14/03/2026
भारत सहित विश्व राजनीति के वर्तमान दौर में अमेरिकी विदेश नीति को लेकर बहस तेज़ हो गई है। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका के व्यवहार को कई विश्लेषक असामान्य, आक्रामक और कभी-कभी असंगत मानते हैं। किंतु यदि हम इस विषय को केवल व्यक्तित्व या भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के आधार पर समझने का प्रयास करें तो हम वैश्विक राजनीति के जटिल ढांचे को नजरअंदाज कर देंगे। वास्तविकता यह है कि आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था गहरे परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। शक्ति संतुलन बदल रहा है, आर्थिक संरचनाएँ पुनर्गठित हो रही हैं और नई राजनीतिक विचारधाराएँ पुराने संस्थागत ढाँचों को चुनौती दे रही हैं। इस परिवर्तित परिदृश्य में अमेरिकी नीति को समझना केवल ट्रंप के निर्णयों की आलोचना करना नहीं, बल्कि उस व्यापक संरचना को समझना है जिसमें अमेरिका स्वयं को अब भी एक निर्णायक वैश्विक शक्ति के रूप में देखता है।
बीसवीं सदी के अंतिम दशक में शीत युद्ध के अंत के बाद अमेरिका एक ऐसे चरण में प्रवेश कर गया जिसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विद्वान ‘एकध्रुवीय क्षण’ कहते हैं। 1991 में सोवियत संघ के विघटन (Dissolution of the Soviet Union) के साथ ही वैश्विक राजनीति से वह प्रमुख प्रतिद्वंद्वी शक्ति समाप्त हो गई जिसने लगभग आधी सदी तक अमेरिकी शक्ति को संतुलित रखा था। उस समय ऐसा प्रतीत हुआ कि अमेरिका न केवल सैन्य दृष्टि से बल्कि आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक प्रभाव के स्तर पर भी दुनिया का निर्विवाद नेता बन गया है। इसी काल में 1991 का खाड़ी युद्ध (Gulf War) हुआ, जिसमें अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने इराकी सेनाओं को कुवैत से पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। इस युद्ध ने यह संदेश दिया कि यदि अमेरिका चाहे तो वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अपनी शर्तों के अनुसार आकार दे सकता है।
किन्तु इतिहास स्थिर नहीं रहता। समय के साथ-साथ नई शक्तियाँ उभरती हैं और पुराने प्रभुत्व को चुनौती देती हैं। इक्कीसवीं सदी के पहले दो दशकों में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन एशिया के आर्थिक उदय के रूप में सामने आया, जिसमें विशेष रूप से चीन की भूमिका निर्णायक रही। चीन ने वैश्विक विनिर्माण, निर्यात और व्यापार के क्षेत्र में असाधारण प्रगति की। उसने दुनिया की फैक्ट्री के रूप में अपनी पहचान स्थापित की और कई देशों की आर्थिक संरचनाओं को अपने साथ जोड़ लिया। दूसरी ओर अमेरिका अब भी तकनीकी नवाचार, वित्तीय बाजार और सैन्य क्षमता के क्षेत्र में अग्रणी बना रहा। परिणामस्वरूप आज की दुनिया पूरी तरह एकध्रुवीय नहीं है, बल्कि शक्ति का एक जटिल वितरण दिखाई देता है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग देशों का प्रभाव प्रमुख है।
यही वह संदर्भ है जिसमें ट्रंप की विदेश नीति को समझना आवश्यक है। जब डोनाल्ड ट्रंप ने 2017 में सत्ता संभाली, तब उन्होंने ‘Make America Great Again’ का नारा दिया। इस नारे के पीछे केवल चुनावी रणनीति नहीं थी, बल्कि यह एक व्यापक राजनीतिक भावना को व्यक्त करता था। अमेरिका के कई नागरिकों को लगने लगा था कि वैश्वीकरण, मुक्त व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की व्यवस्था ने अमेरिका के औद्योगिक आधार और श्रमिक वर्ग को नुकसान पहुँचाया है। इस असंतोष ने एक ऐसे राजनीतिक आंदोलन को जन्म दिया जो मानता था कि अमेरिका को अपनी राष्ट्रीय शक्ति का उपयोग अधिक आक्रामक ढंग से करना चाहिए और वैश्विक नियमों की बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
ट्रंप की विदेश नीति में इसी मानसिकता की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। उन्होंने व्यापार के क्षेत्र में कई देशों पर भारी टैरिफ लगाए, विशेषकर चीन के साथ व्यापार युद्ध छेड़ा। उनका तर्क था कि चीन ने वर्षों तक अमेरिका के साथ अनुचित व्यापारिक व्यवहार किया और अमेरिकी उद्योगों को कमजोर किया। इस दृष्टिकोण के कारण वैश्विक व्यापार प्रणाली में तनाव बढ़ा और कई देशों को अपने आर्थिक संबंधों पर पुनर्विचार करना पड़ा। आलोचकों का कहना था कि इस प्रकार के कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ाते हैं और अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं को भी महँगी वस्तुओं के रूप में इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है।
