Sunil choudhary

Sunil choudhary social

30/11/2024

संग वक़्त के ढल न पाए, दिल के सारे छाले निकले,
संबंधों की आचरणों की टूटी डोर संभाले निकले।
वट वृक्षों को जलते देखा कुंठित हो कुछ पौधों से,
तन से उजले दिखने वाले मन से पूरे काले निकले।।

Sunil Choudhary

30/11/2024

चलते रहेंगे काफिले मेरे बगैर भी यहां
एक सितारा टूटने से आसमा खाली नहीं होता

28/11/2024

आपका सबसे अच्छा मित्र किसी भी जाति का हो सकता है मगर आपका दुश्मन आपकी जाति का ही होगा। 99% तो ऐसा ही है बाकी आप लोग बताओ 🤔🫢🤔

27/11/2024
26/11/2024

पाकिस्तान का नाम और इसके इतिहास का गहरा संबंध भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ा हुआ है। पाकिस्तान का नाम और उसकी स्थापना का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम, मुस्लिम पहचान और धार्मिक संघर्षों से संबंधित है।

पाकिस्तान का नाम कैसे पड़ा:

पाकिस्तान शब्द का उत्पत्ति उर्दू और फारसी शब्दों से हुई है। 'पाक' का अर्थ है 'पवित्र' और 'स्तान' का अर्थ है 'स्थान' या 'देश'। इस प्रकार, पाकिस्तान का मतलब है "पवित्र देश" या "शुद्ध स्थान"। इस नाम की प्रस्तावना डॉक्टर चौधरी रहमत अली ने की थी, जो पाकिस्तान आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे।

पाकिस्तान का इतिहास:

पाकिस्तान का इतिहास भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम समुदाय के संघर्षों और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है।

ब्रिटिश काल (1858-1947): 1858 में ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत पर अपना शासन स्थापित किया। भारतीय मुस्लिमों के लिए यह समय धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान की एक कठिन अवधि थी, क्योंकि ब्रिटिश शासन के दौरान हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव बढ़ने लगा।

मुस्लिम लीग का गठन (1906): भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ मुस्लिम समुदाय का मतभेद बढ़ने के बाद 1906 में "ऑल इंडिया मुस्लिम लीग" की स्थापना हुई। यह पार्टी मुस्लिम समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने के लिए बनी थी।

पाकिस्तान का विचार (1930): 1930 में अल्लामा इकबाल ने मुस्लिमों के लिए एक अलग राज्य की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके विचार ने पाकिस्तान के विचार को उत्पन्न किया, जिसमें मुस्लिमों के लिए एक स्वतंत्र और समर्पित राष्ट्र का विचार था।

अली जिन्ना और पाकिस्तान आंदोलन: पाकिस्तान के निर्माण में मुख्य भूमिका मौलाना मुहम्मद अली जिन्ना की थी, जिन्होंने मुस्लिमों के लिए अलग राज्य की मांग की थी। 1940 में, मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को औपचारिक रूप से "लाहौर प्रस्ताव" में पेश किया। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिमों ने इस आंदोलन को तेज किया, और आखिरकार ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ स्वतंत्रता की मांग की।

भारत का विभाजन और पाकिस्तान का निर्माण (1947): 15 अगस्त 1947 को भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली, और इस स्वतंत्रता के साथ भारत का विभाजन हुआ। भारत को हिंदू बहुल राष्ट्र के रूप में स्थापित किया गया, जबकि पाकिस्तान को मुस्लिमों के लिए एक अलग राज्य के रूप में बनाया गया। पाकिस्तान का गठन 14 अगस्त 1947 को हुआ, और इसे दो भागों में विभाजित किया गया – पश्चिम पाकिस्तान (जो आज का पाकिस्तान है) और पूर्व पाकिस्तान (जो बाद में बांगलादेश बना)।

इस प्रकार, पाकिस्तान का नाम और इतिहास भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक और धार्मिक संघर्षों से जुड़ा हुआ है, जो मुस्लिम समुदाय की पहचान और स्वाधीनता की खोज में परिणत हुआ।

सबके हिस्से में नहीं आया...ये जमीं, ये आसामानये खुशी, ये मुस्कानसबके हिस्से में नहीं आया...ये शाम, ये शहरये एतबार, ये प्...
26/11/2024

सबके हिस्से में नहीं आया...
ये जमीं, ये आसामान
ये खुशी, ये मुस्कान
सबके हिस्से में नहीं आया...
ये शाम, ये शहर
ये एतबार, ये प्यार
ये मंजिल, ये सफर
हाथ पकड़कर चले वो हमसफर
सबके हिस्से में नहीं आया...
"जिंदगी जीना"...,!

