04/11/2025
MaNoJ KaWaLe
Hello friends.....!
04/11/2025
27/10/2025
कुछ माता-पिता बड़े समझदार होते हैं !
वे अपने बच्चों को किसी की भी मंगनी, विवाह, लगन, शवयात्रा, उठावना, तेरहवीं (पगड़ी) जैसे अवसरों पर नहीं भेजते,
इसलिए की उनकी पढ़ाई में बाधा न हो!
उनके बच्चे किसी रिश्तेदार के यहां आते-जाते नहीं, न ही किसी का घर आना-जाना पसंद करते हैं।
वे हर उस काम से उन्हें से बचाते हैं . .
जहां उनका समय नष्ट होता हो !"
उनके माता-पिता उनके करियर और व्यक्तित्व निर्माण को लेकर बहुत सजग रहते हैं !
वे बच्चे सख्त पाबंदी मे जीते हैं!दिन भर पढ़ाई करते हैं,
महंगी कोचिंग जाते हैं, अनहेल्दी फूड नहीं खाते,
नींद तोड़कर सुबह जल्दी साइकिलिंग या स्विमिंग को जाते हैं, महंगी कारें, गैजेट्स और क्लोदिंग सीख जाते हैं, क्योंकि देर-सवेर उन्हें अमीरों की लाइफ स्टाइल जीना है !
फिर वे बच्चे औसत प्रतिभा के हों या होशियार, उनका अच्छा करियर बन ही जाता है, क्योंकि स्कूल से निकलते ही उन्हें बड़े शहरों के महंगे कॉलेजों में भेज दिया जाता है,जहां जैसे-तैसे उनकी पढ़ाई भी हो जाती है और प्लेसमेंट भी।
अब वह बच्चे बड़े शहरों में रहते हैं और छोटे शहरों को हिकारत से देखते हैं !
मजदूरों, रिक्शा वालों, खोमचे वालों की गंध से बचते हैं ...
ये बच्चे छोटे शहरों के गली-कूचे, धूल, गंध देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं।रिश्तेदारों कीआवाजाही उन्हें बेकार की दखल लगती है। फिर वे अपना शहर छोड़कर किसी मेट्रो सिटी या फिर विदेश चले जाते हैं ..
वे बहुत खुदगर्ज और संकीर्ण जीवन जीने लगते हैं।
अब माता-पिता की तीमारदारी और खोज खबर लेना भी उन्हें बोझ लगने लगता है !
पुराना मकान, पुराना सामान, पैतृक संपत्ति को बचाए रखना उन्हें मूर्खता लगने लगती है !
वे पैतृक संपत्ति को जल्दी ही उसे बेचकर
'""राइट इन्वेस्टमेंट""' करना चाहते हैं !
माता-पिता से ..
"वीडियो चैट" में उनकी बातचीत का मसला अक्सर यही रहता है .
इधर दूसरी तरफ कुछ ऐसे बच्चे होते हैं जो सबके सुख-दुख में जाते हैं,
जो किराने की दुकान पर भी जाते हैं, बुआ, चाचा, दादा-दादी को अस्पताल भी ले जाते हैं,
तीज-त्यौहार, श्राद्ध, बरसी के सब कार्यक्रमों में हाथ बंटाते हैं,
क्योंकि उनके माता-पिता ने उन्हें यह मैनर्स सिखाया है !
कि सब के सुख-दुख में शामिल होना चाहिए और ..
किसी की तीमारदारी, सेवा और रोजमर्रा के कामों से जी नहीं चुराना चाहिए .
इन बच्चों के माता-पिता.... उन बच्चों के माता-पिता की तरह समझदार नहीं होते..
क्योंकि वे इन बच्चों का
"कीमती समय" अनावश्यक कामों में नष्ट करवा देते हैं !
फिर ये बच्चे छोटे शहर में ही रहे जाते हैं और दोस्ती यारी रिश्ते नाते जिंदगी भर निभाते हैं !
यह बच्चे, उन बच्चों की तरह "बड़ा करियर"
नहीं बना पाते, इसलिए उन्हें असफल और कम होशियार मान लिया जाता है !
समय गुजरता जाता है, फिर कभी कभार,
वे 'सफल बच्चे' अपनी बड़ी गाड़ियों या फ्लाइट से छोटे शहर आते हैं,
दिन भर एसी में रहते हैं, पुराने घर और गृहस्थी में सौ दोष देखते हैं।
फिर रात को, इन बाइक, स्कूटर से शहर की धूल-धूप में घूमने वाले
'असफल बच्चों' को ज्ञान देते हैं कि.... तुमने अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली आदि आदि !!
असफल बच्चे लज्जित और हीनभाव से सब सुन लेते हैं !
फिर वे 'सफल बच्चे' वापस जाते समय इन असफल बच्चों को,
पुराने मकान में रह रहे उनके मां-बाप, नानी, दादा-दादी का ध्यान रखने की हिदायतें देकर,
वापस बड़े शहरों या विदेशों को लौट जाते हैं।
फिर उन बड़े शहरों में रहने वाले बच्चों की, इन छोटे शहर में रह रहे मां, पिता, नानी के घर कोई सीपेज रिपेयरिंग का काम होता है तो यही 'असफल बच्चे' बुलाए जाते हैं।
सफल बच्चों के उन वृद्ध मां-बाप के हर छोटे बड़े काम के लिए .. यह 'असफल बच्चे' दौड़े चले आते हैं।
कभी पेंशन, कभी किराना, कभी घर की मरम्मत, कभी पूजा...डॉ . के यहां लाना ले जाना कभी कुछ कभी कुछ !