विदेश नीति के सुरक्षा आयाम में भी ट्रंप ने परंपरागत अमेरिकी नीति से अलग रास्ता अपनाने की कोशिश की। उन्होंने कई बार यह कहा कि अमेरिका को उन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं का बोझ नहीं उठाना चाहिए जिनसे उसे सीधे लाभ नहीं मिलता। उदाहरण के लिए उन्होंने नाटो सहयोगियों से रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग की और यह संकेत दिया कि यदि सहयोगी देश अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाते तो अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं पर पुनर्विचार कर सकता है। इस प्रकार की बयानबाजी ने यूरोप और अन्य क्षेत्रों में चिंता पैदा की, क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी सुरक्षा व्यवस्था काफी हद तक अमेरिकी नेतृत्व पर आधारित रही है।
हालाँकि ट्रंप की नीतियों को केवल अनिश्चित या भावनात्मक कहना उचित नहीं होगा। उनके निर्णयों के पीछे एक रणनीतिक सोच भी है, भले ही वह पारंपरिक कूटनीतिक भाषा में व्यक्त न की गई हो। उनका मूल उद्देश्य यह प्रतीत होता है कि अमेरिका को उन परिस्थितियों से बाहर निकाला जाए जिनमें वह वैश्विक व्यवस्था का ‘प्रबंधक’ बनकर दूसरों की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता की जिम्मेदारी उठाता रहा है। ट्रंप के समर्थक तर्क देते हैं कि यह भूमिका अब अमेरिका के लिए अत्यधिक महंगी हो गई है और इसे बदलना आवश्यक है।
फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि क्या अमेरिका वास्तव में उस स्थिति में है जहाँ वह एकतरफा निर्णय लेकर वैश्विक परिणामों को नियंत्रित कर सके। आज की दुनिया में आर्थिक और राजनीतिक परस्पर निर्भरता इतनी गहरी हो चुकी है कि किसी भी बड़े निर्णय के प्रभाव अनेक स्तरों पर दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए ऊर्जा बाजार को ही देखें। यदि मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता है या किसी बड़े तेल उत्पादक देश के साथ संघर्ष की स्थिति बनती है, तो उसका प्रभाव केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता बल्कि दुनिया भर में तेल और गैस की कीमतों पर पड़ता है। इससे आम उपभोक्ताओं के दैनिक जीवन पर भी असर पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांत हमें बताते हैं कि किसी भी महाशक्ति के लिए अपनी शक्ति का सही आकलन करना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि कोई देश अपनी क्षमताओं को अधिक आँकता है तो वह ऐसे निर्णय ले सकता है जिनके परिणाम उसके नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं। इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। वियतनाम युद्ध से लेकर इराक और अफगानिस्तान तक, कई बार अमेरिका ने यह मान लिया कि वह सैन्य शक्ति के माध्यम से राजनीतिक परिवर्तन को आसानी से लागू कर सकता है। लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल साबित हुई।
आज की स्थिति में एक नया तत्व यह है कि अमेरिका अब भी अत्यंत शक्तिशाली है, लेकिन उसके सामने ऐसे प्रतिद्वंद्वी मौजूद हैं जो उसे पूरी तरह से चुनौती न सही, लेकिन सीमित कर सकते हैं। चीन आर्थिक शक्ति के रूप में तेजी से बढ़ा है, जबकि रूस जैसी शक्तियाँ क्षेत्रीय स्तर पर अपनी प्रभाव क्षमता बनाए हुए हैं। इसके अतिरिक्त कई मध्यम शक्तियाँ भी वैश्विक राजनीति में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इस बहुस्तरीय शक्ति संरचना में किसी एक देश के लिए पूर्ण प्रभुत्व स्थापित करना कठिन हो गया है।
ट्रंप की विदेश नीति को इसी संदर्भ में ‘काल्पनिक एकध्रुवीयता’ की मानसिकता कहा जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि अमेरिका अभी भी स्वयं को उस स्थिति में देखता है जहाँ वह वैश्विक घटनाओं को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है, जबकि वास्तविकता में उसकी शक्ति को अन्य कारकों द्वारा सीमित किया जा रहा है। इस मानसिकता के कारण कई बार अमेरिकी नेतृत्व ऐसे कदम उठाता है जिनके परिणाम अपेक्षित नहीं होते।
