Anil Binwal

Anil Binwal Simple

23/12/2025

हिमालय कौंच (कपिकच्छु) –

वैज्ञानिक नाम: Mucuna pruriens
कुल: Fabaceae
अन्य नाम: कौंच, कपिकच्छु, कौंच बीज, Velvet Bean, Cowitch
प्राकृतिक क्षेत्र: भारत (विशेषकर हिमालयी व उष्ण क्षेत्र), अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया



🌿 पौधे का परिचय

हिमालय कौंच एक लता (climber) है जो पेड़ों या सहारे पर चढ़ती है। इसके फल (फलियाँ) रोएंदार होते हैं, जिनके बाल त्वचा पर लगने से तेज खुजली करते हैं। आयुर्वेद में इसके बीज अत्यंत औषधीय माने जाते हैं।



🍃 पहचान कैसे करें
• पत्तियाँ: बड़ी, तीन पर्णक (trifoliate), हरी
• फूल: बैंगनी/सफेद, गुच्छों में
• फल: मुड़े हुए, घने रोएँदार
• बीज: काले/भूरे, चमकदार



🧪 प्रमुख रासायनिक तत्व
• L-DOPA (Levodopa) – तंत्रिका तंत्र के लिए महत्त्वपूर्ण
• एल्कलॉइड्स, प्रोटीन, खनिज



🌱 आयुर्वेदिक गुण (गुण-धर्म)
• वाजीकरण (शक्ति व वीर्यवर्धक)
• तंत्रिका बलवर्धक
• कामोत्तेजक
• पित्त-वात शमन



🩺 औषधीय लाभ
1. नपुंसकता व यौन कमजोरी में सहायक
2. शुक्राणु संख्या व गुणवत्ता बढ़ाने में उपयोगी
3. पार्किंसन रोग में L-DOPA के कारण सहायक (चिकित्सकीय सलाह आवश्यक)
4. तनाव, अवसाद में तंत्रिका समर्थन
5. शक्ति व सहनशक्ति बढ़ाने में मदद

⚠️ महत्वपूर्ण: औषधि रूप में प्रयोग से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लें।



🍶 सेवन विधि (सामान्य जानकारी)
• बीज चूर्ण: 250–500 mg
• अनुपान: दूध/शहद
• समय: चिकित्सक के निर्देशानुसार



⚠️ सावधानियाँ
• कच्चे बीज विषैले हो सकते हैं
• फलियों के रोएँ त्वचा/आँखों से दूर रखें
• गर्भावस्था, उच्च BP, मानसिक रोग, या दवाइयाँ चल रही हों तो विशेष सावधानी



🌾 खेती/उगाने की जानकारी (संक्षेप)
• मिट्टी: अच्छी जल-निकास वाली
• धूप: पूरी धूप
• सहारा: बेल चढ़ाने हेतु
• सिंचाई: मध्यम
• बीज बोआई: वर्षा ऋतु उत्तम



📜 आयुर्वेदिक ग्रंथों में

चरक व सुश्रुत संहिता में कपिकच्छु का वर्णन वाजीकरण औषधि के रूप में मिलता है।
I love Gardening 👍🏻👍🏻

30/11/2025

प्रश्न ....जगन्नाथपुरी मंदिर का ध्वज हवा के विपरीत दिशा में लहराता है, इसके पीछे कोई पौराणिक तथ्य है या वैज्ञानिक??

उत्तर...प्रेम रसिक संत श्री श्वेताभ जी महाराज

हमारा भारतवर्ष एक महान देश है जहाँ कला संस्कृति विज्ञान ज्ञान आदि का अगाध समुद्र बहता है ।

जब कहीं कुछ नहीं था तब भारतवर्ष उस उन्नत तकनीक से लैस था जिससे कई कई देश प्रभावित थे ।

जब लोग अन्य सभ्यता के लोग जंगलों में नंगे रहकर कच्चा मांस चबाते थे तब हम विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित होकर जो Metallurgy तकनीक की देन थी , कई प्रकार के खनिजों , धातुओं और पदार्थों से युक्त थे ।

हमारा ज्ञान विज्ञान बहुत ही उच्च स्तर का था जो आज भी उस स्तर को विज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता ।

क्योंकि हम आज भौतिक विकास कर रहे हैं लेकिन तब हम भौतिक के साथ साथ रासायनिक , जैविक , आर्थिक और आध्यात्मिक विकास के वृहद स्तर पर थे ।

