15/10/2025
दवा उद्योग में क्वालिटी कण्ट्रोल से नहीं
बेईमानी ख़त्म करने से जाने बचेंगी
कोल्ड्रिफ नाम से कफ सीरप बनाने वाली स्रेशन कंपनी के मालिक को गिरफ्तार करने की कोई अहमियत नहीं है क्योंकि इससे गली-मौहल्लों या सही टेक्नोलॉजी और क्वालिफाइड केमिकल इंजिनियर्स की सेवायें न लेने वाली छुटभैय्या दवा निर्माता कंपनियों में कोई सुधार होने वाला नहीं है. कठोर कानून बनाने से भी कुछ न होगा. अंग्रेजी में एक कहावत है कि 'बुराई की जड़ें बहुत गहरी हैं' अर्थात the malice is deeper than we can think about. वकील जो केस लड़ेंगे या जज जो सुनवाई करेंगे उन्हें केमिस्ट्री की कितनी नॉलेज होती है. वे सिर्फ कॉमन सेंस से काम लेते हैं और बहुत जरूरी हुआ तो एक नजदीकी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर से कुछ सलाह कर लेंगें. पुलिस द्वारा लिखी गयी ऍफ़आई आर रिपोर्ट की कॉपी तो मैंने नहीं देखी, लेकिन मुझे नहीं लगता थाने के मुंशी में ऐसी एक रिपोर्ट लिखने की काबलियत होगी. मुंशी लोग या सीआई भी एक केमिकल साइंटिस्ट नहीं है. इसीमें खामियां हो सकती हैं, तो वकील केस कैसे लडेगा?
असल में सारा मामला टेक्नोलॉजी के स्तर, केमिकल प्रोसस्सेस, क्लीन मैन्युफैक्चरिंग, सही प्रोडक्ट या इन्ग्रेडिएंट्स, परीक्षण और पैकिंग पर निर्भर है. भारत में केमिकल साइंस और इंजीनियरिंग में वर्ल्ड क्लास साइंटिस्ट-इंजिनियर पैदा किये हैं. प्रोफेसर एम एम शर्मा इनमें से एक थे. घटिया या स्तरहीन माल बना कर रिश्वत और संपर्कों के जरिये से इसे बेचने की घटिया मानसिकता के चलते लाखों की संख्या में इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने वाली नासमझ जनता को दवा के बारे में मामूली सी समझ भी नहीं होती. वे सिर्फ डॉक्टर की सलाह और दूकानदार पर भरोसा करके दवा खरीदकर जोखम उठाते रहे हैं. नीयत और नियति को बदलने की ताकत ग्रासरूट्स पर सिर्फ ड्रग इंस्पेक्टर्स की होती है जो सिफारिश से नौकरी पाते हैं. ऊपर से डिस्ट्रिक्स के ज्यादातर सीएमओज हफ्ता वसूली में विश्वास रखते हैं. इन्हें न तो किसी ड्रग की थेराप्यूटिक्स की और न ही ड्रग या किसी केमिकल कंपाउंड की टॉक्सिसिटी का क, ख, ग मालूम होता है. एक ड्रग इंस्पेक्टर की मिनिमम क्वालिफिकेशन पीएचडी होनी चहिये और वह भी केमिकल इंजीनियरिंग विषय में. अब भला 30 हज़ार रुपये अगर कॉन्ट्रैक्ट सैलरी दी जाएगी तो एक बीएससी फेल कैंडिडेट ही इन्हें मिल सकता है. दवा निर्माण को अगर एमएसएमई उद्योग की केटेगरी में डालेंगे तो दवा घटिया ही बनेगी और उपभोक्ता मरते रहेंगे.
मेरा एक मित्र बता रहा था कि सिर्फ हरयाणा के ड्रग स्टोर्स वालों और होलसेल डीलरों से हर साल करीब 200 करोड़ रुपयों की रिश्वत के पैसे की उगाही होती है. त्योहारों पर जैसे कि दीवाली पर किसी भी ड्रग इंस्पेक्टर या डिस्ट्रिक्ट के चीफ मेडिकल ऑफिसर के घर जाकर देखें तो गिफ्ट्स और दारू की इतनी बोतलें मिलेंगी कि एक छोटा ट्रक भर सकता है. इंडस्ट्रियल महकमों के डायरेक्टर और मंत्री-संतरी तक बहुत पैसा बनाते हैं. ऐसे में स्रेशन के मालिक को गिरफ्तार करने मात्र से यह बड़ी बुराई कभी ख़त्म नहीं होने वाली. इसे रोकने के लिए मंत्रालय तो सिर्फ एक रेगुलेटर का काम कर सकता है. हमारे यहाँ मिनिस्ट्री ऑफ़ केमिकल्स और हेल्थ मिनिस्ट्री की दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने में पहली भूमिका है. लेकिन सिस्टम के निचले पायदानों पर बेईमानी, भ्रष्टाचार और गुणवत्ता परीक्षण के बाद मार्केटिंग के हथकंडे अपना कर घटिया और जानलेवा दवाओं का कारोबार खूब चलता है. ऐसे में हमारे वैज्ञानिक संस्थानों और रेगुलेटर की बदनामी होती है. विदेश में भी भारत की ड्रग इंडस्ट्री की मलिन छवि तुरत ट्रांसमिट हो जाती है.
जिला स्तर के अधिकारियों को नौकरी से निलंबित करने या दवा कंपनी के मालिक को सजा देने से कुछ भी नहीं होगा. यह तो सागर में बूँद के समान है. मैंने आजतक किसी ड्रग इंस्पेक्टर को अपने विषय में प्रोफेशनल रिफ्रेशर कोर्स करते नहीं देखा, प्रतिभा निखारना तो दूर की बात रही. अगर एक ड्रग इंस्पेक्टर ईमानदारी से काम करना भी चाहता है तो माफिया उसे जान से मारने की धमकी देता है. फिल्मों ने सिखा दिया है कि व्यक्ति को काबू में करने के लिए उसे नहीं बल्कि परिवार को निशाना बनाना अधिक कारगर है. फिर ड्रग इंस्पेक्टर भीगी बिल्ली की तरह काम करता है. इन्हें पुलिस प्रोटेक्शन भी दी जाए तो भी प्रोटेक्ट नहीं होते. इन्हें न फार्माकोलॉजी और न ही इससे एसोसिएटेड अन्य दस प्रक्रियाओं/विधियों जैसे कि फार्मा कॉग्नोसी और फार्माको काइनेटिक्स के बारे में कोई नॉलेज होती है. हेल्थ डिपार्टमेंट सन 1950 के स्टैंडर्ड्स से स्टेट्स में काम करता है जबकि नॉलेज 1000 गुना आगे जा चुकी है. यहाँ तक कि उसी जिले या आसपास स्थित टीचिंग संस्थानों के टीचर्स तक को केमिकल इंजीनियरिंग और साइंस की कोई ख़ास जानकारी नहीं होती. मैंने सुना नहीं आजतक किसी ने भी हरयाणा के किसी भी टीचिंग संस्थान से केमिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी की हो.