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Baljeet Singh
History Knowledge and Teaching
17/12/2016
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02/12/2014
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Shiksha ka Adhikar
शिक्षा किसी भी व्यक्ति एवं समाज के समग्र विकास तथा सशक्तीकरण के लिए आधारभूत मानव मौलिक अधिकार है। यूनेस्को की शिक्षा के लिए वैश्विक मॉनिटरिंग रिपोर्ट 2010(पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है) के मुताबिक, लगभग 135 देशों ने अपने संविधान में शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है तथा मुफ्त एवं भेदभाव रहित शिक्षा सबको देने का प्रावधान किया है। भारत ने 1950 में 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा देने के लिए संविधान में प्रतिबद्धता का प्रावधान किया था। इसे अनुच्छेद 45 के तहत राज्यों के नीति निर्देशक सिद्धातों में शामिल किया गया है।
12 दिसंबर 2002 को संविधान में 86वां संशोधन किया गया और इसके अनुच्छेद 21ए(पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है) को संशोधित करके शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया है।
बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिनियम(पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है) 1 अप्रैल 2010 को पूर्ण रूप से लागू हुआ। इस अधिनियम के तहत छह से लेकर चौदह वर्ष के सभी बच्चों के लिए शिक्षा को पूर्णतः मुफ्त एवं अनिवार्य कर दिया गया है। अब यह केंद्र तथा राज्यों के लिए कानूनी बाध्यता है कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा सभी को सुलभ हो सके।
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं
छह से चौदह वर्ष तक के हर बच्चे के लिए नजदीकी विद्यालय में मुफ्त आधारभूत शिक्षा अनिवार्य है।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बच्चों से किसी भी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और न ही उन्हें शुल्क अथवा किसी खर्च की वजह से आधारभूत शिक्षा लेने से रोका जा सकेगा।
यदि छह के अधिक उम्र का कोई भी बच्चा किन्हीं कारणों से विद्यालय नहीं जा पाता है तो उसे शिक्षा के लिए उसकी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में प्रवेश दिलवाया जाएगा।
इस अधिनियम के प्रावधानों को कियान्वित करने के लिए संबंधित सरकार तथा स्थानीय प्रशासन को यदि आवश्यक हुआ तो विद्यालय भी खोलना होगा। अधिनियम के तहत यदि किसी क्षेत्र में विद्यालय नहीं है तो वहां पर तीन वर्षों की तय अवधि में विद्यालय का निर्माण करवाया जाना आवश्यक है।
इस अधिनियम के प्रावधानों को अमल में लाने की जिम्मेदारी केंद्र एवं राज्य सरकार, दोनों की है, तथा इसके लिए होने वाल धन खर्च भी इनकी समवर्ती जिम्मेदारी रहेगी।
यह अधिनियम माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा तथा बच्चों तक शिक्षा को पहुंचाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इस अधिनियम का सर्वाधिक लाभ श्रमिकों के बच्चे, बाल मजदूर, प्रवासी बच्चे, विशेष आवश्यकता वाले बच्चे या फिर ऐसे बच्चे जो सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक, भाषाई अथवा लिंग कारकों की वजह से शिक्षा से वंचित बच्चों को मिलेगा। इस अधिनियम के कार्यान्वयन के साथ ही यह उम्मीद भी है कि इससे विद्यालय छोड़ने वाले तथा विद्यालय न जाने वाले बच्चों को अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षकों के माध्यम से दी जा सकेगी।
भारत सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम(पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है) बनाने का कदम ऐतिहासिक कहा जा सकता है तथा इससे यह भी तय हो गया है कि हमारा देश सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (एमजीडी) तथा सभी के लिए शिक्षा (ईएफए) के नजदीक पहुंच रहा है।
1. भारत में “शिक्षा” को किस सूची में शामिल किया गया है ?
(1) संघ सूची
(2) राज्य सूची
(3) समवर्ती सूची
(4) यू. जी. सी. सूची
Answer – समवर्ती सूची
2. फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान किस राज्य में है ?