आज मिहिरावली जिसे आप गुरुग्राम कहते हैं और कुतुब मीनार के नाम से जानते हैं वहाँ लगा लौह स्तम्भ और बिहार में अशोक स्तम्भ की metallurgy आज के वैज्ञानिक तक हल नहीं कर पाए कि ऐसा कौन से धातुओं के मिश्रण का किस specific temperature, कितनी देर और किन धस्तुओं का प्रयोग किया गया कि लौह धातु होते हुए भी आज तक उनमें कोई जंग नहीं लगा ।

आज भी Western Scientists कहते हैं कि अगर ये mettalurgy की पद्धति हमें पता लग जाये तो हम आज बहुत कुछ बदल सकते हैं ।

तो भारत का वास्तुशिल्प बहुत ही उन्नत अवस्था का था ।

आज की तरह माचिस के डिब्बे की तरह मकान नहीं बनते थे ।

मन्दिर सदा Engineering का Masterpiece बन कर रहते थे और उन्हें इस तरह बनाया जाता था कि वह आने वाले वंशजों के लिए बहुत बड़े विश्वविद्यालय का कार्य कर सकें ।

मंदिरों में सभी प्रचलित पद्धतियों का प्रयोग किया जाता था , वहीं ज्ञान विज्ञान के केंद्र रहा करते थे और उन ज्ञान विज्ञान के अंदर घुसकर जब हम लक्ष्य निर्धारण करते हैं या उनका उद्देश्य जानते हैं तो वह हमें गर्भ गृह में मिलता है जहां हमें अंततः भगवान में मिल जाना है ।

आज भी प्राचीन मंदिरों का कोई तोड़ नहीं हैं ।

उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत के सभी मंदिरों को विध्वंस कर दिया गया आततायियों द्वारा ।

दक्षिण के मंदिर अब भी जितने बचे हैं , वह अपने आप में ही प्रत्येक मन्दिर आश्चर्य है ।

कोणार्क का मंदिर सबने देखा होगा या जानते होंगे , वह उतना ही नहीं था जितना आप आज देखते हैं ।

वह विशालकाय मन्दिर था और उसके ऊपर बहुत बड़ा चुम्बकत्व पत्थर लगा था जिसजे कारण बाहरी जितने भी जहाज जो विदेशी होते थे , वह खिंच कर आते और नष्ट हो जाते थे ।

वह मन्दिर ऐसा था कि उसके ऊपर मणियों में सूर्य दैदीप्यमान रहता था ।

सूर्य से सम्बंधित जितने भी मन्दिर बनाये जाते थे , वह ऐसे बनाये जाते थे कि गर्भ गृह में साक्षात सूर्य प्रकट हों , उस तरह के Geometrical पद्धति का प्रयोग किया जाता था ।

आज राम मंदिर में जबरदस्ती तरह तरह के mirror और lens लगाकर सूर्य की किरणें परावर्तित की गई ।

लेकिन हमारे अधिकतर मन्दिर में महीनों महीनों तक जब सूर्य किसी राशि पर भ्रमण करते थे , तो सब जगह से मन्दिर बन्द होने पर भी और गर्भ गृह छोटा और अंदर होने पर भी सूर्य इस प्रकार आवर्तित होते थे मानो साक्षात गर्भगृह में ही प्रवेश कर गए हों ।

आज भी अनेकों मन्दिर हैं , जहाँ का पिलर हवा में लटक रहा है ।

मन्दिर की प्रत्येक सीढ़ी पर सरगम बजाया जा सकता है ।

मन्दिर के बाहर कोई हवा नहीं है लेकिन मन्दिर में प्रवेश करते ही हवा के झोंके से आप लहराने लगेंगे ।

आसपास कहीं भी जल नहीं होगा लेकिन मन्दिर के एक जगह जल का स्रोत बनकर वहीं थोड़ी दूर पर लुप्त हो गया होगा ।

मन्दिर के बाहर घोर गर्मी लेकिन मन्दिर के अंदर प्रवेश करते ही Air conditioner जैसा लगेगा ।

मन्दिर के बाहर बहुत ठंड लेकिन मन्दिर में प्रवेश करते ही गर्मी का अनुभूति ।

एक ही मन्दिर में एक ही जगह खड़े होकर आप कुछ अगर फुसफुसायेंगे तो भी दूसरी जगह जो दूसरा गुम्बद है और बहुत दूर है , वहाँ आवाज़ आएगी ।

एक ही मन्दिर में एक ही जगह आप बोलेंगे तो सामने वाला व्यक्ति कुछ नहीं सुन पायेगा ।

