20/03/2026
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*🌹جامعہ فاطمہ غزالیہ دہلی کی جانب سے کل امت مسلمہ کوعیدالفطر مبارک ہو🌹*
اللہ تعالی اپنے محبوب پاک،صاحب لولاک حضرت محمد مصطفی صلی اللہ علیہ وسلم کے صدقے اطفال جامعہ فاطمہ نسواں کے تمام خیرخواہ ان، ہمدردان، معاونین ومخلصین اور جملہ فرزندان توحید کو عید الفطر کی برکتوں، سعادت، نیکیوں اور خوشیوں سےمالامال فرمائے، عید الفطر کی بیکراں خوشیاں آپ سب کوبہت بہت مبارک۔۔۔۔۔۔۔
*اپنی ان خوشیوں میں ایرانی اور فلسطینی بھائیوں کو نہ بھولیں ان کی بقاء اور استقامت و کامیابی کے لیے ہمہ وقت رب کائنات سے دعاگو رہیں ۔۔۔۔۔۔*
آمین یا رب العالمین بجاہ النبی السید المرسلین ۔
From *JAMIA FATIMA GHAZALIYAH*.....
A very blissful Eid-ul-Fitr to you and your family. Eid Mubarak.
May peace, safety, good health and prosperity be yours. Eid Mubarak!
This Eid prayers for people around the world to have a smile on their faces.
*Do not forget Iranian and the Palestinian brothers in your happiness. Always pray to the الله عزوجل of the Universe for their survival, perseverance and success.*
Amen, the Lord of the worlds instead of the Prophet, the Messengers.
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TALIB-E-DUA:
*MOHAMMAD IRFAN ASHRAFI*
DIRECTOR: JAMIA FATIMA niswa,
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19/03/2026
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*सदक़ा-ए-फ़ित्र*
*पोस्ट-30*
*सदक़ा-ए-फ़ित्र बाद रमज़ान नमाजे ईद की अदाएगी से कब्ल दिया जाने वाला सदक़ा-ए-वाजिबा , सदक़ा-ए-फ़ित्र कहलाता है।*
*सदक़ा-ए-फ़ित्र कब ह़ुक्म हुवा ?*
*2 सि.हि. में रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हुए और उसी साल ईद से दो दिन पहले सदक़ा-ए-फ़ित्र का ह़ुक्म दिया गया।*
*मालिक-ए-निसाब मर्द अपनी तरफ़ से अपने छोटे बच्चों की तरफ़ से और अगर कोई मजनून ( या'नी पागल औलाद है चाहे फिर वह पागल औलाद बालिग ही क्यूं न हो तो उस की तरफ़ से भी सदक़ा-ए-फ़ित्र अदा करे हां अगर वह बच्चा या मजनून ख़ुद साहिब-ए-निसाब है तो फिर उस के माल में से फ़ित्रा अदा कर दें।*
*वुजूब का वक़्त: ईद के दिन सुब्ह़-ए-सादिक़ तुलूअ़ होते ही सदक़ाए-फ़ित्र वाजिब होता है , लिहाज़ा जो शख्स सुब्ह़ होने से पहले मर गया या ग़नी था फ़कीर हो गया या सुब्ह़ तुलूअ़ होने के बाद काफ़िर मुसल्मान हुवा या बच्चा पैदा हुवा या फ़क़ीर था ग़नी हो गया तो वाजिब न हुवा और अगर सुब्ह तुलूअ़ होने के बाद मरा या सुब्ह तुलूअ़ होने से पहले काफ़िर मुसल्मान हुवा या बच्चा पैदा हुवा या फ़कीर था ग़नी हो गया तो वाजिब है।*
*ज़कात और स-द-कए फ़ित्र में फर्क़: ज़कात में साल का गुज़रना , आक़िल बालिग और.निसाब-ए-नामी ( या'नी उस में बढ़ने की सलाहिय्यत ) होना शर्त है जब कि सदक़ा-ए-फ़ित्र में यह शराइत नहीं हैं। चुनान्चे अगर घर में ज़ाइद सामान हो तो माल-ए-नामी न होने के बा वुजूद अगर उस की क़ीमत निसाब को पहुंचती है तो उस के मालिक पर सदक़ा-ए-फ़ित्र वाजिब हो जाएगा ज़कात और सदक़ा-ए-फ़ित्र के निसाब में फ़र्क कैफ़िय्यत के ए'तिबार से है..✍️*