(1) जम्मू कश्मीर
(2) हिमाचल प्रदेश
(3) उत्तराखंड
(4) केरल
Answer – उत्तराखंड
3. ओलंपिक खेल 2016 का आयोजन किस देश में किया जायेगा ?
(1) चीन
(2) ऑस्ट्रेलिया
(3) ब्राजील
(4) भारत
Answer – ब्राजील
4. भारत में कर्क रेखा कितने राज्यों से होकर गुजरती है ?
(1) 5
(2) 6
(3) 7
(4) 8
Answer – 8
5. राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् के रचयिता कौन थे ?
(1) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(2) बंकिम चन्द्र चटर्जी
(3) शरत चंद्र चटर्जी
(4) सरोजिनी नायडू
Answer – बंकिम चन्द्र चटर्जी
6. किस देश का राष्ट्रीय खेल ‘शतरंज’ है ?
(1) फ्रांस
(2) रूस
(3) सूडान
(4) यू एस ए
Answer – रूस
7. मेंढक के ह्रदय में कितने कक्ष होते है ?
(1) 1
(2) 2
(3) 3
(4) 4
Answer – 3
Q8. “जिन्ना हाउस” किस शहर में स्थित है ?
(1) दिल्ली
(2) लखनऊ
(3) हैदराबाद
(4) मुम्बई
Ans. (4) मुम्बई
" मानव जीवन में हिंदी का महत्व "
मानव जीवन से तात्पर्य सम्पूर्ण जीवन है और मानव जीवन में हिंदी का विशेष महत्व है। हिंदी का महत्व जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में है, विशेषकर भारतीयों के जीवन में इसका महत्व बहुत प्रभावी तथा अधिक है। ये हमारी मातृ-भाषा है। हिंदी व्यक्ति को मानव जीवन के शास्वत मूल्यों से परिचित कराती है। तुलसीदास द्वारा रचित रामायण के प्रत्येक पृष्ट में मानव जीवन को उसके उच्चतम स्तर पर पहुँचाने के लिए प्रभावी व्यवहार तथा उच्च आदर्शवादी सन्देश हैं जो हम तक पहुंचते हैं। हिंदी के महत्व को मुस्लिम शासन में अकबर ने भी स्वीकार किया था इसलिए उसने भी हिंदी भाषा पर अधिकार वाले पंडित बीरबल को अपना प्रधानमंत्री बनाया और अनेकों अवसरों पर उनसे परामर्श करके निर्णय लिए। आज संसार के २०० विश्व विद्यालयों में हिंदी का अध्ययन हो रहा है, हिंदी के महत्व को वहाँ भी माना जा रहा है।
हिंदी भाषा के अनुसार मानव जीवन का आधार मानवता है। जीवन का संबंध जीव से है समस्त जीव समान है। प्रत्येक जीव में चार विशेषतायें समान रूप से पायी जाती है - भूख,भय,निद्रा और मैथुन। ये हो सकता है कि हाथी में भूख(आहार) की, सर्प में मैथुन की, मानव में निद्रा की व खरगोश में भय की अधिकता पायी जा सकती है,परन्तु समस्त जीवों में ये चारों विशेषताएं अवश्य पायी जाती है। मानव में एक अन्य विशेषता पायी जाती है वह है - बुध्धि अर्थात सीखे हुए ज्ञान का जीवन में उपयोगी प्रयोग। हिंदी साहित्य का सतत अध्ययन सामान्य मनुष्य को भी को मनसा-वाचा-कर्मणा के ज्ञान से परिचित कराते हुए उसे अपना वजूद सिद्ध करने के साथ-साथ उसे स्वर्ग प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर करता है।
हिंदी भाषा मानव को सहृदय बनने तथा सामाजिक मूल्यों से परिचित कराने में मुख्य सहयोगी बनती है। जो सुख माँ कहने में है वह मम्मी कहने में कहाँ ? मिस्री सी घोल देने वाले चाचा सम्बोधन का सुख अंकल में कहाँ है ? कजन तो अंग्रेजियत ने गढा हमारे यहाँ तो सभी भाई-बहन ही थे। हिंदी साहित्य की सरिता से ही हम संबंधों को ठीक प्रकार से समझ सकते हैं। रामायण हर संबंध को ठीक से निर्वाह करना सिखाती है। यह एक सामान्य मनुष्य को मर्यादापुरुष बनने की प्रेरणा प्रदान करती है। आज समाचार-पत्रों में पति-पत्नी