अखिल भारतीय योगा परिषद् एंड रिसर्च सेंटर

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21/06/2025

21 जून 2025

योग के 7 प्रमुख प्रकार जानिए*

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*21 जून 2025 को विश्व योग दिवस मनाया जाएगा। पहले हमने बताया था कि 84 योगासन होते हैं परंतु योग कितने प्रकार के होते हैं? आओ जानते हैं इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी।*

*🚩मुख्‍यत: योग 7 प्रकार के होते हैं- 1.हठयोग, 2.राजयोग, 3.कर्मयोग, 4.भक्तियोग, 5.ज्ञानयोग, 6. तंत्रयोग और 7. लययोग।*

*1. 🚩हठयोग : षट्कर्म, आसन, मुद्रा, प्राणायम, प्रत्याहार, ध्यान और समाधि- ये हठयोग के सात अंग है, लेकिन हठयोगी का जोर आसन एवं कुंडलिनी जागृति के लिए आसन, बंध, मुद्रा और प्राणायम पर अधिक रहता है। यही क्रिया योग है।*

*2. 🚩राजयोग : यम, नियम, आसन, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह पतंजलि के राजयोग के आठ अंग हैं। इन्हें अष्टांग योग भी कहा जाता है।*

*3. 🚩कर्मयोग : कर्म करना ही कर्म योग है। इसका उद्‍येश्य है कर्मों में कुशलता लाना। यही सहज योग है।**

*4. 🚩भक्तियोग : श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन- इन नौ अंगों को नवधा भक्ति कहा जाता है। यही भक्तियोग है।*

*5. 🚩ज्ञानयोग : साक्षीभाव द्वारा विशुद्ध आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना ही ज्ञान योग है। यही ध्यानयोग है। यही ब्रह्मयोग और यही सांख्ययोग है।*

*6. 🚩तंत्रयोग : यह वाममार्ग है जिसमें पुरुष और स्त्री मिलकर इंद्रियों पर संयम रखते हुए योग करते हैं। यही कुंडलिनी योग भी है।*

*7. 🚩लययोग :- यम, नियम, स्थूल क्रिया, सूक्ष्म क्रिया, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। उक्त आठ लययोग के अंग है

Photos from अखिल भारतीय योगा परिषद् एंड रिसर्च सेंटर's post 21/06/2025

Yoga for One Earth
By our associates in Jharkhand

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2025

Yoga is not just a practice—it’s a powerful skill for life. It strengthens the body, calms the mind, and brings balance to everyday living.

Let’s make yoga a part of our daily routine—for ourselves and for a healthier planet.

13/05/2025

जलेबी सिर्फ मिठाई नहीं आयुर्वेदिक दवाई भी है
ये एक राजशाही पकवान है जिसे दूध दही या रबड़ी से खाया जाता है।
👉जलेबी का आयुर्वेदिक उपयोग :
जलेबी एक भारतीय व्यंजन है जो की जलोदर नामक बीमारी का इलाज में प्रयोग किया जाता था।

शुगर बीमारी को नियंत्रित करने के लिए जलेबी को दही से खाते थे

खाली पेट दूध जलेबी खाने से वजन और लम्बाई बढ़ाने के लिए किया जाता था ।

माइग्रेन की और सिर दर्द के लिए सूर्योदय से पहले दूध जलेबी खाने को आयुर्वेद में लिखा है।

👉ग्रह शांति अथवा ईश्वर का भोग में भी जलेबी
आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा लिखित देवी पूजा पद्धति में भगवती को हरिद्रान पुआ जलेबी भोग लगाने के विषय में लिखा है
जलेबी माता भगवती को भोग में चढ़ाने की प्रथा है।

इमरती जो की उडद दाल से बनती है वो शनिदेव के नाम पर हनुमान जी या पीपल वृक्ष या शनि मंदिर में चढ़ाने काले कौवा और कुत्ते को खिलाने से शनि का प्रभाव कम होता है।

हमारे प्राचीन ग्रंथ में जलेबी बनाने की विधि संस्कृत भाषा में लिखी है साथ ही जलेबी बनाने की विधि पुराणों में भी है इसे रस कुंडलिका नाम दिया है।

भोज कुतुहल में इसे जल वल्लीका नाम दिया है
गुण्यगुणबोधिनी' में भी जलेबी बनाने की विधि लिखी है
सबसे बड़ी बात की जलेबी कुंडली के आकार की की होती है जिसका संबंध आंतो से है कब्ज का ये रामबाण इलाज है ।

Photos from अखिल भारतीय योगा परिषद् एंड रिसर्च सेंटर's post 08/04/2025

ब्याह का सीजन शुरू हो गया हैं, भोजन हेतु हमारे द्वारा अधिकांश प्लास्टिक पत्तल आदि (डिस्पोजल)के जहर से बचाने के लिए, देशी पत्तल व मिट्टी के कुल्हड़ का उपयोग फिर आरंभ कर सकते है जो बिल्कुल प्रकृति के अनुरूप होगा...

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे देश में 2000 से अधिक वनस्पतियों की पत्तियों से तैयार किये जाने वाले, पत्तलों औरbha उनसे होने वाले लाभों के विषय में पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान उपलब्ध है, पर मुश्किल से पाँच प्रकार की वनस्पतियों का प्रयोग हम अपनी दिनचर्या में करते हैं।

आमतौर पर केले की पत्तियो में खाना परोसा जाता है...प्राचीन ग्रंथों में केले की पत्तियों पर परोसे गये भोजन को स्वास्थ्य के लिये लाभदायक बताया गया है....आजकल महंगे होटलों और रिसोर्ट मे भी केले की पत्तियों का यह प्रयोग होने लगा है.....