*📚फैजाने ज़कात सफ़ह़ 111,112,114*
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18/03/2026
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*सदक़ा-ए-फ़ित्र*
पोस्ट-29
*सदक़ा-ए-फ़ित्र बाद रमज़ान नमाजे ईद की अदाएगी से कब्ल दिया जाने वाला सदक़ा-ए-वाजिबा , सदक़ा-ए-फ़ित्र कहलाता है। खलीले मिल्लत हज़रत अल्लामा मुफ्ती मुहम्मद खलील खान बरकाती رحمۃاللہ علیہ फ़रमाते हैं : " सदक़ा-ए-फ़ित्र दर अस्ल रमजानुल मुबारक के रोज़ों का सदक़ा है ताकि लग़ू और बेहू़दा कामों से रोज़े की तह़ारत हो जाए और साथ ही ग़रीबों , नादारों की ईद का सामान भी और रोज़ों से हासिल होने वाली नेमतों का शुक्रिया भी ।*
📚( हमारा इस्लाम , हिस्सा :7 , स . 87 )
*स-द-कए फ़ित्र की फ़ज़ीलत की 4 रिवायात हैं:*
*( 1 ) अल्लाह के रसूल ﷺ से इस आयत-ए-करीमा के बारे में सुवाल किया गया तरजमा-ए-कन्जुल ईमान : बेशक मुराद को पहुंचा जो सुथरा हुवा और अपने रब का नाम ले कर नमाज़ पढ़ी।*
*तो आप ﷺ ने फ़रमाया : “ येह आयत सदक़ाए-फ़ित्र के बारे में नाज़िल हुई।*
*( 2 ) सरकार-ए-मदीना-ए-मुनव्वरह , सरदार-ए-मक्का-ए-मुकर्रमा ﷺ का फ़रमान-ए-बरकत निशान है : “ जो तुम्हारे मालदार हैं अल्लाह तआला ( सदका-ए-फ़ित्र देने की वजह से ) उन्हें पाक फ़रमा देगा और जो तुम्हारे ग़रीब हैं तो अल्लाह उन्हें इस से भी ज़्यादा देगा।*
*( 3 ) हज़रते इब्ने उमर رضی اللہ تعالی عنہ फ़रमाते हैं ,कि " सदक़ा-ए-फ़ित्र अदा करने में तीन फ़ज़ीलतें हैं : पहली रोजे का क़बूल होना , दूसरी सक्राते मौत में आसानी और तीसरी अज़ाबे क़ब्र से नजात।*
*( 4 ) हज़रते सय्यिदुना अबू ख़लदह رضی اللہ تعالی عنہ कहते हैं कि : मैं हज़रते सय्यिदुना अबुल आलिया رضی اللہ تعالی عنہ की ख़िदमत में हाज़िर हुवा । उन्हों ने फ़रमाया कि कल जब तुम ईदगाह जाओ , तो मुझ से मिलते जाना जब मैं गया तो मुझ से फ़रमाया : ' क्या तुम ने कुछ खाया ? " मैं ने कहा : हां। " फ़रमाया क्या तुम नहा चुके हो मैं ने कहा : हां फ़रमाया : " स-द-कए फ़ित्र अदा कर चुके हो ? " मैं ने कहा : हां स-द-कए फ़ित्र अदा कर दिया है। फ़रमाने लगे : मैं ने तुम्हें इसी लिये बुलाया था फिर आप ने यह आयत-ए-करीमा*
*قَدْاَفْلَحَ مَنْتَزَکّٰی()وَذَکَرَاسْمَ رَبِِّهٖ فَصَلّٰی()*
*तिलावत की " अहल-ए-मदीना सदक़ा-ए-फ़ित्र और पानी पिलाने से अफ़्ज़ल कोई सदक़ा नहीं जानते थे*
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17/03/2026
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*💰 मसाइले ज़क़ात 💰*
पोस्ट -28
*अफज़ल है कि ज़कात पहले अपने अज़ीज़ हाजतमंदों को दें दिल में नियत ज़कात हो और उन्हें तोहफा या क़र्ज़ कहकर भी देंगे तो ज़कात अदा हो जायेगी।*
📚बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 24📚
*अफज़ल है कि ज़कात व फितरे की रक़म जिसको भी दें तो कम से कम इतना दें कि उसे उस दिन किसी और से सवाल की हाजत ना पड़े।*