जब वे 'सफल बच्चे' मेट्रोज के किसी एयरकंडीशंड जिम में ट्रेडमिल कर रहे होते हैं....!
तब छोटे शहर के यह 'असफल बच्चे' उनके बूढ़े पिता का चश्मे का फ्रेम बनवाने,किसी दूकान के काउंटर पर खड़े होते हैं...
और तो और इनके माता पिता के मरने पर अग्नि देकर तेरहवीं तक सारे क्रियाकर्म भी करते हैं !
सफल यह भी हो सकते थे....!
इनकी प्रतिभा और परिश्रम में कोई कमी न थी....!
""मगर...
इन बच्चों और उनके माता-पिता में शायद 'जीवन दृष्टि अधिक' थी !"
कि उन्होंने धन-दौलत से अधिक, "मानवीय संबंधों और सामाजिक मेल-मिलाप को आवश्यक" माना .
सफल बच्चों से किसी को कोई अड़चन नहीं है..
मगर बड़े शहरों में रहने वाले, वे 'सफल बच्चे' अगर 'सोना' हैं, तो छोटे शहरों-गांवों में रहने वाले यह 'असफल बच्चे' किसी 'हीरे' से कम नहीं !
आपके हर छोटे-बड़े काम के लिए दौड़े आने वाले ,
उनका कैरियर सजग बच्चों से कहीं अधिक तवज्जो और सम्मान के हकदार है !
अपने बच्चों को "संवेदनशील" बनाईए...
वे "धन कमाने की मशीन" नहीं हैं !
सही सकारात्मक एवं मानवीय दृष्टिकोण ही सही जीवन है !!
🙏🙏🙏cp
विवाह उपरांत जीवन साथी को छोड़ने के लिए 2 शब्दों का प्रयोग किया जाता है
1-Divorce (अंग्रेजी)
2-तलाक (उर्दू)
कृपया हिन्दी का शब्द बताए...??
कहानी आजतक के Editor... संजय सिन्हा की लिखी है...।
तब मैं... 'जनसत्ता' में... नौकरी करता था...। एक दिन खबर आई कि... एक आदमी ने झगड़े के बाद... अपनी पत्नी की हत्या कर दी...। मैंने खब़र में हेडिंग लगाई कि... "पति ने अपनी बीवी को मार डाला"...! खबर छप गई..., किसी को आपत्ति नहीं थी...। पर शाम को... दफ्तर से घर के लिए निकलते हुए... प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी... सीढ़ी के पास मिल गए...। मैंने उन्हें नमस्कार किया... तो कहने लगे कि... "संजय जी..., पति की... 'बीवी' नहीं होती...!"
“पति की... 'बीवी' नहीं होती?” मैं चौंका था
" “बीवी" तो... 'शौहर' की होती है..., 'मियाँ' की होती है..., पति की तो... 'पत्नी' होती है...! "
भाषा के मामले में... प्रभाष जी के सामने मेरा टिकना मुमकिन नहीं था..., हालांकि मैं कहना चाह रहा था कि... "भाव तो साफ है न ?" बीवी कहें... या पत्नी... या फिर वाइफ..., सब एक ही तो हैं..., लेकिन मेरे कहने से पहले ही... उन्होंने मुझसे कहा कि... "भाव अपनी जगह है..., शब्द अपनी जगह...! कुछ शब्द... कुछ जगहों के लिए... बने ही नहीं होते...! ऐसे में शब्दों का घालमेल गड़बड़ी पैदा करता है...।"
खैर..., आज मैं भाषा की कक्षा लगाने नहीं आया..., आज मैं रिश्तों के एक अलग अध्याय को जीने के लिए आपके पास आया हूं...। लेकिन इसके लिए... आपको मेरे साथ... निधि के पास चलना होगा...।
निधि... मेरी दोस्त है..., कल उसने मुझे फोन करके अपने घर बुलाया था...। फोन पर उसकी आवाज़ से... मेरे मन में खटका हो चुका था कि... कुछ न कुछ गड़बड़ है...! मैं शाम को... उसके घर पहुंचा...। उसने चाय बनाई... और मुझसे बात करने लगी...। पहले तो इधर-उधर की बातें हुईं..., फिर उसने कहना शुरू कर दिया कि... नितिन से उसकी नहीं बन रही और उसने उसे तलाक देने का फैसला कर लिया है...।
मैंने पूछा कि... "नितिन कहां है...?" तो उसने कहा कि... "अभी कहीं गए हैं..., बता कर नहीं गए...।" उसने कहा कि... "बात-बात पर झगड़ा होता है... और अब ये झगड़ा बहुत बढ़ गया है..., ऐसे में अब एक ही रास्ता बचा है कि... अलग हो जाएं..., तलाक ले लें...!"
निधि जब काफी देर बोल चुकी... तो मैंने उससे कहा कि... "तुम नितिन को फोन करो... और घर बुलाओ..., कहो कि संजय सिन्हा आए हैं...!"
निधि ने कहा कि... उनकी तो बातचीत नहीं होती..., फिर वो फोन कैसे करे...?!!!