1. पलाश के पत्तल में भोजन करने से, स्वर्ण के बर्तन में भोजन करने का पुण्य व आरोग्य मिलता है...।
2. केले के पत्तल में भोजन करने से चांदी के बर्तन में भोजन करने का पुण्य व आरोग्य मिलता है..।
3. रक्त की अशुद्धता के कारण होने वाली बीमारियों के लिये पलाश से तैयार पत्तल को उपयोगी माना जाता है...पाचन तंत्र सम्बन्धी रोगों के लिये भी, इसका उपयोग होता है। आमतौर पर लाल फूलों वाले पलाश को हम जानते हैं, पर सफेद फूलों वाला पलाश भी उपलब्ध है.... इस दुर्लभ पलाश से तैयार पत्तल को बवासीर (पाइल्स) के रोगियों के लिये उपयोगी माना जाता है...।

4. जोडों के दर्द के लिये करंज की पत्तियों से तैयार पत्तल उपयोगी माना जाता है, पुरानी पत्तियों को नयी पत्तियों की तुलना मे अधिक उपयोगी माना जाता है।
5. लकवा (पैरालिसिस) होने पर, अमलतास की पत्तियों से तैयार पत्तलों को उपयोगी माना जाता है।

अन्य लाभ

1. सबसे पहले तो उसे धोना नहीं पड़ेगा, इसको हम सीधा मिटटी में दबा सकते है।
2. न पानी नष्ट होगा।
3. न ही कामवाली रखनी पड़ेगी, मासिक खर्च भी बचेगा।
4. न केमिकल उपयोग करने पड़ेंगे।
5. न केमिकल द्वारा शरीर को आंतरिक हानि पहुंचेगी।
6. अधिक से अधिक वृक्ष उगाये जायेंगे, जिससे कि अधिक ऑक्सीजन भी मिलेगी।
7. प्रदूषण भी घटेगा।
8. सबसे महत्वपूर्ण : झूठे पत्तलों को एक जगह गाड़ने पर, खाद का निर्माण किया जा सकता है एवं मिटटी की उपजाऊ क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है।
9. पत्तल बनाने वालों को भी रोजगार प्राप्त होगा।
10. सबसे मुख्य लाभ-नदियों को दूषित होने से बहुत बड़े स्तर पर बचा सकते हैं, जैसे कि आप जानते ही हैं कि जो पानी आप बर्तन धोने में उपयोग कर रहे हो, वो केमिकल वाला पानी, पहले नाले में जायेगा, फिर आगे जाकर नदियों में ही छोड़ दिया जायेगा और अन्ततः जल प्रदूषण बढ़ाएगा!

08/04/2025

बेल_चिलचिलाती_गर्मी_का_दैवीय_फल

★बेल का मूल स्थान भारत माना जाता है। यह प्रजाति प्रागैतिहासिक काल में निकटवर्ती देशों में पहुंची और हाल ही में मानव आंदोलनों के माध्यम से अन्य सुदूर देशों में पहुंची,
● बेल के पेड़ भारत, श्रीलंका, थाईलैंड, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, वियतनाम, फिलीपींस, कंबोडिया, मलेशिया, जावा, मिस्र, सूरीनाम, त्रिनिदाद और फ्लोरिडा के शुष्क, मिश्रित पर्णपाती और शुष्क डिप्टरोकार्प जंगलों और मिट्टी में अच्छी तरह से पनपते हैं।
●,ऐतिहासिक रिपोर्टों के अनुसार बेल भारत में 800 ईसा पूर्व से एक फसल के रूप में पाया जाता है
●बेल एक उपोष्णकटिबंधीय प्रजाति है, हालांकि यह उष्णकटिबंधीय वातावरण में अच्छी तरह से विकसित हो सकती है।
★बेल भोजन और औषधीय मूल्यों के अलावा, बेल फल के छिलके से उत्पादित सक्रिय कार्बन का उपयोग प्रदूषित या पीने के पानी से क्रोमियम जैसी भारी धातुओं को हटाने के लिए एक कुशल, कम लागत वाले अवशोषक के रूप में किया जा सकता है ।
★बेल की पत्तियों का उपयोग संभावित बायोसॉर्बेंट के रूप में भी किया जा सकता है।
●हानिकारक सीसा आयनों को बेल के पत्तों में अवशोषित करके जलीय घोल से निकालने का प्रदर्शन किया गया
●बेल के बीज के तेल में एक असामान्य फैटी एसिड, 12-हाइड्रॉक्सीओक्टाडेक-सीआईएस-9-एनोइक एसिड (रिसिनोलिक एसिड) मौजूद होता है,
जिसे भविष्य में बायोडीजल के रूप में निर्मित करने की क्षमता है।
●बेल को पर्यावरण के प्राकृतिक शोधक के रूप में जाना जाता है और इसे शहरी, ग्रामीण और शुष्क क्षेत्रों के पुनर्वनीकरण में वन्यजीवों और प्रमुख प्रजातियों के लिए एक सहायक पेड़ के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है,
★बेल फल का रस आपके पेट की सभी समस्याओं के लिए एक उत्कृष्ट पाचन टॉनिक है। यह टैनिन से भरपूर है जिसमें एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं जो इसे अपच और दस्त के दौरान सेवन के लिए आदर्श बनाते हैं। इसमें फाइबर प्रचुर मात्रा में होता है जो मल त्याग को सुचारू बनाने में मदद करता है। गर्मियों के दौरान, जब आपकी पाचन क्रिया थोड़ी ख़राब हो जाती है, तो बेल का रस अपने वातहर गुण के कारण आपकी भूख को बहाल करता है। यह थकान दूर करता है और शरीर को ठंडक पहुंचाने में मदद करता है।
★बेल के फलों में पोटैशियम की मात्रा अधिक होती है। पोटेशियम से भरपूर खाद्य पदार्थ उच्च रक्तचाप वाले लोगों के लिए आदर्श हैं। यह धमनियों के कार्य में सुधार करता है और हृदय संबंधी कार्यों में सुधार करता है। खाली पेट बेल के पत्तों या बेल की जड़ों के काढ़े का सेवन हृदय स्वास्थ्य में सुधार के लिए एक पारंपरिक उपाय है।
★बेल फल गर्मियों का एक विशिष्ट फल है जो अपने आंत-उपचार लाभों के लिए जाना जाता है।
आयुर्वेद में बेल या बिल्व को एक शक्तिशाली पाचक जड़ी बूटी के रूप में वर्णित किया गया है।
बेल के कई फायदे हैं, जैसे रक्त शर्करा संतुलन को बढ़ावा देना, त्वचा के स्वास्थ्य में सुधार और कब्ज से राहत।
★बेल का उपयोग:
●बेल का शरबत शरीर को ठंडक देता है और इस जूस के सेवन से लू से बचा जा सकता है.
●फाइबर से भरपूर होने के चलते बेल का शरबत पीने पर कब्ज से छुटकारा मिलता है
●बेल के जूस में हेल्दी कैलोरी होती है जो वजन कम (Weight Loss) करने में मदद करती है
●मेटाबॉलिज्म को बूस्ट करने के लिए भी बेल का शरबत पिया जा सकता है
★बेल का मुरब्बा भी सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए। दिनभर में 10 ग्राम से अधिक नहीं खाएं। इसकी इतनी ही मात्रा में शरीर को कई न्यूट्रिएंट्स मिल जाते हैं।
●आमतौर पर सुबह नाश्ते के समय बेल का मुरब्बा खाना बेहतर होता है