के संबंध विघटन होने के अनेकों समाचार पढ़ने को मिलते हैं। हिंदी साहित्य में पति-पत्नी संबंध की तुलना सरिता के जल-प्रवाह से की है, जैसे सरिता में जल प्रवाह के बिना सरिता नहीं ठीक वैसे पति-पत्नी संबंध है एक के बिना दूसरे का वजूद नहीं है। अंग्रेजियत ने डिवोर्स दिया है, एक दूसरे के प्रति समर्पण तो हिंदी ने ही सिखाया है। अंग्रेजी भाषा डॉक्टर , इंजिनियर व प्रशासनिक अधिकारी आदि तो बना सकती है परन्तु मानव बनने के लिए हिंदी का अध्ययन करना होगा।
हिंदी साहित्य मनुष्य को मानव बनने में सहयोगी की भूमिका भी निभाता है। हिंदी भाषा तथा साहित्य मानव को जीवन के कुछ मूल-भूत सदगुणों से ओत-प्रोत करती है, जिसमे है -
१. कृतज्ञता :- साहित्य उसे प्रकृति, राष्ट्र, समाज, अभिभावकों तथा गुरुजनों के प्रति कृतज्ञ बनाने में मार्ग दर्शन करता है। हिंदी भाषा के प्रति आस्था जीवन के हर क्षेत्र में कृतज्ञता सिखाती है।
२. सहृदयता :-अंग्रेजी में Man तथा Human दो शब्द है, पहला मनुष्य तथा दूसरे का अर्थ मानव है। मानव बनने के लिए पहला गुण सहृदयता है। जल की प्रकृति नीचे की ओर जाना है जबकि अग्नि का गुण ऊपर की ओर उठना है, अर्थात अग्नि की भांति मानवीय गुण है ऊपर की ओर उठना। मनुष्य से मानव बनने के लिए उसे झुकना होगा। सीढ़ियों पर चढ़ते हुए झुकना पड़ता है। फल वाले तरु भी फल लगने पर झुक जाते हैं। जब मानवीय गुण आयेंगें तो मनुष्य मानव बन झुकना आरम्भ करता है।
३. विनम्रता :- मानव का तीसरा गुण विनम्रता है। दूसरे के प्रति सदा विनम्रता प्रकट करना। किसी के प्रति व्यवहार करने से पूर्व स्वंय को उसके स्थान पर रखकर सोच- समझ कर निर्णय लेना विनम्रता की ही पहचान है।
४. व्यवहार :- मानव को सैदव प्रभावपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। पारिवारिक व सामाजिक विघटन का आधार प्रभावपूर्ण व्यवहार का आभाव ही है। जब हृदय, मस्तिष्क तथा कमेंर्न्द्रियों का आपस में सुसमायोजन होगा, तो वे एक-दूसरे के प्रस्ताव स्वीकार कर सकेंगें, जिससे मानव व्यवहार प्रभावी बन जायेगा। जिसके फलस्वरूप व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज सुधरेगा तो राष्ट्र स्वयं सुधर जायेगा। व्यक्ति स्वयं के प्रभाव के उदाहरण से दूसरों को सुधार सकता। इसलिए सर्वप्रथम हमें स्वयं को सुधारना होगा।
मानवीय जीवन जीने में हिंदी मददगार है। हिंदी साहित्य का महत्व कार्य-कारण संबंध को बताना है। ये समझ में आने पर हर कार्य उपयोगी बन जायेगा। बुद्धिमान व्यक्ति सैदव तर्कशील व चिंतनरत रहता है। उसके जीवन में उदासीनता का कोई स्थान नहीं होता। हिंदी साहित्य अपने सारगर्भित साहित्य के माध्यम से हमें राष्ट्र के प्रति जागरूक रहने के साथ स्वयं,परिवार, देश तथा विश्व के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा भी देता है।
शिक्षा का अधिकार