अज़ीब सँकट था...! निधि को मैं... बहुत पहले से जानता हूं...। मैं जानता हूं कि... नितिन से शादी करने के लिए... उसने घर में कितना संघर्ष किया था...! बहुत मुश्किल से... दोनों के घर वाले राज़ी हुए थे..., फिर धूमधाम से शादी हुई थी...। ढ़ेर सारी रस्म पूरी की गईं थीं... ऐसा लगता था कि... ये जोड़ी ऊपर से बन कर आई है...! पर शादी के कुछ ही साल बाद... दोनों के बीच झगड़े होने लगे... दोनों एक-दूसरे को खरी-खोटी सुनाने लगे... और आज उसी का नतीज़ा था कि... संजय सिन्हा... निधि के सामने बैठे थे..., उनके बीच के टूटते रिश्तों को... बचाने के लिए...!
खैर..., निधि ने फोन नहीं किया...। मैंने ही फोन किया... और पूछा कि... "तुम कहां हो... मैं तुम्हारे घर पर हूँ..., आ जाओ...। नितिन पहले तो आनाकानी करता रहा..., पर वो जल्दी ही मान गया और घर चला आया...।
अब दोनों के चेहरों पर... तनातनी साफ नज़र आ रही थी...। ऐसा लग रहा था कि... कभी दो जिस्म-एक जान कहे जाने वाले ये पति-पत्नी... आंखों ही आंखों में एक दूसरे की जान ले लेंगे...! दोनों के बीच... कई दिनों से बातचीत नहीं हुई थी...!!
नितिन मेरे सामने बैठा था...। मैंने उससे कहा कि... "सुना है कि... तुम निधि से... तलाक लेना चाहते हो...?!!!
उसने कहा, “हाँ..., बिल्कुल सही सुना है...। अब हम साथ... नहीं रह सकते...।"
मैंने कहा कि... "तुम चाहो तो... अलग रह सकते हो..., पर तलाक नहीं ले सकते...!"
“क्यों...???
“क्योंकि तुमने निकाह तो किया ही नहीं है...!”
"अरे यार..., हमने शादी तो... की है...!"
“हाँ..., 'शादी' की है...! 'शादी' में... पति-पत्नी के बीच... इस तरह अलग होने का... कोई प्रावधान नहीं है...! अगर तुमने 'मैरिज़' की होती तो... तुम "डाइवोर्स" ले सकते थे...! अगर तुमने 'निकाह' किया होता तो... तुम "तलाक" ले सकते थे...! लेकिन क्योंकि... तुमने 'शादी' की है..., इसका मतलब ये हुआ कि... "हिंदू धर्म" और "हिंदी" में... कहीं भी पति-पत्नी के एक हो जाने के बाद... अलग होने का कोई प्रावधान है ही नहीं....!!!"
मैंने इतनी-सी बात... पूरी गँभीरता से कही थी..., पर दोनों हँस पड़े थे...! दोनों को... साथ-साथ हँसते देख कर... मुझे बहुत खुशी हुई थी...। मैंने समझ लिया था कि... रिश्तों पर पड़ी बर्फ... अब पिघलने लगी है...! वो हँसे..., लेकिन मैं गँभीर बना रहा...
मैंने फिर निधि से पूछा कि... "ये तुम्हारे कौन हैं...?!!!"
निधि ने नज़रे झुका कर कहा कि... "पति हैं...! मैंने यही सवाल नितिन से किया कि... "ये तुम्हारी कौन हैं...?!!! उसने भी नज़रें इधर-उधर घुमाते हुए कहा कि..."बीवी हैं...!"
मैंने तुरंत टोका... "ये... तुम्हारी बीवी नहीं हैं...! ये... तुम्हारी बीवी इसलिए नहीं हैं.... क्योंकि... तुम इनके 'शौहर' नहीं...! तुम इनके 'शौहर' नहीं..., क्योंकि तुमने इनसे साथ "निकाह" नहीं किया... तुमने "शादी" की है...! 'शादी' के बाद... ये तुम्हारी 'पत्नी' हुईं..., हमारे यहाँ जोड़ी ऊपर से... बन कर आती है...! तुम भले सोचो कि... शादी तुमने की है..., पर ये सत्य नहीं है...! तुम शादी का एलबम निकाल कर लाओ..., मैं सबकुछ... अभी इसी वक्त साबित कर दूंगा...!"
बात अलग दिशा में चल पड़ी थी...। मेरे एक-दो बार कहने के बाद... निधि शादी का एलबम निकाल लाई..., अब तक माहौल थोड़ा ठँडा हो चुका था..., एलबम लाते हुए... उसने कहा कि... कॉफी बना कर लाती हूं...।"
मैंने कहा कि..., "अभी बैठो..., इन तस्वीरों को देखो...।" कई तस्वीरों को देखते हुए... मेरी निगाह एक तस्वीर पर गई..., जहाँ निधि और नितिन शादी के जोड़े में बैठे थे...। और पाँव~पूजन की रस्म चल रही थी...। मैंने वो तस्वीर एलबम से निकाली... और उनसे कहा कि... "इस तस्वीर को गौर से देखो...!"
उन्होंने तस्वीर देखी... और साथ-साथ पूछ बैठे कि... "इसमें खास क्या है...?!!!"
मैंने कहा कि... "ये पैर पूजन का रस्म है..., तुम दोनों... इन सभी लोगों से छोटे हो..., जो तुम्हारे पांव छू रहे हैं...।"
“हां तो....?!!!"