Disclaimer: लेख में उल्लिखित सलाह और सुझाव सिर्फ सामान्य सूचना के उद्देश्य के लिए हैं और इन्हें पेशेवर चिकित्सा सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। कोई भी सवाल या परेशानी हो तो हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लें।

Photos from अखिल भारतीय योगा परिषद् एंड रिसर्च सेंटर's post 08/04/2025

शहतूत क्या गजब का फल है परमात्मा ने सृष्टि में यह इतना महत्वपूर्ण बनाया है शायद इसका मुकाबला कोई फल कर सके दुनिया में कोई ऐसा फल नहीं है जो शहतूत से महत्वपूर्ण हो क्योंकि शहतूत शरीर की सफाई बहुत ही बेहतर करता है।

शहतूत अगर मिले तो हमें अवश्य खाना चाहिए क्योंकि आवंला नींबू से बेहतर सफाई कारक जामुन होता है और जमुना से सैकड़ो गुना बेहतर शहतूत होता है।

एक वर्ष के अन्दर शहतूत एक हफ्ता जरूर खाना चाहिए चाहे पका मिल जाए कच्चा मिल जाए चाहे जैसे भी मिले अवश्य खाना चाहिए कच्चा मिल जाए तो चटनी के रूप में खा लेन चाहिए जैसा भी मिल जाए शहतूत का सेवन करना चाहिए।

👉रक्त संचार में सुधार

रक्त संचार में सुधार के लिए शहतूत के लाभ हासिल किए जा सकते हैं। दरअसल, शहतूत में सायनायडिंग 3-ग्लूकोसाइड नाम का फाइटोन्यूट्रिएंट पाया जाता है। यह खून को साफ करने के साथ ही रक्त संचार में भी सुधार कर सकता है (1)। इस कारण हम यह कह सकते हैं कि शहतूत के सेवन से न केवल खून में मौजूद अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है, बल्कि रक्त परिसंचरण यानी ब्लड सर्कुलेशन की प्रक्रिया को भी नियंत्रित किया जा सकता है।

👉मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक

मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी शहतूत को उपयोग में ला सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक शहतूत में साइटोप्रोटेक्टिव यानी कोशिकाओं को नुकसान से बचाने वाला और तंत्रिका तंत्र से संबंधी समस्याओं को दूर करने वाला न्यूरोप्रोटेक्टिव प्रभाव पाया जाता है। ये दोनों प्रभाव संयुक्त रूप से मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं, इस कारण हम कह सकते हैं कि दिमागी स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए शहतूत का सेवन काफी लाभकारी साबित हो सकता है।

👉ब्लड शुगर को करे नियंत्रित

शहतूत में हाइपरग्लाइसेमिक प्रभाव पाया जाता है, जो शरीर में इंसुलिन की सक्रियता को बढ़ा सकता है और खून में शुगर की अधिक मात्रा को कम करने में सहायक हो सकता है। इस कारण डायबिटीज के रोगियों के लिए शहतूत का सेवन एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।

👉पाचन क्रिया को करे मजबूत

विशेषज्ञों के मुताबिक शहतूत की पत्तियों में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जो पाचन के लिए जरूरी हैं। यह पाचक रसों के बनने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं वहीं, फल के अलावा, कच्चे फल से बने पाउडर का सेवन पाचन प्रक्रिया को मजबूत कर सकता है,ऐसे में यह माना जा सकता है कि बिगड़ी पाचन शक्ति को फिर से दुरुस्त करने में शहतूत के लाभ मददगार साबित हो सकते हैं।

01/03/2025

हड्डियों से चूस लेती है सारा कैल्शियम खाने से लेकर पीने वाली ये 5 चीजें, शरीर में छोड़ देंगी बस चूरा ही चूरा..·.