25/11/2024

इक्ता (Iqta) का इतिहास:

इक्ता, भारत के मध्यकालीन इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और भू-स्वामित्व प्रणाली थी। यह प्रणाली मुख्य रूप से दिल्ली सुलतानत और मुघल साम्राज्य के दौरान प्रचलित थी। इस प्रणाली में शासक अपने साम्राज्य के कुछ भू-भाग को अपने सैनिकों, अधिकारीयों और अन्य प्रमुख व्यक्तियों को सेवा के बदले उपहार के रूप में प्रदान करते थे। इन भू-भागों का प्रशासन और उनसे प्राप्त होने वाली आय उन व्यक्तियों को दी जाती थी।

इक्ता प्रणाली का विकास: इक्ता प्रणाली की शुरुआत दिल्ली सुलतानत के समय में हुई थी, विशेष रूप से अलाउद्दीन ख़िलजी और बाद में मुहम्मद तुगलक के शासनकाल में। इस प्रणाली के तहत, शासक अपने अधिकारियों को विभिन्न क्षेत्रों का नियंत्रण सौंपते थे। इन क्षेत्रों को "इक्ता" कहा जाता था और उनके अधिकारी को "मुक्ता" या "इक्तादार" कहा जाता था। इक्तादार को इन क्षेत्रों से आय प्राप्त होती थी, जिससे वह अपनी सेना को वेतन देने और अन्य प्रशासनिक कार्यों को पूरा करने के लिए सक्षम होता था।

इक्तादार और उनका कर्तव्य: इक्तादार को इक्ता की आय से अपना वेतन मिलता था, लेकिन यह आय शासक को वापस करने की थी। इक्तादार का मुख्य कर्तव्य था, अपनी जिम्मेदारी वाले क्षेत्र में शांति बनाए रखना, कर वसूलना और शासक के आदेशों का पालन सुनिश्चित करना।

इक्ता प्रणाली का प्रभाव:

सैन्य संगठन: इक्ता प्रणाली ने सैन्य अधिकारियों को क्षेत्रीय आधार पर सशक्त किया, क्योंकि उन्हें एक क्षेत्र से आय मिलती थी, जिससे वे अपनी सेना की देखरेख कर सकते थे।

स्थानीय प्रशासन: इक्ता प्रणाली ने स्थानीय प्रशासन को मजबूत किया, क्योंकि इक्तादार को क्षेत्रीय प्रशासन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

मुलायम भूमि वितरण: इस प्रणाली से भूमि का वितरण किया गया, जिससे शासक के शासन का विस्तार हुआ और भू-स्वामियों के बीच अधिकारों का संतुलन बना।

इक्ता प्रणाली का पतन: मुघल साम्राज्य के दौरान इक्ता प्रणाली में बदलाव आया। अकबर के शासनकाल में, मुघल साम्राज्य में 'जमींदारी' प्रणाली का अधिक प्रचलन हुआ। इक्ता प्रणाली का धीरे-धीरे ह्रास हुआ और मुघल प्रशासन की नीतियों में परिवर्तन आया। अंततः, ब्रिटिश साम्राज्य के समय में यह पूरी तरह समाप्त हो गई।

निष्कर्ष: इक्ता प्रणाली भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था थी, जिसने मध्यकालीन काल में शासक और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भूमि और राजस्व के वितरण को व्यवस्थित किया। इस प्रणाली ने सैन्य और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत किया और भारत के राजनीतिक इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला।

