Sughar_Singh -"सौरभ कैथवां"

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03/12/2023
11/10/2023

एक भिखारी था...

भीख मांगने के लिए मसजिद के बाहर बैठा था।
सभी नमाजी आंख बचा कर चले गए और
उसे कुछ ना मिला।
फिर वो चर्च गया,
फिर मंदिर और गुरूद्वारा,
लेकिन उसको किसी ने कुछ नहीं दिया।

आखिर कर वह एक बीयर बार के बाहर आ कर बैठ गया।

जो भी शराबी बाहर निकलता
वो उसके कटोरे में कुछ डाल देता।
कुछ ही देर में उसका कटोरा नोटों से भर गया...।

यह देख भिखारी बोला:

प्रभु, रहते कहां हो और Address कहां का देते हो।।

😜😜😜

30/09/2023

अच्छी थी पगडंडी अपनी, सड़कों पर तो जाम बहुत है।
फुर्र हो गई फुर्सत अब तो, सबके पास काम बहुत है॥

नहीं जरूरत बूढ़ों की अब, हर बच्चा बुद्धिमान बहुत है।
उजड़ गए सब बाग बगीचे, दो गमलों में शान बहुत है॥

मट्ठा, दही नहीं खाते हैं, कहते हैं ज़ुकाम बहुत है।
पीते हैं जब चाय तब कहीं, कहते हैं आराम बहुत है॥

बंद हो गई चिट्ठी, पत्री, फोनों पर पैगाम बहुत है।
आदी हैं ए.सी. के इतने, कहते बाहर घाम बहुत है॥

झुके-झुके स्कूली बच्चे, बस्तों में सामान बहुत है।
सुविधाओं का ढेर लगा है, पर इंसान परेशान बहुत है॥

18/09/2023

एक पिता ने अपने गुस्सैल बेटे से तंग आकर उसे कीलों से भरा एक थैला देते हुए कहा ,"तुम्हें जितनी बार क्रोध आए तुम थैले से एक कील निकाल कर बाड़े में ठोंक देना !"

बेटे को अगले दिन जैसे ही क्रोध आया उसने एक कील बाड़े की दीवार पर ठोंक दी। यह प्रक्रिया वह लगातार करता रहा।

धीरे धीरे उसकी समझ में आने लगा कि कील ठोंकने की व्यर्थ मेहनत करने से अच्छा तो अपने क्रोध पर नियंत्रण करना है और क्रमशः कील ठोंकने की उसकी संख्या कम होती गई।

एक दिन ऐसा भी आया कि बेटे ने दिन में एक भी कील नहीं ठोंकी।

उसने खुशी खुशी यह बात अपने पिता को बताई। वे बहुत प्रसन्न हुए और कहा, "जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम एक बार भी क्रोधित नहीं हुए, ठोंकी हुई कीलों में से एक कील निकाल लेना।"

बेटा ऐसा ही करने लगा। एक दिन ऐसा भी आया कि बाड़े में एक भी कील नहीं बची। उसने खुशी खुशी यह बात अपने पिता को बताई।
पिता उस लड़के को बाड़े में लेकर गए और कीलों के छेद दिखाते हुए पूछा, "क्या तुम ये छेद भर सकते हो?"

बेटे ने कहा,"नहीं पिताजी!"

पिता ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा,"अब समझे बेटा, क्रोध में तुम्हारे द्वारा कहे गए कठोर शब्द, दूसरे के दिल में ऐसे छेद कर देते हैं, जिनकी भरपाई भविष्य में तुम कभी नहीं कर सकते !"

18/09/2023

अमिताभ बच्चन कहते हैं...
अपने करियर के चरम पर, मैं एक बार हवाई जहाज से यात्रा कर रहा था।
मेरे बगल वाली सीट पे एक साधारण से सज्जन व्यक्ति बैठे थे, जिसने एक साधारण शर्ट और पैंट पहन रखी थी। वह मध्यम वर्ग का लग रहा था, और बेहद शिक्षित दिख रहा था।

अन्य यात्री मुझे पहचान रहे थे कि मैं कौन हूँ, लेकिन यह सज्जन मेरी उपस्थिति के प्रति अंजान लग रहे थे ... वह अपना पेपर पढ़ रहे थे, खिड़की से बाहर देख रहे थे, और जब चाय परोसी गई, तो उन्होंने इसे चुपचाप पी लिया ।

उसके साथ बातचीत करने की कोशिश में मैं उन्हें देख मुस्कुराया। वह आदमी मेरी ओर देख विनम्रता से मुस्कुराया और 'हैलो' कहा।

हमारी बातचीत शुरू हुई और मैंने सिनेमा और फिल्मों के विषय को उठाया और पूछा, 'क्या आप फिल्में देखते हैं?'