Facts About Bones: कैल्शियम हमारे शरीर के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज है, जो हड्डियों और दांतों को मजबूत रखने के साथ-साथ हमारे रक्तचाप, मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र के सही संचालन में भी मदद करता है।

यदि शरीर में कैल्शियम की कमी हो, तो हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ ऐसे फूड्स भी हैं जो शरीर से कैल्शियम को खत्म कर सकते हैं और हड्डियों को कमजोर बना सकते हैं? आइए जानते हैं, वो कौन से फूड्स हैं जिनसे आपको बचना चाहिए।

1. कोल्ड ड्रिंक (Soda)

कोल्ड ड्रिंक, खासकर सॉफ्ट ड्रिंक्स, हर पार्टी या समारोह का हिस्सा बन जाते हैं। हालांकि, इन्हें ज्यादा मात्रा में पीने से शरीर में कैल्शियम की कमी हो सकती है। इन ड्रिंक्स में फॉस्फोरिक एसिड पाया जाता है, जो शरीर से कैल्शियम के अवशोषण को रोकता है। इसके परिणामस्वरूप हड्डियों का कैल्शियम धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसलिए अगर आप हड्डियों को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो कोल्ड ड्रिंक का सेवन कम से कम करें।

2. रेड और प्रोसेस्ड मीट

रेड मीट (जैसे मांसपेशी वाले मांस) और प्रोसेस्ड मीट (जैसे सॉसेज, बेकन, हॉट डॉग्स) का सेवन अत्यधिक करने से यूरिक एसिड की समस्या हो सकती है, जो हड्डियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। यह पदार्थ शरीर के भीतर कैल्शियम के अवशोषण को प्रभावित कर सकते हैं और हड्डियों को कमजोर कर सकते हैं। इसलिए, अगर हड्डियों की सेहत का ख्याल रखना है, तो इन फूड्स का सेवन सीमित करना चाहिए।

3. केक, कैंडी और कुकीज

केक, कैंडी और कुकीज जैसे मीठे और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में अत्यधिक शक्कर और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं, जो कैल्शियम के अवशोषण में रुकावट डालते हैं। इसके अतिरिक्त, ये फूड्स शरीर में सूजन का कारण बन सकते हैं, जिससे हड्डियां और भी कमजोर हो सकती हैं। इसलिए, इन अत्यधिक मीठे पदार्थों को नियमित रूप से खाने से बचें और स्वस्थ स्नैक्स का चयन करें।

4. चाय (Tea)

चाय में कैफीन पाया जाता है, जो शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को कम करता है। अगर आप अधिक चाय पीते हैं, तो यह आपकी हड्डियों के लिए खतरनाक हो सकता है। विशेष रूप से अधिक कैफीन वाले चाय या कॉफी का सेवन हड्डियों से कैल्शियम को निकाल सकता है, जिससे हड्डियां कमजोर हो सकती हैं। इसलिए, चाय का सेवन सीमित करें और अधिक पानी या कैल्शियम से भरपूर अन्य पेय पदार्थों का सेवन करें।

5. शराब (Alcohol)

शराब का अत्यधिक सेवन हड्डियों की सेहत पर गहरा असर डालता है। शराब शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को कम करती है और हड्डियों को कमजोर कर सकती है। यह हड्डियों को चूने के समान बना सकती है और हड्डी के फ्रैक्चर (हड्डी टूटने) का खतरा बढ़ा सकती है। अगर आप हड्डियों को मजबूत रखना चाहते हैं तो शराब का सेवन बहुत सीमित करें।

6. ऑयली फूड्स (Oily Foods)

ऑयली फूड्स जैसे समोसा, फ्राइड चिकन, पकोड़ी, आदि हड्डियों के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। ये अत्यधिक वसा और असंतुलित फैट्स से भरपूर होते हैं, जो शरीर में सूजन पैदा कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप, कैल्शियम का अवशोषण प्रभावित हो सकता है, जिससे हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। इन फूड्स को सीमित मात्रा में ही खाएं और स्वस्थ, हल्का भोजन करें।

कैल्शियम हड्डियों के लिए महत्वपूर्ण है और इसके सही अवशोषण के लिए संतुलित आहार की आवश्यकता होती है। अगर आप अपने हड्डियों को मजबूत और स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो इन फूड्स का सेवन सीमित करें या पूरी तरह से बचें:

कोल्ड ड्रिंक

रेड और प्रोसेस्ड मीट

केक, कैंडी, कुकीज

ज्यादा चाय और कॉफी

अत्यधिक शराब

ऑयली और फ्राइड फूड्स

इसके बजाय, कैल्शियम से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे दूध, दही, हरी पत्तेदार सब्जियां, ताजे फल, नट्स और बीज आदि का सेवन करें। नियमित रूप से व्यायाम और हड्डियों को मजबूत करने वाली आदतों को अपनाने से भी आप अपनी हड्डियों को स्वस्थ रख सकते हैं।

26/02/2025

सिंदूरी का पौधा

सिंदूर का पौधा वैसे तो साउथ अमेरिका और कुछ एशियाई देशों में उगाया जाता है और भारत में इसे हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में उगाया जाता है।

सिंदूर का पौधा आसानी से नहीं देखने को मिलता, इसके 1 पौधे में से एक बार एक या डेढ़ किलो तक सिंदूर फल निकल सकता है, और इसकी कीमत ₹400 प्रति किलो से ज्यादा होती है. कमीला का पेड़ 20 से 25 फीट तक ऊंचा होता है यानी अमरूद के पेड़ जितना ही इसके पेड़ का भी फैलाव होता है