विश्व स्तर पर आज हमारा भारत देश हर तरह से संपन्न और प्रगतिशील माना जाता हैं। आज देश ने आकाश से बढ़कर ब्रह्माण्ड को छूने में कामयाबी हासिल की हैं। लेकिन इस पूरे प्रगतिशील दौर में आज भी देश में शिक्षा का स्तर पहले अधिक चिंताजनक बना हुआ है। आज भले ही हमारे पास हर एक किलोमीटर पर स्कूल और पाठशालाएं मौजूद हों लेकिन शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जारहा है। आज दौर में भले ही हमने ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल में दाखिला दिला दिया हो लेकिन शिक्षा के पैमानों में इन बच्चों की स्थिति और भी अधिक चिंताजनक हो गई है। देश में सभी के लिए मुफ्त शिक्षा का बिल भले ही पास हो गया हो लेकिन यह आधारभूत अधिकार अभी भी केवल कागजों पर ही है। वर्ष 2002 में संविधान बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देना को फंडामेंटल राइट में शामिल किया था। इसकी तरह काफी बहस के बाद 2009 अगस्त में शिक्षा का अधिकार बिल भी लोकसभा में पास कर दिया था। लेकिन कई महीने बाद भी इन दोनों को लेकर अधिसूचना जारी नहीं की जा सकी। जब तक इस बिल को लेकर अधिसूचना जारी नहीं हो जाती, तब तक यह इस बिल का कोई मतलब नहीं है।
स्कूली शिक्षा की समस्याओं पर विचार करने के सिलसिले में जो कुछ प्रश्न बार-बार उठाए जाते हैं वे हैं- शिक्षकों की अनुपस्थिति, अभिभावकों की उदासीनता, सही पाठय़क्रम का अभाव, अध्यापन में खामियां इत्यादि। परंतु इन समस्याओं को अलग-अलग रूप में देखा नहीं जा सकता, क्योंकि इनकी जड़ें सारी व्यवस्था में फैली हैं। इसलिए व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाना जरूरी है। इसके लिए हमें स्कूली शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं पर गौर करना होगा। पहली मूल समस्या है प्रवेश (ऐक्सेस) की कमी। आजादी के 62 साल बाद भी हमारे देश में करोड़ों बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं। पूरे देश में यह संख्या 30 प्रतिशत से कम नहीं होगी। दाखिले का अनुपात (ग्रॉस एनरोलमेन्ट रेशियो) सूचक नहीं हो सकता। क्योंकि दाखिल बच्चों में से अधिकांश विभिन्न कारणों से बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। आधुनिकतम सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कक्षा 10 तक पहुंचते-पहुंचते 61 प्रतिशत बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी थी। प्रवेश की समस्या के समाधान के लिए सबसे पहला कार्य होना चाहिए – अतिरिक्त स्कूलों का निर्माण, अतिरिक्त शिक्षकों की बहाली और अतिरिक्त शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों का निर्माण। शिक्षा की दूसरी मूल समस्या है, इसकी अति निम्न गुणवत्ता। इसे बढ़ाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय है न्यूनतम मानकों (नौर्म्स) का निर्धारण कर उन्हें सभी स्कूलों में लागू करना। शिक्षा अधिकार विधेयक की अनुसूची में कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। परंतु ये नितान्त अपर्याप्त हैं। अनेक अत्यावश्यक मानकों का इसमें जिक्र ही नहीं है जैसे- जन आबादी से स्कूल की दूरी, प्रति स्कूल और प्रति क्लास में छात्रों की संख्या, कक्षाओं में फर्नीचर, पाठय़-उपकरण, प्रयोगशाला का स्तर, शिक्षकों की योग्यता, प्रशिक्षण, वेतनमान एवं सेवा की शर्ते इत्यादि। कुछ मानकों का जिक्र तो है पर उनका स्पष्ट उल्लेख करने के बदले कहा गया है, ‘जैसा सरकार निर्धारित करे।’ इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अयोग्य शिक्षकों (पैरा टीचर्स) की बहाली और बहु कक्षा पढ़ाई का मौजूदा सिलसिला जारी रहेगा। फिर तो गुणवत्ता की बात करना भी फिजूल है।
