचिंग संस्थानों के टीचर्स तक को केमिकल इंजीनियरिंग और साइंस की कोई ख़ास जानकारी नहीं होती. मैंने सुना नहीं आजतक किसी ने भी हरयाणा के किसी भी टीचिंग संस्थान से केमिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी की हो.

15/10/2025

नोबेल पुरस्कार की बाबत लिखना कठिन कार्य

नोबेल पुरस्कार के लिए एक खोज को चयित करना वास्तव में कठिन काम है. दुनिया में दस हज़ार के लगभग ऐसे जर्नल हैं जो विज्ञान की नवीनतम जानकारी को प्रकाशित करते हैं. इनकी प्रकाशन अवधि पहले अनियत होती थी, लेकिन शोध कार्य में जबरदस्त इजाफे और प्रकाशन के तकाज़े के कारण पहले तीन महीना या माहवार प्रकाशित होने वाले जर्नल्स ने अपनी आवृति घटकर पाक्षिक और फिर साप्ताहिक कर ली. तकाज़े की एक वजह खोज के लिए श्रेय है. इसलिए एक कहावत भी चल निकली कि 'पब्लिश ऑर पेरिश' अर्थात या तो तुरत प्रकाशन करवा लें या फिर कहीं के न रहें'. प्रकाशन के लिए एक उपयुक्त जर्नल का चुनाव इसकी रेप्युटेशन, इम्पैक्ट फैक्टर और सर्कुलेशन एवं आवृति से ताल्लुक रखता है. प्रकाशन हेतु लेखों की आवक संख्या बढ़ने के बाद इनके प्रकाशन में साल भर का समय लगने लगा जिससे लेखक के शोधकार्य को अपनी बिरादरी में मान्यता हेतु हानि होती थी. तब साधन संपन्न जर्नल्स ने न केवल प्रकाशन की अवधि साप्ताहिक कर दी अलबत्ता क्रमशः महत्व अख्तियार करते गए नए विषयों और इनमें शोध की मात्रा बढ़ने के कारण अनेक नए प्रकाशन (सिबलिंग या सिस्टर पब्लिकेशन्स) शुरू करने पड़े. इससे भी काम न चला तो महत्वपूर्ण पेपर्स को ऑनलाइन, अडवांस पेपर के रूप में प्रकाशित करना पड़ा और साथ में अगले अंक के लिए पाइपलाइन में डाले गए लेखों के टाइटल भी दिए जाने लगे.

साप्ताहिक या महीने भर की अवधि में प्रकाशन हेतु जितने रिसर्च पेपर्स और अन्य प्रकार की सम्बंधित सामग्री 20 प्रतिष्ठित जर्नल्स में आजकल प्रकाशित होती है इसकी ट्रैकिंग करना और पढ़ना ही एक चुनौतीपूर्ण काम है. किस लेख को पढ़ें और, किसे छोड़ें यह फैसला करना नामुमकिन है, इसलिए अत्यधिक प्रासंगिक जो प्रतीत होता है -क्योंकि सूचना का निर्गम एक अत्यंत प्रतियोगी स्थिति है, उसे ही एक कम्यूनिकेटर या विज्ञान लेखक आगे आमजन के पढने हेतु सेलेक्ट करके प्रेषित करने के लिए उद्धत होता है. इससे आगे प्रकाशन -दैनिक, पाक्षिक या माहवार, के एडिटर पर निर्भर है कि वह उसे भेजी सामग्री का उपयोग करने का फैसला ले या, न ले. उसकी परसेप्शन महत्वपूर्ण है. आमतौर से यह ज्ञात स्रोत-व्यक्ति से लेना ही श्रेयस्कर माना जाता है. हिंदी के अखबारों के विज्ञान के लेख पढ़ने वाले पाठकों की संख्या शायद दो प्रतिशत भी न होगी, लेकिन सामग्री में विषयों की विविधता बनाए रखने के लिए संपादक अपने विवेक से सभी प्रकार से और, विविध विषयों की अच्छी सामग्री का प्रकाशन करने की नीयत रखते हैं.

नोबेल पुरस्कार के लिए एक शोध कार्य का चयन एक कठिन और लम्बी प्रोसेस के जरिये से होता है. यह एक नयी डिस्कवरी के लिए नहीं परन्तु एक ऐसी डिस्कवरी के लिए दिया जाता है जोकि 30-40 बरस पहले की गयी थी और जिसके बाद इसी विषय पर आगे जो भी शोध कार्य हुआ उसने ही इसकी अहमियत बनाई. चयित शोधकार्य एक ऐसी खिड़की खोलता है जिसके उस पार की दुनिया में क्या है, कैसे है, क्यों है, जैसे सवालों का जवाब मिलता है. इन सवालों को पैदा करने के लिए आगे के बुद्धिजीवियों के योगदान से ही मूल कार्य या खिड़की खोलने वाले व्यक्ति के काम की अहमियत साबित होती है. पुरस्कृत कार्य से आगे हुए कार्य और पुरस्कार की घोषणा पहले हुए ऐतिहासिक कार्य का लेखा-जोखा मालूम करने से ही एक व्यक्ति यह बता सकता है कि पुरस्कार देना जायज कैसे है. चूंकि मीडिया में स्पेस भी एक कम्पीटीटिव कमोडिटी है, इसलिए एक शोधकार्य के विगत परिप्रेक्ष्य और इसकी अहमियत को संक्षिप्त में बताया जाना एक और चुनौती है जिसे कम्यूनिकेटर को फेस करना होता है. ऐसे पॉपुलर स्टाइल के लेख की संरचना सावधानी से, उपयुक्त शब्दों और सही वाक्यरचना से करनी होती है. प्रीसायिज़ कम्युनिकेशन के नियम को फॉलो करने और वैज्ञानिक शब्दावली की जटिलता के कारण लेख को अधिक विस्तार नहीं दिया जा सकता. मालूम नहीं पाठकों के पल्ले कुछ पड़ता भी है या नहीं, लेकिन लेख बनाना और छापना भी जरूरी है ताकि घटनाओं और इनकी अहमियत से कोई अनजान न बना रहे. वर्ष 2025 के नोबेल पुरस्कारों के बारे में मैंने पहले 4500 शब्दों का लेख पॉपुलर स्टाइल में बनाया. इसे लिखने या ड्राफ्टिंग का काम मैंने 10 अक्टूबर को पूरा कर लिया क्योंकि तब तक फिजियोलॉजी या मेडिसिन, फिजिक्स और केमिस्ट्री के नोबेल पुरस्कारों के चयित वैज्ञानिकों के नामों की घोषणा हो चुकी थी. इन लेखों के लिए मुझे विपुल मात्रा में सम्बंधित सामग्री को खोज कर पढ़ना पड़ा. एक दिन इसकी एडिटिंग और फैक्ट्स को क्रॉस-चेक करने में लग गया.