आपको बता दें कि इसके पेड़ से फल से जो बीज निकलते हैं उसे पीसकर सिंदूर बनाया जाता है, क्योंकि यह बिल्कुल नेचुरल होता है.इससे कोई नुकसान भी नही होता.कमीला के पेड़ पर फल गुच्छों में लगते हैं जो शुरू में हरे रंग का होता है, लेकिन बाद में यह फल लाल रंग में बदल जाता है उन फल के अंदर ही सिंदूर होता है. वह सिंदूर छोटे-छोटे दानों के आकार में होता है, जिसे पीसकर बिना किसी दूसरी चीजों की मिलावट की सीधे तौर पर प्रयोग में लाया जा सकता है.यह शुद्ध और स्वास्थ के लिए भी बहुत ही उपयोगी है. इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता. इस सिंदूर का इस्तेमाल ना सिर्फ माथे पर लगाने के लिए है बल्कि इसका प्रयोग भोजन पदार्थों को लाल रंग देने के लिए भी होता है, यानी कि इसे खाया भी जाता है. कमीला के पेड़ से निकले वाले संदूर का प्रयोग उच्च श्रेणी की लिपस्टिक बनाने में किया जाता है. इससे दवाएं भी बनती है. इसे लिपस्टिक, हेयर डाई नेल पॉलिश जैसे कई चीजों में इस्तेमाल किया जाता है. कमर्शियल यूज में रेड इंक बनाना, पेंट के लिए इस्तेमाल करना, साबुन के लिए इस्तेमाल करना भी शामिल है. रेड डाई का इस्तेमाल जहां-जहां हो सकता है वहां इस पौधे का यूज किया जाता है.

26/02/2025

मालभोग केला : बिहार का गौरव - अगर आपने मालभोग का स्वाद नहीं चखा है, तो आपने वास्तव में केले का स्वाद नहीं चखा है!" भारत में लगभग 500 किस्में उगायी जाती हैं लेकिन एक ही किस्म का विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नाम है। डॉ राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पास केला की 74 से ज्यादा प्रजातियाँ संग्रहित हैं।
मालभोग केला सिल्क (एएबी) समूह का एक सदस्य है ,इसमें मालभोग, रसथली, मोर्तमान, रासाबाले, पूवन (केरल) एवे अमृतपानी, आदि प्रजातियों के केला आते है । यह बिहार एवं बंगाल की एक मुख्य किस्म है जिसका अपने विशिष्ट स्वाद एवं सुगन्ध की वजह से विश्व में एक प्रमुख स्थान है। यह अधिक वर्षा को सहन कर सकती है। बिहार में यह प्रजाति पानामा विल्ट की वजह से लुप्त होने के कगार पर है। फल पकने पर डंठल से गिर जाता है। इसमें फलों के फटने की समस्या भी अक्सर देखी जाती है। मालभोग केला को प्राइड ऑफ बिहार भी कहते है , जहां ड्वार्फ केवेंडिश समूह के केला 50 से 60 रुपया दर्जन बिकता है वही मालभोग केला 150 से 200 रुपया दर्जन बिकता है।आज के तारीख में बिहार में मालभोग प्रजाति के केले वैशाली एवं हाजीपुर के आसपास के मात्र 15 से 20 गावों में सिमट कर रह गया है इसकी मुख्य वजह इसमें लगने वाली एक प्रमुख बीमारी जिसका नाम है फ्यूजेरियम विल्ट जिसका रोगकारक है फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम एफ एसपी क्यूबेंस रेस 1 है।

1. वनस्पति विज्ञान विशेषताएँ
मालभोग केला सिल्क केले के समूह से संबंधित है। यह केले के AAA जीनोम समूह का हिस्सा है, जिसकी विशेषता ट्रिपलोइडी है, जिसका अर्थ है कि इसमें गुणसूत्रों के तीन सेट हैं। इस केले की किस्म को मुख्य रूप से इसके मीठे फल के लिए उगाया जाता है, जिसे ताजा खाया जाता है लेकिन इसे विभिन्न उत्पादों में भी संसाधित किया जा सकता है।

आभासी(छद्म) तना
मालभोग केले का छद्म तना मध्यम ऊंचाई का होता है, जो 2.5 से 3 मीटर तक होता है। इसका आकार मजबूत, बेलनाकार होता है, जो इसे कुछ पर्यावरणीय परिस्थितियों का सामना करने सक्षम होता है, हालांकि यह हवा से होने वाले नुकसान के प्रति मध्यम रूप से संवेदनशील है।

पत्तियाँ
केले का पौधा प्रमुख मध्य शिराओं के साथ बड़ी, हरी पत्तियाँ पैदा करता है। पत्तियों का लेमिना चौड़ा होता है, जो विकास के लिए कुशल प्रकाश संश्लेषण प्रदान करता है। हालाँकि, कई केले की किस्मों की तरह, मालभोग की पत्तियाँ सिगाटोका जैसे पर्ण रोगों के प्रति अतिसंवेदनशील होती हैं।

फूल और पुष्पक्रम
मालभोग केले का पुष्पक्रम लटकता हुआ होता है, जिसमें बड़े, लाल-बैंगनी रंग के सहपत्र होते हैं जो फल के विकासशील फलों के हाथों की रक्षा करते हैं। फूल गुच्छों में व्यवस्थित होते हैं, जिसमें मादा फूल केले में विकसित होते हैं और नर फूल पुष्पक्रम के अंत में निकलते हैं।

2. कृषि संबंधी विशेषताएँ
मालभोग केले की खेती आम तौर पर उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु के लिए उपयुक्त है। यह अच्छी तरह से वितरित वर्षा और 20 डिग्री सेल्सियस से 38 डिग्री सेल्सियस के बीच के तापमान वाले क्षेत्रों में पनपता है। निम्नलिखित कृषि संबंधी विशेषताएं इस केले की किस्म की सफल वृद्धि को परिभाषित करती हैं....