“ये एक रस्म है... ऐसी रस्म सँसार के... किसी धर्म में नहीं होती... जहाँ छोटों के पांव... बड़े छूते हों...! लेकिन हमारे यहाँ शादी को... ईश्वरीय विधान माना गया है..., इसलिए ऐसा माना जाता है कि... शादी के दिन पति-पत्नी दोनों... 'विष्णु और लक्ष्मी' के रूप हो जाते हैं..., दोनों के भीतर... ईश्वर का निवास हो जाता है...! अब तुम दोनों खुद सोचो कि... क्या हज़ारों-लाखों साल से... विष्णु और लक्ष्मी कभी अलग हुए हैं...?!!! दोनों के बीच... कभी झिकझिक हुई भी हो तो... क्या कभी तुम सोच सकते हो कि... दोनों अलग हो जाएंगे...?!!! नहीं होंगे..., हमारे यहां... इस रिश्ते में... ये प्रावधान है ही नहीं...! "तलाक" शब्द... हमारा नहीं है..., "डाइवोर्स" शब्द भी हमारा नहीं है...!"
यहीं दोनों से मैंने ये भी पूछा कि... "बताओ कि... हिंदी में... "तलाक" को... क्या कहते हैं...???"
दोनों मेरी ओर देखने लगे उनके पास कोई जवाब था ही नहीं फिर मैंने ही कहा कि... "दरअसल हिंदी में... 'तलाक' का कोई विकल्प ही नहीं है...! हमारे यहां तो... ऐसा माना जाता है कि... एक बार एक हो गए तो... कई जन्मों के लिए... एक हो गए तो... प्लीज़ जो हो ही नहीं सकता..., उसे करने की कोशिश भी मत करो...! या फिर... पहले एक दूसरे से 'निकाह' कर लो..., फिर "तलाक" ले लेना...!!"
अब तक रिश्तों पर जमी बर्फ... काफी पिघल चुकी थी...!
निधि चुपचाप मेरी बातें सुन रही थी...। फिर उसने कहा कि... "भैया, मैं कॉफी लेकर आती हूं...।"
वो कॉफी लाने गई..., मैंने नितिन से बातें शुरू कर दीं...। बहुत जल्दी पता चल गया कि... बहुत ही छोटी-छोटी बातें हैं..., बहुत ही छोटी-छोटी इच्छाएं हैं..., जिनकी वज़ह से झगड़े हो रहे हैं...।
खैर..., कॉफी आई मैंने एक चम्मच चीनी अपने कप में डाली...। नितिन के कप में चीनी डाल ही रहा था कि... निधि ने रोक लिया..., “भैया..., इन्हें शुगर है... चीनी नहीं लेंगे...।"
लो जी..., घंटा भर पहले ये... इनसे अलग होने की सोच रही थीं...। और अब... इनके स्वास्थ्य की सोच रही हैं...!
मैं हंस पड़ा मुझे हंसते देख निधि थोड़ा झेंपी कॉफी पी कर मैंने कहा कि... "अब तुम लोग... अगले हफ़्ते निकाह कर लो..., फिर तलाक में मैं... तुम दोनों की मदद करूंगा...!"
शायद अब दोनों समझ चुके थे.....
हिन्दी एक भाषा ही नहीं - संस्कृति है...!
इसी तरह हिन्दू भी धर्म नही - सभ्यता है...!!
👆उपरोक्त लेख मुझे बहुत ही अच्छा लगा..., जो सनातन धर्म और संस्कृति से जुड़ा है...। आप सभी से निवेदन है कि... समय निकाल कर इसे पढ़ें और आगे शेयर ज़रूर करें 🙏cp
किसका घर माता-पिता का या बेटे का ❤️❤️
"पापा नया घर बिल्कुल तैयार हो चुका है। सोच रहा हूं कि वहां दीपावली पर शिफ्ट कर लूं।" सिद्धार्थ ने अपने पापा गोविंद प्रसाद जी से कहा।
सिद्धार्थ गोविंद जी और सुधा का इकलौता बेटा है। सुधा वहीं पर बैठी मूकदर्शक बनी चुपचाप सुन रही है। पिछले कुछ दिनों से उसने किसी भी बात पर रियेक्ट करना छोड़ दिया था। नए घर की उमंग में सिद्धार्थ और उसकी पत्नी रिया दोनों बेहद खुश थे। सिद्धार्थ बहुत बड़ा अफसर है। रिया भी अमीर खानदान से ताल्लुक रखती है। गोविन्द जी ने अपने घर को बहुत चाव से बनवाया था। कोठी बाग बगीचा सब कुछ था। परन्तु जब सिद्धार्थ ने कहा कि उसने भी एक घर का सपना देखा है अपने घर का।
ये सुनकर गोविंद जी आश्चर्यचकित रह गए थे। "अपना घर तो ये किसका घर है??"
"नहीं पापा ये घर आपका है। मैं अपने घर को अपनी मेहनत से बनाना चाहता हूं।" फिर उसने उनसे कुछ पूछने की जरूरत नहीं समझी थी। सब कुछ रिया और उसकी मर्जी से होने लगा था। बीच-बीच में सिद्धार्थ उनसे सलाह ले लिया करता था। जबरन उन्हें दो तीन बार साइट पर भी ले गया था। मां को तो न कुछ पूछा न दिखाने की जरूरत महसूस की थी।
सुधा के अंदर तो जैसे सब कुछ टूट गया था।जिस बेटे को उसने जान से भी ज्यादा प्यार किया था उसने एक तरह से उसका तिरस्कार कर दिया था। तिरस्कार बोल कर ही नहीं चुप रह कर भी किया जा सकता है। सुधा महसूस कर सकती थी। रिया ने बहू के रूप में कभी उन्हें कोई तकलीफ नहीं दी थी। अमीर घर की बेटी होने के बावजूद उसका व्यवहार बेहद संस्कारी और संयमित था। पांच साल का गोलू और रिया घर की रौनक थे। सुधा ने कभी भी रिया के साथ बुरा बर्ताव नहीं किया था। गोलू में तो सुधा की जान बसती थी। पर सुधा बेटे के व्यवहार से बहुत आहत हो गई थी कभी कभी गोविंद जी से अकेले में बात करते हुए पूछती कि ये मुझे मेरे किन पापों का फल मिला??? एक ही बेटा वह भी घर छोड़ कर चला जाएगा। गोलू और रिया.....