आदमी ने जवाब दिया, 'ओह, बहुत कम। मैंने कई साल पहले एक फिल्म देखा था। '

मैंने उल्लेख किया कि मैंने फिल्म उद्योग में काम किया है।

आदमी ने जवाब दिया .. "ओह, यह अच्छा है। आप क्या करते हैं?"

मैंने जवाब दिया, 'मैं एक अभिनेता हूं'

आदमी ने सिर हिलाया, 'ओह, यह अद्भुत है!' तो यह बात हैं ...

जब हम उतरे, तो मैंने हाथ मिलाते हुए कहा, "आपके साथ यात्रा करना अच्छा था। वैसे, मेरा नाम अमिताभ बच्चन है!"

उस आदमी ने हाथ मिलाते हुए मुस्कुराया, "थैंक्यू ... आपसे मिलकर अच्छा लगा..मैं जे आर डी टाटा (टाटा का चेयरमैन) हूं!"

मैंने उस दिन सीखा कि आप चाहे कितने भी बड़े हो।हमेशा आप से कोई !! बड़ा !! होता है।

नम्र बनो, इसमें कुछ भी खर्च नहीं है।

I have reached 500 followers! Thank you for your continued support. I could not have done it without each of you. 🙏🤗🎉
07/09/2023

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24/06/2023

पराजय

एक डिप्टी कलेक्टर के तौर पर जब जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभार मिलने के बाद ज्वाइन किया..तो जानकारी हुई की ये जिला ..स्कूली शिक्षा के लिहाज से बहुत पिछड़ा हुआ हैं… वरिष्ठ अधिकारियों ने भी कहा आप ग्रामीण इलाकों पर विशेष ध्यान दें..

बस तय कर लिया … महीने में आठ दस दिन जरूर ग्रामीण स्कूलों को दूंगा.. शीघ्र ही..ग्रामीण इलाकों में दौरों का सिलसिला चल निकला .. पहाड़ी व जंगली इलाका भी था कुछ..

एक दिन मातहत कर्मचारियों से मालूम हुआ.. “बड़ेरी” नामक गांव, जो एक पहाड़ी पर स्थित है..वहां के स्कूल में कोई शिक्षा अधिकारी नहीं जाता है, क्योंकि वहां पहुंचने के लिए.. वाहन छोड़कर … लगभग पांच-छः किलोमीटर जंगली रास्ते से पैदल ही जाना होता है …..तय कर लिया अगले दिन वहां जाया जाए..

वहां कोई मिस्टर वी. के. वर्मा हेड मास्टर हैं. जो बरसों से, पता नहीं क्यूं … वहीं जमे हुए हैं .! मैंने निर्देश दिए उन्हें कोई अग्रिम सूचना न दी जाय …. सरप्राइज विजिट होगी..! अगले दिन हम सुबह निकले … दोपहर बारह बजे …. ड्राइवर ने कहा साहब यहां से आगे …. पहाड़ी पर पैदल ही जाना होगा पाच छः किलोमीटर..

मै और दो अन्य कर्मचारी पैदल ही चल पड़े.. लगभग डेढ़ घंटे सकरे .. पथरीले जंगली रास्ते से होकर हम ऊपर गांव तक पहुंचे..सामने स्कूल का पक्का भवन था..और लगभग दो सौ कच्चे पक्के मकान थे..स्कूल साफ सुथरा और व्यवस्थित रंगा पुता हुआ था .. बस तीन कमरे और प्रशस्त बरामदा..चारों तरफ सुरम्य हरा भरा वन..

अंदर क्लास रूम में पहुंचे तो तीन कक्षाओं में लगभग सवा सौ बच्चे तल्लीनता पूर्वक पढ़ रहे थे.. हालांकि शिक्षक कोई भी नहीं था..एक बुजुर्ग सज्जन बरामदे में थे जो वहां नियुक्त पियून थे.शायद… उन्होंने बताया हेड मास्टर साहब आते ही होंगे..

हम बरामदे में बैठ गए थे..तभी देखा एक चालीस पैतालीस वर्ष के सज्जन..अपने दोनो हाथो में पानी की बाल्टियां लिए ऊपर चले आ रहे थे..पायजामा घुटनों तक चढ़ाया हुआ था..ऊपर खादी का कुर्ता जैसा था..! उन्होंने आते ही परिचय दिया.. मैं वी के वर्मा यहां हेड मास्टर हूं..। यहां इन दिनों ..बच्चों के लिए पानी, थोड़ा नीचे जाकर कुंए से लाना होता है..हमारे चपरासी दादा..बुजुर्ग हैं अब उनसे नहीं होता..इसलिए मै ही लेे आता हूं..वर्जिश भी हो जाती है..वे मुस्कुराकर बोले..