मैंने इस लेख को दो हिस्सों में कर दिया: पहले में फिजियोलॉजी या मेडिसिन और दूसरे हिस्से में फिजिक्स और केमिस्ट्री वाले पुरस्कारों का जिक्र किया. इस तरकीब ने भी दोनों लेखों में से प्रत्येक को 2300-2400 शब्दों का बना डाला. यह एडिटर की मेहरबानी रही कि उन्होंनें एक शब्द का बदलाव किये बिना ही कंटेंट को जस का तस इस्तेमाल किया. पहला लेख भी मैंने फेस बुक पर पोस्ट किया है. दूसरा भी पोस्ट किया है. अमूमन एक सीक्वेंस में दो दिन लगातार कोई अखबार एक ही व्यक्ति के एक ही घटना से सम्बद्ध लेखों का प्रकाशन नहीं करता. इस मामले में फीडबैक का अभाव बहुत है. हालांकी दो लेख लिख दिए हैं लेकिन, इस बारे अध्ययन अभी तीन-चार तक जारी रखा गया. बैकग्राउंड के लिए कुछ और सूचनाएं आठ-दस सम्बंधित शोधपत्रों से और कुछ ऐसी किताबों से मिलीं जिन्हें अमरीका और ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने सन 1925 के बाद प्रकाशित किया. विषयों की बेसिक जानकारी से इन्अहें पढ़कर ही अवगत हुआ जा सकता है, अन्यथा पुरस्कृत शोध क्या है इसे समझा नहीं जा सकता. ठीक से पूरे सम्बंधित साहित्य का अध्ययन किया जाये तो एक बरस का समय लग सकता है. फिर तो, तत्काल लेख बनाया नहीं जा सकता. ऐसा है तो एक किताब ही लिखनी पड़ेगी. लेकिन मुझ जैसे को तीस लाख की रॉयलटी कौन देगा? रु30 हज़ार मिल जाएँ यही बड़ी बात है.

इससे पहले ऐसी एक घटना तब हुयी थी जब नवभारत टाइम्स, दिल्ली के प्रधान संपादक माननीय विद्यानिवास मिश्र जी थे. अब मुझे ठीक से याद नहीं, यह शायद वर्ष 1991की बात हो सकती है. विज्ञान से जुड़ी हुयी संसदीय समितियों की कार्यप्रणाली के बारे में एक लेख बनाकर मैंने इन्हें खुद जाकर दिया था. उन्होंनें लेख ले लिया और मुस्कराते हुए 'ठीक है' कहा. अगले दिन इन्होंनें इसका पहला भाग और, दूसरा भाग इससे अगले दिन प्रकाशित कर दिया था. प्रसंगवश बता दूं कि इस वक़्त दैनिक हिंट के प्रधान संपादक श्री शम्भुनाथ शुक्ल हैं जो कभी जनसत्ता अखबार के वरिष्ठ पत्रकारों में से एक हैं. पत्रकारिता के एक स्तम्भ के रूप में इनकी पहचान है. मुझ पर इनकी कृपादृष्टि 35 वर्षों से बनी हुयी है. इन्हीं ने वर्ष 2025के लिए घोषित किये गए नोबेल पुरस्कारों के बारे में मेरे दो लेख तुरत प्रकाशित कर दिए.

15/10/2025

मानव मस्तिष्क प्रसन्नता और आनंद के लिए नहीं
सुरक्षा के लिए बना है

हमारे मनीषी और बौद्ध महंत योगी ही यह जानते थे कि मनुष्य के मस्तिष्क का क्रमशः विकास किस काम के लिए हुआ है. उन्होंनें मस्तिष्क की अपार क्षमताओं के अनेक रहस्य जान लिए थे. हमारे मनीषियों ने हमें समझाया कि मस्तिष्क का वास्तिविक काम मन या शरीर को खुश या प्रसन्न रखना नहीं है. अर्थात नेचर ने इसे प्रसन्नता उत्पन्न करने के लिए डिजाईन नहीं किया बल्कि तकलीफ सहने के लिए किया. मस्तिष्क के काम को न्यूरोफिजियोलॉजिस्ट्स ने अभी तक जितना भी समझा है वे उस दर्शन को शायद अनजाने में इग्नोर करते हुए इसकी अंता दृष्टि को अप्लाई करना याद नहीं रखते जो वास्तव में इसके एव्ल्युशन से सम्बंधित है. इस रहस्य को न्यूरोफिजियोलॉजिस्ट्स ने अभी पहचाना है इसे एडमिट किया है.

मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र का काम वास्तव में यह सुनिश्चित करना है कि आप सुरक्षित हैं और रहे. इसका मतलब है कि खुशी की तलाश करने के बजाय, आपका मस्तिष्क लगातार संभावित खतरों की तलाश में रहता है. मस्तिस्क में एक्साइटेशन अर्थात उत्तेजना का आभास (न्यूरोकेमिस्ट्री के अनुसार न्यूरो-ट्रांसमीटर्स अर्थात केमिकल सब्सटांसेस जिन्हें शरीर के स्नायु या तंत्रिकातंत्र की कोशिकाएं अलग-अलग तरह के न्यूरॉन संश्लेषित करते हैं. संश्लेषित होकर ये ब्लड में सर्कुलेट होते हैं और टिश्यू पर असर डालते हैं. जो थ्योरी एक व्यक्ति पर लागू होती हैं वही थ्योरी राष्ट्रों पर भी अप्लाई होती है. आप किसी भी देश को देख लीजिये, वे हर बात के लिए अस्तित्व का संघर्ष करते दीखते हैं और इस प्रक्रिया में एक दुसरे को नष्ट करते हुए भी. रूस-उक्रेन, भारत पाकिस्तान, पाकिस्तान-अफगानिस्तान, ड्रग माफिया और सरकार या कोई कातिल, सभी एक ही थ्योरी के अनुसार काम करते हैं. जीव चाहे एक वायरस है या उन्नत से उन्नत मस्तिष्क वाला मनुष्य या बौद्धिक उन्नति से टेक्नोलॉजिकल ताकत में उन्नत देश, सभी का व्यवहार एक जैसे सिद्धांतों से चलते हैं. जो ताकतवर है वह कमजोर को मौक़ा लगते ही मार देगा. इस मौके को पहचान कर प्रतिद्वंद्वी को जो पहले मार देता है वही सर्वाइव करता है.

15/10/2025

महिलाओं में गठिया का प्रकोप

मनुष्य और अन्य जीव जंतुओं के शरीर प्रतिरक्षा सिस्टम को समझने के लिए सन 1900 के बाद से बहुत रिसर्च हुयी है. फिजियोलॉजी ऑर मेडिसिन में जिन तीन वैज्ञानिकों को वर्ष 2025 के लिए नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुयी हैं उनके शोधकार्य ने शरीर के इम्यून सिस्टम की बारीकियों के बारे में नवीनतम जानकारी पैदा की है जिसका सम्बन्ध पेरिफेरल इम्यून टॉलरेंस से है. बताया गया कि हमारे प्रतिरक्षा सिस्टम में जो दो किस्म के -थाइमस डीरायिव्ड या 'टी', और 'बी', के सेल्स बनते हैं इनमें से 'टी' सेल्स का एक और उप-उत्पाद टी-रेगुलेटरी सैल होता है जो एक ख़ास किस्म की प्रोटीन का उत्पादन करके प्रतिजनों से चिपक कर इन्हें या तो मारने लिए या अग्नोर करने के लिए प्रेरित करता है. इस प्रोटीन का उत्पादन डीएनए पर मौजूद एक ख़ास किस्म का जीन-खंड करता है. इस पूरी प्रक्रिया का ही उक्त तीन वैज्ञानिकों ने पता लगाया है. यह अध्ययन ऑटो-इम्यून बीमारियों जैसे कि गठिया या रूमेटॉइड आर्थराइटिस की चिकित्सा में सहायक हो सकता है. किस तरह से इस प्रक्रिया को रोकने के इन्हिबिटर्स का विकास किया जायेगा यह ड्रग इंडस्ट्री पर निर्भर करता है.
इस सिलसिले में नेचर पब्लिशिंग ग्रुप ने सिस्टम्स बायोलॉजी एंड एप्लीकेशन्स के अंतर्गत एक रिसर्च पेपर-Immunopeptidomics for autoimmunity:
unlocking the chamber of immune secrets, सन 2025 में प्रकाशित किया है जिसमें इस बारे विस्तार से चर्चा है. इस शोधपत्र में बताया गया है कि टी कोशिकाएँ मेजर हिस्टोकंपैटिबिलिटी कॉम्प्लेक्स (एमएचसी) या ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (एचएलए) कॉम्प्लेक्स पर प्रस्तुत स्व-एपिटोप्स को पहचान कर कई स्वप्रतिरक्षी विकारों की रोगजनन में मध्यस्थता करती हैं.
विभिन्न स्वप्रतिरक्षी विकारों में टी कोशिकाओं को प्रस्तुत किए जाने वाले अधिकांश स्वप्रतिजन ज्ञात नहीं हैं, जिससे स्वप्रतिजनों की पहचान में बाधा उत्पन्न हुई है. इम्यूनोपेप्टिडोमिक्स में हालिया प्रगति ने एमएचसी पर प्रस्तुत प्रतिजनी एपिटोप्स के संग्रह को उजागर करना शुरू कर दिया है.
मनुष्य में यह छः नंबर के क्रोमोसोम पर यह डीएनए अवस्थित है और यहीं से मनुष्य के नर्वस सिस्टम की कोशिकाओं पर असर डालने वाले माइलिन बेसिक प्रोटीन का उत्पादन करता है. कई स्वप्रतिरक्षी रोगों में, इम्यूनोपेप्टिडोमिक्स ने नए स्वप्रतिजनों की पहचान की है और स्वप्रतिरक्षा के पीछे के तंत्रों की हमारी समझ को बढ़ाया है. विशेष रूप से, इम्यूनोपेप्टिडोमिक्स ने एचएलए एलील्स द्वारा उत्पन्न आनुवंशिक जोखिम को समझाने के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान किए हैं. संभावित स्वप्रतिजनों की खोज के लिए इम्यूनोपेप्टिडोमिक्स का लाभ कैसे उठाया जा सकता है इस बाबत इस पर्चे के शोधकर्मियों ने टाइप 1 डायबिटीज़ (T1D), सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (SLE), और रूमेटॉइड आर्थराइटिस (RA) में इम्यूनोपेप्टिडोमिक्स के अनुप्रयोग पर प्रकाश डाला है. यह समीक्षा शोध स्वप्रतिरक्षा को समझने के लिए इम्यूनोपेप्टिडोमिक्स के उपयोग हेतु एक महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करता है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के बारे में अभी बहुत कुछ अज्ञात ऐसा है जिस पर और भी शोध करने की जरूरत है. पिछले 125 सालों में बाबत काफी जानकारी जुटायी गयी है, फिर भी हम सब कुछ नहीं जानते. ऑटो-इम्यून बीमारियों की चिकित्सा की कोशिश तो होती है, लेकिन अधिक कामयाबी नहीं मिलती और लोग इन बीमारियों के कारण कंडम हो जाते हैं. गठिया-बाव तो बहुत ही घटक तरीके से शरीर की हड्डियों और मांसपेशियों पर हमला करता है.
यह अत्यधिक चिंता की बात कि ऑटो-इम्यून बीमारियों से महिलायें अपने शरीर की बनावट के कारण और जीवन शैली की वजह से अधिक संख्या में पीड़ित होती हैं. हम अपने पड़ौस में ही 55 वर्ष से अधिक की महिलाओं में मोटापा और गठिया रोग से पीड़ितों को देख सकते हैं. इन्हें चलना भी मुश्किल हो जाता है. घरेलू महिलायें हल्का व्यायाम भी नहीं कर पातीं. कुछेक तो ऐसे परिवेश में जीने को बाध्य हैं जिन्हें घर से निकलना और टहलना भी सुलभ नहीं है. खुली जगहें हैं ही नहीं और ट्रैफिक वें प्रदूषण इतना है कि ये सुबह भी ठीक से नहीं टहल पातीं. समस्या विकराल है, लेकिन उपाय तो जागरूक रहकर करने ही होंगें. सिर्फ रिसर्च या दवा से कुछ ख़ास नहीं होने वाला.