📚बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 66📚
*हदीस में है कि रब तआला उसके सदक़े को क़ुबूल नहीं करता जिसके रिश्तेदार मोहताज हो और वो दूसरों पर खर्च करे।*
📚 बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 65📚
*तंदरुस्त कमाने वाले शख्स को अगर वो साहिबे निसाब ना हो तो उसे ज़कात दे सकते हैं पर उसे खुद मांगना जायज़ नहीं।*
📚बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 61📚
*किसी पर 1 लाख रुपए क़र्ज़ हैं उसको कहीं से 1 लाख रुपए मिल गए अगर वो अपना क़र्ज़ नहीं चुकाता तो बुरा करता है मगर अब भी उसपर ज़कात फर्ज़ नहीं है।*
📚 बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 15📚
*जिसके पास ख़ुद का मकान, दुकान, खेत या खाने का गल्ला साल भर के लिए मौजूद हो मगर वो साहिबे निसाब ना हो तो उसे ज़कात व फ़ित्रा दे सकते हैं ।*
📚बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 62📚
*काफिर व बदमज़हब को ज़कात फ़ित्रा हदिया तोहफ़ा कुछ भी देना नाजायज़ है अगर उनको ज़क़ात व फ़ितरे की रक़म दी तो अदा ना होगी।*
📚बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 63-65📚
*पालिसी या F.D. अपने नाम है तो ज़कात फर्ज़ है लेकिन अपनी नाबालिग औलाद को देकर उनको मालिक बना दिया या उनके नाम से फिक्स किया तो ज़कात नहीं।*
📚बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 11📚
*ज़कात व फित्रा बनी हाशिम यानि कि सय्यदों को नहीं दे सकते।*
📚 बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 63📚
*अगर कोई सय्यद साहब परेशान हाल हैं तो उनकी मदद करना मुसलमान पर ज़रूरी है उनकी मदद अपने असली माल से करें ज़कात व फित्रा से नहीं।*
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16/03/2026
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*💰 मसाइले ज़क़ात 💰*
पोस्ट-27
*ज़कात हर मालिक-ए-निसाब पर फ़र्ज़ है।*
*● दुल्हन को मैके से जो ज़ेवरात मिलते हैं उन की ज़कात दुल्हन पर फ़र्ज़ है। वह ख़ुद अदा करे, या उस की इजाज़त से उसका शौहर या बाप, भाई वग़ैरह अदा कर दें।*
*● औरतों के पास जो ज़ेवर होते हैं उनकी मालिक औरत खुद है तो औरत पर ज़कात फर्ज़ है शौहर पर उसकी ज़कात नहीं शौहर चाहे तो दे और चाहे ना दे उस पर कुछ इलज़ाम नहीं, अगर शौहर अपनी बीवी के ज़ेवर की ज़कात नहीं देता तो औरत जितनी रकम ज़कात की बनती है उतने का ज़ेवर बेचकर अदा करे।*
📚बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 62📚
📚 क्या आप जानते हैं, सफह 391📚
*● ज़कात 2.5% यानि 100 रुपए में 2.5 रुपए है।*
*● बाप अपनी बालिग़ औलाद की तरफ से या शौहर बीवी की तरफ से ज़कात या सदक़ये फित्र देना चाहे तो बगैर उनकी इजाज़त के नहीं दे सकता।*
📚फतावा अफज़लुल मदारिस, सफह 88📚
*● हाजते असलिया यानि रहने का घर, पहनने के कपड़े, किताबें, सफ़र के लिए सवारियां, घरेलु सामान पर ज़कात फर्ज़ नहीं है।*
📚 फतावा आलमगीरी, जिल्द 1, सफह 160📚