उनका चेहरा पहचाना सा लगा और नाम भी.. मैंने उनकी और देखकर पूछा.. “तुम विवेक हो.न! इंदौर से.. गुजराती कॉलेज..!”

मैंने हैट उतार दिया था.. उसने कुछ पहचानते हुए .. चहकते हुए कहा…… आप अभिनव.. !! अभिनव श्रीवास्तव..! मैंने कहा और नहीं तो क्या.. भई..!लगभग बीस बाईस बरस पहले हम इंदौर में साथ ही पढ़े थे … बेहद होशियार और पढ़ाकू था वो …. बहुत कोशिश करने के बावजूद शायद ही कभी उससे ज्यादा नंबर आए हों.. मेरे एक प्रतिस्पर्धा रहती थी हमारे बीच..जिसमें हमेशा वही जीता करता था..आज वो हेड मास्टर था और मैं..जिला शिक्षा अधिकारी.. पहली बार उससे आगे निकलने … जीतने.. का भाव था.. और सच कहूं तो खुशी थी मन में..

मैंने सहज होते हुए पूछा.. यहां कैसे पहुंचे.. भई..?. और कौन कौन है घर पर..? उसने विस्तार से बताना शुरू किया….“ एम. कॉम करते समय ही बाबूजी की मालवा मिल वाली नौकरी जाती रही थी..फिर उन्हें दमे की बीमारी भी तो थी..! …. घर चलाना मुश्किल हो गया था..किसी तरह पढ़ाई पूरी की.. नम्बर अच्छे थे.. इसलिए संविदा शिक्षक वर्ग – 3 की नियुक्ति मिल गई थी..जो छोड़ नहीं सकता था..आगे पढ़ने की न गुंजाइश थी न स्थितियां … इस गांव में पोस्टिंग मिल गई..

मां बाबूजी को लेकर यहां चला आया … सोचा गांव में कम पैसों में गुजारा हो ही जायेगा..!” फिर उसने हंसते हुए कहा.. “इस दुर्गम गांव में पोस्टिंग..और वृद्ध.. बीमार मां बाप को देख.. कोई लड़की वाले लड़की देने तैयार नहीं हुए …. इसलिए विवाह नहीं हुआ..और ठीक भी है.. कोई पढ़ी लिखी लड़की भला यहां क्या करती..!

अपनी कोई पहुंच या पकड़ थी नही पैसे भी नहीं थे कि यहां से ट्रांसफर करा पाते..तो बस यहीं जम गए..

यहां आने के कुछ बरस बाद..मां बाबूजी दोनों ही चल बसे.. यथा संभव उनकी सेवा करने का प्रयास किया..अब यहां बच्चों में … स्कूल में मन रम गया है…छुट्टी के दिन बच्चों को लेकर.. आस पास की पहाड़ियों पर वृक्षारोपण करने चला जाता हूं…

रोज शाम को स्कूल के बरामदे में बुजुर्गों को पढ़ा देता हूं..अब शायद इस गांव में कोई निरक्षर नहीं है.. नशा मुक्ति का अभियान भी चला रक्खा है..अपने हाथों से खाना बना लेता हूं..और किताबें पढ़ता हूं..

बच्चों को अच्छी बुनियादी शिक्षा.. अच्छे संस्कार मिल जाएं … अनुशासन सीखें बस यही ध्येय है.. मै सी ए नहीं कर सका पर मेरे दो विद्यार्थी सी.ए. हैं…. और कुछ अच्छी नौकरी में भी..।
मेरा यहां कोई ज्यादा खर्च है नहीं.. मेरी ज्यादातर तनख़ा इन बच्चों के खेल कूद और स्कूल पर खर्च हो जाती हैं…तुम तो जानते हो कॉलेज के जमाने से क्रिकेट खेलने का जुनून था..! वो बच्चों के साथ खेल कर पूरा हो जाता है..बड़ा सुकून मिलता है..”