15/10/2025

विलंबित पोस्ट मॉर्टम सम्बन्धी परेशानियां

हरयाणा में एक उच्च पुलिस अधिकारी द्वारा एक सप्ताह पहले सर में खुद मार कर खुदकशी कर ली थी. मृत देह का पोस्ट मॉर्टम अभी तक नहीं किया गया है. फॉरेंसिक साइंटिस्ट्स के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहेगा क्योंकि एक सप्ताह के अन्तराल में शरीर की बायोकेमिस्ट्री में काफी बदलाव हो जाता है. मालूम नहीं है कि मृत देह से मृत्यु होने के दो घंटे के भीतर टिश्यू और ब्लड सैंपल्स लेकर इन्हें संरक्षित किया गया या नहीं. शायद नहीं. इस बारे में विज्ञान क्या कहता है इसे भी देखें:
मृत्यु के परिणामस्वरूप शरीर के सभी ऊतकों में व्यापक जैव रासायनिक परिवर्तन होने की संभावना होती है, जिसके कारण परिसंचारी ऑक्सीजन की कमी, एंजाइमी प्रतिक्रियाओं में परिवर्तन, कोशिकीय क्षरण और उपचय चयापचयों के उपचय उत्पादन का बंद होना शामिल है. ये जैव रासायनिक परिवर्तन मृत्यु के बाद के समय (मृत्यु के बाद का अंतराल) को अधिक सटीक रूप से निर्धारित करने में मदद करने वाले रासायनिक मार्कर प्रदान कर सकते हैं, जिसे वर्तमान अवलोकन-आधारित विधियों से स्थापित करना चुनौतीपूर्ण है. अध्ययन में, जानवरों के शवों (चूहे और सूअर) से लिए गए रक्त और इन विट्रो में संग्रहीत चूहों और मनुष्यों के रक्त में 96 घंटे की अवधि में रक्त pH और छह चयापचयों (लैक्टिक अम्ल, हाइपोक्सैंथिन, यूरिक अम्ल, अमोनिया, NADH और फॉर्मिक अम्ल) की सांद्रता में परिवर्तन की जाँच की गई. मृत्यु के बाद सभी छह चयापचयों का pH और सांद्रता बदल गई, लेकिन परिवर्तन की सीमा और दर अलग-अलग थी. शवों में रक्त pH 7.4 से घटकर 5.1 हो गया. हाइपोक्सैंथिन, अमोनिया, NADH और फॉर्मिक अम्ल की सांद्रता समय के साथ बढ़ी और ये चयापचय पदार्थ मृत्यु के बाद के अंतराल के संभावित मार्कर हो सकते हैं. लैक्टेट की सांद्रता बढ़ी और फिर उच्च स्तर पर बनी रही, और चूहे में सांद्रता में परिवर्तन मानव और सूअर की तुलना में भिन्न थे. यह मृत्यु के बाद होने वाले बहुविध उपापचयी परिवर्तनों का पहला व्यवस्थित अध्ययन है और यह होने वाले परिवर्तनों की प्रकृति और सीमा को प्रदर्शित करता है, साथ ही मृत्यु के बाद के अंतराल का अनुमान लगाने के लिए संभावित संकेतकों की पहचान भी करता है.
उक्त एबस्ट्रेक्ट सन २०१३ में पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ़ साइंस में प्रकाशित हुए अध्ययन Biochemistry Changes That Occur after Death: Potential Markers for Determining Post-Mortem Interval से लिया गया है.
हरयाणा में आईपीएस अधिकारी और एडिशनल डायरेक्टर जनरल के पद पर तैनात वाई.पूरण कुमार द्वारा खुदकशी किये जाने से पुलिस विभाग में अफसरशाही में भ्रष्टाचार, दुराचार और आपसी वैमनस्य की प्रक्रियाओं को खोजा जाना और इनका डॉक्यूमेंटेशन जरूरी हो गया है. हरयाणा में आईपीएस अधिकारीयों की भीड़ है और आर्थिक एवं अन्य अपराधों के बढ़ने की वजह, प्रतियोगिता और धनलिप्सा, पॉलिटिकल इंटरफेरंस, नेपोतीज्म, पॉलिटिकल संरक्षणवाद, जातिवाद और मुफ्त एवं मामूली खर्चे वाली सरकारी सुविधाओं ने अधिकारीयों के मिजाज़ में बहुत गड़बड़ पैदा की है. नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद और मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री अकादमी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन में क्रमशः जिन आईपीएस और आईएएस अफसरों को शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाता है, उनमें शानदार ट्रेनिंग दी जाती है. साथ में यह भी सिखाया जाता है कि मौजूदा राजनैतिक परिवेश से प्रभावित होने के बावजूद खुद को कैसे 'बचाया' या साफ़ रखा जा सकता है. लेकिन बहुत से अधिकारी राजनीति करने वालों और धनाढ्यों के दबाव को सहन नहीं कर पाते. ये टूट जाते हैं, या भृष्ट हो जाते हैं. इसीलिए बहुत से अधिकारी खुद को सचिवालय या कलर्की वाले काम में लगा लेते हैं. कोई विरला ही आईपीएस या आईएएस अधिकारी ऐसा होगा जिसकी संतान मल्टीनेशनल कारपोरेशनों या भारतीय संस्थानों में उच्च पदों पर काम न करती हो या विदेश में शिक्षित न हुयी हो और वहीं बस गयी है या फिर आईपीएस और आईएएस की सेवा में न आयी हो.
कल के द ट्रिब्यून अखबार में भाई राजबीर देशवाल, जो खुद हरयाणा में उच्च पुलिस अधिकारी रहे, ने एक उत्कृष्ट लेख लिखा है जिसका छायाचित्र संलग्न है. पुलिस सेवा में उच्चाधिकारी वर्ग में हालात बहुत खराब हैं. इनका समाज पर और समाज का इन पर जो असर पड़ता है उसे आमजन और खुद इनके परिवार को भी खामियाजा भुगतना पड़ता है. हालत ऐसे हैं जो कॉलोनियल इंडिया से भी बदतर हो गए हैं. पूरण कुमार की खुदकशी को जातीय विद्वेष या वैमनस्य के लेंस से देखने से असली हालात आर पर्दा पड़ा रहेगा. आज ही इस वाकये से जुड़े एक सब-इंस्पेक्टर ने भी खुदकशी कर ली है. इस चेन-रिएक्शन में न जाने कितने औरों की बलि चढ़ेगी, लेकिन मुझे यकीन है कि पुलिस सिस्टम में जो महत्वपूर्ण कड़ी मनुष्य की है, उसे कोई रहत नहीं मिलेगी.