ये कह कर उसके आंसू निकल आते थे। मैंने तो अपने सास ससुर की दिल से सेवा की कभी उनका दिल नहीं दुखाया अम्मा जी ने तो अंतिम समय मेरे सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया था कि ईश्वर हमेशा तुझे खुशी देंगे। फिर पता नहीं हमारे परिवार को किसकी बद्दुआ लग गई।
धीरे धीरे दुःख मना कर उसने अपने दिल को समझा लिया था।
गोविन्द जी उसे समझाते कि तुम्हारा जब मन करे वहां चली जाना।बेटे की तरक्की पर दुःख नहीं मनाते खुश होते हैं। रिया और सिद्धार्थ एक एक चीजें चुन चुन कर ला रहे थे। गोविन्द जी को बेटे से दूर होने का दुःख था पर उन्होंने जाहिर नहीं किया। वो उसे महसूस कराते कि वो उसकी खुशी में खुश हैं।
आज धनतेरस है गृहप्रवेश की सारी तैयारियां हो चुकी थी। सिद्धार्थ और रिया नए घर की खुशी में बेहद उत्साहित थे। सिद्धार्थ सुबह सुबह नए कपड़े ले कर मां पापा के रूम में आया। पापा के लिए खूबसूरत सिल्क का कुर्ता बंद गले की जैकेट के साथ और मां के लिए बेहद सुंदर सिल्क की साड़ी मम्मी के पसंदीदा हरे लाल रंग की।
मां, पापा जल्दी से तैयार हो जाइए ग्यारह बजे का मूर्हत है। सुधा चुप थी। सोच रही थी कि बस तैयार हो जाओ। और चलो। अंदर जैसे कुछ खत्म सा हो गया न कोई उत्साह न कोई खुशी उसे जा कर सिर्फ खड़े होना है।
गोलू आ कर उसके गले से झूल गया दादी मां आप मेरे साथ चलोगी न आंखों में आंसू भर कर उसने गोलू को छाती से चिपका लिया। सुधा गाड़ी में पूरे रास्ते भर चुप थी। जिस दिन भूमि पूजन हुआ था उसके बाद आज वो घर देखने जा रही है। गाड़ी से उतरते ही सामने बेटे की कोठी को सिर उठा कर देखा तो दंग रह गई।
"बहुत खूबसूरत आधुनिक तरीके से डिजाइन किया गया था।"
"आओ मां !" बेटे ने मां का हाथ पकड़ लिया।
महीनों बाद उसने कुछ कहा । सुधा सोच रही थी कि आज नए घर की उमंग में अपनी मां से अबोला खत्म कर रहा है।
घर के मेन गेट पर नेमप्लेट देख कर सुधा स्तब्ध हो गई।
"सुधा गोविंद निवास"
उसका दिल बहुत तेज से धड़क उठा। बेटा मां के चेहरे के भाव पड़ने की कोशिश कर रहा था। अंदर रिया खड़ी मुस्कुराई।
आइए मां ! आपके नए घर में आपका स्वागत है। ये लीजिए आपकी अमानत रिया ने घर की चाभियां सुधा के हाथ में रख दी।
बेटे ने मां का हाथ चूम लिया। " मां अपने नए घर में भगवान के लिए भोग अपने हाथ से बनाओ पर प्रसाद मेरी पसंद का होगा।"
सुधा समझ ही नहीं पा रही थी। क्या बनाऊं??? सुधा की आंखों से आंसू टपक पड़े।
" हलवा बनाऊंगी" मेरे कान्हा जी की और तेरी पसंद का।
पहले अपना और पापा का रूम देख लो मां सुधा को लगभग खींचते हुए रुम में ले गया सुधा देख रही थी उस रूम में सब कुछ उसकी पसंद का है।
पापा के लिए रॉकिंग चेयर, उसके लिए सामने से खुलने वाली खिड़की सुबह-सुबह सूर्य की पहली किरण के दर्शन सूर्य भगवान को नमन करना ये उसका सपना था। जिसे वह कभी सिद्धार्थ से कहा करती थी। बाहर तुलसी जी का चौरा जैसा वो हमेशा चाहती थी।
अरे! ये तो उसका लगाया हुआ मनीप्लांट है। इसके लिए वह कितना परेशान हुई थी। माली ने उसे उखाड़ कर गुलदाउदी लगा दिया था तो उसने माली को कितना डांटा था।
तो मेरे बच्चे को सब कुछ याद था। उसका मन पुलकित हो उठा। कमरे की एक एक चीज को छू कर देख थी।
"मां आपने क्या सोचा था??? आपका राजा बेटा आपके बिना खुश रहेगा ???" रिया मुस्कुराती हुई कह उठी मां आपका बेटा तो मेरे गोलू से भी छोटा है।
"मां" सिद्धार्थ ने सुधा को बाहों में समेट लिया आपके संस्कार इतने कमजोर नहीं हैं। आपने क्या सोचा ???? कि आपका बेटा आपको और पापा को यूं ही अकेला छोड़ देगा। नहीं मां, वो घर मेरा है जो पापा ने मुझे दिया। और ये घर आप दोनों का है जो मैंने आपको दिया है।
गोविन्द जी आश्चर्यचकित थे।"पर बेटा परिवार तो दो हिस्सों में बंट जाएगा न।"
" कैसे बंटेगा पापा ??"