मन्दिर के दीवारों पर न केवल चित्रकारी बल्कि विभिन्न तकनीकियों को प्रदर्शित किया जाता रहा है ।

कर्नाटक में एक मन्दिर के ऊपर इतना भारी विशालकाय पत्थर है कि वैज्ञानिक तक हैरान हैं कि आज बड़े बड़े उपकरणों का भी प्रयोग कर उस पत्थर को इतने ऊपर नहीं पहुँचाया जा सकता ।

मंदिरों की दीवारों के पत्थरों को जोड़ने के लिये किसी भी चूना या अन्य वस्तुओं का प्रयोग नहीं किया गया बस उनमें इस तरह के structure बनाये गए जिससे वह हिल तक नहीं सकते ।

तो हमारा वास्तुशिल्प अद्भुत था ।

और सबसे अधिक जिनमें तकनीक का प्रयोग किया गया , वह थे समुद्र किनारे बनाये हुए मन्दिर ।

जैसे सोमनाथ , कोणार्क , जगन्नाथ मंदिर इत्यादि ।

सोमनाथ को तो नष्ट भ्रष्ट किया गया न जाने कितनी बार ।

जो आप सोमनाथ मंदिर आज देखते हैं न , वह वास्तविक नहीं है ।

वह तो बहुत भव्य था ।

वह मन्दिर इस तरह बनाया गया था कि चन्द्रमा स्वयं पूर्णिमा तक भगवान का अभिषेक करते थे , मतलब साक्षात चन्द्रमा की छवि शिवलिंग पर अंकित होती थी और शिवलिंग दूधिया चाँदनी से नहा जाता था ।

लेकिन अभी तो उसको किसी तरह जीर्णोद्धार करके इस तरह बना दिया गया ।

ऐसे ही यह जगन्नाथ मन्दिर है जो वास्तुकला और Engineering का अद्भुत नमूना है ।

जिसने घूस देकर पढ़ाई नहीं की होगी , वह Aerodynamics का सिद्धांत समझता होगा अवश्य ।

उस मन्दिर का शिखर और उसके ऊपर जो नक्काशियां हैं , साथ ही साथ उसके साथ लगे हुए तीन छोटे जो शिखर बनाये गए हैं , वह पूरे Aerodynamics के सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाये गए हैं ।

आप लोगों ने Eddie Current Flow पढ़ा होगा और समझा होगा ।

यह उसी का प्रभाव है ।

याद करिये किसी ने बचपन में खेतों में पानी जाते हुए देखा होगा ।

मेड़ों की नालियों से बहता हुआ पानी जब खेतों में जाता है तो जहाँ वह खेतों में प्रवेश करता है , बीच में बहुत तेजी से flow करता है , लेकिन side में किनारे जो पानी रहता है , वह पानी के external force से विपरीत दिशा में बहता है और जिधर से पानी का flow आ रहा होता है , उसी की ओर बहता है ।

ये तो हुई किनारे की बात ।

अब इसी पानी के बीच में एक Barrier लगा दीजिये जैसे मन्दिर का ऊँचा शिखर ।

अब क्या होगा दोनों ओर पानी force से बहेगा लेकिन बीच में जहाँ barrier लगा है , वहाँ पानी उल्टी direction में बहेगा या तो फिर गोल गोल घूमेगा ।

इसे ही Eddie current flow phenomena बोलते हैं ।

यह Aerodynamics का सिद्धांत है ।

Aeroplane इसी कारण उड़ता है ।

उसकी बनावट ऐसी होती है कि हवा को जब वह चीरता है तो जो हवा पीछे की ओर जाती है , वह aeroplane को आगे की ओर push करती है हवा के विपरीत दिशा में ।

अब ऐसे समझिये कि दोनों ओर से एक ही दिशा में हवा बह रही है और बीच में जैसे ही कोई barrier डाल दिया जाएगा तो हवा उससे टकराकर विपरित दिशा में बहने लगेगी लेकिन कुछ ही सीमित क्षेत्र तक जहाँ barrier बना हुआ है ।

अब फिर समझिये , जैसे आपने समुद्र की लहरें देखी हैं ??