मैंने टोकते हुए कहा…मां बाबूजी के बाद शादी का विचार नहीं आया..? उसने मुस्कुराते हुए कहा.. “दुनियां में सारी अच्छी चीजें मेरे लिये नहीं बनी है..” “इसलिए जो सामने है..उसी को अच्छा करने या बनाने की कोशिश कर रहा हूं..”..फिर अपने परिचित दिलचस्प अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोला.“

अरे वो फ़ैज़ साहेब की एक नज़्म में है न..! .”अपने बेख्वाब किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो..अब यहां कोई नहीं..कोई नहीं आएगा..” उसकी उस बेलौस हंसी ने भीतर तक भिगो दिया था..
लौटते हुए मैंने उससे कहा..विवेक..तुम जब चाहो तुम्हारा ट्रांसफर मुख्यालय या जहां तुम चाहो करा दूंगा.. उसने मुस्कुराते हुए कहां..अब बहुत देर हो चुकी है.जनाब.. अब यहीं इन लोगों के बीच खुश हूं..कहकर उसने हाथ जोड़ दिए..
मेरी अपनी उपलब्धियों से उपजा दर्प..उससे आगे निकल जाने का अहसास..भरम.. चूर चूर हो गया था..वो अपनी जिंदगी की तमाम कमियों.. तकलीफों.. असुविधाओं के बावजूद सहज था.

उसकी कर्तव्यनिष्ठा देखकर.. मै हतप्रभ था ..जिंदगी से..किसी शिकवे या.. शिकायत की कोई झलक उसके व्यवहार में…नहीं थी.. सुख सुविधाओं..उपलब्धियों.. ओहदों के आधार पर हम लोगों का मूल्यांकन करते हैं..लेकिन वो इन सब के बिना मुझे फिर पराजित कर गया था..!

लौटते समय उस कर्म ऋषि को हाथ जोड़कर..भरे मन से इतना ही कह सका..तुम्हारे इस पुनीत कार्य में कभी मेरी जरूरत पड़े तो जरूर याद करना मित्र!

फीस समय की या अनुभव की? एक विशाल जहाज का इंजन खराब हो गया। लाख कोशिशों के बावजूद कोई इंजीनियर उसे ठीक नहीं कर सका। फिर क...
10/06/2023

फीस समय की या अनुभव की?
एक विशाल जहाज का इंजन खराब हो गया। लाख कोशिशों के बावजूद कोई इंजीनियर उसे ठीक नहीं कर सका। फिर किसी ने एक मैकेनिकल इंजीनियर का नाम सुझाया जिसे इस तरह के काम का 30 से अधिक वर्षों का अनुभव था। उसे बुलाया गया। इंजीनियर ने वहां पहुंचकर इंजन का ऊपर से नीचे तक बहुत ध्यान से निरीक्षण किया। सब कुछ देखने के बाद इंजीनियर ने अपना बैग उतारा और उसमें से एक छोटा सा हथौड़ा निकाला। फिर उसने इंजन पर एक जगह हथोड़े से धीरे से खटखटाया। और कहा कि अब इंजन चालू करके देखें। और सब हैरान रह गए जब इंजन फिर से चालू हो गया। इंजन ठीक करके इंजीनियर चला गया। जहाज के मालिक ने जब इंजीनियर से जहाज की मरम्मत करने की फीस पूछी, तो इंजीनियर ने कहा- 20,000 डॉलर।
"क्या?!" मालिक चौंका। "आपने लगभग कुछ नहीं किया। मेरे आदमियों ने मुझे बताया था कि तुमने एक हथोड़े से इंजन पर सिर्फ थोड़ा सा खटखटाया था। इतने छोटे काम के लिए इतनी फीस? आप हमें एक विस्तृत बिल बनाकर दें।"
इंजीनियर ने बिल बनाकर दे दिया। उसमें लिखा था:
हथौड़े से खटखटाया: $2
कहां और कितना खटखटाना है: $19,998
फिर इंजीनियर ने जहाज के मालिक से कहा - अगर मैं किसी काम को 30 मिनट में कर देता हूं तो इसलिए कि मैंने 30 साल यह सीखने में लगा दिए कि उसे 30 मिनट में कैसे किया जाता है। मैंने आपको 30 मिनट नहीं दिए, इतने समय में मेरे 30 वर्षों का अनुभव दिया है। फीस कितना समय लगा उसकी नहीं मेरे अनुभव की है। जहाज का मालिक बहुत शर्मिंदा हुआ और उसने ख़ुशी ख़ुशी इंजीनियर को उसकी फीस दे दी।

तो किसी की विशेषज्ञता और अनुभव की सराहना करें...
क्योंकि ये उनके वर्षों के संघर्ष, प्रयोग, मेहनत और आंसुओं का परिणाम हैं।

- -
लेखक (अज्ञात)

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