मिट्टी की आवश्यकताएँ
मालभोग अच्छी तरह से सूखा, अच्छी जैविक सामग्री वाली उपजाऊ मिट्टी में सबसे अच्छा बढ़ता है। पर्याप्त नमी बनाए रखने वाली दोमट मिट्टी आदर्श होती है। इष्टतम विकास के लिए पीएच रेंज 6.5 और 7.5 के बीच है।

पानी की आवश्यकताएँ
इष्टतम विकास और फलों के विकास को सुनिश्चित करने के लिए नियमित रूप से पानी देना महत्वपूर्ण है, खासकर शुष्क अवधि के दौरान। हालाँकि, अत्यधिक पानी से जलभराव हो सकता है, जिससे जड़ सड़न और अन्य बीमारियाँ हो सकती हैं। मालभोग केला फ्यूजरियम ऑक्सिस्पोरम एफ.एसपी.क्यूबेंस रेस 1के प्रति बहुत ही संवेदनशील होने की वजह से लुप्तप्राय होने की कगार पर है। इसे पुनः स्थापित करने के लिए आवश्यक है की इसके टिश्यू कल्चर पौधे बना कर इसकी खेती की जाय एवं एक जगह पर केवल एक ही फसल ली जाय।

उर्वरक
केले का पौधा बहुत ज़्यादा खाद लेता है। संतुलित NPK (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम) उर्वरकों के साथ जैविक खाद का उपयोग, जोरदार विकास और अधिक उपज को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है।

रोपण और अंतराल
आमतौर पर, मालभोग केले के पौधों को 2.5 मीटर गुणा 2.5 मीटर के अंतराल पर लगाया जाता है ताकि पर्याप्त धूप और हवा का प्रवाह सुनिश्चित हो सके, जो रोग की घटनाओं को कम करने और स्वस्थ विकास को बढ़ावा देने में मदद करता है।

कीट और रोग संवेदनशीलता
हालाँकि मालभोग का बहुत महत्व है, लेकिन यह कई कीटों और बीमारियों के प्रति संवेदनशील है, जिसमें केले का घुन, नेमाटोड और फ्यूजेरियम विल्ट और बंची टॉप वायरस जैसी बीमारियाँ शामिल हैं। सफल खेती के लिए प्रभावी कीट और रोग प्रबंधन रणनीतियाँ, जैसे कि फसल चक्रण, जैविक मिट्टी संशोधन और जैव नियंत्रण एजेंटों का उपयोग, महत्वपूर्ण हैं।

3. फल की विशेषताएँ
मालभोग केला अपने ऑर्गेनोलेप्टिक गुणों के लिए जाना जाता है, जो स्थानीय और क्षेत्रीय बाजारों में इसकी लोकप्रियता के कुछ कारण हैं।

आकार और आकृति
फल मध्यम आकार का होता है, आमतौर पर 12-15 सेमी लंबा, थोड़ा घुमावदार, बेलनाकार आकार का। छिलका मोटा होता है और पूरी तरह पकने पर चमकीला पीला हो जाता है।

छिलका और गूदा
छिलका आसानी से हटाया जा सकता है, जिससे इसे ताजा खाने में आसानी होती है। गूदा मलाईदार, कोमल और मुलायम होता है, जिसमें थोड़ी दृढ़ता होती है जो इसकी बनावट को बढ़ाती है।

स्वाद और सुगंध
मालभोग केले की सबसे खास विशेषताओं में से एक इसकी सुखद सुगंध है। इसका स्वाद मीठा होता है, जिसमें भरपूर स्वाद होता है जो अम्लता और मिठास को संतुलित करता है, जिससे यह एक पसंदीदा मिठाई केला बन जाता है।

उपज
इष्टतम परिस्थितियों में मालभोग केले के पौधों की औसत उपज लगभग 30 से 40 टन प्रति हेक्टेयर होती है। प्रत्येक गुच्छा का वजन 15 से 20 किलोग्राम के बीच हो सकता है, जिसमें प्रति गुच्छा 8 से 12 केले होते हैं।

4. पोषण सामग्री
मालभोग केला एक पौष्टिक फल है जो कई आवश्यक विटामिन और खनिज प्रदान करता है। मुख्य पोषण घटकों में शामिल हैं:

कैलोरी: यह प्रति 100 ग्राम में लगभग 90 से 110 किलो कैलोरी प्रदान करता है, जो इसे ऊर्जा-घने भोजन बनाता है।

कार्बोहाइड्रेट: मालभोग केला कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होता है, मुख्य रूप से फ्रुक्टोज, सुक्रोज और ग्लूकोज जैसी प्राकृतिक शर्करा के रूप में, जो त्वरित ऊर्जा बढ़ावा प्रदान करते हैं।

विटामिन: यह विटामिन का एक उत्कृष्ट स्रोत है, विशेष रूप से विटामिन सी, जो प्रतिरक्षा कार्य का समर्थन करता है, और विटामिन बी 6, जो मस्तिष्क के स्वास्थ्य और चयापचय में सहायता करता है।

खनिज: इसमें पोटेशियम जैसे आवश्यक खनिज होते हैं, जो हृदय स्वास्थ्य और रक्तचाप को नियंत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण है, और मैग्नीशियम, जो मांसपेशियों के कार्य के लिए महत्वपूर्ण है।

आहार फाइबर: केला आहार फाइबर भी प्रदान करता है, जो पाचन स्वास्थ्य में योगदान देता है और नियमित मल त्याग को बनाए रखता है।

5. आर्थिक महत्व
मालभोग केला छोटे और बड़े पैमाने पर किसानों दोनों के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक मूल्य रखता है। स्थानीय और शहरी दोनों बाजारों में इसकी उच्च मांग इसे एक आकर्षक फसल बनाती है। किसान अक्सर इस किस्म को पसंद करते हैं क्योंकि:

बाजार की मांग: फल का अनूठा स्वाद, सुगंध और बनावट इसे अत्यधिक बिक्री योग्य बनाती है। यह सीधे उपभोग के लिए मांग में है, साथ ही चिप्स, प्यूरी और आटे जैसे प्रसंस्कृत केले के उत्पादों के उत्पादन में भी।

आय स्रोत: मालभोग केला अपने साल भर की खेती के चक्र के कारण किसानों के लिए एक स्थिर आय स्रोत प्रदान करता है, जिसमें रोपण शेड्यूल के आधार पर अलग-अलग फसलें संभव हैं।

मूल्य संवर्धन: ताजा खपत से परे, मालभोग केला खुद को केला-आधारित स्नैक्स और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों सहित मूल्य-वर्धित उत्पादों के लिए उधार देता है, जो इसकी आर्थिक क्षमता को और बढ़ाता है।

6. कटाई के बाद की हैंडलिंग
परिवहन और भंडारण के दौरान मालभोग केले की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए, कटाई के बाद सावधानीपूर्वक हैंडलिंग आवश्यक है:

भंडारण की स्थिति: केले आमतौर पर तब काटे जाते हैं जब वे परिपक्व होते हैं लेकिन अभी भी हरे होते हैं। उचित हैंडलिंग में उन्हें समय से पहले पकने या खराब होने से बचाने के लिए लगभग 13°C से 14°C के तापमान पर अच्छी तरह हवादार जगहों पर रखना शामिल है।

पकने की प्रक्रिया: बाजार के उद्देश्यों के लिए, केले को अक्सर एथिलीन गैस या पारंपरिक तरीकों का उपयोग करके कृत्रिम रूप से पकाया जाता है ताकि पकने की गति को नियंत्रित किया जा सके, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वे बाजार में बेहतरीन स्थिति में पहुँचें।

सारांश

मालभोग केला एक ऐसी किस्म है जिसमें बेहतरीन विशेषताएँ हैं जो इसे उपभोक्ताओं और किसानों दोनों के बीच लोकप्रिय बनाती हैं। इसका मीठा स्वाद, सुखद सुगंध और पोषण संबंधी लाभ इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता और विभिन्न बढ़ती परिस्थितियों के अनुकूल होने से पूरित होते हैं। हालांकि कीटों और बीमारियों के लिए अतिसंवेदनशील, उचित प्रबंधन अभ्यास स्वस्थ फसलों और इष्टतम पैदावार सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं। जिन क्षेत्रों में इसकी खेती की जाती है, विशेष रूप से बिहार में, वहां के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में इसकी भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता है।

"Malbhog Banana: The Pride of Bihar – If You Haven't Tasted Malbhog, You Haven't Truly Tasted a Banana"

सौजन्य :
प्रोफेसर (डॉ) एसके सिंह
सह निदेशक अनुसंधान
विभागाध्यक्ष,पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय समन्वित फल अनुसंधान परियोजना, डॉ राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर बिहार

25/02/2025

हमारे पौराणिक ग्रन्थों में बताया गया हैं कि भोजन के अंत में पानी पीना जहर के समान हैं । ऐसा क्यों ? चलो आज इसको हम विज्ञान की कसौटी पर कसने का एक सार्थक प्रयास करते हैं।

"अजीर्णे भेषजं वारि , जीर्णे वारि बलप्रदम।
भोजने चाऽमृतम् वारि , भोजनान्तें विषप्रदम् ।।"

इस श्लोक के अनुसार अपच की अवस्था में पानी औषध के समान होता है । भोजन पचने के बाद की अवस्था में पानी बल प्रदान करता है तो भोजन के बीच में घूंट भर थोड़ा सा जल अमृत के समान होता है ,जबकि भोजन के बाद में पिया हुआ पानी जहर के समान होता है।

भोजन करने के बाद हमारे पेट के #जठर में जाकर खाना पचने की प्रक्रिया शुरू करता है। यह जठर हमारे शरीर की नाभि के बांई ओर एक थैली नुमा छोटा सा अंग है ।

वर्तमान की अपनी लोक भाषा में इसको हम #आमाशय कहते हैं। जठर में एक प्रकार की हल्की अग्नि प्रदीप होती है। जब भूख लगती है तब वास्तव में आमाशय में वो अग्नि ही हमें संकेत करती है कि शरीर के लिए ईंधन भेजा जाए, गाङी रिजर में आ गई हैं।

आपने महसूस किया होगा कि जब अच्छी भूख लगती है तो कैसा भी भोजन कर लिया जाए बहुत मीठा भी लगता है और पच भी जाता है। जठर की अग्नि भोजन के एक घंटे बाद तक प्रदीप्त रहती हैं।

हमारी पुरानी बोली में इसको #जठराग्नि कहते हैं। 1 घंटे तक जठराग्नि को अपना काम करने के लिए ऊपर से कुछ भी डालना अग्नि को बंद करने का कारण बनता है। इसलिए भूख अनुसार जब भोजन पूर्ण हो जाए तो हमें अपना भोजन बंद कर देना चाहिए । तब जठराग्नि अपनी प्रक्रिया 1 घंटे में आराम से चला कर भोजन से प्राप्त मात्रा में आहार रस हमारे शरीर के विभिन्न अंगों को भेजता है ।अब अगर जठराग्नि की चलती हुई प्रक्रिया के ऊपर हमने लोटा भरकर ठंडा पानी डाल दिया तो पेट की अग्नि बुझ जाएगी। जिसके चलते भोजन के उत्तम पाचन की प्रक्रिया तो एकदम रूक जायेगी।