फिर भी यह कहना गलत होगा कि अमेरिका तेजी से पतन की ओर बढ़ रहा है। वास्तव में अमेरिकी अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता और सैन्य शक्ति अब भी अत्यंत मजबूत हैं। दुनिया की प्रमुख तकनीकी कंपनियाँ, अग्रणी विश्वविद्यालय और वैश्विक वित्तीय संस्थान अमेरिका में ही स्थित हैं। डॉलर अब भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त का प्रमुख माध्यम बना हुआ है। इसलिए अमेरिका के पास ऐसी संरचनात्मक शक्तियाँ मौजूद हैं जो उसे लंबे समय तक वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण बनाए रखेंगी।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी देश की राजनीतिक नेतृत्व प्रणाली अपने ही बनाए हुए मिथकों पर विश्वास करने लगती है। प्रत्येक राष्ट्र अपने इतिहास और शक्ति के बारे में कुछ कथाएँ गढ़ता है जो राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करती हैं। लेकिन यदि ये कथाएँ वास्तविकता से बहुत दूर चली जाएँ तो वे नीति-निर्माण को भ्रमित कर सकती हैं। अमेरिका में भी कभी-कभी यह धारणा दिखाई देती है कि वह किसी भी परिस्थिति में वैश्विक घटनाओं को नियंत्रित कर सकता है। जबकि आधुनिक विश्व व्यवस्था कहीं अधिक जटिल और परस्पर निर्भर है।
भविष्य के संदर्भ में यह संभव है कि ट्रंप या उनके जैसे अन्य नेता अमेरिकी विदेश नीति को और अधिक आक्रामक दिशा में ले जाने का प्रयास करें। वे मान सकते हैं कि जोखिम उठाए बिना अमेरिका अपने रणनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाएगा। ऐसी स्थिति में कुछ निर्णय सफल भी हो सकते हैं, क्योंकि अमेरिका के पास अब भी विशाल संसाधन और प्रभाव क्षमता है। लेकिन इसी के साथ यह भी संभावना है कि कुछ नीतियाँ गंभीर विफलताओं का कारण बनें।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का इतिहास हमें यह सिखाता है कि महान शक्तियाँ अक्सर अपनी शक्ति के चरम पर नहीं बल्कि उस समय गलतियाँ करती हैं जब उन्हें लगता है कि उनका प्रभुत्व चुनौती के बावजूद कायम है। यदि अमेरिका अपने वास्तविक सामर्थ्य और सीमाओं के बीच संतुलन स्थापित कर सके तो वह आने वाले दशकों में भी वैश्विक व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ बना रह सकता है। लेकिन यदि वह केवल अतीत की यादों के आधार पर वर्तमान को समझने की कोशिश करेगा, तो उसके सामने नई चुनौतियाँ खड़ी होंगी।
अंततः यह कहना उचित होगा कि अमेरिकी विदेश नीति का भविष्य केवल किसी एक नेता की व्यक्तिगत शैली से निर्धारित नहीं होगा। यह उस व्यापक संरचना पर निर्भर करेगा जिसमें वैश्विक शक्ति संतुलन, आर्थिक परस्पर निर्भरता और घरेलू राजनीति की प्रवृत्तियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। ट्रंप का दौर हमें यह याद दिलाता है कि जब कोई महाशक्ति स्वयं को पुनर्परिभाषित करने की प्रक्रिया से गुजरती है, तब उसके निर्णय पूरे विश्व पर प्रभाव डालते हैं।
इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि अमेरिका सहित सभी प्रमुख शक्तियाँ अंतरराष्ट्रीय संबंधों को शून्य-योग प्रतियोगिता के रूप में देखने के बजाय सहयोग और संतुलन के दृष्टिकोण से समझें। वैश्विक समस्याएँ चाहे वे ऊर्जा संकट हों, आर्थिक अस्थिरता हो या जलवायु परिवर्तन किसी एक देश के प्रयास से हल नहीं हो सकतीं। इन चुनौतियों का समाधान तभी संभव है जब बड़ी शक्तियाँ अपनी प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित रखते हुए साझा हितों की पहचान करें।
यदि अमेरिका इस वास्तविकता को स्वीकार कर लेता है और अपनी शक्ति का उपयोग विवेकपूर्ण तरीके से करता है, तो वह आने वाले समय में भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का एक स्थिर और प्रभावी केंद्र बना रह सकता है। लेकिन यदि वह स्वयं को अब भी अकेला निर्णायक शक्ति मानकर आगे बढ़ेगा, तो उसकी नीतियाँ कभी-कभी ऐसे परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं जिनसे न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया को अनिश्चितता और अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा। यही वह द्वंद्व है जो आज की वैश्विक राजनीति को परिभाषित कर रहा है और आने वाले वर्षों में भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय करेगा।
प्रशांत कुमार