30/11/2025
प्रश्न ....जगन्नाथपुरी मंदिर का ध्वज हवा के विपरीत दिशा में लहराता है, इसके पीछे कोई पौराणिक तथ्य है या वैज्ञानिक??
उत्तर...प्रेम रसिक संत श्री श्वेताभ जी महाराज
हमारा भारतवर्ष एक महान देश है जहाँ कला संस्कृति विज्ञान ज्ञान आदि का अगाध समुद्र बहता है ।
जब कहीं कुछ नहीं था तब भारतवर्ष उस उन्नत तकनीक से लैस था जिससे कई कई देश प्रभावित थे ।
जब लोग अन्य सभ्यता के लोग जंगलों में नंगे रहकर कच्चा मांस चबाते थे तब हम विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित होकर जो Metallurgy तकनीक की देन थी , कई प्रकार के खनिजों , धातुओं और पदार्थों से युक्त थे ।
हमारा ज्ञान विज्ञान बहुत ही उच्च स्तर का था जो आज भी उस स्तर को विज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता ।
क्योंकि हम आज भौतिक विकास कर रहे हैं लेकिन तब हम भौतिक के साथ साथ रासायनिक , जैविक , आर्थिक और आध्यात्मिक विकास के वृहद स्तर पर थे ।
आज मिहिरावली जिसे आप गुरुग्राम कहते हैं और कुतुब मीनार के नाम से जानते हैं वहाँ लगा लौह स्तम्भ और बिहार में अशोक स्तम्भ की metallurgy आज के वैज्ञानिक तक हल नहीं कर पाए कि ऐसा कौन से धातुओं के मिश्रण का किस specific temperature, कितनी देर और किन धस्तुओं का प्रयोग किया गया कि लौह धातु होते हुए भी आज तक उनमें कोई जंग नहीं लगा ।
आज भी Western Scientists कहते हैं कि अगर ये mettalurgy की पद्धति हमें पता लग जाये तो हम आज बहुत कुछ बदल सकते हैं ।
तो भारत का वास्तुशिल्प बहुत ही उन्नत अवस्था का था ।
आज की तरह माचिस के डिब्बे की तरह मकान नहीं बनते थे ।
मन्दिर सदा Engineering का Masterpiece बन कर रहते थे और उन्हें इस तरह बनाया जाता था कि वह आने वाले वंशजों के लिए बहुत बड़े विश्वविद्यालय का कार्य कर सकें ।
मंदिरों में सभी प्रचलित पद्धतियों का प्रयोग किया जाता था , वहीं ज्ञान विज्ञान के केंद्र रहा करते थे और उन ज्ञान विज्ञान के अंदर घुसकर जब हम लक्ष्य निर्धारण करते हैं या उनका उद्देश्य जानते हैं तो वह हमें गर्भ गृह में मिलता है जहां हमें अंततः भगवान में मिल जाना है ।
आज भी प्राचीन मंदिरों का कोई तोड़ नहीं हैं ।
उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत के सभी मंदिरों को विध्वंस कर दिया गया आततायियों द्वारा ।
दक्षिण के मंदिर अब भी जितने बचे हैं , वह अपने आप में ही प्रत्येक मन्दिर आश्चर्य है ।
कोणार्क का मंदिर सबने देखा होगा या जानते होंगे , वह उतना ही नहीं था जितना आप आज देखते हैं ।
वह विशालकाय मन्दिर था और उसके ऊपर बहुत बड़ा चुम्बकत्व पत्थर लगा था जिसजे कारण बाहरी जितने भी जहाज जो विदेशी होते थे , वह खिंच कर आते और नष्ट हो जाते थे ।
वह मन्दिर ऐसा था कि उसके ऊपर मणियों में सूर्य दैदीप्यमान रहता था ।
सूर्य से सम्बंधित जितने भी मन्दिर बनाये जाते थे , वह ऐसे बनाये जाते थे कि गर्भ गृह में साक्षात सूर्य प्रकट हों , उस तरह के Geometrical पद्धति का प्रयोग किया जाता था ।
आज राम मंदिर में जबरदस्ती तरह तरह के mirror और lens लगाकर सूर्य की किरणें परावर्तित की गई ।
लेकिन हमारे अधिकतर मन्दिर में महीनों महीनों तक जब सूर्य किसी राशि पर भ्रमण करते थे , तो सब जगह से मन्दिर बन्द होने पर भी और गर्भ गृह छोटा और अंदर होने पर भी सूर्य इस प्रकार आवर्तित होते थे मानो साक्षात गर्भगृह में ही प्रवेश कर गए हों ।
आज भी अनेकों मन्दिर हैं , जहाँ का पिलर हवा में लटक रहा है ।
मन्दिर की प्रत्येक सीढ़ी पर सरगम बजाया जा सकता है ।
मन्दिर के बाहर कोई हवा नहीं है लेकिन मन्दिर में प्रवेश करते ही हवा के झोंके से आप लहराने लगेंगे ।
आसपास कहीं भी जल नहीं होगा लेकिन मन्दिर के एक जगह जल का स्रोत बनकर वहीं थोड़ी दूर पर लुप्त हो गया होगा ।
मन्दिर के बाहर घोर गर्मी लेकिन मन्दिर के अंदर प्रवेश करते ही Air conditioner जैसा लगेगा ।
