15/09/2023
पटना कॉलेज का एनसीसी कार्यालय बना आलीशान सवारी का स्टैन्ड !
मित्रों आप सभी इतने सुधि पाठक हैं कि मुझे खुद को रोकना संभव नहीं हो पाता है। मैं जब जब आपके कमेन्ट को देखता हूँ तो ये महसूस होता है कि इस पाती को और आपके करीब ले जाना चाहिए। तब आप भी इसे अपना महसूस करेंगे। मेरी कोशिश अनवरत यही रही है। इस बार मैं अपने उन तीन दोस्तों का जिक्र करूँगा जिन्होने अपने सत्र में कुछ अलग किया था। शरारत भी किया तो कॉलेज के लिए कुछ बेहतर किया। आम तौर पर कॉलेज के दिनों में कोई शरारत करता है तो कॉलेज की संपत्ति को कुछ ना कुछ क्षति पहुँचाता है। लेकिन इनकी शरारत आप जब सुनेंगे तो हतप्रभ रहेगे, लेकिन बताना जरूरी है। मेरे सहपाठी दोस्त अगर यादों के झरोखे में गोता लगाएँगे तो निश्चय ही समझ जाएगे की बात किससे बारे में हो रही है। सबसे पहले मैं इस वाकया को लिखने से पहले अपने एक दोस्त को श्रद्धांजलि दे दूँ, क्योकि इन तीन दोस्तों में से एक हमारे बीच नहीं रहा है। मिलनसार होने के साथ सबके जरूरत में वो सबसे आगे रहता था। लेकिन काल ने उसे पहले ही अपना ग्रास बना लिया। ये तीनों दोस्त एनसीसी में थे। पहला दोस्त जो अब हमारे बीच में नहीं है वो एनसीसी के वायु सेना विंग में था, शेष दोनों आर्मी विंग में। कॉलेज में एनसीसी के अभ्यास के दौरान हम जरूर उन्हे चिढाते थे कि सिपाही जी की तरह पैर पटक रहे हो, लेकिन जब किसी समारोह के लिए तीनों तैयार होते थे तो वाकई अधिकारी लगते थे। दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड का वो हिस्सा बन चुके थे। कद काठी में दो तो सामान्य थे तीसरा जो पटना जिला का ही रहने वाला था वो मजबूत था। इस मित्र के पिता जी पटना सचिवालय में कार्यरत थे। कदकाठी से मजबूत मेरे मित्र और उसके पिता जी के बीच पिता पुत्र का व्यवहार ना होकर मित्रवत था। सचिवायल में काम करने बावजूद मित्र परिवार के लोगों से जिद करके कॉलेज छात्रावास में ही रहता था। शेष दोनों मित्र जिसमें से एक मित्र उत्तर बिहार का या यू कहें कि नेपाल के समीप का था। अच्छी भोजपुरी बोलता था, म़ृदुभाषी और बेहद मिलनसार था। आप सोंच रहे होंगे कि मैं इनके नाम क्यों नहीं बता रहा हूँ। दरअसल मैं चाहता हूँ आप उसे पहचाने और खोंजे याद करें। दोनों मित्र जो फिलहाल मौजूद हैं अपने अपने क्षेत्र में बेहद उँचे पद पर पदस्थ हैं। मित्र होने के नाते मैं व्यक्ति रुप से कुछ भी कहूँ लेकिन सार्वजनिक मंच पर तो मुझे एक गरीमा जरूर निभानी होगी। तो सुविधा के लिए मैं तीनों का नाम करण कर देता हूँ। मजबूत कदकाठी वाले मित्र को शर्मा जी बुलाते थे, नेपाल के समीप रहने वाले मित्र को पाडेय जी और एनसीसी के वायु सेना विंग वाला मित्र जो कि अब हमारे बीच नहीं है उसे कुमार कहते थे।