प्रवेश एवं गुणवत्ता, इन दोनों समस्याओं का असली कारण है वित्त का अभाव। शिक्षा अधिकार विधेयक से संलग्न वित्तीय स्मरण-पत्र में कहा गया है, ‘विधेयक को अमल में लाने के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों का परिणाम निर्धारित करना फिलहाल संभव नहीं है।’ यह कथन गलत है। पिछले 10 वर्षो में भारत के हर बच्चे को नि:शुल्क प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने में जो खर्च होगा उसका कई बार अनुमान लगाया जा चुका है। 1999 में तापस मजूमदार समिति ने बताया कि इसके लिएअगले 10 वर्षों में 1,37,000 करोड़ अतिरिक्त रकम लगेगी। 2005 में शिक्षा-परामर्श बोर्ड (केब) के एक विशेषज्ञ दल ने अनुमान लगाया था कि इस पर 6 साल तक प्रतिवर्ष न्यूनतम 53,500 करोड़ और अधिकतम 73 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय होगा। फिलहाल प्रारंभिक शिक्षा के लिए सर्वशिक्षा अभियान के माध्यम से धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। दसवीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में करीब दोगुनी वृद्धि के बाद भी ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में सर्वशिक्षा अभियान के लिए प्रतिवर्ष करीब 30,000 करोड़ रुपए का प्रावधान है। इस रकम से न तो देश के सभी बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलाया जा सकता है और न गुणवत्ता में विशेष परिवर्तन लाया जा सकता है।
हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था की तीसरी मूल समस्या है, इसमें व्याप्त असमानता और भेदभाव। देश के सामाजिक वर्गीकरण के साथ-साथ हमारे यहां स्कूलों का भी वर्गीकरण है, जिसके मुताबिक धनी और विशिष्ट वर्ग के बच्चे ज्यादा फी वाले अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं, और गरीब व निम्न वर्ग के बच्चे जिनकी संख्या कुल स्कूली छात्रों का करीब 80 प्रतिशत है। इसके चलते देश का सामाजिक विभाजन और भी बढ़ता जा रहा है। सभी स्कूलों में न्यूनतम मानक लागू करना न केवल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ा सकता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में मौजूद भेदभाव को मिटाने में भी मदद कर सकता है। भेदभाव मिटाने का दूसरा उपाय है पड़ोस के स्कूल के सिद्धांत को लागू करना जिसके मुताबिक हर स्कूल को उसके लिए निर्धारित पोषक क्षेत्र अथवा पड़ोस के सभी बच्चों को दाखिला देना होगा। इसका भी शिक्षाधिकार विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है। बल्कि, स्कूलों के वर्तमान वर्गीकरण को कायम रखने की व्यवस्था है।
देश के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा का अधिकार देने के बाद सरकार अब माध्यमिक शिक्षा का अधिकार भी देने जा रही है। मानव संसाधन विकास के अनुसार आने वाले पाँच वर्षों में माध्यमिक शिक्षा को भी बच्चों के मौलिक आधार के रूप में शामिल किया जा सकता है। जिसके तहत बच्चों के लिए माध्यमिक शिक्षा भी अनिवार्य व मुफ्त होगी। उल्लेखनीय है कि संसद ने पहले ही 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा बिल पारित किया था। इसके तहत शिक्षा बच्चों का मौलिक अधिकार बन गई थी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मुताबिक 2013 या 2015 तक सरकार बच्चों के लिए माध्यमिक शिक्षा भी मुफ्त व अनिवार्य कर सकती है। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून को लागू करने में सरकार को पाँच साल में एक लाख 71 हजार 484 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ेंगे और पाँच लाख दस हजार शिक्षकों को भर्ती करना पड़ेगा। इसी वर्ष 27 अगस्त को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून भारत के गजट में प्रकाशित हो गया। लेकिन अभी यह कानून लागू नहीं हुआ है।
हालांकि देश के 86वां संविधान संशोधन के अनुच्छेद 21(क) में शिक्षा को जोड़कर मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 आयु समूह के बच्चों तक सीमित कर दिया था। यह बिल इसी अनुच्छेद के तहत लाया गया है। वर्ष १९५0 में जब संविधान ने सरकार को 14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा देने के निर्देश दिए थे, तब के सामाजिक-आर्थिक हालात आज से एकदम अलग थे। आज १२वीं कक्षा की परीक्षा पास किए बगैर रोजगार की बात तो दूर, आईटीआई व पॉलीटेक्निक या फिर अन्य किसी व्यावसायिक कोर्स में भी दाखिला नहीं मिल सकता, तो फिर देश के बच्चों को आजादी के बाद हर साल इंतजार करवाकर कौन-सा मौलिक अधिकार दिया जा रहा है?
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी सहभागिता (पीपीपी) का सिद्धांत लागू करने की नीति बन चुकी है। यानी अब सार्वजनिक धन का उपयोग सरकार शिक्षा के निजीकरण और बाजारीकरण के लिए करने जा रही है। कुछ प्रदेश सरकारों ने तो सरकारी स्कूलों को निजी कंपनियों को देने के लिए टेंडर तक जारी करने या फिर अन्य तरीकों से सौंपने की पूरी तैयारी कर ली है।अप्रैल2009 में योजना आयोग ने स्कूली शिक्षा को सार्वजनिक-निजी सहभागिता के सांचे में ढालने के लिए एक बैठक बुलाई थी, जिसमें १८ कॉपरेरेट घरानों के प्रतिनिधि मौजूद थे, एक भी शिक्षाविद् या शिक्षक नहीं था। शिक्षा को कारोबार में बदलने की इस घोषित सरकारी नीति के चलते इस बिल का खोखलापन अपने आप जाहिर हो जाता है।
वैश्वीकरण की नवउदारवादी नीति की तर्ज पर बने इस सरकारी बिल के पैरोकार सरकार के बाहर भी हैं। उनका कहना है कि यह बिल निजी स्कूलों की भी जवाबदेही तय करता है। उनका इशारा उस प्रावधान की ओर है, जो निजी स्कूलों में कमजोर वर्गो और वंचित समुदायों के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित करता है। इनकी फीस सरकार की ओर से दी जाएगी। इससे बड़ा फूहड़ मजाक और क्या हो सकता था। एक, आज 6-14 आयु समूह के लगभग 20 करोड़ बच्चों में से ४ करोड़ बच्चे निजी स्कूलों में हैं। इनके 25 फीसदी यानी महज एक करोड़ बच्चों के लिए यह प्रावधान होगा। शेष बच्चों का क्या होगा? दूसरा, सब जानते हैं कि निजी स्कूलों में ट्यूशन फीस के अलावा अन्य कई प्रकार के शुल्क लिए जाते हैं, जिसमें कम्प्यूटर, पिकनिक, डांस आदि शामिल है। यह सब और इन स्कूलों के अभिजात माहौल के अनुकूल कीमती पोशाकें गरीब बच्चे कहां से लाएंगे? इनके बगैर वे वहां पर कैसे टिक पाएंगे? तीसरा, यदि किसी तरह वे 8वीं कक्षा तक टिक भी गए, तो उसके बाद उनका क्या होगा? ये बच्चे फिर सड़कों पर आ जाएंगे जबकि उनके साथ पढ़े हुए फीस देने वाले बच्चे १२वीं कक्षा पास करके आईआईटी व आईआईएम या विदेशी विश्वविद्यालयों की परीक्षा देंगे। इन सवालों का एक ही जवाब था- समान स्कूल प्रणाली जिसमें प्रत्येक स्कूल (निजी स्कूलों समेत) पड़ोसी स्कूल होगा।