मन्दिर के बाहर बहुत ठंड लेकिन मन्दिर में प्रवेश करते ही गर्मी का अनुभूति ।
एक ही मन्दिर में एक ही जगह खड़े होकर आप कुछ अगर फुसफुसायेंगे तो भी दूसरी जगह जो दूसरा गुम्बद है और बहुत दूर है , वहाँ आवाज़ आएगी ।
एक ही मन्दिर में एक ही जगह आप बोलेंगे तो सामने वाला व्यक्ति कुछ नहीं सुन पायेगा ।
मन्दिर के दीवारों पर न केवल चित्रकारी बल्कि विभिन्न तकनीकियों को प्रदर्शित किया जाता रहा है ।
कर्नाटक में एक मन्दिर के ऊपर इतना भारी विशालकाय पत्थर है कि वैज्ञानिक तक हैरान हैं कि आज बड़े बड़े उपकरणों का भी प्रयोग कर उस पत्थर को इतने ऊपर नहीं पहुँचाया जा सकता ।
मंदिरों की दीवारों के पत्थरों को जोड़ने के लिये किसी भी चूना या अन्य वस्तुओं का प्रयोग नहीं किया गया बस उनमें इस तरह के structure बनाये गए जिससे वह हिल तक नहीं सकते ।
तो हमारा वास्तुशिल्प अद्भुत था ।
और सबसे अधिक जिनमें तकनीक का प्रयोग किया गया , वह थे समुद्र किनारे बनाये हुए मन्दिर ।
जैसे सोमनाथ , कोणार्क , जगन्नाथ मंदिर इत्यादि ।
सोमनाथ को तो नष्ट भ्रष्ट किया गया न जाने कितनी बार ।
जो आप सोमनाथ मंदिर आज देखते हैं न , वह वास्तविक नहीं है ।
वह तो बहुत भव्य था ।
वह मन्दिर इस तरह बनाया गया था कि चन्द्रमा स्वयं पूर्णिमा तक भगवान का अभिषेक करते थे , मतलब साक्षात चन्द्रमा की छवि शिवलिंग पर अंकित होती थी और शिवलिंग दूधिया चाँदनी से नहा जाता था ।
लेकिन अभी तो उसको किसी तरह जीर्णोद्धार करके इस तरह बना दिया गया ।
ऐसे ही यह जगन्नाथ मन्दिर है जो वास्तुकला और Engineering का अद्भुत नमूना है ।
जिसने घूस देकर पढ़ाई नहीं की होगी , वह Aerodynamics का सिद्धांत समझता होगा अवश्य ।
उस मन्दिर का शिखर और उसके ऊपर जो नक्काशियां हैं , साथ ही साथ उसके साथ लगे हुए तीन छोटे जो शिखर बनाये गए हैं , वह पूरे Aerodynamics के सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाये गए हैं ।
आप लोगों ने Eddie Current Flow पढ़ा होगा और समझा होगा ।
यह उसी का प्रभाव है ।
याद करिये किसी ने बचपन में खेतों में पानी जाते हुए देखा होगा ।
मेड़ों की नालियों से बहता हुआ पानी जब खेतों में जाता है तो जहाँ वह खेतों में प्रवेश करता है , बीच में बहुत तेजी से flow करता है , लेकिन side में किनारे जो पानी रहता है , वह पानी के external force से विपरीत दिशा में बहता है और जिधर से पानी का flow आ रहा होता है , उसी की ओर बहता है ।
ये तो हुई किनारे की बात ।
अब इसी पानी के बीच में एक Barrier लगा दीजिये जैसे मन्दिर का ऊँचा शिखर ।
अब क्या होगा दोनों ओर पानी force से बहेगा लेकिन बीच में जहाँ barrier लगा है , वहाँ पानी उल्टी direction में बहेगा या तो फिर गोल गोल घूमेगा ।
इसे ही Eddie current flow phenomena बोलते हैं ।
यह Aerodynamics का सिद्धांत है ।
Aeroplane इसी कारण उड़ता है ।
उसकी बनावट ऐसी होती है कि हवा को जब वह चीरता है तो जो हवा पीछे की ओर जाती है , वह aeroplane को आगे की ओर push करती है हवा के विपरीत दिशा में ।
अब ऐसे समझिये कि दोनों ओर से एक ही दिशा में हवा बह रही है और बीच में जैसे ही कोई barrier डाल दिया जाएगा तो हवा उससे टकराकर विपरित दिशा में बहने लगेगी लेकिन कुछ ही सीमित क्षेत्र तक जहाँ barrier बना हुआ है ।
अब फिर समझिये , जैसे आपने समुद्र की लहरें देखी हैं ??
समुद्र की लहरें तेजी से किनारे आती हैं और जैसे ही टकराती हैं तो फिर वह विपरीत दिशा में जाती है ।
इसी विज्ञान को समझकर समुद्र की लहरों पर उल्टा diving करते हैं बहुत से लोग ।
बिल्कुल विपरीत दिशा में जिसे surfing कहते हैं ।
तो यह जो हमारे मन्दिर हैं सब उत्कृष्ट वास्तुकला और विज्ञान का संगम और बेजोड़ नमूना हैं ।
Prem Rasik Sant Shri Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक संत श्री श्वेताभ जी महाराज
Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak
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