समुद्र की लहरें तेजी से किनारे आती हैं और जैसे ही टकराती हैं तो फिर वह विपरीत दिशा में जाती है ।

इसी विज्ञान को समझकर समुद्र की लहरों पर उल्टा diving करते हैं बहुत से लोग ।

बिल्कुल विपरीत दिशा में जिसे surfing कहते हैं ।

तो यह जो हमारे मन्दिर हैं सब उत्कृष्ट वास्तुकला और विज्ञान का संगम और बेजोड़ नमूना हैं ।

Prem Rasik Sant Shri Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक संत श्री श्वेताभ जी महाराज

Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak

#आनंद #भक्ति #भगवान #धर्म

28/11/2025

कुटकी (Picrorhiza kurroa) एक बहुत प्राचीन और दुर्लभ औषधीय पौधा है, जिसे आयुर्वेद में तीक्ष्ण स्वाद, दहीनी (यकृत) सुधारक, और ज्वरनाशक औषधि के रूप में जाना जाता है। इसे हिमालय की प्राकृतिक संपदा माना जाता है।



🌿 कुटकी का परिचय
• वैज्ञानिक नाम: Picrorhiza Kurroa
• परिवार: Plantaginaceae
• संस्कृत नाम: कुटकी, कटुकी
• हिंदी नाम: कुटकी
• तिब्बत में: Kutki
• आयुर्वेद में इसे तीनों दोषों को संतुलित करने वाली औषधि माना गया है।



🌱 पौधा कैसा दिखता है?
• यह एक छोटा, घास जैसा पौधा होता है।
• इसकी जड़ें लंबी, पतली और भूरी-काली रंग की होती हैं – वही औषधि के रूप में उपयोग होती हैं।
• पत्तियाँ हरी और लंबी होती हैं।
• फूल सफेद या नीले रंग के स्पाइक जैसे आते हैं।



🏔️ कुटकी कहाँ उगती है?
• यह प्राकृतिक रूप से हिमालय के ऊँचे हिस्सों में (3000–5000 मीटर ऊँचाई तक) पाई जाती है।
• उत्तराखंड, हिमाचल, कश्मीर, नेपाल, तिब्बत में यह प्राकृतिक रूप से मिलती है।



📜 पुरानी मान्यताएँ
• प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भावप्रकाश निघंटु में इसका उल्लेख है।
• पुराने वैद्य इसे “यकृत (लिवर) की औषधियों की रानी” कहते थे।
• प्राचीन काल में इसका उपयोग बुखार, पीलिया, और पाचन समस्याओं में विशेष रूप से किया जाता था।
• तिब्बती चिकित्सा (Sowa Rigpa) में इसे अमृत के समान औषधि माना जाता था।



💊 औषधीय गुण

हेपेटोप्रोटेक्टिव👉🏻लिवर को ठीक करता है
एंटी-इंफ्लेमेटरी👉🏻सूजन में लाभ
एंटी-ऑक्सीडेंट👉🏻कोशिकाओं को क्षति से बचाता है
एंटी-पाइरेटिक👉🏻बुखार कम करता है
डिटॉक्सिफायर👉🏻शरीर में जमा विषैले पदार्थ निकालता है



🩺 कुटकी किस-किस रोग में उपयोगी है?

✔️ लिवर रोग:
• फैटी लिवर
• हेपेटाइटिस
• पीलिया (जॉन्डिस)
• लिवर सिरोसिस

✔️ पाचन समस्याएँ:
• गैस, अपच
• कब्ज
• पेट दर्द

✔️ बुखार:
• मलेरिया
• वायरल फीवर
• टाइफाइड (सहायक औषधि)

✔️ त्वचा रोग:
• सोरायसिस
• एक्जिमा
• एलर्जी

✔️ अस्थमा व श्वसन रोग:
• सांस फूलना
• बलगम



⚠️ गर्भावस्था और 12 वर्ष से कम बच्चों के लिए बिना विशेषज्ञ सलाह के उपयोग नहीं।



🌿 खेती और संरक्षण
• यह पौधा अब लुप्तप्राय (Endangered) श्रेणी में आ रहा है।
• इसकी मांग बहुत है पर उगाना कठिन, इसलिए जंगली संग्रह अधिक हुआ।
• अब इसे सीड बैंक और इन-विट्रो कल्टीवेशन के ज़रिए बचाने की कोशिश हो रही है।



⭐ आधुनिक वैज्ञानिक शोध
• आधुनिक शोध में पाया गया है कि कुटकी में पिक्रोक्रोसिन, कुटकिसाइड और अन्य कड़वे तत्व होते हैं जो लिवर की कोशिकाओं को पुनर्जीवित करते हैं।
• इसका उपयोग पेट की दवाओं और हर्बल लिवर सप्लीमेंट्स में व्यापक रूप से होता है।



🌼 सार (Essence)