बुरी हालत में भारतीय लोगों की आहार शैली परंपरा से भारत के लोगों द्वारा उपयोग किये जा रहे आहार में प्रोटीन की कमी क्यों ह...
11/08/2025

बुरी हालत में भारतीय लोगों की आहार शैली

परंपरा से भारत के लोगों द्वारा उपयोग किये जा रहे आहार में प्रोटीन की कमी क्यों होती है. भारत भूमि पर रहने वालों के लिए खाद्यान्न और आहार के अन्य स्रोत जोकि ज्यादातर निरामिष हैं और वानस्पतिक स्रोत आधारित हैं की क्रमशः विकास यात्रा देखी जाए तभी बात समझ में आती है अर्थात हमें अपने आहार स्रोतों की एक-एक करके एव्ल्युश्नरी जर्नी ट्रेस करनी चाहिए. वानस्पतिक स्रोत के अलावा हमारे नियमित आहार में पशु से मिलने वाला दूध भी बड़ी मात्रा में इस्तेमाल होता है. वैसे सर्वेक्षण के डाटा के आधार पर देखा जाए भारत के लोगों के आहार में आमिष या मांस-मछली, कीड़े-मकौड़े आदि की अंश बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन आहार प्रेफ्रेंस सम्बन्धी आदतों में बदलाव होने से अब बहुत लोग दोहरे किस्म का भोजन लेने लगे हैं या आहार में आमिष की मात्रा बढ़ा दी है.

भारतीय लोग अगर जिस्मानी मेहनत नहीं कर पाते हैं या ऐसे अवसर आने पर असहज या असुविधा महसूस करते हैं या फिर दिनचर्या के कारण 40 मिनट के लिए भी वर्कआउट नहीं कर नहीं पाते तो मोटापे के लक्षण विजिट होने शुरू हो जाते हैं और ज्यादातर में सेंट्रल ऑबेसिटी दिखाई देने लगती है. अर्थात पेट के आसपास मोटापा दिखाई देने लगता है. भारतीय लोग आहार में घी और खाद्य तेलों का बहुत प्रयोग करते हैं क्योंकि यह ऊर्जा का स्रोत है. उदाहरण के लिए कहें तो सेंट्रल और वेस्टर्न इंडिया में बाजरा का उपयोग रोटी और खिचड़ी बनाने के लिए किया जाता है और परम्परा यह है कि इसमें चिकनाई कम होने के कारण इस फ़ूड का निगलना कुछ कठिन है. इसे स्वादु और नरम बनाने अर्थात पैलेटीबिलिटी के लिए इसमें प्रति सौ ग्राम मात्रा में 20 ग्राम घी डालने का रिवाज हो गया है. खिचड़ी में घी न डालें तब भी ताज़ा दूध में छाछ मिला कर लिया जाता है. बाड़मेर और बीकानेर के गावों के अलावा दक्षिण-पश्चिम हरयाणा के देहात में अक्टूबर से लेकर होली के त्यौहार तक डाइट में बाजरा से बने हुए आहार की मात्रा 50 प्रतिशत तो होती ही है. बाजरा, गेहूं से अधिक पौष्टिक मान वाला खाद्यान्न है. हमारी पॉपुलेशन में आज से 60-70 साल पहले ज्यादातर लोग देहात में शारीरिक परिश्रम करते हुए खेती एवं पशुपालन का काम किया करते और श्रम की मात्रा मध्यम से से अधिक थी जिसमें कम से कम 2000 किलोकैलोरी प्रदिदिन खर्च होती थी. इसके मुकाबले में आज देहात में यह खपत 1200 कैलोरी और शहरों में शायद 800-1000 कैलोरी ही रह गयी है जबकि आहार से हम प्रतिदिन 1800 से 3000 कैलोरी लेते हैं. बाकी की ऊर्जा या तो व्यर्थ हो जाती है या ऑबेसिटी, डायबिटीज टाइप-2 और हृदवाहिकीय तकलीफों को जन्म देती है.

भारत में सन 1971-1973 के बाद से फ़ूड एटलस और न्यूट्रीशन एटलस का रिविजन नहीं हुआ है. अब यह पोषण एटलस हो गया है. जो भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद - राष्ट्रीय पोषण संस्थान द्वारा विकसित एक ऑनलाइन सूचना विज्ञान संसाधन है। पोषण एटलस एक एकीकृत ज्ञान मंच के माध्यम से विभिन्न स्रोतों से भारत में पोषण संबंधी डेटासेट तक आसान पहुँच प्रदान करता है, जो विज़ुअलाइज़ेशन और मानचित्रण क्षमताओं से सुसज्जित है और आगे के अध्ययनों को डिज़ाइन करने, हस्तक्षेपों की रणनीति बनाने और डेटा को नीति में बदलने के लिए अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकता है. इसमें आहार को लेकर रीजनल रैंडम सर्वे, खाद्य तेलों और घी की खपत, कंज्यूमर सर्वे, डिजीज सर्वे, माइक्रो न्यूट्रीएन्ट डेफिशियेंसी इन इंडियन्स सर्वे, डायबिटीज एंड हार्ट फेलियर एवं कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ सर्वे, और फ़ूड चॉइस सर्वे. इसके अतिरिक्त न्यूट्रीटिव वैल्यू ऑफ़ इंडियन फूड्स और रिकमेंडेड डाइटरी अलाउंसेस फॉर इंडियन्स उपलब्ध हैं. इंडस्ट्री प्रोसेस्ड और इंडस्ट्रियली अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड्स के बारे में न्यूट्रीशन से सम्बंधित रिसर्च का प्रकाशन भी बहुत हुआ है. इसके अनेक आस्पेक्ट्स को उजागर करते हुए क्लिनिकल आस्पेक्ट्स पर बहुत रिसर्च लिटरेचर उपलब्ध है.

आहार को बनाने से पहले हमारे घरों में मेन्यु बनाने का रिवाज़ नहीं है. आमतौर से जो बनाया जाता है उसमें फॅमिली इनकम के हिसाब से परिजनों के स्वाद और एफ़ॉर्डेबिलिटी अर्थात सस्ता है या मंहगा, के हिसाब से डाइट का चुनाव किया जाता है. इसके चलते २४ घंटे के भीतर लिए गए विभिन्न तरह के आहार में सभी तत्वों की संतुलित मात्रा नहीं बनी रहती. आहार में प्रोटीन और रेशे की मात्रा कम रहती है. विकल्प के तौर से आहार में वसा की अधिक मात्रा रहने और नमक, मसाले तेज़ रखने से शरीर को नुकसान पहुंचता रहता है. फलों का सेवन कम करने से क्योंकि ये मंहगे होते हैं. शरीर में जरूरी मिनरल्स और विटामिन्स नहीं पहुंचते. हरी, पत्तेदार सब्जियों का सेवन भी अपेक्षाकृत कम रहता है और चूंकि इनमें फैट या वसा की मात्रा कुदरती तौर से कम रहती है, इसलिए इनमें घी अधिक डाला जाता है. आजकल नैनोफूड्स का प्रचलन भी बारास्ता न्युट्रास्युटिकल्स और इंडस्ट्रियली प्रोसेस्ड फूड्स बढ़ता जा रहा है, इसीलिए देश के लोगों का स्वास्थ्य का स्तर सामान्य से भी नीचे जा रहा है. हमारी ज्यादातर पॉपुलेशन में मसल तो बोन रेशों यूरोपियन लोगों के मुकाबले में कम है. देश का अधिकतर क्षेत्रफल गर्म जलवायु वाला है इसलिए यहां के लोग सुस्त हैं और इनकी कार्यक्षमता भी कम ही है. इसका असर कार्य की मात्रा, गुणवत्ता, खेल प्रतिस्पर्द्धाओं और शारीरिक मुकाबलों में कम रहता है.

भारत में द आर्मी ऑफ़ द ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सिपाहियों और यूरोपियन फौजी अफसरों के लिए डाइट निर्धारण और शांतिकाल में इनके वर्कआउट और वर्क आउटपुट के बारे में अगर हम ऐतिहासिक रूप से विवेचना करें तो पाएंगे कि इन दोनों के शासन काल में फौजी डॉक्टर्स ने सबसे पहले भारत में न्यूट्रीशन रिसर्च की शुरुआत की जिसे सन 1911 में तमिलनाडु के कुनूर में नियमित तरीके से बेरी-बेरी इन्क्वायरी के रूप में स्थापित करते हुए न्यूट्रीशन रिसर्च लैबोरेट्रीज के रूप में शुरू किया गया. सबसे पहले डॉ एक्रोइड ने भारत में उपलब्ध खाद्य पदार्थों की पोषक तत्वों और मान को मालूम किया और तत्पश्चात सेना में यूरोपियन लोगों और भारतीय सैनिकों के लिए डाइट का निर्धारण किया. सैनिटेशन एंड हाइजीन के लिए अलग से मेडिकल बोर्ड बनाया गया. इससे सैनिकों में स्टेमिना बना रहता था. ऐसी फौज के इस्तेमाल से ही सन 1790 के बाद से ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौज ने भारत के अधिकतर राजाओं से युद्ध करके या युद्ध की धमकी देकर इन्हें अपने अधीन कर लिया था. इसका बड़ा असर सन 1911-1914 बीच हुए प्रथम महायुद्ध और सन 1939-1945 के दूसरे महायुद्ध में भारतीय सैनिकों के प्रदर्शन से जोड़ा जा सकता है. सन 1795 से लेकर सन 1911 तक भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश इंडिया की फौज से चुनींदा ब्रिटिश अफसरों की अगुवाई में इंडियन सोल्जर्स का इस्तेमाल करते हुए मध्य एशिया, तिब्बत, चीन, बर्मा और अफ्रीका तक में न केवल मिलिट्री एक्सपीडिशन भेजे गए थे बल्कि अनेक युद्धों में भी भारतीयों सिपाहियों का इस्तेमाल किया गया था. इनका खर्चा भी ब्रिटिश इंडियन गवर्नमेंट उठाया करती.

न्यूट्रीशन और हेल्थ रिसर्च के परिणामों का फायदा भारत में आमजन को सन 1970 तक भी बहुत नहीं मिला. इसके बाद सबसे पहला ध्यान भारत में देहात और शहरों में निवास करने वाले गरीब बच्चों की ओर गया जिनके लिए सन 1975 में इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज की शुरुआत करते हुए देश भर में आंगनवाड़ी केंद्र खोले गए. बाद में मिड-डे मिल्स की शुरुआत भी स्कूलों में की गयी थी जिसके अच्छे परिणाम निकले. इन सबसे अलग है भारतवर्ष के घरों की रसोई में नियमित रूप से बनने वाला भोजन और इस्तेमाल होने वाले खाद्य पदार्थ, इनकी उपलब्धता, गुणवत्ता और मात्रा इसका आमजन की सेहत से ताल्लुक. इस मामले में जबरदस्त उदासीनता दिखाई जाती है जिसे दुरुस्त करने की जरूरत है. यह स्वेच्छा से और जागरूक रहकर खुद ही करना है. लेकिन इसके लिए जरूरी है लोगों को शिक्षित करना या स्वाध्याय करना. इन दोनों उपायों में भी कमी है. लोग खराब आधार खाकर एंटरटेनमेंट करने को तरजीह अधिक देते हैं, वाहियात कामों में समय बर्बाद करते हैं, लेकिन जीवन के लिए जो सबसे जरूरी बातें हैं उनकी बारीकियों से खुद को नावाकिफ रखे हुए हैं. मैंने अनेक बार पुस्तक मेलों में जाकर यह नोटिस किया कि लोग कुकरी बुक्स तो खरीदते हैं लेकिन आहार के बारे में वैज्ञानिक जानकारी वाले किताबें बहुत कम लेते हैं. इस मामले में हमारे मीडिया में अभी तक दकियानूसी बातों का अधिक और वैज्ञानिक रूप से लोकरुचि शैली में बहुत ही कम जानकारी का प्रकाशन होता है.