"ये घर मेरे ऑफिस के पास है। इसलिए "वर्किंग डे" पर यहां रहेंगे और "वीकेंड" पर वहां।"
मैं दादी मां के पास ही सोऊंगा ऐसा कह कर गोलू दादी के आंचल में छिप गया। सुधा आंखों में खुशी के आंसू लिए "अम्मा जी का हाथ" अपने सिर पर महसूस कर रही थी।
Cp
साइकिल की सवारी किसी भी देश की अर्थव्यवस्था (GDP) के लिए बेहद हानिकारक है....!
सुनने में ये हास्यास्पद लग सकता है , परन्तु सत्य है....
एक साइकिल चलाने वाला देश के लिए बहुत बड़ी आपदा है, क्योंकि.......
वो गाड़ी नहीं खरीदता,
वो लोन नहीं लेता,
वो गाड़ी का बीमा नहीं करवाता,
वो तेल नहीं खरीदता,
वो गाड़ी की सर्विसिंग नहीं करवाता,
वो पैसे देकर गाड़ी पार्किंग नहीं करता,
वो ट्रैफ़िक फाइन नहीं देता ,
और तो और
वो मोटा (मोटापा) नहीं होता।
जी हां .....यह सत्य है कि एक स्वस्थ व्यक्ति
अर्थव्यवस्था के लिए सही नहीं है, क्योंकि...
वो दवाईयां नहीं खरीदता,
वो अस्पताल व चिकित्सक के पास नहीं जाता
वो राष्ट्र की GDP में कोई योगदान नहीं देता।
ठीक इसके विपरित एक फ़ास्ट फूड की दुकान 30 नौकरी पैदा करती है........
10 हृदय चिकित्सक,
10 दंत चिकित्सक,
10 वजन घटाने वाले...!
नोट :-पैदल चलना इससे भी अधिक ख़तरनाक होता है, क्योंकि पैदल चलने वाला व्यक्ति तो साइकिल भी नहीं खरीदता..................cp
टूटते रिश्ते 💔💔💔
सुबह के साढ़े सात बजे जब निधि स्कूल के लिए तैयार हुई तो चुपके से ऊपर मम्मी के बेडरूम में गई धीरे से डोर सरकाया देखा तो सारा सामान बिखरा पड़ा था। नीचे ड्राइंग रूम में आई तो पापा सोफे पर बेसुध सो रहे थे। अपने रुम में आकर उसने अपनी गुल्लक में से पचास रुपए निकाल कर पॉकेट में रख लिए। बैग उठा कर बस के लिए निकलने लगी तो सरोज आई निधि बेटा आलू का परांठा बनाया है खा लो।
निधि ने मायूस नजरों से सरोज आंटी को देखा नहीं आंटी भूख नहीं है। सरोज ने जबरदस्ती टिफिन उसके बैग में डाला। निधि स्कूल के लिए निकल गई सरोज सोचने लगी बेचारी छोटी बच्ची साहब और मेमसाब के रोज के लडा़ई झगडे से इस तेरह साल की उम्र में कितनी बड़ी हो गई है। सरोज पिछले दस सालों से नेहा व नरेश के यहां काम कर रही है। दोनों मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे पदों पर कार्यरत हैं निधि उनकी इकलौती बेटी है किसी चीज की कोई कमी नहीं है। पर हर समय दोनों एक दूसरे से लड़ते रहते हैं।नरेश पिछले कुछ समय से नेहा से तलाक चाह रहा है और चाहता है निधि की जिम्मेदारी नेहा उठाए और नेहा निधि की जिम्मेदारी नरेश को देने के साथ जायदाद में हिस्सा चाहती है। इस कारण दोनों लड़ते रहते हैं।
बच्चे की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता इसलिए दोनों एक दूसरे के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं बेचारी निधि स्कूल से घर आकर अपने कमरे में दुबक जाती है केवल सरोज आंटी से ही बात करती है।रोज की तरह नेहा और नरेश ने नाश्ता अपने अपने कमरे में किया और ऑफिस के लिए निकल गये करीब बारह बजे स्कूल से कॉल आया कि जल्दी हास्पिटल पहुंचो निधि को चोट आई है। हॉस्पिटल पहुंच कर पता चला कि निधि बहुत ऊपर से सीढ़ियों से गिर गई है। आईसीयू में रखा गया था। आपरेशन की तैयारी हो रही थी
सिर में बहुत गहरी चोट आई थी।ऑपरेशन शुरू हुआ पर जिंदगी मौत से हार गई। नेहा और नरेश स्तब्ध रह गए उन्हें ऐसा झटका लगा था कि अपनी सुध-बुध ही खो बैठे थे। निधि की दादी भी आ गई थी बेटा बहू को देखकर नफरत से मुंह फेर लिया। पूछताछ हुई टीचर स्टुडेंट्स सभी के बयान लिए गए यही पता चला कि बैलेंस बिगड़ने से नीचे गिर गई। तेरहवां निबटने के बाद नरेश ने अपनी मां को रोकना चाहा पर उन्होंने आंखों में आंसू भर कर कहा तुम दोनों खूनी हो तुम्हारी जिद मेरी पोती को खा गई।
मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहती थी पर तुम दोनों ने उसे अपने अहम का मोहरा बना कर उसकी जान ले ली। मां चली गई। सरोज तब से सदमे में थी फिर उसने जैसे तैसे होश संभाला नरेश और नेहा से कहा मेमसाब मैं अब यहां नहीं रह पाऊंगी इस घर की दीवारें मेरी निधि की सिसकियों से भरी हैं उसे मैंने कभी अपनी गोद में तो कभी छिप कर रोते हुए देखा है।मेरा मन किया कि उसे लेकर भाग जाऊं पर मैं डरपोक थी ऐसा नहीं कर सकी अगर चली जाती तो शायद आज वो जिंदा होती।नरेश और नेहा के पास अब शायद कहने को कुछ नहीं था। जैसे जैसे दिन बीत रहे थे उनका लडा़ई झगड़ा एक अजीब सी बर्फ में में तब्दील हो चुका था।उनकी सारी भावनाएं अंदर ही अंदर एक खामोशी अख्तियार कर चुकी थी। संडे का दिन था बड़ी मुश्किल से नेहा ने निधि के रूम में जाने की हिम्मत जुटाई थी महीनों दोनों उसके कमरे में कदम नहीं रखते थे कैसे मां बाप थे वो दोनों।
उसका रूम उसका बेड तकिया उसकी किताबें उसकी पेंसिल पैन स्कूल बैग सब वैसे ही रखा था। अलमारी खोली तो उसके कपड़े नीचे गिर पड़े उसका हल्का ब्लू नाइट सूट जिसे वह अक्सर पहना करती थी। नेहा रोते हुए उसमें से सामान निकालने लगी। तभी उसके हाथ एक ब्लू कलर की डायरी लगी। उसने कांपते हाथों से उसे खोला आगे के कुछ पेज फटे हुए थे। पेज दर पेज टूटे दिल की दास्तां छोटे छोटे टुकड़ों में दर्ज थी–
मम्मी पापा मैं आपको डियर नहीं लिखूंगी । क्योंकि डियर का मीनिंग प्यारा होता है। पापा आप मम्मी को कहते हो कि तुम्हारी बेटी। और मम्मी आप पापा को कहते हो तुम्हारी बेटी आप दोनों ये क्यों नहीं कहते कि हमारी बेटी।
अगले पेज पर था पता है जब मैं मामा जी के घर जाती हूं मामा मामी मुझे बहुत प्यार करते हैं मामी अनु को जब प्यार से मेरा बच्चा कहती हैं तो मुझे लगता है कि मैं प्यारी बच्ची नहीं हूं मम्मा मैं तो आपका सारा कहना मानती हूं फिर भी आपने मुझे कभी मेरा बच्चा नहीं कहा।
एक पेज पर लिखा था मम्मी मैं जब बुआ के घर जाती हूं तो वो भी मुझे बहुत प्यार करती हैं। पर खाना हमेशा नक्ष की पंसद का बनाती हैं। मम्मा मुझे राजमा बहुत पसंद है मैंने आपको बनाने को कहा था पर आपने कहा मुझे परेशान मत करो। जो खाना है सरोज आंटी को बोला करो वो बना देंगी।मम्मा मैंने राजमा खाना छोड़ दिया है अब अच्छा नहीं लगता।
पापा मुझे आपके चिल्लाने से बहुत डर लगता है। पापा मैं आपके साथ आइसक्रीम खाने जाना चाहती हूं। आप कहते हैं कि आपके पास फालतू चीजों के लिए टाइम नहीं है। पापा जब चीनू मासी और मौसा जी मुझे और विपुल को आइसक्रीम खिलाने ले जाते हैं तो वो कभी ऐसा नहीं कहते। पता है मम्मी मैं अपने घर से दूर जाना चाहती हूं जहां मुझे ये न सुनाई दे कि निधि को मैं नहीं रखूंगी। जहां पापा के चिल्लाने की आवाज न सुनाई दे। पापा अगर मैं बड़ी होती तो मैं आप दोनों को कभी परेशान नहीं करती मैं खुद ही चली जाती। मैं आप दोनों से बहुत प्यार करती हूं। आप दोनों मुझे प्यार क्यों नहीं करते।
एक पेज पर था–आइलव यू सरोज आंटी मुझे प्यार करने के लिए। जब मुझे डर लगता है अपने पास सुलाने के लिए।मेरी हर बात सुनने के लिए।
अंतिम पेज पर था दादी आई लव यू आप मुझे यहां से ले जाओ आई प्रॉमिस कभी तंग नहीं करूंगी।
नेहा डायरी को सीने से लगा कर जोर जोर से रो पड़ी। नरेश भी उसके रोने की आवाज सुनकर आ गया था नेहा ने डायरी उसे पकड़ा दी। पेज दर पेज पलटते हुए उसके चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे। वह खुद को संभाल नहीं पाया जमीन पर बैठ गया। नेहा रोते हुए बोली नरेश पता है वो एक्सीडेंट नहीं आत्महत्या थी। सुसाइड था। जिस रिश्ते को हम बोझ समझते थे हमारी निधि ने उससे हमें आजाद कर दिया। नरेश हम दोनों ने अपनी बच्ची का खून किया है। नरेश फूट-फूट कर रो पड़ा।
ये कहानी हर उस घर की है जहां मां-बाप बच्चों के सामने लड़ते हैं या घर टूट कर बिखरते हैं और उन टूटते रिश्तों का सबसे बड़ा खामियाजा बच्चे भरते हैं। अगर आप अच्छी परवरिश नहीं दे सकते तो आपको बच्चे को जन्म देने का कोई अधिकार नहीं है। अच्छी परवरिश का मतलब रूपए पैसे सुख सुविधाओं का होना नहीं है। इसका मतलब है कि आप बच्चे को जब जरूरत है उसके कितने करीब हैं।
Cp
सभी मर्द एक जैसे होते हैं।
कौन मर्द ?