*● एसी, फ्रिज, बाईक, फोर व्हीलर ये सब हाजते असलिया में दाखिल हैं मगर टी० वी० हाजते असलिया में दाखिल नही है इसलिए टी० वी० पर ज़कात फर्ज़ है, उसी तरह किसी के पास कई मकान हैं और वो सब उसके खुद के रहने के लिए है तो ज़कात नहीं लेकिन अगर किसी मकान में किराएदार को बसा दिया और उसका किराया इतना है कि ये साहिबे निसाब को पहुंच जाए तो किराये पर ज़कात फर्ज़ होगी, उसी तरह दुकान पर तो ज़कात नहीं है मगर उसमे भरे हुए माल की ज़कात है लिहाज़ा सब एहतियात से जोड़कर ज़कात अदा करी जाये।*
*● सगे भाई-बहन, चाचा, मामू, खाला, फूफी, सास-ससुर, बहु-दामाद या सौतेले माँ-बाप को ज़क़ात की रक़म दी जा सकती है।*
📚बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 60-64📚
*● ज़कात, फित्रा या कफ्फारह का रुपया अपने असली मां-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी, बेटा-बेटी, पोता-पोती, नवासा-नवासी को नहीं दे सकते।*
📚बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 60📚
*● कफ़न दफ़न में, तामीरे मस्जिद में, मीलादे पाक की महफ़िल में ज़कात का रुपया खर्च नहीं कर सकते किया तो ज़कात अदा नहीं होगी।*
📚बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 24📚
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पोस्ट-26
*ज़कात हर मालिक-ए-निसाब पर फ़र्ज़ है।*
*● जो शख़्स 653 ग्राम 184 मिली ग्राम चाँदी या उसके दाम का मालिक हो वह मालिक-ए-निसाब है। मौजूदा वक़्त में दिल्ली सर्राफ़ा बाज़ार के एतिबार से उस का दाम लगभग 1,80,000 (एक लाख अस्सी हज़ार) रुपये है। मुख़्तलिफ़ शहरों में चाँदी के रेट में फ़र्क़ हो सकता है, इसलिए अपने शहर के सर्राफ़ा बाज़ार के एतिबार से निसाब का दाम मालूम कर लें।*
*जो शख़्स इतने या ज़्यादा रुपये का मालिक हो वह ढाई फ़ीसद (2.5%) के हिसाब से ज़कात अदा करे।*
*● जिस के पास चाँदी न हो, सिर्फ़ सोना और रुपये हों, वह सोने की क़ीमत के रुपये अपने रुपयों से मिला कर देखें। निसाब पूरा हो तो ज़कात दे, वरना माफ़ है।*
*● सोने का निसाब साढ़े सात तोले हैं, जिस का वज़न आज के हिसाब से 87 ग्राम 479 मिली ग्राम है। जिस के पास इतना या उस से ज़्यादा सोना हो उस पर सोने की ज़कात फ़र्ज़ है। और जिस के पास इस से कम सोना हो, वह सोना मौजूद सोने की क़ीमत के रुपये अपने रुपयों से मिला ले। कुल क़ीमत 1,80,000 रुपये या ज़्यादा हो तो ज़कात दे, कम हो तो माफ़ है।*
*● सर्राफ़ा बाज़ार में सोना कई शक्लों में मौजूद होता है। उन के रेट में भी काफ़ी फ़र्क़ होता है। ख़ालिस सोना 24 कैरेट (carat) का सोना कहते हैं। आम तौर पर सोने के ज़ेवरात 22 कैरेट या 18 कैरेट के होते हैं। जिस कैरेट का सोना होगा उसी कैरेट के एतिबार से ज़ेवरात के कुल वज़न पर ज़कात वाजिब होगी। ज़ेवरात के वज़न में कोई कमी नहीं की जाएगी।*
*● हमारे शरीअत में है:*
*"अगर सोने चाँदी में खोट हो और ग़ालिब सोना चाँदी है तो सोना चाँदी क़रार दी जाएगी और कुल पर ज़कात वाजिब है।"*
*● और 22 कैरेट, 18 कैरेट वाले सोने के ज़ेवरात में दरअसल आमेज़िश होती है, जो यक़ीनन खोट सोना है, जिस में ग़ालिब सोना होता है, इसलिए कुल वज़न पर ज़कात अदा की जाएगी।*