📌 कुटकी एक दुर्लभ, शक्तिशाली और प्राचीन औषधीय पौधा है।
📌 विशेष रूप से लिवर और पाचन तंत्र के लिए रामबाण मानी जाती है।
📌 आज यह संकटग्रस्त है और इसे सुरक्षित रखने की आवश्यकता है।
I love Gardening 👍🏻👍🏻

07/11/2025

शंखपुष्पी (Shankhpushpi) एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधीय पौधा है, जिसे प्राचीन काल से ही दिमाग, तंत्रिका तंत्र और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक माना गया है। यह पौधा छोटे आकार का होता है, जो जमीन पर फैलता है। इसके फूल सफेद या हल्के नीले रंग के होते हैं, जो शंख (सीपी) की आकृति के समान दिखते हैं, इसलिए इसका नाम ‘शंखपुष्पी’ रखा गया है।

✅️ आइये जानते हैं सेहत के लिए कितना फायदेमंद हैं शंखपुष्पी :--

1️⃣ इस जड़ी-बूटी को दिमाग और याद्दाश्‍त तेज करने वाला टॉनिक भी कहा जा सकता हैं। ये बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने का काम करती हैं। ये जड़ी-बूटी बढ़ती उम्र में याद्दाश्‍त कमजोर होने से भी रोकती हैं और इसे चिंता एवं डिप्रेशन को कम करने में भी असरकारी पाया गया हैं। इससे अल्‍जाइमर, तनाव, चिंता, डिप्रेशन और मानसिक तनाव जैसी कई समस्‍याओं का इलाज किया जा सकता हैं।

2️⃣ मूत्र रोग में शंखपुष्पी बहुत लाभकारी औषधि हैं। पेशाब करते समय जलन या दर्द होना, रुक-रुककर पेशाब होना, पेशाब में पस आना आदि रोग इसके सेवन से ठीक हो जाते हैं। ऐसे रोगों से राहत पाने के लिए प्रतिदिन शंखपुष्पी चूर्ण को गाय के दूध, मक्खन, शहद अथवा छाछ के साथ सेवन करने से लाभ होता हैं।

3️⃣ शंखपुष्पी के फूलों में एथेनॉलिक अर्क पाया जाता हैं, जो नॉन-एस्ट्रिफाइड फैटी एसिड के लेवल को कम करता हैं। इससे हार्ट अटैक, हार्ट ब्लॉक, ब्लड क्लॉट आदि गंभीर रोगों के जोखिम को कम करने में भी मदद मिलती। यह रक्त को डिटॉक्सिफाई करने में मदद करता हैं।

4️⃣ अगर मिर्गी के मरीज को बार-बार दौरा पड़ रहा हैं तो शंखपुष्पी के रस में शहद मिलाकर सुबह शाम पिलाने से मिर्गी में लाभ मिलता हैं।

5️⃣ डायबिटीज को नियंत्रित करने के लिए शंखपुष्पी के चूर्ण को सुबह-शाम गाय के मक्खन के साथ या पानी के साथ सेवन करने से मधुमेह में लाभ मिलता हैं।

6️⃣ शंखपुष्पी खून की उल्टी रोकने वाली उत्तम औषधि हैं। यदि किसी को खून की उल्टी हो रही हो तो शंखपुष्पी का रस, दूब घास तथा गिलोय का रस मिलाकर पिलाने से तत्काल लाभ होता हैं। नाक से खून बहने पर भी इसकी बूंद नाक में डालने से खून आना बंद हो जाता हैं।

7️⃣ शंखपुष्पी के फूल का इस्तेमाल पीलिया, पेचिश, बवासीर जैसे अन्य पेट से जुड़े विकारों के लिए किया जाता हैं। शंखपुष्पी का रस चेहरे की झुर्रियां और उम्र बढ़ने के लक्षणों को रोकने में मदद करता हैं।

⚠️ सावधानी :--

■ गर्भवती महिलाओं और बच्चों को आयुर्वेदिक वैद्य के परामर्श से ही दें।

■ अधिक मात्रा में सेवन करने से पेट दर्द या हल्की सुस्ती हो सकती है।

शंखपुष्पी एक चमत्कारी हर्बल औषधि है जो शरीर और मन दोनों के लिए फायदेमंद है। यह न केवल दिमाग को तेज और तनावमुक्त रखती है, बल्कि हृदय, मूत्र, पाचन, और त्वचा के लिए भी उपयोगी है। नियमित लेकिन संतुलित सेवन से शरीर को ऊर्जा, संतुलन और मानसिक शांति मिलती है।

#शंखपुष्पी

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31/10/2025

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