जो बाप बनकर ताउम्र तुम्हारी हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी ख्वाहिशों को पूरी करता है,जिसे अपने फटे हुए जूते सिलवाने याद रहे ना रहे लेकिन अपनी बिटिया के लिए स्कूल ड्रेस खरीदना कभी नहीं भूलता है जो महज तुम्हारी छोटी सी इलेक्ट्रॉनिक गुड़िया और एक तुम्हारी पहली स्कूटी और साइकिल के लिए रोज 4 घंटे ओवरटाइम के नाम पर घर लेट आया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना?
सभी मर्द एक जैसे होते हैं।
कौन मर्द ?
वही मर्द ना ,जो भाई बनकर ताउम्र अपनी ख्वाहिशों को मार कर अपने सारे खिलौने तुम्हे दे दिया करता है, तुम्हें डांट ना पड़े इसलिए अपने बाप से मार भी खा लिया करता है, लाख लापरवाह रहे हो वो, लेकिन तुम्हारे एक तरफ उठने वाली हर एक नजर को वह फोड़ दिया करता है वही मर्द ना जो जिंदगी भर पागलों की तरह हंसता रहता है लेकिन तुम्हारी विदाई में फूट फूट कर रोया करता है वही मर्द ना जो जिंदगी के भाग दौड़ में सबसे दूर भाग कर तुम्हारे एक फोन कॉल का इंतजार करता है तुम उसे मर्द की बात कर रही हो ना?
सभी मर्द एक जैसे होते हैं।
कौन मर्द ?
वही मर्द ना जो पति बनकर अपने लड़कपन को एक ही झटके में खत्म कर देता है 80 की रफ्तार से चलाने वाला बाइक अचानक से 40 की रफ्तार में अपने जिम्मेदारियों को थाम लेता है मंगलसूत्र का पहचान वह मर मर्द ता उमर तुम्हारी छोटी छोटी ख्वाहिशों के लिए अपने हर बड़े बड़े अरमानों को मार दिया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना जो पति बनकर हर उम्र में एक दोस्त की तरह तुम्हारा साथ दिया करता है बोलो ना तुम उसी की बात कर रही हो ना?
सभी मर्द एक जैसे होते हैं
कौन मर्द ?
वही मर्द ना जो प्रेमी बनकर पूरी दुनिया को भूलाकर बस तुमसे मोहब्बत करता है तुम्हारे हर झूठे तुम्हारे हर कहानी की बातों को सच मानकर तुमसे बेइंतेहा इश्क करता है वह तुम्हारी झूठ में भी खुद के लिए सच खोज लिया करता है तुम्हारी एक मुस्कान के लिए अपना सब कुछ निछावर कर दिया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना जो प्रेमी बनकर अपनी प्रेमिका के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाया करता है अरे बोलो ना, अरे चुप क्यों हो, बताओ ना की बात कर रही हो ना?
सभी मर्द एक जैसे होते हैं ।
कौन मर्द ??
वही मर्द ना जो दोस्ती के रिश्ते में एक दोस्त बनकर तुम्हें परिवार का हिस्सा मान लेता है जो तुम्हें पिज़्ज़ा खिलाने के लिए खुद के लिए बल्ला खरीदने का पैसा निकाल कर तुम्हें पिज्जा खिला देता है, वही मर्द ना जो मात्र दोस्ती का रिश्ता होने के बावजूद भी पूरी दुनिया से तुम्हारे लिए लड़ जाया करता है तुम्हें सब से बचाता है तुमसे हमेशा गाली खाता है लेकिन तुम्हारी आंखों में कभी आंसू नहीं आने देता वही मर्द ना जो तुमसे लड़ता है झगड़ते है तुम्हें रुलाता है और फिर तुम्हें हंसाने के लिए खुद जोकर बन जाया करता है बताओ ना तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना?
सभी मर्द एक जैसे ही होते है
कौन मर्द ??
वही मर्द जो एक बेटा बन कर हमेशा अपनी मां का ढाल बन कर खड़ा रहता है वही मर्द जिसकी हर तम्माना को पूरी करने के लिए मां रात भर जागती है और मां के बुढ़ापे में वही लड़का एक ढाल बन कर मां की सेवा करता है मां के लिए उसका बेटा ही सबसे बेहतर होता है मां के लिए उसका बेटा ही हीरो है , हां ये बात सही है कि शादी होने के बाद वही कुछ बेटे अपनी मां को घर से निकाल कर वृद्ध आश्रम में भेज देते है लेकिन उनके इस कुकर्म के लिए क्या सिर्फ मर्द ही जिमेद्दार होते है लेकिन इन सब से दूर हिंदुस्तान के आज भी हर घर में श्रवण कुमार जैसे बेटे रहते है जिनके लिए उनकी मां ही उनकी दुनिया है ,
बताओ ना क्या तुम उसी मर्द की बात कर रहीं हो जो अपनी मां के लिए जान भी देते है
Cp
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13/10/2022