*● जो रुपये अपने खाते में हों, या बैंक अकाउंट में फ़िक्स हों, या दूसरे के ज़िम्मे क़र्ज़ या दीन हों, या दुकान, मकान के मालिक के पास ज़मानत के तौर पर जमा हों, उन की ज़कात भी वाजिब है। जिस ने रुपये दिए हैं या जमा किए हैं वह उन की ज़कात अदा करे।*
*● जो ज़मीन फ़रोख़्त करने के लिए खरीदी हो वह दौलत-ए-तिजारत है। हर साल बाज़ार भाव से उस की जो क़ीमत है उस की ज़कात अदा करना फ़र्ज़ है।*
*● हाँ रहने का मकान और पहनने के कपड़ों पर ज़कात नहीं है।*
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*📝रेडियो, मोबाइल, टेलिफोन की ख़बर पर, बग़ैर शरई सुबूत के, चाँद मान लेना*
✍️मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी
पोस्ट- 25
*आजकल काफी लोग सिर्फ रेडियो, मोबाइल, टेलीफोन की ख़बर पर बग़ैर चांद देखे या बग़ैर शरई सुबूत के ईद मना लेते हैं या रमज़ान शरीफ़ का चांद हो तो रोज़ा रख लेते हैं....! यह गलत है। अगर आसमान पर धुंध ग़ुबार या बादल हो तो रमज़ान के चांद के लिए एक, और ईद के चांद के लिए दो बा'शरा (दाढ़ी वाले) दीनदार भले मर्दों की गवाही ज़रूरी है, आसमान साफ हो तो बहुत से लोगों का चांद देखना ज़रूरी है। एक दो की गवाही काफी नहीं। महज़ रेडियो, मोबाइल, टेलीविज़न और टेलीफोन की ख़बर पर न रोज़ा रखें न ईद मनाए, जब तक के आप की बस्ती में शरई तौर पर चांद का सबूत ना हो या दूसरी बस्ती में चांद देखा गया हो और शरई तौर पर उसकी इत्तिला आप तक ना आ गई हो। जो लोग रेडियो और टेलीफोन वगैरह की ख़बरों पर ईद मना लेते हैं उनसे पूछा जाए कि अगर रेडियो तार और टेलीफोन पर ईद मनाई जाए तो आज कल पूरी दुनिया में एक ही दिन ईद होना चाहिए और हमेशा ईद का चांद 29 दिन का ही होना चाहिए क्योंकि दुनिया में ईद का चांद कहीं ना कहीं 29 का ज़रूर हर साल मान लिया जाता है और आज कल पूरी दुनिया में उसकी ख़बर हो जाना बज़रिया ए रेडियो, टेलीविज़न टेलीफोन एक आम और आसान सी बात है तो रोज़े कभी 30 हो ही नहीं सकते।*
*सऊदी अरब में भी उमूमन हिंदुस्तान से हमेशा 1 दिन पहले ईद मनाई जाती है तो रेडियो और टेलीविज़न पर अक़ीदा रखने वाले वहां के ऐलान पर ईद क्यों नहीं मनाते ? दिल्ली के ऐलान पर क्यों मनाते हैं ? इस्लामाबाद, कराची, लाहौर, ढाका, और रंगून, की इत्तलाआत क्यों नज़रअंदाज़ कर दी जाती है ? अगर कोई यह कहे कि वह दूसरे मुल्क में है तो हम पूछते हैं कि यह मुल्कों की तक़्सीम और बटवारे क्या क़ुरआन और हदीस की रू (तरफ़) से है ? क्या ख़ुदा और रसूल ने कर दिए हैं ? या आजकल की मौजूदा सियासत और अक़्वामे मुत्ताहिदा की तरफ़ से है ? और अक़्वामे मुत्ताहिदा की तक़्सीम की.....शरीयत ए इस्लामिया में क्या कोई हैसियत है ? यह भी हो सकता है कि कोई क़ोमी हुक्मरां ख़ुदाए तआला पैदा फ़रमाए और वह उन सब मुल्कों को फतह करके सब को एक ही मुल्क बना डाले,, और अगर जवाबन कोई कहे कि मुल्क दूसरा और दूरी ज्यादा होने की बिना पर मुत्तला अलग-अलग है तो ख्याल रहे कि इख़्तिलाफ़ ए मुतालेअ मोअतबर नहीं। और अगर बिल्फ़र्ज़ मान भी लीजिए तो हिंदुस्तान के वह शहर और इलाके जो अपने मुल्क के शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, और