सुप्रीम कोर्ट के उन्नीकृष्णन फैसले (1993) के अनुसार अनुच्छेद ४१ के मायने हैं कि शिक्षा का अधिकार 14 वर्ष की आयु में खत्म नहीं होता, वरन सैकंडरी व उच्चशिक्षा तक जाता है। फर्क इतना है कि 14 वर्ष की आयु तक की शिक्षा के लिए सरकार पैसों की कमी का कोई बहाना नहीं कर सकती, जबकि सैकंडरी व उच्चशिक्षा को देते वक्त उसकी आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखा जा सकता है। जनता को उम्मीद थी कि यह बिल उच्चशिक्षा के दरवाजे प्रत्येक बच्चे के लिए समानता के सिद्धांत पर खोल देगा। तभी तो रोजगार के लिए सभी समुदायों के बच्चे बराबरी से होड़ कर पाएंगे और साथ में भारत की अर्थव्यवस्था में समान हिस्सेदारी के हकदार बनेंगे। क्या ऐसे कानून के लिए और आधी सदी तक इंतजार किया जाए या संसद पर जन-दबाव बनाकर इसी बिल में यथोचित संशोधन करवाने के लिए कमर कसी जाए?
इन सभी सरकारी आंकड़ों से शिक्षा की कार्यशैली से तो आम जनता को भ्रमित किया जा सकता है ।पर शिक्षा के लिए शिक्षायोजना अधिकार का क्रियांवयन होना जरूरी है.सिर्फ शिक्षा का मौलिक अधिकार का कानून सरकारी दस्तावेजों से ही नहीं मिल सकताहै। सरकारी और गैर सरकारी संगठनो को अब जड़ चेतनके साथ जुडकर शुरूआत करनी होगी। आम जनता की भागीदारी के लिए मीड़िया को भी सामने आना होगा लोगों को जागरूक और प्रोत्साहित करना होगा। शिक्षा के इस अधिकार को पूरी तरह से सफल बनाने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है।
1. शिक्षित युवाओं को शिक्षक बननेकी राह में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए एवं उचित ट्रेनिंग और आय देना चाहिए।
2. सरकार को स्कूली पाठ्यक्रम में अधिक गुणवत्ता के साथ शिक्षा की उचित व्यवस्था पर केंद्रित होना चाहिए।
3. इस चुनौती को जन भागीदारी,मीड़िया, और गैर सरकारी संगठनों द्वारा एक साथ मिलकर किया जाना चाहिए।
4. सिर्फ शहरों और जिलो तक ही सीमित ना रह कर गांवों और छोटे कस्बों तक शिक्षा के सही मायनों को पहुचाना होगा। शिक्षा नीति के सही क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
01/11/2014
Delhi darshan>>>>> Lal Quila ki sair.
01/11/2014
Delhi Darshan >>>Lal Quila
Some imp.Questions for ETE students.
Ques. 1. Manovigyan ththa shiksha mai samband , Manovigyan ke vikas ne shiksha ko kis prakar prabhavit kiya hai ???
Ques. 2. Shiksha manovigyan kya hai ?Manovigyan ka gyan ek shikshak (teacher) ko accha shikshak banne mai kis prakar shayata karta hai ?
Ques. 3. Abiprerna (motivation) kya hai ?Abiprerna ke prakar & ...abiprerna ke sidhdhant, Abiprena ka shiksha mai kya yogdan hai ?
Ques. 4. Vidhyalaya ke manovaigyanik vatavaran se kya abipraya hai ?, isse kis prakar uppukatt banaya jaa sakta hai ???
Ques. 5. Abhikramit anudeshan kya hai ?, iske kya -kya visheshtae hai ?. Abhikramit anudeshan ke mukhya siddhant kya hai ?
Ques. 5 (A).What is Programmed Learning ?, what are its main features , & what are its main princilpes ??