11/08/2025

फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री या सेहत नाश इंडस्ट्री

हमारे देश के पारंपरिक खाद्यान्नों बाजरा, ज्वार, रागी, जौ और चना की प्रोसेसिंग करके हम जिस प्रकार से भोजन और अन्य आहारों को तैयार करते रहे हैं उस पर फ़ूड प्रोसेसिंग की कुदृष्टि पड़ चुकी है. वे इनसे ब्रेड, बिस्कुट और अन्य कन्फेक्शनरी आइटम्स जोकि ५० से अधिक हो चुकी हैं, बाज़ार में अन्न की कीमत से १०-१५ गुना ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं. हमारे फ़ूड रेगुलेटर जानबूझ कर सोया हुआ है क्योंकि फ़ूड इंडस्ट्री वाले इतने चालाक हैं कि रेगुलेटर की सभी गाइडलाइन्स पर खरे उतर रहे हैं. इसका मतलब है रु.२ प्रतिकिलो के आलू को चिप्स बनाकर रु.४०० प्रतिकिलो जिस प्रकार से पेप्सी और अन्य कंपनियों ने बेचा, उसी तरीके से अब नोट अनाज या मिलेट्स को बेचा जा रहा है. इससे देश के लोगों का पोषण मान बढ़ने से रहा, उलटा कुपोषण और प्रोसेस्ड फूड्स खाने से जिनमें रिफाइंड शुगर और खाद्य तेल मिले होते हैं, सेहत और खराब होगी. चूंकि फ़ूड इंडस्ट्री के पास बेशुमार पैसा होता है, इसलिए वे लुभावने पैक्स और विज्ञापन के जरिये से नए नए हेल्थ कॉन्शस हुए लोगों की जेब भी ढीली करने में पीछे नहीं रहेंगे. न्यूट्रीशन साइंस वाले लोग माथा पकड़ कर बैठे हुए हैं क्योंकि जनता यह सुनती कि देश के बायोमेडिकल साइंटिस्ट्स एक अरसे से कहते रहे हैं इससे गट-माइक्रोबायोम नष्ट हो रहा है, लोगों में आहार के कारण कोलोरेक्टल कैंसर के मामले, डायबिटीज और हृदवाहिकीय रोगों पहले से अधिक और तेज़ी से बढ़ रहे हैं. फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री एक और बुरा काम करने के लिए खुद को मजबूर बनती है और वह है सिंथेटिक केमिकल प्रिज़र्वेटिव प्रोसेस्ड फूड्स आइटम्स में मिला देना ताकि पैक या डिब्बा बंद होने के बाद इनमें सूक्ष्मजीवाणु और फूही या फंगस न लगे. इन लोगों ने कभी यह मालूम ही नहीं किया कि वानस्पतिक स्रोतों से ऐसे आहार संरक्षक हमें मिल सकते हैं जो सेफ या सुरक्षित हैं. इस बारे में की गयी रिसर्च के कमी नहीं है.

उक्त विषय पर मैंने अधिक नहीं तो १० लेख पिछले एक साल में वर्नाक्यूलर मीडिया में प्रकाशित किये हैं. एडिटर का कहना है कि उन्हें कोई फीडबैक नहीं मिलता. लेकिन उन्होंनें लेखों को छापा, यह सोचकर कि कोई तो पढता होगा.
देश के लोगों को स्वाद और लुभावने तुरत आहार चाहियें, परंपरा जाए भाड़ में. सोच यह है कि तुरत आहार नहीं छोड़ना. बीमार होने पर इलाज करा लेंगे. लेकिन वे यह नहीं सोचते कि एक बार अगर मोटापा हो गया, डायबिटीज टाइप-२ और कैंसर हो गया तो इन विकट अवस्थाओं से छुटकारा नहीं मिलेगा. फ़ूड एंड न्यूट्रीशन में भारत एक अग्रणी देश है. नए लोगों के लिए फ़ूड एंड न्यूट्रीशन रिसर्च कोई मायने नहीं रखती. वे इसे इग्नोर कर चुके हैं. भला हो उन घरों की बुजुर्ग महिलाओं का जो आज भी परिजनों के लिए रोजाना साथ-आठ घंटा मेहनत करके परम्परा से आहार तैयार करते हुए अपना जीवन लगा चुका हैं ताकि उनके बच्चे और बड़े सेहतमंद बने रहें.

11/08/2025

मेडिकल हिस्ट्री, ब्रिटिश इंडियन आर्मी और फौजियों की भर्ती

द आर्मी ऑफ़ ईस्ट इंडिया कंपनी के मेडिकल डॉक्टर्स द्वारा भारत में संक्रामक रोगों और अन्य मामलों जैसे कि ट्रॉपिकल डिजीजेज़ पर किये गए अनुसंधान को ब्रिटिश इंडियन आर्मी और इंडियन मेडिकल सर्विस के डॉक्टर्स ने आगे बढ़ाया. उन्होंनें मालूम किया कि भारत और नेपाल में विभिन्न प्रदेशों में रहने वाले चार प्रमुख नस्लों -नार्थवेस्टर्न प्रोविन्सस में रहने वाले जाट, राजपूत और रांघड़, बंगाली, मद्रासी, मराठा, तमिल, और गोरखा लोगों में बैक्टीरियल डिजीजेस के प्रति क्या रेस्पोंस है. इनकी खुराक क्या है, रहन-सहन के स्थान का परिवेश कैसा है, पीने के लिए पानी के स्रोत कैसे और कौन से हैं और इनका गट-माइक्रोबायोम इन्फेक्शन के दौरान कैसा व्यवहार करता है. सेना में भर्ती के न केवल ऐसी इनफार्मेशन बल्कि यह भी देखा जाता था कि इनके इलाके में आँखों में होने वाले साधारण रोग जैसे की ट्रेकोमा या डस्ट के कारण आँखें लाल हो जाने की स्थिति कितनी बड़ी है. नेपालियों में ब्रिटिश इंडियन आर्मी और बाद में इंडियन आर्मी में भर्ती किये जाने की एक बड़ी वजह न केवल उनके फेफड़ों का बड़ा साइज़ था बल्कि कॉलरा से प्रभावित न होने की प्रवृत्ति का इनमें कम पाया जाना भी बड़ा कारण था. ब्रिटिश डॉक्टर्स ने गोरखा सोल्जर्स की फिजियोलॉजी को जानने के लिए कई अध्ययन किया जैसे कि इनमें बसाल मेटाबॉलिक रेट जिसकी तुलना ब्रिटिश सोल्जर्स से की गयी थी. भारत में सन 1960 के दशक तक भी कॉलरा एक बड़ा स्कर्ज अर्थात प्रकोप था जिसके कारण लाखों लोगों की मृत्यु हो जाया करती. इनके बारे में सभी रिकार्ड्स मौजूद हैं. ब्रिटिश मेडिकल डॉक्टर्स ही नहीं, बल्कि इंडियन मेडिकल सर्विस के अनेक भारतीय डॉक्टर्स भी उन दिनों न केवल करंट साइंस जर्नल बल्कि ब्रिटिश मेडिकल जर्नल और नेचर पत्रिका में भी लेख एवं रिपोर्ट्स भेजा करते थे जिनका प्रकाशन होता था. जाहिर होता है कि मेडिकल रिसर्च और हिस्ट्री भी फौज में जवानों और अफसरों की भर्ती के लिए जरूरी सूचना का उत्पादन करते हैं. इसके अलावा भारतीयों की एथनोग्राफीकल स्टडीज, एन्थ्रोपोमीट्रिक (शरीर के अंगों का नाप करने की विधा), एन्थ्रोपोलॉजिकल फीचर्स और जियोग्राफी एवं फाइटिंग फिटनेस ने भी भूमिका अदा की थी. इन स्टडीज को ज्यादातर रिस्ट्रिक्टेड या गोपनीय रखा जाता रहा और आमजन से इनका कोई वास्ता न था.