कोलकाता, वगैरा से दूर है और दूसरे मुल्कों जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, बर्मा, चीन, तिब्बत, नेपाल, लंका, के बाअज़ शहरों से क़रीब है तो उन्हें आप चांद के मामले में कहां की पैरवी करने का मशवरा देंगे ? अपने मुल्क की ? या जिन मुल्कों और शहरों से वह करीब है वहां की ? और वह मुत्तलेअ के बारे में दिल्ली, मुंबई, और कोलकाता, की मुआफ़िक़त करेंगे या दूसरे मुल्कों के अपने से क़रीब इलाक़ों की।*
📚ग़लत फहमियां और उनकी इस्लाह सफ़हा- 68, 69📚
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*📝एतिकाफ़ में चुप रहना*
✍️मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी
पोस्ट- 24
*कुछ लोग एतिकाफ़ में चुपचाप बैठे रहने को ज़रूरी समझते हैं हांलाकि एतिकाफ़ में चुप रहना न ज़रूरी, न महज़ ख़ामोशी कोई इबादत। बल्कि चुप रहने को सवाब की बात समझना मकरूहे तहरीमी है।*
📚 (बहारे शरीअत, हिस्सा-5, सफ़हा-153)📚
*अलबत्ता बुरी बातों में चुप रहना ज़रूरी है। ख़ुलासा ये है कि एतिकाफ़ की हालत में क़ुरआन मज़ीद की तिलावत करें, तस्बीह व दुरूद का विर्द रखें, नफ़्ल पढ़े, दीनी किताबों का मुतालआ करें, दीन की बातें सीखने और सिखाने में कोई हरज नहीं बल्कि इबादत है। ज़रूरत के वक़्त कोई दुनिया की जाइज़ बात भी की जा सकती है। इससे एतिकाफ फ़ासिद नहीं होता। हाँ ज़्यादा दुनियावी बातचीत से एतिकाफ बेनूर हो जाता है और सवाब कम हो जाता है।*
📚 ग़लत फ़हमियाँ और उनकी इस्लाह, सफ़हा- 67📚
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*📚रमज़ान का तोहफ़ा*
✍️मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी
*✔️स्पेशल पोस्ट*
*📝अलविदा का बयान?*
*💫जुमअतुल-वदाअ रमज़ान शरीफ़ के आख़िरी जुमअ को कहने लगे हैं। यह कोई इस्लामी त्योहार नहीं है। रमज़ान के जुमओं की तरह यह भी सिर्फ़ एक जुमअ है। कुर्आन व हदीस में इसकी अलग से कोई ख़ुसूसियत या फज़ीलत नहीं आई है। चूंकि यह रमज़ान शरीफ़ का आख़िरी जुमअ है। अलविदा के माना रूख्सती के हैं। यानि अब रमज़ान का महीना रूख़्सत होने वाला है, इसलिए इसको जुमअतुल-वदाअ कहने लगे। आज के हालात को सामने रखते हुए यह बेहतर है कि इस दिन कोई ऐसा काम या ऐसी कोई बात न की जाए जिससे लोग इस जुमले की अलग से कोई ख़ुसूसियत समझें। आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खाँ रहमतुल्लाह अलैह ने भी फ़तावा रज़विया जदीद, जिल्द 8, पेज 455 पर यही लिखा है।*
*अलविदा न कहकर इसको सिर्फ़ जुमअ का नाम ही दिया जाए तो ज़्यादा अच्छा है। और इसके ख़ुतबे में वही पढ़ना फ़र्ज, वाजिब या सुन्नत है जो दूसरे जुमओं के ख़ुतबों में है। किसी साल ऐसा होता है। कि रमज़ान के खुतबों में है। किसी साल ऐसा होता है कि रमज़ान की 30 तारीख़ जुमअ के दिन पड़ रही हो तो काफी लोग यह पूछते हैं कि अलविदा कौन-सा जुमअ होगा? क्योंकि अगर चांद 29 को हो गया तो रमज़ान से आगे हो जाएगा। इस तरह का सवाल पूछने वाले सब अनपढ़ और बे-इल्म लोग होते हैं। मैं कहता हूँ कि जब इस जुमअ की कोई ख़ुसूसियत इस्लाम में है ही नहीं तो इसके बारे में पूछने की क्या ज़रूरत है?*
