अश्वत्थामा द्वारा उपपांडवों की हत्या और द्रौपदी की करुणा — विस्तृत कथा
यह प्रसंग महाभारत और विशेष रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित अत्यंत मार्मिक घटनाओं में से एक है। यह केवल प्रतिशोध की कथा नहीं, बल्कि धर्म, करुणा, क्रोध और न्याय के गहरे संघर्ष की कहानी है।
युद्ध का अंत और दुर्योधन की दशा
कुरुक्षेत्र का भयंकर युद्ध समाप्ति की ओर था।
कौरव सेना लगभग नष्ट हो चुकी थी। भीमसेन ने गदा युद्ध में दुर्योधन की जंघा तोड़ दी थी। घायल दुर्योधन एक सरोवर के पास पड़ा अपने अंतिम समय की प्रतीक्षा कर रहा था।
उसी समय गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा वहाँ पहुँचा।
उसके साथ कृपाचार्य और कृतवर्मा भी थे।
दुर्योधन की दशा देखकर अश्वत्थामा का हृदय क्रोध और प्रतिशोध से भर उठा। उसे लगा कि पांडवों ने छल से उसके पिता द्रोणाचार्य का वध कराया और अब दुर्योधन को भी अधर्मपूर्वक हराया।
उसने प्रतिज्ञा की—
“मैं आज रात पांडवों का वंश समाप्त कर दूँगा।”
रात्रि का भयानक हमला
रात्रि का समय था।
युद्ध समाप्त मानकर पांडवों का शिविर शांत था। सभी योद्धा गहरी नींद में थे।
अश्वत्थामा ने कपटपूर्वक रात में शिविर में प्रवेश किया।
वह अत्यंत क्रूर और क्रोध से अंधा हो चुका था।
उसने सबसे पहले धृष्टद्युम्न का वध किया, जो द्रोणाचार्य के वध का कारण बने थे। फिर उसने सोए हुए सैनिकों को मारना शुरू कर दिया।
अंत में वह उस तंबू में पहुँचा जहाँ द्रौपदी के पाँच पुत्र — उपपांडव — सो रहे थे।
वे थे:
प्रतिविन्ध्य
सुतसोम
श्रुतकर्मा
शतानीक
श्रुतसेन
अश्वत्थामा ने उन्हें सोते समय ही मार डाला।
उसे लगा कि उसने पांडवों का अंत कर दिया है।
लेकिन वे पाँचों पांडव नहीं, उनके पुत्र थे।
द्रौपदी का विलाप
प्रातःकाल जब यह समाचार फैला, पूरा शिविर शोक में डूब गया।
द्रौपदी अपने पुत्रों के शव देखकर फूट-फूटकर रोने लगी।
एक माँ का हृदय टूट चुका था।
उसका विलाप सुनकर सभी की आँखें भर आईं।
भीमसेन क्रोध से कांप उठे। उन्होंने तुरंत अश्वत्थामा को मार डालने की प्रतिज्ञा की।
अर्जुन की प्रतिज्ञा
अर्जुन ने द्रौपदी से कहा—
“मैं तुम्हारे पुत्रों के हत्यारे का सिर लाकर तुम्हारे चरणों में रखूँगा।”
इसके बाद अर्जुन अपने रथ पर सवार हुए।
रथ के सारथी स्वयं श्रीकृष्ण थे।
अर्जुन और श्रीकृष्ण अश्वत्थामा का पीछा करने निकल पड़े।
ब्रह्मास्त्र का प्रयोग
जब अश्वत्थामा ने देखा कि अर्जुन उसका पीछा कर रहे हैं, तो वह भयभीत हो गया।
उसे पता था कि युद्ध में वह अर्जुन का सामना नहीं कर सकता।
तब उसने अंतिम उपाय के रूप में भयंकर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया।
ब्रह्मास्त्र इतना शक्तिशाली था कि उससे पूरी सृष्टि संकट में पड़ सकती थी।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा—
“अर्जुन! इसका सामना केवल ब्रह्मास्त्र से ही किया जा सकता है।”
तब अर्जुन ने भी मंत्रों द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।
दोनों दिव्य अस्त्रों के टकराने से आकाश अग्नि से भर गया। पृथ्वी कांपने लगी। ऋषि-मुनि भयभीत हो उठे।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आदेश दिया कि वे अपना ब्रह्मास्त्र वापस बुला लें। अर्जुन ने ऐसा कर लिया, क्योंकि वे अस्त्र को नियंत्रित करना जानते थे।
लेकिन अश्वत्थामा अपना अस्त्र वापस लेना नहीं जानता था।
अश्वत्थामा का नया अधर्म
जब अश्वत्थामा अस्त्र वापस नहीं ले पाया, तब उसने उसे पांडव वंश के अंतिम उत्तराधिकारी को नष्ट करने के लिए मोड़ दिया।
उस समय उत्तरा गर्भवती थीं। उनके गर्भ में परीक्षित थे।
अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र उत्तरा के गर्भ की ओर भेज दिया।
उत्तरा भयभीत होकर श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचीं—
“हे प्रभु! मेरे गर्भ की रक्षा कीजिए!”
तब श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य सुदर्शन और योगमाया से गर्भस्थ परीक्षित की रक्षा की।
अश्वत्थामा को बंदी बनाना
इसके बाद अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ लिया।
उसे रस्सियों से बांधकर शिविर में लाया गया।
भीमसेन उसे तुरंत मार डालना चाहते थे।
लेकिन तभी एक अद्भुत घटना हुई।
द्रौपदी की करुणा
जिस अश्वत्थामा ने उसके पाँच पुत्रों की हत्या कर दी थी, उसी को देखकर द्रौपदी की आँखों में करुणा आ गई।
उसने कहा—
“यह गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र है।
जैसे मैं अपने पुत्रों के वियोग में दुखी हूँ, वैसे ही इसकी माता कृपी भी पुत्र-वियोग में रोएगी।
मैं नहीं चाहती कि एक और माँ मेरी तरह दुख सहन करे।”
द्रौपदी ने यह भी कहा कि गुरु-पुत्र होने के कारण अश्वत्थामा सम्मान के योग्य है।
उसकी करुणा देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए।
श्रीकृष्ण का निर्णय
श्रीकृष्ण जानते थे कि अश्वत्थामा ने घोर अधर्म किया है।
लेकिन वे द्रौपदी की करुणा और अर्जुन की प्रतिज्ञा — दोनों को सत्य रखना चाहते थे।
उन्होंने अर्जुन को ऐसा दंड देने का उपाय बताया जिससे:
अश्वत्थामा जीवित भी रहे,
और उसकी वीरता, सम्मान तथा शक्ति समाप्त हो जाए।
दिव्य मणि निकालना
अर्जुन ने अश्वत्थामा के माथे पर लगी दिव्य मणि निकाल ली।
उस मणि के कारण अश्वत्थामा को:
रोग नहीं होते थे,
भूख-प्यास नहीं लगती थी,
और वह तेजस्वी रहता था।
मणि निकलते ही उसका तेज नष्ट हो गया।
अर्जुन ने उसके केश काट दिए और उसे अपमानित करके शिविर से बाहर निकाल दिया।
अश्वत्थामा का श्राप
श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया—
“तू हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर भटकेगा।
तेरे शरीर से रक्त और पीप बहता रहेगा।
लोग तुझसे दूर भागेंगे।
तू अकेला, पीड़ित और अपमानित जीवन जीएगा।”
कहा जाता है कि अश्वत्थामा आज भी चिरंजीवी रूप में पृथ्वी पर भटक रहा है।
इस कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ
1. क्रोध बुद्धि नष्ट कर देता है
अश्वत्थामा क्रोध में इतना अंधा हो गया कि उसने सोते हुए निर्दोष बच्चों की हत्या कर दी।
2. करुणा सबसे बड़ी शक्ति है
द्रौपदी ने अपने पुत्रों के हत्यारे पर भी दया दिखाई।
3. अधर्म का दंड निश्चित है
अश्वत्थामा महान योद्धा था, फिर भी अधर्म के कारण उसे भयानक श्राप मिला।
अ4. श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा करते हैं
उन्होंने परीक्षित की रक्षा कर पांडव वंश को बचाया।
यह प्रसंग महाभारत के सबसे भावुक और गहरे अध्यायों में माना जाता है, जहाँ एक ओर प्रतिशोध की अग्नि है, तो दूसरी ओर द्रौपदी की अद्भुत क्षमा और मातृत्व।
साभार भक्ति की बाते
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02/01/2026
हॉलीवुड की अभिनेत्री शर्ल मैक्लीलन एक बार भूटान आदि पर्वतीय प्रदेशों की यात्रा पर गई थी। अपनी यात्रा से सम्बन्धित संस्मरण में लिखा है कि उन्होंने आकाश में पीतवस्त्रधारी एक लामा को उड़ते हुए देखा था। उस आश्चर्यजनक दृश्य को देखकर उनके मुख से अनायास निकल पड़ा था – ‘काश! आज न्यूटन और आइन्स्टीन यहाँ होते।
हम जो नहीं देखे ऐसा नहीं है, वो ही नहीं सकता शायद हम उसको देखने में सक्षम ही नहीं। करोना में पूरी दुनिया रूकी थी
खेचरी मुद्रा हमारे गले में उपस्थित थायरॉयड ग्लैंड के सिक्रीशन को बढ़ाती है। जिससे हमारा मेटाबॉलिज्म इंप्रूव होता है। मेटाबॉलिज्म इंप्रूव होने से पेट के रोग भी नहीं लगते हैं। शरीर स्वस्थ रहता है और खाना ठीक से पचता है।
खेचरी मुद्रा आकाश गमन, जल में चलना आदि सिद्धियों की प्राप्ति के लिए की जाती है। ऐसा साधक साक्षात शिव की तरह स्वयं में निमग्न रहता है। देवरहा बाबा, स्वामी विशुद्ध आनंद, गुरु तोतापुरी खेचरी विद्या में निपुण थे।
ख का अर्थ है= आकाश, चरी = चरना, ले जाना, विचरण करना। इस मुद्रा की साधना के लिए पद्मासन में बैठकर दृष्टि को दोनों भौहों के बीच स्थिर करके आती जाती स्वांस देखते हुए, फिर जिह्वा को उलटकर तालु से सटाते हुए पीछे रंध्र में डालने का प्रयास किया जाता है।
मेरे द्वारा ये प्रयोग कुछ समय तक किया और उससे मेरे क्रोध पर अंकुश लगा। दिमाग शांत होने लगा। लेकिन नियम वध करने के खेचरी के चमत्कार अदभुत हो सकते हैं।
आकाशगामिनी विद्या। यह अतिप्राचीन तंत्र विज्ञान के अंतर्गत आता है जिसे “योग तन्त्र की चौसठ विद्याओं में से एक है।
अकाशगामिनी विद्या को जानने वाला व्यक्ति आकाश मार्ग से सर्वत्र विचरण कर सकी-सकता है।
तंत्र ज्योतिष संहिता में 64 विद्याओं में अकाधगामिनी विद्या का प्रमुख स्थान है। खेचरी मुद्रा में जीभ को तालू में लगाने का अभ्यास करते हैं और धीरे धीरे जिव्हा, कंठ के ऊपर नाग फन के आकार की होने से खेचरी विद्या की सिद्धि हो जाती है।
नदी, पहाड़, जगल, समुद्र कोई भी उसके मार्ग नष्ट में बाधक नहीं बन सकते है। इस रहस्यमयी विद्या के अनेक उदाहरण प्राचीन साहित्य में मिलते हैं।
महर्षि व्यास के पुत्र शुकदेव ने इसी विद्या की सिद्धि द्वारा सम्पूर्ण जम्बुद्वीप की निर्विघ्न यात्रा की थी।
इसी विद्या का आश्रय लेकर महर्षि नारद भी तीनों लोकों में विचरण करते थे।
हनुमानजी नल-नील को भी इस विद्या की सिद्धि थी। हनुमान ने समुद्र का उल्लंघन इसी विद्या के द्वारा किया था और आकाश-मार्ग से मृतसंजीवनी भी लाये थे।
रावण को आकाशगामिणी विद्या का आचार्य ही कहना उपर्युक्त होग।
रावण भी इसी विद्या की सहायता से आकाश – मार्ग से यात्रा करता था।
‘हेमवती विद्या’ द्वारा उसने अथाह स्वर्ण का निर्माण कर सम्पूर्ण लंका को ही स्वर्णमय बना डाला था।
वास्तव में जितनी भी तान्त्रिक विद्याएँ है- वे सब यक्षों और राक्षसों की ही देन है।
आर्यों के आने के पहले हमारे देश में यक्ष और राक्षस – ये ही दो जाति के लोग थे। दोनों भगवान शिव और प्रकृति के भयानक रूप के उपासक थे। मगर दोनों की उपासना में थोड़ी भिन्नता थी।
यक्ष जाति के लोग प्रकृति शक्ति को अपने अनुकूल बनाने के लिए बराबर प्रयत्नशील मैंने हुई काले की रहते थे। जब कि राक्षस जाति के लोग प्रकृति-शक्ति के विभिन्न रूपों पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए बराबर प्रयत्नशील रहा करते थे।
कहने की आवश्यकता नहीं दोनों के इसी प्रयत्नशीलता के फलस्वरूप नाना प्रकार तन्त्र-विद्याओं ने जन्म लिया और उनके विज्ञानों का भी समय-समय पर आविर्भाव हुआ
तान्त्रिक विद्याओं में एक ‘पारद-भी है। पारद को बांधना असम्भव है । बाँधने की क्रिया को ‘रसबन्ध – क्रिया’ कहते
रावण रसबन्ध-क्रिया से भी भलीभाँति परिचित था । रसबन्ध – क्रिया के आधार पर उसने पारद की एक ऐसी ‘गुटिका’ तैयार का अपनी नाभि में रख ली थी।जिसके प्रभाव से वह जरा, मरण के भय से मुक्त हो गया था।
ऐसे सिद्ध पारद को ‘अमृत कहा गया है। नाभि जीवनी शक्ति का एकमात्र केन्द्र है।
दूसरी शताब्दी में भी ‘आकाशगामिनी’ विद्या के जीवित रहने का प्रमाण मिलता है। उत्तरी भारत के आर्यावर्त प्रान्त में नाग- वंश के अनेक प्रतापी राजा हुए।
इस अवधि में जिन्होंने इस रहस्यमयी विद्या को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया-उनमें अहिछत्र
(वर्तमान रुहेलखण्ड) के राजा वासुकि के असाधारण प्रतिभाशाली पुत्र नागार्जुन का नाम प्रसिद्ध है।
नागार्जुन के गुरु थे पदलिप्त।
पदलिप्त ने नागार्जुन को रसायन-शास्त्र में पारंगत ही नहीं किया, बल्कि आकाशगामिनी विद्या भी बतलाई उन्हें ।वे स्वयं आकाशमार्ग से नित्य तीर्थयात्रा करते थे। उन्होने प्रसन्न होकर नागार्जुन को आकाशगमन – विद्या के सारे रहस्यों से परिचित करा दिया था।
भारतीय रसायन के इतिहास में नागार्जुन का महत्वपूर्ण नाम है।
पारद-विद्या के दो महत्वपूर्ण अंग है-तारबीज और हेमबीज । प्रकारान्तर में इन्ही दोनों को तारक-विद्या और हेमवती-विद्या कहते हैं।
जैसे हेमवतीविद्या स्वर्ण-निमार्ण से संबंधित है, वैसे ही तारक विद्या है आकाशगमन से सम्बन्धित। दोनों में पारद का प्रयोग है। पारद का पर्याय रस है।
आकाशगमन योग द्वारा तो सम्भव है ही, पारद – सिद्धि द्वारा भी सम्भव है। नागार्जुन पारद-विद्या के ज्ञाता तो थे ही, इसके अतिरिक्त तारक-विद्या और हेमवती- विद्या के भी प्रकाण्ड विद्वान थे।
तिब्बत में रस – रसायन से सम्बन्धित अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं, जिनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है
‘बौद्धतन्त्र’ जिसके लेखक नागार्जुन हैं। महायान – सम्प्रदाय के इस तन्त्र का नाम ‘रस – रत्नाकार’ है । रस – रत्नाकार में नागार्जुन को रसशास्त्र का एक महान सिद्ध बतलाया गया
जैसा कि ऊपर बतलाया गया है ‘रस’ यानी पारद द्वारा भी आकाश-गमन सम्भव है।
चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में व्याडी नामक एक रसायन शास्त्री ने अत्यधिक परिश्रम से सोना बनाने और आकाश में उड़ने की कला प्राप्त की थी। इस विषय में व्याडी ने एक पुस्तक भी लिखी थी, जो अब उपलब्ध नहीं है।
वैद्य व्याडी उज्जैन का निवासी थे। वह रसायन-विद्या की खोज में इतना डूब गये कि अपनी सम्पत्ति सहित अपना जीवन तक भी नष्ट कर डाला था।
वैद्य व्याडी ने अपना सर्वस्व गँवा देने के बाद उसे इस विद्या से घोर घृणा हो गयीं। एक दिन शोकमग्न नदी के तट पर बैठा था। उसके हाथ में वह ‘भेषजसंस्कार’ ग्रन्थ था- जिसमें से वह अपने शोध के लिए व्यवस्था – पत्र लिखा करता था।
निराशा से उत्तेजित होकर वह एक-एक पत्र फाड़कर जल में फेंकने लगा। व्याडी से कुछ दूर पर नदी के किनारे प्रवाह की दिशा में एक वेश्या भी बैठी हुई थी।
उसने पत्रों को बहते देखकर पानी से बाहर निकाल लिया उन्हें| व्याडी की नजर उस पर तब पड़ी, जब वह पुस्तक के सारे पत्र फाड़कर नदी में फेंक चुका था। तभी वह वेश्या उसके पास गयी और पुस्तक फाड़ने का कारण पूछा।
व्याडी ने सारी बात दी और अन्त में कहा- ‘घोर असफलता के कारण मुझे इस विद्या से घृणा हो गयी है।
यह सुनकर वेश्या बोली- ‘इस कार्य को मत छोड़ो। ऋषियों का ज्ञान मिथ्या नहीं हो सकता। आपकी कामना की सिद्धि में जो बाधा है वह सम्भवतः किसी सूत्र को ढंग से न समझ पाने के कारण है।
कोशिश करने पर वह बाधा अवश्य दूर हो जायेगी। मेरे पास काफी धन है। आप वह धन लें लें और पुनः प्रयास करें। सफलता अवश्य मिलेगी।
प्रोत्साहन पाकर व्याडी के मन में पुनः आशा का संचार हुआ। वह उस वेश्या से धन लेकर पुनः रसायन के रहस्यों की खोज में जुट गया।
वास्तव में व्याडी से एक औषधि के व्यवस्था – पत्र का एक शब्द समझने में भूल हो गयी थी। उस शब्द का अर्थ यह था कि इसके लिए तेल और नर- रक्त दोनों की आवश्यकता है।
वह शब्द रक्तामल था, जिसका अर्थ उसने लाल आमलक यानी आँवला समझा।
जानते हैं, इस भूल का क्या परिणाम हुआ? जब व्याडी ने औषधि का प्रयोग किया, तो उसका कुछ भी असर नही हुआ। तब बैचेन होकर वह विविध औषधियाँ पकाने लगा।
इस क्रिया में अग्निशिखा उसके सिर से छू गयी और उसका सिर जल गया । इसलिए उसने अपनी खोपड़ी पर बहुत सा तेल डाल लिया और उसको मला।
फिर, वह किसी काम के लिए भटटी से उठकर बाहर जाने लगा। उसके सिर उसमें लगा और रक्त बहने लगा।
पीड़ा होने के कारण वह नीचे की ओर देखने लगा। उससे तेल के साथ मिले रक्त की कुछ बूँदों को गिरते हुए नही देखा। फिर जब देगची में रसायन पक गया तो उसने और उसकी पत्नी ने परीक्षा करने के लिए रसायन को अपने शरीरों पर मल लिया। इस क्रिया की आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया हुई। जानते है क्या हुआ, वे दोनों वायु में उड़ने लगे।
इसके बाद ‘आकाशगामिंनी विद्या’ के विषय में कोई स्पष्ट उल्लेख नही मिलता। इसका कारण यह था कि इससे सम्बन्धित साहित्य नष्ट हो गया।
हिन्दुकुश पर्वत श्रेणी को पार कर बर्बर असभ्य आक्रमणकारी यहाँ आये। उन्होंने मन्दिरों और विश्वविद्यालयों के अथाह धन और ज्ञान को लूटा और दुर्लभ पुस्तकों तथा प्राचीन ग्रन्थों को जलाकर नष्ट कर डाला।
सबसे अधिक क्षति का सामना नालन्दा विश्वविद्यालय को करना पड़ा।
पूर्व-मध्यकाल में केवल यही एक विश्वविद्यालय बचा था, जहाँ अनेक प्रकार की प्राचीन और रहस्यमयी विद्यायें जीवित थी।
आचार्य गौणपाद, अनंगवज्र, गोरखनाथ, चर्पटीनाथ, नागसेन आदि सिद्ध उस युग के असाधारण प्रतिभाशाली विद्वान थे।
बाणभट्ट के अनुसार सिद्ध तपस्वियों का साधनास्थल ‘श्री पर्वत’ था, जो वर्तमान नागार्जुन कोंडा (आन्ध्र प्रदेश) के निकट नरहल्ल पर्वत है।
आज भी हिमालय की सुरम्य घाटियों, गिरि-गुहाओं और दुर्गम स्थानों में प्राचीन विद्याओं के गौरव से मण्डित अनेक सिद्ध पुरुष निवास करते हैं।
सिद्ध पारद द्वारा उन्होंने शरीर को काल के बन्धनों से मुक्त कर लिया है। आकाशगामिनी विद्या द्वारा वे इच्छानुसार यत्र-तत्र विचरण करते रहते हैं।
सामान्यतः उन्हे देख पाना सम्भव नहीं है। किन्तु इसमें तनिक भी सन्देह नही कि कुछ पुण्यात्मा लोगों को उनके दर्शन हुए है। उन्होने उन्हे प्रत्यक्ष आकाशमार्ग से गमन करते हुए देख सकते है
23/06/2024
नरक कितने, कहां होते हैं और कौन जाता है, रहस्यमयी ज्ञान!!!!!!!!!!!
धार्मिक मान्यता अनुसार नरक वह स्थान है जहां पापियों की आत्मा दंड भोगने के लिए भेजी जाती है। दंड के बाद कर्मानुसार उनका दूसरी योनियों में जन्म होता है। कहते हैं कि स्वर्ग धरती के ऊपर है तो नरक धरती के नीचे यानी पाताल भूमि में हैं। इसे अधोलोक भी कहते हैं। अधोलोक यानी नीचे का लोक है। ऊर्ध्व लोक का अर्थ ऊपर का लोक अर्थात् स्वर्ग। मध्य लोक में हमारा ब्रह्मांड है। सामान्यत: 1.उर्ध्व गति, 2.स्थिर गति और 3.अधोगति होती है जोकि अगति और गति के अंतर्गत आती हैं।
कुछ लोग स्वर्ग या नरक की बातों को कल्पना मानते हैं तो कुछ लोग सत्य। जो सत्य मानते हैं उनके अनुसार मति से ही गति तय होती है कि आप अधोलोक में गिरेंगे या की ऊर्ध्व लोक में।
हिन्दू धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि गति दो प्रकार की होती है 1.अगति और 2. गति। अगति के चार प्रकार है- 1.क्षिणोदर्क, 2.भूमोदर्क, 3. अगति और 4.दुर्गति।... और गति में जीव को चार में से किसी एक लोक में जाना पड़ता है। गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए हैं: 1.ब्रह्मलोक, 2.देवलोक, 3.पितृलोक और 4.नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्त लोकों में जाता है।
जब मरता है व्यक्ति तो चलता है इस मार्ग पर!!!!!!!!
पुराणों के अनुसार जब भी कोई मनुष्य मरता है या आत्मा शरीर को त्यागकर यात्रा प्रारंभ करती है तो इस दौरान उसे तीन प्रकार के मार्ग मिलते हैं। ऐसा कहते हैं कि उस आत्मा को किस मार्ग पर चलाया जाएगा यह केवल उसके कर्मों पर निर्भर करता है। ये तीन मार्ग हैं- अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है, वहीं धूममार्ग पितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है। अब सवाल यह उठता है कि कौन जाता है उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है?
कौन जाता है नरक में??????
ज्ञानी से ज्ञानी, आस्तिक से आस्तिक, नास्तिक से नास्तिक और बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को भी नरक का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि ज्ञान, विचार आदि से तय नहीं होता है कि आप अच्छे हैं या बुरे। आपकी अच्छाई आपके नैतिक बल में छिपी होती है।
आपकी अच्छाई यम और नियम का पालन करने में निहित है। अच्छे लोगों में ही होश का स्तर बढ़ता है और वे देवताओं की नजर में श्रेष्ठ बन जाते हैं। लाखों लोगों के सामने अच्छे होने से भी अच्छा है स्वयं के सामने अच्छा बनना। मूलत: जैसी गति, वैसी मति। अच्छा कार्य करने और अच्छा भाव एवं विचार करने से अच्छी गति मिलती है। निरंतर बुरी भावना में रहने वाला व्यक्ति कैसे स्वर्ग जा सकता है?
धर्म, देवता और पितरों का अपमान करने वाले, तामसिक भोजन करने वाले, पापी, मूर्छित, क्रोधी, कामी और अधोगामी गति के व्यक्ति नरकों में जाते हैं। पापी आत्मा जीते जी तो नरक झेलती ही है, मरने के बाद भी उसके पाप अनुसार उसे अलग-अलग नरक में कुछ काल तक रहना पड़ता है।
निरंतर क्रोध में रहना, कलह करना, सदा दूसरों को धोखा देने का सोचते रहना, शराब पीना, मांस भक्षण करना, दूसरों की स्वतंत्रता का हनन करना और पाप करने के बारे में सोचते रहने से व्यक्ति का चित्त खराब होकर नीचे के लोक में गति करने लगता है और मरने के बाद वह स्वत: ही नरक में गिर जाता है। वहां उसका सामना यम से होता है।
गरुड़ पुराण का नाम किसने नहीं सुना? पुराणों में नरक, नरकासुर और नरक चतुर्दशी, नरक पूर्णिमा का वर्णन मिलता है। नरकस्था अथवा नरक नदी वैतरणी को कहते हैं। नरक चतुर्दशी के दिन तेल से मालिश कर स्नान करना चाहिए। इसी तिथि को यम का तर्पण किया जाता है, जो पिता के रहते हुए भी किया जा सकता है।
पाताल के नीचे बहुत अधिक जल है और उसके नीचे नरकों की स्तिथि बताई गई है। जिनमें पापी जीव गिराए जाते हैं। यों तो नरकों की संख्या पचपन करोड़ है; किन्तु उनमें रौरव से लेकर श्वभोजन तक इक्कीस प्रधान हैं।
नरक का स्थान : महाभारत में राजा परीक्षित इस संबंध में शुकदेवजी से प्रश्न पूछते हैं तो वे कहते हैं कि राजन! ये नरक त्रिलोक के भीतर ही है तथा दक्षिण की ओर पृथ्वी से नीचे जल के ऊपर स्थित है। उस लोग में सूर्य के पुत्र पितृराज भगवान यम है वे अपने सेवकों के सहित रहते हैं। तथा भगवान की आज्ञा का उल्लंघन न करते हुए, अपने दूतों द्वारा वहां लाए हुए मृत प्राणियों को उनके दुष्कर्मों के अनुसार पाप का फल दंड देते हैं।
श्रीमद्भागवत और मनुस्मृति के अनुसार नरकों के नाम-
1.तामिस्त्र, 2.अंधसिस्त्र, 3.रौवर, 4, महारौवर, 5.कुम्भीपाक, 6.कालसूत्र, 7.आसिपंवन, 8.सकूरमुख, 9.अंधकूप, 10.मिभोजन, 11.संदेश, 12.तप्तसूर्मि, 13.वज्रकंटकशल्मली, 14.वैतरणी, 15.पुयोद, 16.प्राणारोध, 17.विशसन, 18.लालभक्ष, 19.सारमेयादन, 20.अवीचि, और 21.अय:पान, इसके अलावा.... 22.क्षरकर्दम, 23.रक्षोगणभोजन, 24.शूलप्रोत, 25.दंदशूक, 26.अवनिरोधन, 27.पर्यावर्तन और 28.सूचीमुख ये सात (22 से 28) मिलाकर कुल 28 तरह के नरक माने गए हैं जो सभी धरती पर ही बताए जाते हैं। हालांकि कुछ पुराणों में इनकी संख्या 36 तक है।
इनके अलावा वायु पुराण और विष्णु पुराण में भी कई नरककुंडों के नाम लिखे हैं- वसाकुंड, तप्तकुंड, सर्पकुंड और चक्रकुंड आदि। इन नरककुंडों की संख्या 86 है। इनमें से सात नरक पृथ्वी के नीचे हैं और बाकी लोक के परे माने गए हैं। उनके नाम हैं- रौरव, शीतस्तप, कालसूत्र, अप्रतिष्ठ, अवीचि, लोकपृष्ठ और अविधेय हैं।
हालांकि नरकों की संख्या पचपन करोड़ है; किन्तु उनमें रौरव से लेकर श्वभोजन तक इक्कीस प्रधान माने गए हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- रौरव, शूकर, रौघ, ताल, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विमोहक, रूधिरान्ध, वैतरणी, कृमिश, कृमिभोजन, असिपत्रवन,कृष्ण, भयंकर, लालभक्ष, पापमय, पूयमह, वहिज्वाल, अधःशिरा, संदर्श, कालसूत्र, तमोमय-अविचि, श्वभोजन और प्रतिभाशून्य अपर अवीचि तथा ऐसे ही और भी भयंकर नर्क हैं।
क्या सचमुच नरक या स्वर्ग होते हैं???????
कौन जाता है नरक के द्वार : कुछ लोग कहते हैं कि स्वर्ग या नरर्क हमारे भीतर ही है। कोई भी ऐसा नहीं हो जो मनुष्य के किये की सजा या पुरस्कार देता हो। मनुष्य अपने कर्मों से ही स्वर्ग या नरक की स्थिति को भोगता है। यदि वह बुरे कर्म करेगा को बुरी जगह और बुरी परिस्थिति में होगा और अच्छे कर्म करेगा तो अच्छी जगह और परिस्थिति में होगा। कुछ हद तक यह बात सही मानी जा सकती है, लेकिन इसके सही होने के पीछे के विज्ञान या मनोविज्ञान को समझना होगा।
पुराणों अनुसार कैलाश के उपर स्वर्ग और नीचे नरक व पाताल लोक है। संस्कृत शब्द स्वर्ग को मेरु पर्वत के ऊपर के लोकों हेतु प्रयुक्त किया है। जिस तरह धरती पर पाताल और नरक लोक की स्थिति बताई गई है उसी तरह धरती पर स्वर्ग की स्थिति भी बताई गई है। आज के कश्मीर और हिमालय के क्षेत्र को उस काल में स्वर्गलोक कहा जाता था, जहां के आकाश में बादल छाए रहते थे और जहां से पानी सारे भारत में फैलता था। हिमालय में ही देवात्म नामक एक हिमालय है जहां अच्छी आत्माएं शरीर छोड़ने के बाद रहती हैं।
पुराणों अनुसार जीवात्मा 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मनुष्य जन्म पाती है। अर्थात नीचे से ऊपर उठने की इस प्रक्रिया को ही ऊर्ध्वगति कहते हैं। अदि मनुष्य अपने पाप कर्मों के द्वारा फिर से नीचे गिरने लगता है तो उसे अधोगति कहते हैं। अधोगति में गिरना ही नरक में गिरना होता है। जिस तरह हमारे शरीर जब रात्रि में अचेत होकर सो जाता है तब हम हर तरह के स्वप्न देखते हैं यदि हम लगातार बुरे स्वपन्न देख रहे हैं तो यह नरक की ही स्थिति है। यह मरने के बाद अधोगति में गिरने का संकेत ही है। वर्तमान में चौरासी लाख योनियों से भी कहीं अधिक योनियां हो गई होगी। हालांकि पुरानी गणना अनुसार निम्नलिखित 84 लाख योनियां थी। इस आप संख्या में न लेकर प्रकार में लें।
* पेड़-पौधे - 30 लाख
* कीड़े-मकौड़े - 27 लाख
* पक्षी - 14 लाख
* पानी के जीव-जंतु - 9 लाख
* देवता, मनुष्य, पशु - 4 लाख
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किस नरक में कौन जाता है??????
*बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने मनमाने यज्ञकर्म, त्योहार, उपवास और पूजा-पाठ का अविष्कार कर लिया है तथा जो मनघड़ंत तांत्रिक कर्म भी करते हैं। ऐसे दूषित भावना से तथा शास्त्रविधि के विपरीत यज्ञ आदि कर्म करने वाले पुरुष कृमिश नरक में गिराए जाते हैं। इस प्रकार के शास्त्र निषिद्ध कर्मों के आचरणरूप पापों से पापी सहस्त्रों अत्यंत घोर नरकों में अवश्य गिरते हैं।
*बहुत से मनुष्य भोजन करते व्यक्त किसी का स्मण नहीं करते और भोजन के नियमों को नहीं मानते इसका उनके जीवन पर प्रभाव पड़ता है। पुराणों में कहा गया है कि जो देवताओं तथा पितरों का भाग उन्हें अर्पण किए बिना ही अथवा उन्हें अर्पण करने से पहले ही भोजन कर लेता है, वह लालभक्ष नामक नरक में यमदूतों द्वारा गिराया जाता है।
*पुरणों अनुसार झूठी गवाही देने वाला मनुष्य रौरव नरक में पड़ता है।
*गोओं और सन्यासियों को कहीं बंद करके रोक रखने वाला पापी रोध नरक में जाता है।
*मदिरा पीने वाला शूकर नरक में और नर हत्या करने वाला ताल नरक में गिर जाता है।
*गुरु पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला पुरुष तप्तकुम्भ नामक नरक में तड़पाया जाता है।
*जो अपने भक्त की हत्या करता है उसे तप्तलोह नरक में तपाया जाता है।
*गुरुजनों का अपमान करने वाला पापी महाज्वाल नरक में डाला जाता है।
*गरूड़ पुराण अनुसार वेद शास्त्रों का अपमान करने और उन्हें नष्ट करने वाला लवण नामक नरक में गलाया जाता है।
*धर्म मर्यादा का उल्लंघन करने वाला विमोहक नरक में जाता है।
*देवताओं से द्वेष रखने वाला मनुष्य कृमिभक्ष नरक में जाता है।
*आजकल लोग ज्यादा छली हो गए है। सब जीवों से व्यर्थ बैर रखने वाला तथा छल पूर्वक अस्त्र-शस्त्र का निर्माण करने वाला विशसन नरक में गिराया जाता है।
*असत्प्रतिग्रह ग्रहण करने वाला अधोमुख नरक में और अकेले ही मिष्ठान्न ग्रहण करने वाला पूयवह नरक में पड़ता है।
*बहुत से लोग जानवरों को पालकर उनके बल पर अपना जीवन यापन करते हैं। आजकल मुर्गों और कुत्तों को बेचने और पालने का व्यापार भी चल रहा है। बकरा, मुर्गा, कुत्ता, बिल्ली तथा पक्षियों को जीविका के लिए पालने वाला मनुष्य भी पूयवह नरक में पड़ता है।
*बहुत से लोग दूसरों के प्रति बैर भाव रखते हैं और उनका अहित करने की ही सोचते रहते हैं। पुराणों में कहा गया है कि दूसरों के घर, खेत, घास और अनाज में आग लगाता है, वह रुधिरान्ध नरक में डाला जाता है।
*ज्योतिषी विद्या का आजकल ज्यादा प्रचलन है। झूठ बोलकर धंधा करने वाले ज्योतिषियों की तो भरमार हो चली है। पुराणों अनुसार नक्षत्र विद्या तथा नट एवं मल्लों की वृत्ति से जीविका चलाने वाला मनुष्य वैतरणी नामक नरक में जाता है।
*धन, ताकत और जवानी में अंधे और उन्मुक्त होकर दूसरों के धन का अपहरण करने वाले पापी को कृष्ण (अंधकार) नामक नरक में गिराया जाता है।
*पूरे विश्व में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। बहुत तेजी से वृक्षों को काटा जा रहा है। पुराणों अनुसार वृक्षों को काटने वाला मनुष्य असिपत्रवन में जाता है। वृक्षों में भी पीपल, बढ़, नीम, केल, अनार, बिल्व, आम, अशोक, शमी, नारियल, अनार, बांस आदि पवित्र वृक्षों को काटना तो घोर पाप माना गया है।
*इसके अलावा जो कपटवृत्ति से जीविका चलाते हैं, वे सब लोग बहिज्वाल नामक नरक में गिराए जाते हैं।
*पराई स्त्री और पराए अन्न का सेवन करने वाला पुरुष संदर्श नरक में डाला जाता है।
*जो दिन में सोते हैं तथा वृत का लोप किया करते हैं और जो शरीर के मद से उन्मत्त रहते हैं, वे सब लोग श्वभोज नामक नरक में पड़ते हैं।
*जो भगवान् शिव और विष्णु को नहीं मानते, उन्हें अवीचि नरक में गिराया जाता है।
दरअसल, मनुष्य अपने कर्मों से ही उक्त नरकों में गिर जाते हैं। जैसी मति वैसी गति। जैसी गति वैसा नरक। नरकों से छुटकारा माने के लिए विद्वान लोग वेदों का पालन करने की सलाह देते हैं। वेद पठन, प्रार्थना और ध्यान से ही नरकों से बचा जा सकता है।
04/03/2024
#देव_ध्वजा
किस देवता का कौन-सा ध्वज... ?? 🚩🚩
#ध्वज और #पताका अलग-अलग होते हैं दोनों को ही हम झंडा मान सकते हैं। पताका #त्रिकोणाकार होती है जबकि ध्वजा #चतुष्कोणीय। प्रत्येक हिन्दू देवी या देवता अपने साथ अस्त्र-शस्त्र तो रखते ही हैं साथ ही उनका एक ध्वज भी होता है। यह ध्वज उनकी पहचान का प्रतीक माना गया है।
युद्ध में ध्वजों का प्रयोग भी ग्रन्थों में वर्णित है। ऋगवेद संहिता के अतिरिक्त अन्य ग्रन्थों में भी ध्वज प्रयोग का उल्लेख है। इनके आकार अनुसार कई नाम थे जैसे कि अक्रः, कृतध्वजः, केतु, बृहतकेतु, सहस्त्रकेतु आदि। ध्वज तथा नगाड़े, दुन्दभि आदि सैन्य गरिमा के चिन्ह माने जाते थे। महाभारत में प्रत्येक महारथी और रथी के पास उसका निजी ध्वज और शंखनाद सेना नायक की पहचान के प्रतीक थे।
1. ब्रह्मा की ध्वजा : #हंस_ध्वजा
2. विष्णु की ध्वजा : #गरुढ़_ध्वजा
3. महेश की ध्वजा : #वृषभ_ध्वजा
4. दुर्गा की ध्वजा : #सिंह_ध्वजा
5. गणेश की ध्वजा : #कुम्भ_ध्वजा एवं #मूषक_ध्वजा
6. कार्तिकेय की ध्वजा : #मयूर_ध्वजा
7. वरुणदेव की ध्वजा : ्वजा
8. अग्निदेव की ध्वजा : #धूम_ध्वजा
9. कामदेव की ध्वजा : ्वजा
10. इंद्रदेव की ध्वजा : #एरावत और #वैजयंति_ध्वजा
11. यमराज की ध्वजा : #भैंसा_ध्वजा
♦ #अर्ध_चंद्र_ध्वजा.. भारत में जगन्नाथ मंदिर के ध्वज सहित शिव और दुर्गा के कई मंदिरों पर अर्ध चंद्र अंकित ध्वज फहराया जाता है। यह अर्द्धचन्द्र शाक्त, शैव और चन्द्रवंशियों के पंथ का प्रतीक चिह्न है। मध्य एशिया में यह मध्य एशियाई जाति के लोगों के ध्वज पर बना होता था। चंगेज खान के झंडे पर अर्द्धचन्द्र होता था। इस्लाम का प्रतीक चिह्न है अर्द्धचन्द्र। अर्धचंद्र अंकित ध्वज पर होने का अपना ही एक अलग इतिहास है।
♦ #नाग_ध्वज ... बहुत से शैव और नाग मंदिरों पर नाग ध्वज होता है जिस पर नाग का चिह्न अंकित रहता है।
♦ #सूर्य_ध्वजा भगवान सूर्य (विवास्वान) वंशज को सूर्यवंशी कहा गया है। सूर्यवंशियों के ध्वज पर सूर्य का चिन्ह अंकित होता है।
♦ #ऊँ_और_स्वस्तिक_ध्वजा... केसरिया रंग के हिन्दू ध्वज पर ओम और स्वस्तिक का चिन्ह होता है।
🚩 #रामायण_और_महाभारत_के_ध्वज...
अर्जुन की ध्वजा पर हनुमान का चित्र अंकित था। कृपाचार्य की ध्वजा पर सांड, मद्रराज की ध्वजा पर हल, अंगराज वृषसेन की ध्वजा पर मोर और सिंधुराज जयद्रथ के झंडे पर वराह की छवि अंकित थी। गुरू द्रोणाचार्य के ध्वज पर सौवर्ण वेदी का चित्र था तो घटोत्कच के ध्वज पर गिद्ध विराजमान था। दुर्योधन के झंडे पर रत्नों से बना हाथी था जिसमें अनेक घंटियां लगी हुई थीं। इस तरह के झंडे को जयन्ती ध्वज कहा जाता था। श्रीकृष्ण के झंडे पर गरूड़ अंकित था। बलराम के झंडे पर ताल वृक्ष की छवि अंकित होने से तालध्वज कहलाता था।
महाभारत में शाल्व के शासक अष्टमंगला ध्वज रखते थे। महीपति की ध्वजाओं पर स्वर्ण, रजत एवं ताम्र धातुओं से बने कलश आदि चित्रित रहते थे। इनकी एक ध्वजा सर्वसिद्धिदा कहलाती थी। इस ध्वजा पर रत्नजडित घडियाल के चार जबड़े अंकित होते थे। एक अन्य प्राचीन ग्रंथ में लिखा है कि झंडे के ऊपर बाज, वज्र, मृग, छाग, प्रासाद, कलश, कूर्म, नीलोत्पल, शंख, सर्प और सिंह की छवियां अंकित होनी चाहिए।
वैदिक एवं पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ऋग्वेद काल में धूमकेतु झंडे का खूब प्रयोग होता था। वाल्मीकि रामायण में भी शहर, शिविर, रथयात्रा और रण क्षेत्र के बारे में झंडे का उल्लेख मिलता है। निषादराज गुह की नौकाओं पर स्वस्तिक ध्वज लहराता था। महाराज जनक का सीरध्वज और इनके भाई के पास कुषध्वज था। कोविदार झंडे कौशल साम्राज्य का था।
🚩 #ध्वजों_के_प्रकार...
रणभूमि में अवसर के अनुकूल आठ प्रकार के झंड़ों का प्रयोग होता था। ये झंडे थे- जय, विजय, भीम, चपल, वैजयन्तिक, दीर्घ, विषाल और लोल। ये सभी झंडे संकेत के सहारे सूचना देने वाले होते थे। विषाल झंडा क्रांतिकारी युद्ध का तथा लोल झंडा भयंकर मार-काट का सूचक था।
🔘 जय .... जय झंडा सबसे हल्का तथा रक्त वर्ण का होता था। यह विजय का सूचक माना जाता है। इसका दंड पांच हाथ लम्बा होता है।
🔘 विजय... विजय ध्वज की लम्बाई छह हाथ होती है। श्वेत वर्ण का यह ध्वज पूर्ण विजय के अवसर पर फहराया जाता था।
🔘 भीम.... अरुण वर्ण का भीम ध्वज सात हाथ लम्बा होता था और लोमहर्षण युद्ध के अवसर पर इसे फहराया जाता था।
🔘 चपल... चपल ध्वज पीत वर्ण का होता था तथा आठ हाथ लम्बा होता है। विजय और हार के बीच जब द्वन्द्व चलता था, उस समय इसी चपल ध्वज के माध्यम से सेनापति को युद्ध-गति की सूचना दी जाती थी।
🔘 वैजयन्तिक... वैजयन्तिक ध्वज नौ हाथ लम्बा तथा विविध रंगों का होता था।
🔘 दीर्घ... दीर्घ ध्वज की लम्बाई दस हाथ होती है। यह नीले रंग का होता है। युद्ध का परिणाम जब शीघ्र ज्ञात नहीं हो सकता था तो उस समय यही झंडा प्रयुक्त होता है।
🔘 विशाल... विशाल ध्वज ग्यारह हाथ लम्बा और धारीवाल होता है।
🔘 लोल.... लोल झंडा बारह हाथ लम्बा और कृष्ण वर्ण का होता है।
12/01/2024
भीष्म पितामह के रहस्य...
पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरु हुए। पुरु के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए।
कुरु के वंश में आगे चलकर राजा प्रतीप हुए जिनके दूसरे पुत्र थे शांतनु। शांतनु का बड़ा भाई बचपन में ही शांत हो गया था। शांतनु के गंगा से देवव्रत (भीष्म) हुए। भीष्म ने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली थी इसलिए यह वंश आगे नहीं चल सका। भीष्म अंतिम कौरव थे।
पहला रहस्य...
यह वह काल था जबकि देवी और देवता धरती पर विचरण किया करते थे। किसी खास मंत्र द्वारा उनका आह्वान करने पर वे प्रकट हो जाया करते थे। देवताओं में इंद्र, वरुण, 2 अश्विनकुमार, 8 वसुगण, 12 आदित्यगण, 11 रुद्र, सूर्य, मित्र, पूषा, विष्णु, ब्रह्मा, शिव, पार्वती, सरस्वती, लक्ष्मी, उषा, अपांनपात, सविता, त्रिप, विंवस्वत, 49 मरुद्गण, पर्जन्य, वायु, मातरिश्वन्, त्रिप्रआप्त्य, अज एक पाद, आप, अहितर्बुध्न्य, यम, पितृ (अर्यमा), मृत्यु, श्रद्धा, शचि, दिति, अदिति, कश्यप, विश्वकर्मा, गायत्री, सावित्री, आत्मा, बृहस्पति, शुक्राचार्य आदि। इन्हीं देवताओं के कुल में से एक मां गंगा भी हैं।
गंगा ने क्यों किया शांतनु से विवाह?
पुत्र की कामना से शांतनु के पिता महाराजा प्रतीप गंगा के किनारे तपस्या कर रहे थे। उनके तप, रूप और सौन्दर्य पर मोहित होकर गंगा उनकी दाहिनी जंघा पर आकर बैठ गईं और कहने लगीं, 'राजन! मैं आपसे विवाह करना चाहती हूं। मैं जह्नु ऋषि की पुत्री गंगा हूं।'
इस पर राजा प्रतीप ने कहा, 'गंगे! तुम मेरी दाहिनी जंघा पर बैठी हो, जबकि पत्नी को तो वामांगी होना चाहिए, दाहिनी जंघा तो पुत्र का प्रतीक है अतः मैं तुम्हें अपने पुत्रवधू के रूप में स्वीकार कर सकता हूं।' यह सुनकर गंगा वहां से चली गईं।'
जब महाराज प्रतीप को पुत्र की प्राप्ति हुई तो उन्होंने उसका नाम शांतनु रखा और इसी शांतनु से गंगा का विवाह हुआ। गंगा से उन्हें 8 पुत्र मिले जिसमें से 7 को गंगा नदी में बहा दिया गया और 8वें पुत्र को पाला-पोसा। उनके 8वें पुत्र का नाम देवव्रत था। यह देवव्रत ही आगे चलकर भीष्म कहलाया।
दूसरा रहस्य...
शांतनु ने अपने पिता प्रतीप की आज्ञा से गंगा के पास जाकर उनसे विवाह करने के लिए निवेदन किया था। गंगा तो शांतनु के पिता पर आसक्त हुई थी। तब गंगा ने कहा, 'राजन्! मैं आपके साथ विवाह करने के लिए तैयार हूं लेकिन आपको वचन देना होगा कि आप मेरे किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।' शांतनु ने गंगा को वचन देकर विवाह कर लिया।
गंगा के गर्भ से महाराज शांतनु को 8 पुत्र हुए जिनमें से 7 को गंगा ने गंगा नदी में ले जाकर बहा दिया। वचन के बंधे होने के कारण शांतनु कुछ नहीं बोल पाए।
जब गंगा का 8वां पुत्र हुआ और वह उसे भी नदी में बहाने के लिए ले जाने लगी तो राजा शांतनु से रहा नहीं गया और उन्होंने इस कार्य को करने से गंगा को रोक दिया। गंगा ने कहा, 'राजन्! आपने अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी है इसलिए अब मैं आपके पास नहीं रह सकती।' इतना कहकर गंगा वहां से अंतर्ध्यान हो गई।
महाराजा शांतनु ने अपने उस पुत्र को पाला-पोसा और उसका नाम देवव्रत रखा। देवव्रत के किशोरावस्था में होने पर उसे हस्तिनापुर का युवराज घोषित कर दिया। यही देवव्रत आगे चलकर भीष्म कहलाए।
तीसरा रहस्य...
एक बार 'द्यु' नामक वसु ने वशिष्ठ ऋषि की कामधेनु का हरण कर लिया। इससे वशिष्ठ ऋषि ने द्यु से कहा कि ऐसा काम तो मनुष्य करते हैं इसलिए तुम आठों वसु मनुष्य हो जाओ। यह सुनकर वसुओं ने घबराकर वशिष्ठजी की प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि अन्य वसु तो वर्ष का अंत होने पर मेरे शाप से छुटकारा पा जाएंगे, लेकिन इस 'द्यु' को अपनी करनी का फल भोगने के लिए एक जन्म तक मनुष्य बनकर पीड़ा भोगना होगी।
यह सुनकर वसुओं ने गंगाजी के पास जाकर उन्हें वशिष्ठजी के शाप को विस्तार से बताया और यह प्रार्थना की कि 'आप मृत्युलोक में अवतार लेकर हमें गर्भ में धारण करें और ज्यों ही हम जन्म लें, हमें पानी में डुबो दें। इस तरह हम जल्दी से सभी मुक्त हो जाएंगे।' गंगा माता ने स्वीकार कर लिया और वे युक्तिपूर्वक शांतनु राजा की पत्नी बन गईं और शांतनु से वचन भी ले लिया। शांतनु से गंगा के गर्भ में पहले जो 7 पुत्र पैदा हुए थे उन्हें उत्पन्न होते ही गंगाजी ने पानी में डुबो दिया जिससे 7 वसु तो मुक्त हो गए लेकिन 8वें में शांतनु ने गंगा को रोककर इसका कारण जानना चाहा।
गंगाजी ने राजा की बात मानकर वसुओं को वशिष्ठ के शाप का सब हाल कह सुनाया। राजा ने उस 8वें पुत्र को डुबोने नहीं दिया और इस वचनभंगता के काण गंगा 8वें पुत्र को सौंपकर अंतर्ध्यान हो गईं। यही बालक 'द्यु' नामक वसु था।
चौथा रहस्य...
एक दिन देवव्रत के पिता शांतनु यमुना के तट पर घूम रहे थे कि उन्हें नदी में नाव चलाते हुए एक सुन्दर कन्या नजर आई। शांतनु उस कन्या पर मुग्ध हो गए। महाराजा ने उसके पास जाकर उससे पूछा, 'हे देवी तुम कौन हो?' उसने कहा, 'महाराजा मेरा नाम सत्यवती है और में निषाद कन्या हूं।' (उस काल में निषाद नाम की एक जाति होती थी)
महाराज उसके रूप यौवन पर रीझकर उसके पिता के पास पहुंचे और सत्यवती के साथ अपने विवाह का प्रस्ताव किया। इस पर धीवर ने कहा, 'राजन्! मुझे अपनी कन्या का विवाह आपके साथ करने में कोई आपत्ति नहीं है, किंतु मैं चाहता हूं कि मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र को ही आप अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाएं, तो ही यह विवाह संभव हो पाएगा।' निषाद के इन वचनों को सुनकर महाराज शांतनु चुपचाप हस्तिनापुर लौट आए और मन ही मन इस दुख से घुटने लगे। सत्यवती के वियोग में महाराज व्याकुल रहने लगे और उनका शरीर भी दुर्बल होने लगा।
महाराज की इस दशा को देखकर देवव्रत को चिंता हुई। जब उन्हें मंत्रियों द्वारा पिता की इस प्रकार की दशा होने का कारण पता चला तो वे निषाद के घर जा पहुंचे और उन्होंने निषाद से कहा, 'हे निषाद! आप सहर्ष अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह मेरे पिता शांतनु के साथ कर दें। मैं आपको वचन देता हूं कि आपकी पुत्री के गर्भ से जो बालक जन्म लेगा वही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। कालांतर में मेरी कोई संतान आपकी पुत्री के संतान का अधिकार छीन न पाए इस कारण से मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं आजन्म अविवाहित रहूंगा।'
उनकी इस प्रतिज्ञा को सुनकर निषाद ने हाथ जोड़कर कहा, 'हे देवव्रत! आपकी यह प्रतिज्ञा अभूतपूर्व है।' इतना कहकर निषाद ने तत्काल अपनी पुत्री सत्यवती को देवव्रत तथा उनके मंत्रियों के साथ हस्तिनापुर भेज दिया।
पांचवां रहस्य...
देवव्रत जब निषाद कन्या सत्यवती को लाकर अपने पिता शांतनु को सौंपते हैं तो शांतनु की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। शांतनु प्रसन्न होकर देवव्रत से कहते हैं, 'हे पुत्र! तूने पितृभक्ति के वशीभूत होकर ऐसी कठिन प्रतिज्ञा की है, जो न आज तक किसी ने की है और न भविष्य में कोई करेगा। तेरी इस पितृभक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुझे वरदान देता हूं कि तेरी मृत्यु तेरी इच्छा से ही होगी। तेरी इस प्रकार की प्रतिज्ञा करने के कारण तू 'भीष्म' कहलाएगा और तेरी प्रतिज्ञा भीष्म प्रतिज्ञा के नाम से सदैव प्रख्यात रहेगी।'
छठा रहस्य...
सत्यवती के गर्भ से महाराज शांतनु को चित्रांगद और विचित्रवीर्य नाम के 2 पुत्र हुए। शांतनु की मृत्यु के बाद चित्रांगद राजा बनाए गए, किंतु गंधर्वों के साथ युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई, तब विचित्रवीर्य बालक ही थे। फिर भी भीष्म विचित्रवीर्य को सिंहासन पर बैठाकर खुद राजकार्य देखने लगे। विचित्रवीर्य के युवा होने पर भीष्म ने बलपूर्वक काशीराज की 3 पुत्रियों का हरण कर लिया और वे उसका विवाह विचित्रवीर्य से करना चाहते थे, क्योंकि भीष्म चाहते थे कि किसी भी तरह अपने पिता शांतनु का कुल बढ़े।
लेकिन बाद में बड़ी राजकुमारी अम्बा को छोड़ दिया गया, क्योंकि वह शाल्वराज को चाहती थी। अन्य दोनों (अम्बालिका और अम्बिका) का विवाह विचित्रवीर्य के साथ कर दिया गया। लेकिन विचित्रवीर्य को दोनों से कोई संतानें नहीं हुईं और वह भी चल बसा। एक बार फिर गद्दी खाली हो गई। सत्यवती शांतनु का वंश तो डूब गया और गंगा शांतनु के वंश ने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले ली थी। अब हस्तिनापुर की राजगद्दी फिर से खाली हो गई थी।
सातवां रहस्य.....परशुराम से युद्ध:
विचित्रवीर्य के युवा होने पर उनके विवाह के लिए भीष्म ने काशीराज की 3 कन्याओं का बलपूर्वक हरण किया था जिसमें से एक को शाल्वराज पर अनुरक्त होने के कारण छोड़ दिया था।
लेकिन शाल्वराज के पास जाने के बाद अम्बा को शाल्वराज ने स्वीकार करने से मना कर दिया। अम्बा के लिए यह दुखदायी स्थिति हो चली थी। अम्बा ने अपनी इस दुर्दशा का कारण भीष्म को समझकर उनकी शिकायत परशुरामजी से की।
परशुरामजी ने अन्याय के खिलाफ लड़ने की ठनी। परशुरामजी ने भीष्म से कहा कि 'तुमने अम्बा का बलपूर्वक अपहरण किया है, अत: अब तुम्हें इससे विवाह करना होगा अन्यथा मुझसे युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।'
भीष्म और परशुरामजी का 21 दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ। अंत में ऋषियों ने परशुराम जी को सारी व्यथा-कथा सुनायी और भीष्म की स्थिति से भी उनको अवगत कराया तब कहीं परशुरामजी ने ही युद्धविराम किया। इस तरह भीष्म द्वारा लिए गए ब्रह्मचर्य के प्रण पर वे अटल रहे।
आठवां रहस्य...
सत्यवती के शांतनु से उत्पन्न दोनों पुत्र (चित्रांगद और विचित्रवीर्य) की मृत्यु हो जाने के बाद सत्यवती भीष्म से बार बार अनुरोध करती हैं कि पिता के वंश को चलाने के लिए अब तुम्हें विवाह कर पुत्र उत्पन्न करना चाहिए लेकिन भीष्म अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने को तैयार नहीं होते हैं। ऐसे में सत्यवती विचित्रवीर्य की विधवा अम्बालिका और अम्बिका को 'नियोग प्रथा' द्वारा संतान उत्पन्न करने का सोचती है। भीष्म की अनुमति लेकर सत्यवती अपने पुत्र वेदव्यास द्वारा अम्बिका और अम्बालिका के गर्भ से यथाक्रम धृतराष्ट्र और पाण्डु नाम के पुत्रों को उत्पन्न करवाती है।
शांतनु से विवाह करने के पूर्व सत्यवती ने अपनी कुंवारी अवस्था में ऋषि पराशर के साथ सहवास कर लिया था जिससे उनको वेदव्यास नामक एक पुत्र का जन्म हुआ था। वे अपने इसी पुत्र से अम्बिका और अम्बालिका के साथ संयोग करने का कहती है। इस तरह यह कुल ऋषि कुल कहलाता है।
नौवां रहस्य...
भीष्म पितामह ने विवाह नहीं करके ब्रह्मचर्य का पालन किया था। उन्होंने अविवाहित रहकर भी इस व्रत का कठोरता से पालन किया था। इसके लिए वे योगारूढ़ होकर ब्रह्म का ध्यान किया करते थे। उनके समक्ष श्रीकृष्ण बच्चे ही थे लेकिन उन्होंने कृष्ण को भगवान रूप में पहचान लिया था। वे सदा कृष्णभक्ति में लीन रहते थे।
महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने निहत्थे रहकर अर्जुन का रथ हांकने की प्रतिज्ञा की थी, लेकिन भीष्म ने उनसे शस्त्र ग्रहण करने का वचन ले लिया था। कृष्ण के लिए यह धर्म संकट की स्थिति बन गई थी। अंत में भक्त की लाज रखने को जब श्रीकृष्ण रथ का पहिया लेकर दौड़ पड़े, तब भीष्म ने हथियार रख दिए और श्रीकृष्ण के हाथों मारे जाने में ही अपनी मुक्ति समझने लगे। कृष्ण ने ऐसा करके अपने हथियार न धारण करने की प्रतिज्ञा भी पूरी की और भीष्म के कहने पर हथियार धारण करने का वचन भी पूरा कर दिया।
दसवां रहस्य...
महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की तरफ से सेनापति थे। कुरुक्षेत्र का युद्ध आरंभ होने पर प्रधान सेनापति की हैसियत से भीष्म ने 10 दिन तक घोर युद्ध किया था।
9वें दिन भयंकर युद्ध हुआ जिसके चलते भीष्म ने बहादुरी दिखाते हुए अर्जुन को घायल कर उनके रथ को जर्जर कर दिया। युद्ध में आखिरकार भीष्म के भीषण संहार को रोकने के लिए कृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ती है। उनके जर्जर रथ को देखकर श्रीकृष्ण रथ का पहिया लेकर भीष्म पर झपटते हैं, लेकिन वे शांत हो जाते हैं, परंतु इस दिन भीष्म पांडवों की सेना का अधिकांश भाग समाप्त कर देते हैं।
10वें दिन भीष्म द्वारा बड़े पैमाने पर पांडवों की सेना को मार देने से घबराए पांडव पक्ष में भय फैल जाता है, तब श्रीकृष्ण के कहने पर पांडव भीष्म के सामने हाथ जोड़कर उनसे उनकी मृत्यु का उपाय पूछते हैं। भीष्म कुछ देर सोचने पर उपाय बता देते हैं।
ग्यारहवां रहस्य...
दसवें ही ही दिन इच्छामृत्यु प्राप्त भीष्म द्वारा अपनी मृत्यु का रहस्य बता देने के बाद इसके बाद भीष्म पांचाल तथा मत्स्य सेना का भयंकर संहार कर देते हैं। फिर पांडव पक्ष युद्ध क्षेत्र में भीष्म के सामने शिखंडी को युद्ध करने के लिए लगा देते हैं। युद्ध क्षेत्र में शिखंडी को सामने डटा देखकर भीष्म अपने अस्त्र शस्त्र त्याग देते हैं। इस मौके का फायदा उठाकर कृष्ण के इशारे पर बड़े ही बेमन से अर्जुन ने अपने बाणों से भीष्म को छेद दिया। भीष्म बाणों की शरशय्या पर लेट जाते हैं।
दरअसल, भीष्म ने अपनी मृत्यु का रहस्य यह बताया था कि वे किसी नपुंसक व्यक्ति के समक्ष हथियार नहीं उठाएंगे। इसी दौरान उन्हें मारा जा सकता है। इस नीति के तरह युद्ध में भीष्म के सामने शिखंडी को उतारा जाता है।
भीष्म को अर्जुन तीरों से छेद देते हैं। वे कराहते हुए नीचे गिर पड़ते हैं। जब भीष्म की गर्दन लटक जाती है तब वे अपने बंधु बांधवों और वीर सैनिकों से क्या कहते हैं?
बारहवां रहस्य...
भीष्म के शरशय्या पर लेटने की खबर फैलने पर कौरवों की सेना में हाहाकार मच जाता है। दोनों दलों के सैनिक और सेनापति युद्ध करना छोड़कर भीष्म के पास एकत्र हो जाते हैं। दोनों दलों के राजाओं से भीष्म कहते हैं, राजन्यगण। मेरा सिर नीचे लटक रहा है। मुझे उपयुक्त तकिया चाहिए। उनके एक आदेश पर तमाम राजा और योद्धा मूल्यवान और तरह-तरह के तकिए ले आते हैं।
किंतु भीष्म उनमें से एक को भी न लेकर मुस्कुराकर कहते हैं कि ये तकिए इस वीर शय्या के काम में आने योग्य नहीं हैं राजन। फिर वे अर्जुन की ओर देखकर कहते हैं, 'बेटा, तुम तो क्षत्रिय धर्म के विद्वान हो। क्या तुम मुझे उपयुक्त तकिया दे सकते हो?' आज्ञा पाते ही अर्जुन ने आंखों में आंसू लिए उनको अभिवादन कर भीष्म को बड़ी तेजी से ऐसे 3 बाण मारे, जो उनके ललाट को छेदते हुए पृथ्वी में जा लगे। बस, इस तरह सिर को सिरहाना मिल जाता है। इन बाणों का आधार मिल जाने से सिर के लटकते रहने की पीड़ा जाती रही। इतना सब कुछ होने के बावजूद भीष्म क्यों नहीं त्यागते हैं प्राण?
तेरहवां रहस्य...
सूर्य का उत्तरायण होना: शरशय्या पर लेटने के बाद भी भीष्म प्राण क्यों नहीं त्यागते हैं, जबकि उनका पूरा शरीर तीर से छलनी हो जाता है फिर भी वे इच्छामृत्यु के कारण मृत्यु को प्राप्त नहीं होते हैं।
भीष्म यह भलीभांति जानते थे कि सूर्य के उत्तरायण होने पर प्राण त्यागने पर आत्मा को सद्गति मिलती है और वे पुन: अपने लोक जाकर मुक्त हो जाएंगे इसीलिए वे सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते हैं।
भीष्म ने बताया कि वे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही शरीर छोड़ेंगे, क्योंकि उन्हें अपने पिता शांतनु से इच्छामृत्यु का वर प्राप्त है और वे तब तक शरीर नहीं छोड़ सकते जब तक कि वे चाहें, लेकिन 10वें दिन का सूर्य डूब चुका था।
चौदहवां रहस्य...
भीष्म को ठीक करने के लिए शल्य चिकित्सक लाए जाते हैं, लेकिन वे उनको लौटा देते हैं और कहते हैं कि अब तो मेरा अंतिम समय आ गया है। यह सब व्यर्थ है। शरशय्या ही मेरी चिता है। अब मैं तो बस सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहा हूं।
पितामह की ये बातें सुनकर राजागण और उनके सभी बंधु बांधव उनको प्रणाम और प्रदक्षिणा कर करके अपनी अपनी छावनियों में लौट जाते हैं। अगले दिन सुबह होने पर फिर से वे सभी भीष्म के पास लौटते हैं। सभी कन्याएं, स्त्रियां और उनके कुल के योद्धा पितामह के पास चुपचाप खड़े हो जाते हैं।
पितामह ने पीने के लिए राजाओं से ठंडा पानी मांगा। सभी उनके लिए पानी ले आए, लेकिन उन्होंने अर्जुन की ओर देखा। अर्जुन समझ गया और उसने अपने गांडीव पर तीर चढ़ाया और पर्जन्यास्त्र का प्रयोग कर वे धरती में छोड़ देते हैं। धरती से अमृततुल्य, सुगंधित, बढ़िया जल की धारा निकलने लगती है। उस पानी को पीकर भीष्म तृप्त हो जाते हैं।
फिर भीष्म दुर्योधन को समझाते हैं कि युद्ध छोड़कर वंश की रक्षा करो। उन्होंने अर्जुन की बहुत प्रशंसा की और दुर्योधन को बार बार समझाया कि हमारी यह गति देखकर संभल जाओ, लेकिन दुर्योधन उनकी एक भी नहीं मानता है और फिर से युद्ध शुरू हो जाता है।
अगले दिन फिर से सभी उनके पास इकट्ठे होते हैं। वे नए सेनापति कर्ण को समझाते हैं। वे दोनों पक्षों में अपने अंतिम वक्त में भी संधि कराने की चेष्टा करते हैं। भीष्म के शरशय्या पर लेट जाने के बाद युद्ध और 8 दिन चला।
पंद्रहवां रहस्य...
भीष्म यद्यपि शरशय्या पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्चाताप दूर हो जाता है।
बाद में सूर्य के उत्तरायण होने पर युधिष्ठिर आदि सगे संबंधी, पुरोहित और अन्यान्य लोग भीष्म के पास पहुंचते हैं। उन सबसे पितामह ने कहा कि इस शरशय्या पर मुझे 58 दिन हो गए हैं। मेरे भाग्य से माघ महीने का शुक्ल पक्ष आ गया। अब मैं शरीर त्यागना चाहता हूं। इसके पश्चात उन्होंने सब लोगों से प्रेमपूर्वक विदा मांगकर शरीर त्याग दिया।
सभी लोग भीष्म को याद कर रोने लगे। युधिष्ठिर तथा पांडवों ने पितामह के शरविद्ध शव को चंदन की चिता पर रखा तथा दाह-संस्कार किया।
सोलहवां रहस्य...
भीष्म सामान्य व्यक्ति नहीं थे। वे मनुष्य रूप में देवता वसु थे। उन्होंने ब्रह्मचर्य का कड़ा पालन करके योग विद्या द्वारा अपने शरीर को पुष्य कर लिया था। दूसरा उनको इच्छामृत्यु का वरदान भी प्राप्त था।
उस काल में 200 वर्ष की उम्र होना सामान्य बात थी। बौद्धों के काल तक भी भारतीयों की सामान्य उम्र 150 वर्ष हुआ करती थी। इसमें शुद्ध वायु, वातावरण और योग ध्यान का बड़ा योगदान था। भीष्म जब युवा थे तब कृष्ण और अर्जुन हुए भी नहीं थे।
माना जाता है कि भीष्म ही युद्ध में सबसे अधिक उम्र के थे। उन्हें राजनीति का ज्यादा अनुभव होने के कारण वेदव्यास ने संपूर्ण महाभारत में भीष्म को राजनीति का केंद्र बनाकर राजनीति के बारे में उन्होंने जो भी कहा, उसका प्राथमिकता से उल्लेख किया।
श्री शिवानंद मिश्रा
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