अब मैं वाकये की बात करता हूँ। पटना कॉलेज एनसीसी कार्यालय का नक्शा आपके दिमाग में जरूर होगा। इसके समीप से ही एक रास्ता था, जो साइकिल स्टैंड के समीप से होकर विश्वविद्यालय का कार्यालय और साइन्स कॉलेज की तरफ जाता था। मैं जिन दिनों की बात कर रहा हूँ उन दिनों में अधिकांश छात्र साइकिल से आते थे, कुछ छात्र जरूर मोपेड और स्कूटर से आते थे। लेकिन हमारे शर्मा जी अपने मित्रों में धाक जमाने के लिए आलीशान फटफटिया से आते थे। आलीशान इसलिए कि उसे ये जानदार सवारी बताते थे। अगर चाभी नहीं है तो एक लोहे की कांटी का इस्तेमाल कर इसे चलाया जा सकता था। मित्र थे तो शान जताने में माहिर लेकिन जब पिता जी को पता चलता था कि आलीशान सवारी कॉलेज गई थी, जो पेट्रोल कल के लिए था वो शर्मा जी फूँक आए तो शर्मा जी को बाबू जी घर में ही टिटोरियल क्लास लगा देते थे। अगले दिन शर्मा जी कॉलेज आते और ठेठ महगी में कहते “का कहियो, बाबू जी कूटले हथिन”, जब कारण पता चला तो समझ में आया कि कमाई तो कुछ है नहीं पेट्रोल में पैसे बरबाद करना गलत है ही। रास्ता निकाला जाए कि सब कुछ सामान्य हो जाए। तीनों मित्रों ने मिलकर जुगत लगाई एनसीसी ऑफिस के पेंटिंग के लिए एक फंड आवंटित कराई गई। पेटिंग भी जरूरी थी, और पैसे भी बचाने थे, मंत्रणा होने लगा कि आखिर कैसे किया जाए। पहले ये ख्याल आया कि किसी चलताउ पेंट से पेंट कर देते हैं, लेकिन पाडेय जी ने साफ मना कर दिया और कहा कि नहीं ये धोखा होगा। फिर आया कि पेंट कराने के लिए सब जगह जुगाड लाने शुरु। पेंटिंग का कोई अनुभव था नहीं लेकिन रात-रात भर सरस्वती पूजा और दूसरे समारोह में जगकर सामुदायिक रुप से काम करने का हम सब का अनुभव था। उसी समय पटना कॉलेज के आस पास कई घरों में कोचिंग संस्थानें खुलने लगी थी, लिहाजा हार्डवेयर की दुकानें भी तेजी से खुलने लगी थीं। पाडेय जी ने वीडा उठाया कि पेंट खुद करेंगे। । Asianpaints की बडी दुकान हाल फिलहाल में खुली थी। पेंट करने का आसान तरीका भी उससे पूछा गया। सभी जरूरी सामान मसलन पेंट ,थिनर , ब्रस और रोलर ले लिया गया। अब बारी थी पेंट करने की, पटना कॉलेज के सामने शोभराज सभी को याद होगा। वहाँ से समोसे और जलेबे का पार्सल भी ले लिया गया। कॉलेज बंद होते ही अपने इस मित्र को मुसीबत में पाकर हम सभी जुट गए मदद के लिए। आधी रात से पहले ही एनसीसी कार्यालय का कायापलट हो गया। बाकी पेंट को बरबाद तो कर सकते थे नहीं, इसलिए साइकिल स्टैंड और दूसरी जगहों पर उसे लगा कर खत्म किया गया। हाँ ये जरूर ध्यान रखा गया कि अपनी आलीशान सवारी एनसीसी ऑफिस के समीप ही खडी रहे इसलिए गहरा पीला रंग जो कि कालेज के मुख्य इमारत और एनसीसी कार्यालय के बाहरी दीवार पर था सी से आलीशान सवारी का स्टैन्ड पेन्ट किया गया। सारा काम होने में हम सब का उत्साह वर्धन करने वाला समोसा और जलेबा जरूर रहा। इस घटना को आप में कोई जरूर जानता होगा मित्रों के बारे में भी जानता होगा। इन सहृदय मित्रों से आप जरूर मिलें बात करें अपने विचारों का आदान प्रदान करें पता नहीं कब किसकी डोर टूट जाए। आज हमारे बीच कुमार नहीं है, हम सब उसकी कमी महसूस करते हैं,खालीपन सा लगता है। बशीर बद्र की रचना की दो पंक्ति हैं यहाँ –
अब किसे चाहें किसे ढूँढा करें
वो भी आख़िर मिल गया अब क्या करें,...