11/01/2026
मोबाइल की लत और गुज़रा बचपन…
एक समय था जब बचपन धूप में खेलता था।
कंचे, गुल्ली-डंडा, लुका-छिपी, कबड्डी—
घुटनों पर लगी चोटें, हथेलियों पर मिट्टी
और दिल में बेफ़िक्र हँसी हुआ करती थी।
आज बचपन स्क्रीन में क़ैद है।
उँगलियाँ खेलती हैं, पर आँखें थकी हुई हैं।
दोस्त पास बैठे हैं, फिर भी बातचीत दूर है।
माँ की आवाज़ नोटिफ़िकेशन में दब जाती है
और पिता की सीख “रील” से हार जाती है।
मोबाइल बुरा नहीं है,
लेकिन जब वह माँ की गोद, दोस्त की मुस्कान
और मैदान की आज़ादी छीन ले—
तो सवाल उठना ज़रूरी है।
क्या हमने बच्चों को
सुविधा दी या आदत लगा दी?
क्या हमने समय बचाया
या बचपन खो दिया?
आइए,
थोड़ा मोबाइल साइड में रखें,
थोड़ा समय बच्चों के साथ बैठें,
कहानियाँ सुनें,
आसमान देखें,
और बचपन को फिर से
खुली हवा में साँस लेने दें।
क्योंकि
बचपन लौटकर नहीं आता,
पर संभाल लिया जाए तो सँवर ज़रूर जाता है।
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