वैसे आपने भी देखा होगा अग्नि के ऊपर पानी डालने से आग बुझ जाती है ।इसी भांति पेट की जठर अग्नि भी पानी डालने से बुझ जाएगी और भोजन जठर में अपने नियत समय 1 घंटे में पच नहीं पाएगा और जब 1 घंटे से अधिक समय तक भोजन वहां पर रहेगा तो भोजन अंदर पड़ा पड़ा खराब होगा, गैस कारक होगा। गंधनुमा होगा जिसकी गैस ऊपर व नीचे दोनों जगह से निकलनी शुरू हो जाएगी। इसलिए भोजन के अंत में कभी भी पानी नहीं पिएं।

हमारे सभी पौराणिक ग्रंथों और वैद्य ऋषिजनों की वो अमूल्य सीखनुमा बातों पर आधुनिक विज्ञान भी सर झुकाकर सैल्यूट कर रहा हैं ये देर से ही सही पर लाईन पर तो आ ही गये।

आप भी यह आदर्श आदत बना लीजिए कि भोजन करने के एक घंटे तक पानी नहीं पीने का प्रण ले रहे हैं।

22/02/2025

#अश्वगंधा

यह एक प्राचीन भारतीय जड़ी-बूटी है जिसे आयुर्वेद में विशेष स्थान प्राप्त है। इसे ‘भारतीय जिनसेंग’ भी कहा जाता है और यह अपनी अनेक औषधीय गुणों के कारण सदियों से उपयोग की जा रही है। इसका वैज्ञानिक नाम Withania somnifera है। अश्वगंधा का नाम संस्कृत में “अश्व” (घोड़ा) और “गंधा” (गंध) से बना है, जिसका अर्थ है “घोड़े जैसी गंध”, क्योंकि इसके जड़ से घोड़े जैसी गंध आती है। यह पौधा विशेषकर भारत, मध्य पूर्व और अफ्रीका में पाया जाता है और इसे ताकत, ऊर्जा, और जीवन शक्ति बढ़ाने के लिए जाना जाता है। अश्वगंधा के उपयोग से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है और यह तनाव, चिंता, और अन्य कई रोगों के उपचार में सहायक है।

■अश्वगंधा के फायदे

★अश्वगंधा मानसिक तनाव और चिंता को कम करने में सहायक है।
★यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है।
★यह शारीरिक ताकत और सहनशक्ति को बढ़ाने में मदद करता है।
★अश्वगंधा नींद की गुणवत्ता को बढ़ाता है और अनिद्रा में लाभकारी है।
★यह कोलेस्ट्रॉल और रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायक है।

अश्वगंधा के उपयोग:

चिंता और डिप्रेशन के लिए अश्वगंधा का शानदार उपयोग: अश्वगंधा को एडाप्टोजेन के रूप में जाना जाता है, जो शरीर को तनाव से लड़ने में मदद करता है। यह तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल के स्तर को कम करता है, जिससे चिंता और डिप्रेशन में राहत मिलती है। नियमित रूप से अश्वगंधा का सेवन करने से मानसिक शांति मिलती है और मूड में सुधार होता है।

आर्थराइटिस के लिए अश्वगंधा का शानदार उपयोग:

आर्थराइटिस के मरीजों के लिए अश्वगंधा अत्यंत लाभकारी है। यह एक प्राकृतिक एंटी-इंफ्लेमेटरी है, जो जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करता है। अश्वगंधा का नियमित उपयोग आर्थराइटिस के लक्षणों को कम करता है और रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करता है।

कोग्नीशन के लिए अश्वगंधा का शानदार उपयोग:

अश्वगंधा मानसिक सतर्कता और एकाग्रता को बढ़ाने में मदद करता है। यह याददाश्त और सीखने की क्षमता को सुधारता है, जिससे छात्रों और व्यावसायिक व्यक्तियों के लिए यह एक उत्कृष्ट औषधि है। यह दिमागी थकान को कम करके कोग्निटिव फंक्शन्स को बेहतर बनाता है।

तनाव के लिए अश्वगंधा का शानदार उपयोग: तनाव से निपटने के लिए अश्वगंधा अत्यधिक प्रभावी है। यह तनाव को कम करने और मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक है। अश्वगंधा का सेवन शरीर को आराम प्रदान करता है और मानसिक शक्ति को बढ़ाता है।

दर्द के लिए अश्वगंधा का शानदार उपयोग: अश्वगंधा दर्द से राहत देने वाली प्राकृतिक जड़ी-बूटी है। यह दर्द निवारक गुणों के कारण गठिया, मांसपेशियों के दर्द और अन्य शारीरिक पीड़ाओं में राहत देता है। इसे नियमित रूप से लेने से दर्द में सुधार होता है और शरीर को नई ऊर्जा मिलती है।

अश्वगंधा के नुकसान

-बल्ड प्रेशर से ग्रस्त लोगों को अश्वगंधा डॉक्टर के परामर्श से ही लेना चाहिए. जिनका बीपी लो होता है उन्हे अश्वगंधा का सेवन नहीं करना चाहिए।

-अश्वगंधा का अधिक इस्तेमाल पेट के लिए हानिकारक हो सकता है। इसे लेने से डायरिया की समस्या हो सकती है. इसलिए इसके इस्तेमाल से पहले आप डॉक्टर की सलाह लें उसके बाद ही इसका सेवन करें।

-अश्वगंधा का इस्तेमाल नींद के लिए अच्छा है. लेकिन इसका बहुत दिनों तक इस्तेमाल आपको नुकसान भी पहुंचा सकता है।

-अश्वगंधा का सही डोज़ न लेने से आपको उल्टी और जी मिचलाने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

-अश्वगंधा का ज्यादा प्रयोग आपके लिए नुकसानदायक भी हो सकता है. अश्वगंधा के ज्यादा इस्तेमाल से आपको बुखार, थकान, दर्द की शिकायत भी हो सकती है।

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