22/11/2024

राजराजा चोल प्रथम (राजराज चोल-I) चोल साम्राज्य के एक महान शासक थे, जिन्होंने दक्षिण भारत में 985 ई. से 1014 ई. तक शासन किया। उनका असली नाम अरुलमोझीवर्मन था। उन्होंने चोल साम्राज्य को दक्षिण भारत का एक शक्तिशाली साम्राज्य बनाया और उसकी सीमाओं को श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक विस्तारित किया।

राजराजा चोल की प्रमुख उपलब्धियाँ:

राज्य विस्तार:
उन्होंने कई युद्धों के माध्यम से अपना साम्राज्य बढ़ाया, जिसमें श्रीलंका पर विजय प्राप्त करना और पंड्या व चेर साम्राज्यों को हराना शामिल था।

बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण:
तंजावुर में स्थित बृहदीश्वर मंदिर (जिसे राजराजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है) राजराजा चोल की सबसे बड़ी वास्तुकला उपलब्धि है। यह मंदिर चोल साम्राज्य की कला, वास्तुकला और धार्मिक महत्व को दर्शाता है। यह आज यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।

समुद्री शक्ति का विकास:
उन्होंने अपनी नौसेना को मजबूत बनाया, जिससे चोल साम्राज्य दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों जैसे श्रीविजय साम्राज्य (वर्तमान इंडोनेशिया) तक प्रभाव डाल सका।

प्रशासनिक सुधार:
उन्होंने अपने साम्राज्य को बेहतर तरीके से संगठित किया, जिसमें कर संग्रह प्रणाली और स्थानीय स्वायत्तता को बढ़ावा देना शामिल था।

धार्मिक संरक्षण:
उन्होंने शैव धर्म को बढ़ावा दिया और कई मंदिरों का निर्माण और संरक्षण किया।

राजराजा चोल ने चोल साम्राज्य की नींव को इतना मजबूत बनाया कि उनके उत्तराधिकारी, विशेष रूप से राजेंद्र चोल प्रथम, इस साम्राज्य को नई ऊंचाइयों तक ले जा सके। उनका शासन काल चोल इतिहास के "स्वर्ण युग" के रूप में जाना जाता है।

21/11/2024

**पुराण** भारतीय धार्मिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो इतिहास, देवताओं, धर्म, संस्कृति, और जीवन के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। पुराणों का उद्देश्य केवल कथाएँ सुनाना नहीं, बल्कि जीवन के गूढ़ अर्थ, moral lessons और धर्मिक शिक्षा देना भी था। पुराणों का इतिहास बहुत पुराना है, और इनकी संख्या 18 प्रमुख पुराणों तक मानी जाती है।

# # # **पुराणों का इतिहास:**

1. **पुराणों की उत्पत्ति**:
- पुराण शब्द संस्कृत के "पुराण" (पुर + आन) से आया है, जिसका अर्थ है "पुराना" या "प्राचीन इतिहास"।
- पुराणों का निर्माण वेदों के बाद हुआ। वेदों में जिन बातों का संदर्भ मिलता था, पुराणों में उनका विस्तार और व्याख्या दी गई। पुराणों का मुख्य उद्देश्य वेदों के गूढ़ तत्वों को सरल रूप में समझाना और उन्हें सामान्य जनता तक पहुंचाना था।

2. **पुराणों का उद्देश्य**:
- पुराणों में देवताओं, महापुरुषों और प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में कथाएँ दी जाती हैं।
- ये समाज को धार्मिक शिक्षा देने, जीवन के उद्देश्य को समझाने, और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से रचे गए थे।
- इन्हें **स्मृति** के रूप में देखा जाता है, जो वेदों के बाद का प्रामाणिक साहित्य है। वेदों के ज्ञान का विस्तार और उसकी व्याख्या पुराणों में की जाती थी।

3. **पुराणों का वर्गीकरण**:
पुराणों की संख्या अलग-अलग मतों में अलग-अलग बताई जाती है, लेकिन मुख्य रूप से 18 प्रमुख पुराणों को स्वीकार किया जाता है, जिन्हें **महापुराण** कहा जाता है। ये 18 पुराण निम्नलिखित हैं:

1. **विष्णु पुराण**
2. **शिव पुराण**
3. **ब्रह्म पुराण**
4. **भागवत पुराण**
5. **रामायण पुराण**
6. **महाभारत पुराण**
7. **अग्नि पुराण**
8. **लिंग पुराण**
9. **स्कंद पुराण**
10. **मार्कंडेय पुराण**
11. **वायु पुराण**
12. **मत्स्य पुराण**
13. **कुरम पुराण**
14. **नारद पुराण**
15. **पद्म पुराण**
16. **संगीत पुराण**
17. **गरुड़ पुराण**
18. **भृगु पुराण**

4. **पुराणों का समय**:
- पुराणों का समय वेदों के बाद आता है। इनकी रचना **300 ईसा पूर्व** से **1000 ईस्वी** तक हुई मानी जाती है, हालांकि इनके कुछ अंश और विचार इससे भी पहले के हो सकते हैं।
- पुराणों का उद्देश्य सामान्य जनता के लिए धार्मिक शिक्षा और जीवन के मार्ग को सरलता से प्रस्तुत करना था।

5. **पुराणों का भाषा और शैली**:
- पुराणों की भाषा संस्कृत थी, और इनमें कथा शैली का बहुत उपयोग किया गया है।
- इनमें धार्मिक और दार्शनिक विचार, मंत्र, स्तुतियाँ, प्रार्थनाएँ, और शास्त्रार्थ (debates) होते थे, जो सामान्य जनता को समझ में आ सकें।

6. **पुराणों में मुख्य विषय**:
- **देवताओं की कथाएँ**: पुराणों में प्रमुख देवताओं जैसे **विष्णु**, **शिव**, **ब्रह्मा**, **गणेश**, **कृष्ण**, और **राम** की कथा और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं का वर्णन मिलता है।
- **राजवंशों और महापुरुषों का इतिहास**: पुराणों में प्रमुख राजवंशों, जैसे **चंद्रवंश** और **सूर्यवंश**, के इतिहास और उनके महत्व का वर्णन किया गया है।
- **धर्म और नीति**: पुराणों में धर्म, नीति, और संस्कारों के बारे में विस्तार से बताया गया है, जिससे समाज में नैतिक मूल्यों का प्रचार हुआ।
- **संसार का सृजन और प्रलय**: पुराणों में संसार के उत्पत्ति, उसका पालन और प्रलय के बारे में भी विस्तृत जानकारी दी गई है।

7. **प्रमुख पुराणों का संक्षिप्त विवरण**:

- **विष्णु पुराण**: इसमें विष्णु भगवान के अवतारों (जैसे राम और कृष्ण) और उनके कार्यों का वर्णन है।
- **शिव पुराण**: इसमें शिव भगवान के जीवन और उनके कार्यों के बारे में कथा दी गई है।
- **भागवत पुराण**: यह विशेष रूप से भगवान श्री कृष्ण के जीवन, उनके अवतार और उपदेशों पर केंद्रित है।
- **गरुड़ पुराण**: इसमें मृत्यु के बाद के जीवन, स्वर्ग, नरक, और यमराज के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।
- **स्कंद पुराण**: इसमें भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की महिमा और उनके युद्धों की कथा है।
- **पद्म पुराण**: इसमें विभिन्न देवी-देवताओं, विशेष रूप से देवी लक्ष्मी की महिमा का वर्णन है।

8. **पुराणों का महत्व**:
- पुराणों का प्रमुख उद्देश्य धार्मिक शिक्षा देना था, और ये भारतीय संस्कृति, समाज, और धर्म के महत्वपूर्ण दस्तावेज माने जाते हैं।
- ये भारतीय काव्य साहित्य का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और इन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, रीति-रिवाजों, और त्यौहारों को समझने के लिए भी उपयोग किया जाता है।

# # # निष्कर्ष:
**पुराण** भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक साहित्य का एक अभिन्न हिस्सा हैं। इनकी रचना वेदों के बाद हुई थी और इनका उद्देश्य समाज में धर्म, नैतिकता, और सत्य के संदेश को फैलाना था। पुराणों में न केवल धार्मिक बातें होती हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक शिक्षा भी दी जाती है। इनका प्रभाव भारतीय समाज और धार्मिक जीवन पर आज भी देखने को मिलता है।

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