Ques. 6. Anushashan se aap kya samajhte hai ? Anushashan ke vibbinn prakaro ka ullekh karo, Aap kis prakar ke Anushashan ko apne Vidhyalaya ke liye adhik upyukat samajhte hai aur kyu ?
Ques. 7. Samudaya ko kis prakar vidhyalaya se jodda jaa sakta hai ? Kis prakar vidhyalaya ko samudaya ke nikkat laya jaa sakta hai ?
Ques. 8.Budhi ( Intelligence ) kya hai ? Buddi ke prakar thatha buddi ko prabhavit karne wale karak kon -kon se hai , Biddi ke mukhya siddhant kya hai ?
Ques. 9. Prathmik satar ke adhigam aiv shikshan mai Matrabhasha ( mother's tongue) ka matahva sapsht karo
Ques. 10. Mid day Meal , kyo jaruri hai?, yeh Prathimik shiksha ke prasar ke liye kitna aavashak hai ???
Ques.11. Shikshan vidhi mai Bharman ko kitna upyogi mante hai. Bharman ke aayojan ka prarup, savdhaniya, vai adhyapak ke bhumika ka varnan karo ??
Ques. 12. Shikshan vidhi mai Bharman ko kitna upyogi mante hai. Bharman ke aayojan ka prarup, savdhaniya, vai adhyapak ke bhumika ka varnan karo ??
Ques. 13. Mahatama Gandhi dwara pratipadit buniyadi shiksha ke vibbinnh aayamo ke charcha karo ???
Ques. 14. Pathya sehgami kriyae kya hai ? Vidhyalaya ke gathan mai in kriyao ke kya Aavashyakta hai ? Ye kriyaye kis prakar Vidhyarithi ke Vyaktitava nirmaan mai sahayak hai ??
Ques. 15. Sukhsham shikshan kya hai ? Sukhsham shikshan ke prakriya , Bhartiya parivesh mai mai Sukhsham Shikshan ke visheshtaye ???
Ques. 16. what is pedagogical analysis? explane its process....??
shaikshik vishleshan kya hai? iski prakriya ko samjhaiye....???
Ques. 17. Prathmik satar par gannit( Math’s) shikshan ke dauran aap kin – kin vidhiyo vai Shikshan samagri ka chayan karege ? udaharan sahit likeye
Ques. 18. Samasyatamak Balak kese kehte hai? Ye kitne prakar ke hote hai ? Inhe shiksha pradan karte samay Adyapak ko kin kin baton ka dhyan rakhna chaheye ?
Ques. 19. Surgennatamakta ( Creativity) kya hai ?, kis prakar ke balako ko surgennatamak kya jaaega ?, Ek Adyapak balko m kis prakar Surgennatamakta ka vikas kar sakta hai ?
Ques. 20. Bhasha vikas( language Development ) kya hai ? baalko mai kis prakar bhasha ka vikas kiya jaa sakta hai ? iske mukhya sopan ( steps) kon
Ques. 21. Bal Sahitya ka kya mahatav hai ? Acche Bal sahitya ke Visheshtaye Udaharan sahit likeye
Ques. 22. Abivridhi aur vikas kya hai ? inme antar, Abivridhi aur vikas ke siddhanth ???
Ques. 23. Saamajik Privartan kya hai ? Shiksha dwara kis prakar Saamajik Privartan kiye jaa sakte hai?
..
Ques. 24. Adarshvaad ( Idealism ) kya hai , Adarshvaad ke pramukh siddhant , Adarshvaad thatha Shiksha ke mukhya uddesheye kya hai ??
Ques.25 Samajikaran kya hai ? Samajikaran ke prakriya , Samajakaran ke prakriya mai Shiksha ka kya kaarya hai ????
Ques.26 Swami Dayanand Saraswati ke anusaar Shiksha ka kya aarth hai ? Swami Dayanand Saraswati ke anusaar Shiksha ke aadarbhut siddant kya hai ?, inke Shiksha ke uddeshye kya hai ???
Baljeet Singh Saini
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