ब्रिटिश लोगों के भारत से चले जाने के बाद इंडियन आर्मी का री-आर्गेनाइजेशन हुआ. तब सन 1950 में छोटे पैमाने पर दिल्ली में डिफेंस साइंस लेबोरेटरी में कुछेक शरीरक्रिया विज्ञानी भारतीय सैनिकों पर अनुसन्धान कार्य किया करते. लेकिन चीन से सन 1962 में हुए युद्ध ने सब बदल दिया. लेकिन इससे एक महीना पहले ही इस छोटे से ग्रुप को बड़ी जिम्मेवारी दी गयी जिसने हाई एलटीट्यूड फिजियोलॉजी, न्यूट्रीशन और बायो केमिस्ट्री पर काम करना शुरू किया. कुछ समय बाद इसे बड़ी लैब बना दिया गया. फिलहाल इसके मैंडेट में उच्च एवं अत्यधिक ऊंचाई की फिजियोलॉजी, गर्मी, ठंड और ध्रुवीय फिजियोलॉजी, व्यायाम फिजियोलॉजी, न्यूरोफिजियोलॉजी, प्रदर्शन सुधार के लिए योग और एडाप्टोजेन्स, नैदानिक और कोशिकीय जैव रसायन, भारतीय सैनिकों का मानवमितीय डेटाबेस, सशस्त्र बलों के लिए पोषण, मानव-मशीन इंटरफेस: एर्गोनॉमिक्स, व्यवसाय स्वास्थ्य और विष विज्ञान, हर्बल हस्तक्षेप - फाइटोकेमिस्ट्री, इम्यूनोमॉड्यूलेशन और वैक्सीन एजेंट, जीनोमिक्स और प्रोटियोमिक्स: आणविक मार्कर, बायोमेडिकल इंजीनियरिंग और नैनोटेक्नोलॉजी से सम्बंधित है. जबरदस्त काम हुआ है और हमारे फौजियों की क्षमता और सुरक्षा में बड़ा इजाफा हुआ है.

यह चिंता का विषय है भारत में मेडिकल हिस्ट्री से सम्बंधित सिर्फ एक ही स्कूल हैदराबाद में ओस्मानिया यूनिवर्सिटी में है, और कहीं नहीं. कुछ काम इस बारे में जेएनयू में इतिहास विषय के प्रोफेसर दीपक भट्टाचार्य ने खुद भी किया और अपने पीएचडी स्टूडेंट्स से भी करवाया था. सन 1967 से इंडियन नेशनल साइंस अकादमी, नयी दिल्ली एक जर्नल 'इंडियन जर्नल ऑफ़ हिस्ट्री ऑफ़ साइंस' का प्रकाशन नियमित रूप से करती है. असल में हिस्ट्री ऑफ़ मेडिसिन के लिए एक विभाग इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च में होना चाहिए था. इसके लिए मैंने सन 2012 में एक सुझाव भारत सरकार में स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के तत्कालीन सचिव एवं इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के महानिदेशक को दिया था. लेकिन इस प्रस्ताव पर आगे कार्रवाई नहीं हुयी. यह विभाग मेडिकल आर्काइव्ज के साथ हिस्ट्री ऑफ़ मेडिसिन एंड मेडिकल रिसर्च इन इंडिया पर काम करता. भारत में जो कुछ भी मेडिकल सर्विसेज और अनुसंधान के बारे में काम हुआ है वह अनेक रिपोर्ट्स और जर्नल्स में प्रकाशित हुए लेखों में बंद है. यह भी अत्यंत खेद का विषय रहा है कि भारत में 600 से अधिक विश्वविद्यालयों में स्थापित किये गए इतिहास और पुरातत्व अध्ययन विभागों ने ज्यादातर काम पुरातत्व उत्खनन और डायनेस्टीकल हिस्ट्री पर ही किया, विज्ञान के इतिहास पर कभी नहीं. इससे अच्छा तो देश में पहले दौर में स्थापित किये गए इंडियन इंस्टिट्यूट्स ऑफ़ टेक्नोलॉजी ही हैं जिनमें से कुछ ने भाषा शास्त्र और हिस्ट्री ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी पर कुछ काम किया. यह भी तब हुआ जब इनकी फैकल्टी में कुछ ऐसे लोग रहे जिन्हें इन दो विषयों को लेकर गहन रुचि थी. वह पीढ़ी अब रिटायर हो चुकी है या सिधार गयी है. यह संतोष का विषय है कि ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज में गए कुछ भारतीय प्रोफेसर इस दिशा में कुछ कम कॉलोनियल पीरियड से सम्बंधित दिनों में क्या हुआ, इस पर कर चुके हैं और कर भी रहे हैं. इसलिए मेरा मानना है कि यूजीसी को अपने अंतर्गत सभी विश्वविद्यालयों में इतिहास विभागों की री-मॉडलिंग करनी चाहिए और इनका मैंडेट फिर से तय किया जाना चाहिए. इन लोगों ने डायनेस्टीकल हिस्ट्रीज पर बहुत काम कर लिया और अब यह 95 प्रतिशत तक बंद हो जाना चाहिए क्योंकि मुझे लगता है ऐसे काम में रुचि रखने वाली फैकल्टी अपना समय बर्बाद करती है. बदलाव की यह प्रक्रिया कोर्स री-डिजाईन, वर्तमान फैकल्टी के पुनर्प्रशिक्षण और नयी फैकल्टी के तदनुसार भर्ती से संभव हो होगी.

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