31/05/2026
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क्या 'क्वाड' की नाव अलग-अलग दिशाओं में बह रही है?
हाल ही में दिल्ली में क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। मेजबानी भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने की, और इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री पेनी वोंग और जापानी विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी शामिल हुए। डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद यह इस तरह की तीसरी बैठक थी।
दिखने में तो यह बैठक बहुत कामयाब रही, लेकिन अगर हम परतों को हटाकर देखें, तो इसके अंदर कई बड़ी चुनौतियां और विरोधाभास (contradictions) छिपे हैं।
1. सकारात्मक कदम: कागजों पर क्या हासिल हुआ?
बैठक में हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) की सुरक्षा और विकास के लिए कई अच्छे फैसलों पर सहमति बनी:
समुद्री सुरक्षा: समुद्री निगरानी और जागरूकता के लिए तीन नए मिशन (जैसे IPMSC और IPMDA) शुरू करने की बात कही गई।
बड़ा प्रोजेक्ट: फिजी (Fiji) में एक बंदरगाह (Port) बनाने का फैसला लिया गया, जो क्वाड का पहला साझा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट होगा।
समान विचारधारा: मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत (FOIP), क्षेत्रीय अखंडता और आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ने की प्रतिबद्धता दोहराई गई।
2. असली पेंच: अमेरिका का 'एकतरफा' रवैया और क्वाड की मजबूरी
एडिटोरियल का सबसे धारदार विश्लेषण यहीं है। जॉइंट स्टेटमेंट (साझा बयान) में कुछ मुद्दों पर जो चुप्पी साधी गई, वो बहुत कुछ बयां करती है:
अमेरिका की मनमानी: पश्चिमी एशिया (West Asia/Middle East) में ईरान के साथ चल रहे तनाव में अमेरिका और इजरायल ने जो कदम उठाए, उस पर क्वाड के बाकी देशों से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया।
बयानों में चालाकी: बयान में ईरान की हरकतों की निंदा तो की गई, लेकिन अमेरिका द्वारा हिंद महासागर में ईरानी जहाज को डुबोने या पाकिस्तान के जरिए ईरान से गुप्त बातचीत करने का कोई जिक्र नहीं था।
चीन-रूस फैक्टर: ऐसा लगता है कि अमेरिका अपनी सहूलियत के हिसाब से चीन और रूस के साथ नई तरह की डीलिंग कर रहा है, जिससे क्वाड की भाषा पर लगाम (constraints) लग गई है।
सरल शब्दों में कहें तो: जब अमेरिका कोई कदम उठाता है, तो वह बाकी सहयोगियों से नहीं पूछता। इससे क्वाड की एकता और इसकी प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
3. लीडर्स समिट पर संकट: क्या क्वाड कमजोर हो रहा है?
क्वाड का सफर 2007 में अधिकारियों के स्तर से शुरू हुआ था और 2021 तक आते-आते यह राष्ट्राध्यक्षों (पीएम और राष्ट्रपति) के स्तर तक पहुंच गया। लेकिन अब इस रफ्तार पर ब्रेक लगता दिख रहा है:
2024 का विवाद: पन्नू-निज्जर मामले को लेकर भारत और अमेरिका के बीच तनाव हुआ, जिसके कारण भारत में होने वाला समिट टल गया और जो बाइडन के दबाव में इसे बाल्टीमोर (अमेरिका) में करना पड़ा।
2025 का गतिरोध: भारत और ट्रंप प्रशासन के बीच टैरिफ (टैक्स), प्रतिबंध, व्यापार और 'ऑपरेशन सिंदूर' के दावों को लेकर विवाद हुआ, जिससे दिल्ली में होने वाली बैठक फिर खटाई में पड़ गई।
2026 की मौजूदा स्थिति: साल 2026 आधा बीत चुका है, लेकिन अभी तक भारत की अध्यक्षता में मुख्य लीडर्स समिट की तारीख तय नहीं हुई है। अगर भारत बिना समिट कराए इसकी कमान ऑस्ट्रेलिया को सौंप देता है, तो यह माना जाएगा कि क्वाड का कद और महत्व घट रहा है।
बॉटम लाइन (निष्कर्ष)
इसमें कोई शक नहीं है कि जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर क्वाड हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक "Force for Good" (भलाई की ताकत) है।
लेकिन, अगर अमेरिका अपने सहयोगियों को भरोसे में लिए बिना दुनिया भर में एकतरफा फैसले लेता रहा, तो यह ग्रुप बिखर सकता है। क्वाड को अगर अपने नेक इरादों को हकीकत में बदलना है, तो इसके सभी चारों पहियों को एक दिशा में चलना होगा—अलग-अलग दिशाओं में खींचने से गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी।