20/08/2026
अगर सच में सरकारी स्कूलों को ठीक करना है, तो एक बार यह सवाल भी पूछिये कि MDM व्यवस्था शिक्षकों के जिम्मे ही क्यों?
शिक्षक का मूल कार्य है बच्चों को अध्यापन कराना, उनका सीखना सुनिश्चित करना और उनके भविष्य को सजाना और संवारना।
लेकिन जब शिक्षक को पढ़ाने के साथ-साथ MDM की खरीदारी, राशन, फल-सब्जी, भुगतान, हिसाब-किताब और तरह-तरह की व्यवस्थाओं में उलझा दिया जाता है, तो फिर उससे शत-प्रतिशत शिक्षण की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है?
कई बार तो महीनों तक MDM का आवंटन बहुत लेट आता है, फिर भी बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन सुचारू रूप से चलता रहे, इसलिए शिक्षक अपनी तरफ से व्यवस्था करने तक को मजबूर होते हैं।
और जब कोई कमी रह जाए तो कैमरा लेकर शिक्षक के पास पहुंचना सबसे आसान काम हो गया है आजकल। यह सोचने का विषय है, और सबसे बड़ी समस्या सिर्फ काम का बोझ नहीं है…
बल्कि MDM ने कई जगहों पर शिक्षक और प्रधान शिक्षक के बीच वह भरोसा भी कमजोर कर दिया है, जो एक अच्छे विद्यालय की सबसे बड़ी ताकत होता है।
किसी को लगता है—प्रधान शिक्षक ने क्या खरीदा?
किसी को लगता है—इतनी व्यवस्था कैसे हुई?
और कभी-कभी बिना पूरी सच्चाई जाने संदेह का माहौल भी बन जाता है।
जरा सोचिए…
जिस शिक्षक और प्रधान शिक्षक को मिलकर बच्चों का भविष्य बनाना है, अगर उनका समय और ऊर्जा एक-दूसरे पर संदेह करने में ही लग जाए तो शिक्षण कार्य कब होगा?
इसलिए बात बहुत सीधी सी है—
शिक्षकों को MDM की जिम्मेदारी से ही मुक्त कर देना चाहिए।
MDM की अन्य किसी के पास पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था होनी चाहिए।
शिक्षक को सिर्फ बच्चों की पढ़ाई और सीखने पर केंद्रित होने दीजिए।
अब आप बताइए 👇
क्या आपको भी लगता है कि MDM को शिक्षकों की जिम्मेदारी से अलग कर देना चाहिए?
क्या इससे विद्यालय में आपसी विश्वास और पढ़ाई दोनों बेहतर हो सकते हैं?
कमेंट में अपनी सच्ची राय जरूर लिखिए।
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