📚रमज़ान का तोहफ़ा सफ़हा 40📚
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*📚रमज़ान का तोहफ़ा*
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पोस्ट- 23
*📝शबे क़द्र का बयान?*
*💫शबे क़द्र बड़ी फज़ीलत वाली रात है। क़ुर्आन करीम में इस एक रात की इबादत को एक हज़ीर महीनों की इबादत से बढ़कर बताया गया है।*
*ज़्यादा सही बात यह है कि रमज़ान शरीफ़ के आख़िरी दस दिनों में 21,23,25,27 और 29वीं रातों में से वह एक रात होती है। लिहाज़ा शबे क़द्र की फज़ीलत हासिल करने के लिए काफी मुसलमान भाई इन सारी रातों में रात भर इबादत करते हैं।*
*आजकल शबे क़द्र और शबे बरात में भी बहुत तेज़ और बहुत दूर तक आवाज़ फेंकने वाले माइकरोफोन लगाकर सारी सारी रात तकरीरें और नज़्में पढ़ने का रिवाज हो गया है। यह सब भी मुनासिब नहीं है और मुझको इसमें कुछ भलाई नज़र नहीं आती कि न खुद ज़िक्रो इबादत व तिलावत करो न दूसरों को करने दो। अगर हो भी तो बगैर माइक के हो या घंटे डेढ़ घंटे प्रोग्राम चलाकर एकदम ख़ामोशी कर दी जाए और लोगों को नफ़्ल नमाज़ व क़ुर्आन करीम पढ़ने का भी मौका दिया जाए और आजकल के अकसर मुक़र्रिरों की तक़रीरें और शाइरों की शाइरी में कोई नेकी नजऱ नहीं आती और न ही उन्हें दीन सीखने सिखाने का श़ग़्ल कहा जा सकता है सिवाए जज़्बात व जोश और तरह तरह के अन्दाज़ और तरज़ों के कुछ हासिल नहीं होता। और आज के दौर में इबादत के लिए भी लाउडस्पीकर ज़रूरी सा हो गया है यह बात क़ाबिले अफ्सोस है। और जो लोग इन रातों में सारी रात इबादत न कर सकें उन्हें चाहिये कि कुछ देर नफ़िल नमाज़ और क़ुर्आन करीम की तिलावत में गुज़ार लें।*
📚रमज़ान का तोहफ़ा सफ़हा 33,34📚
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पोस्ट- 22
*📝ईद के दिन शैतानी तोहफे?*
*💫रमज़ान का महीना ख़त्म होने को है ईद क़रीब आ रही है। शहर में एलान हो रहा है दीवारों पर पोस्टर चिपकायें जा रहे हैं ईद के दिन का ख़ास तोहफ़ा, फलानी स्पेशल पिक्चर फलां हाल में लग रही है बुकिंग जारी है जल्दी कीजिये और हजारों मुसलमान लड़के लड़कियां नमाज़ होते ही थियेटर और सिनेमा हालों में घुस गये या घरों में टी.बी. खोलकर बैठ गये ये ईद मनाई जा रही है। लगता है कि जैसे अल्लाह तआला को धोखा देने की कोशिश की जा रही है लेकिन यह अल्लाह तआला को धोखा क्या देंगे यह खुद ही बड़े धोखे में है और शैतान का कहना मानने वाले कभी फायदे में नहीं रहते यह ख़ुदाई दीन के साथ खिलवाड़ करने वाले यह इस्लामी त्योहारों की आड़ में फिल्में देखने और दिखाने वाले ख़ुदाई पकड़ से निकल नहीं सकेंगे और मौत से पंजा छुड़ाकर भाग नहीं पायेंगे। अब जो कर सको वह कर लो ख़ूब अच्छी तरह जान लो अल्लाह तआला को रूलाते देर नहीं लगती पलक झपकने में कुछ का कुछ हो जाता है। ज़रा सी देर में आँखों के सामने अन्धेरे छा जाते हैं जहाँ क़हक़हे और ठठ्ठे लग रहे थे वहाँ चींखे निकल जाती हैं और अल्लाह तआला जो चाहे वह कर सकता है उसकी पकड़ सख्त है।*
📚रमज़ान का तोहफ़ा सफ़हा 39,40📚
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