विश्व विजेता संत रामपाल जी महाराज

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19/09/2024

पाठ सेवा🤲🏻🙇🏻✨


गरीब, धन जननी धन भूमि धन, धन नगरी धन देश।
धन करनी धन कुल धन, जहां साधु प्रवेश।।


❤️ ❤️

18/12/2023



15/12/2023




05/07/2023

#ज्ञानगंगा_Part71

श्री ब्रह्मा पुराण”
इस पुराण के वक्ता श्री लोमहर्षण ऋषि जी हैं। जो श्री व्यास ऋषि के शिष्य हुए हैं जिन्हें सूत जी भी कहा जाता है। श्री लोमहर्षण जी (सूत जी) ने बताया कि यह ज्ञान पहले श्री ब्रह्मा जी ने दक्षादि श्रेष्ठ मुनियों को सुनाया था। वही मैं सुनाता हूँ। इस पुराण के सृष्टि के वर्णन नामक अध्याय में (पृष्ठ 277 से 279 तक) कहा है कि श्री विष्णु जी सर्व विश्व के आधार हैं जो ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव रूप से जगत की उत्पत्ति तथा पालन तथा संहार करते हैं। उस भगवान विष्णु को मेरा नमस्कार है।

जो नित्य सद्सत स्वरूप तथा कारणभूत अव्यक्त प्रकृति है उसी को प्रधान कहते हैं। उसी से पुरुष ने इस विश्व का निर्माण किया है। अमित तेजस्वी ब्रह्मा जी को ही पुरुष समझो। वे समस्त प्राणियों की सृष्टि करने वाले तथा भगवान नारायण के आश्रित हैं।

स्वयंभू भगवान नारायण ने जल की सृष्टि की। नारायण से उत्पन्न होने के कारण जल को नार कहा जाने लगा। भगवान ने सर्व प्रथम जल पर विश्राम किया। इसलिए भगवान को नारायण कहा जाता है। भगवान ने जल में अपनी शक्ति छोड़ी उससे एक सुवर्णमय अण्ड प्रकट हुआ। उसी में स्वयंभू ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई ऐसा सुना जाता है। एक वर्ष तक अण्डे में निवास करके श्री ब्रह्मा जी ने उसके दो टुकड़े कर दिए। एक से धूलोक बन गया और दूसरे से भूलोक।

तत्पश्चात् ब्रह्मा जी ने अपने रोष से रूद्र को प्रकट किया। उपरोक्त ज्ञान ऋषि लोमहर्षण (सूत जी) का कहा हुआ है जो सुना सुनाया (लोक वेद) है जो पूर्ण नहीं है। क्योंकि वक्ता कह रहा है कि ऐसा सुना है। इसलिए पूर्ण जानकारी के लिए श्री देवीमहापुराण, श्री शिवमहापुराण, श्रीमद् भगवद् गीता तथा चारों वेद और पूर्ण परमात्मा द्वारा तत्व ज्ञान जो स्वसम वेद अर्थात् कविर्वाणी (कबीर वाणी) कहा जाता है। उसके लिए कृप्या पढ़ें ‘गहरी नजर गीता में‘, परमेश्वर का सार संदेश‘, परिभाषा प्रभु की तथा पुस्तक ‘यथार्थ ज्ञान प्रकाश में‘।

(वास्तविक ज्ञान को स्वयं कलयुग में प्रकट होकर कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ने अपने खास सेवक श्री धर्मदास साहेब जी (बांधवगढ़ वाले) को पुनर् ठीक-ठीक बताया। जो इसी पुस्तक में सृष्टि रचना में वर्णित है, कृप्या वहाँ पढ़ें।)।

श्री पारासर जी ने काल ब्रह्म को परब्रह्म भी कहा है तथा ब्रह्म भी तथा विष्णु भी कहा है तथा इसी को अनादि अर्थात् अमर भी कहा है। इस ब्रह्म अर्थात् काल का जन्म मृत्यु नहीं होती। इसी से ऋषि की बाल बुद्धि सिद्ध होती है।
विचार करें - विष्णु पुराण का ज्ञान एक ऋषि द्वारा कहा है जिसने लोकवेद (सुने सुनाऐं ज्ञान अर्थात् दंत कथा) के आधार से कहा है तथा ब्रह्मा पुराण का ज्ञान श्री लोमहर्षण ऋषि ने दक्षादि ऋषियों से सुना था, वह लिखा है। इसलिए उपरोक्त दोनों (विष्णु पुराण व ब्रह्मा पुराण) को समझने के लिए श्री देवी पुराण तथा श्री शिव पुराण का सहयोग लिया जाएगा, जो स्वयं श्री ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र नारद जी को सुनाया, जो श्री व्यास ऋषि के द्वारा ग्रहण हुआ तथा लिखा गया। अन्य पुराणों का ज्ञान श्री ब्रह्मा जी के ज्ञान के समान नहीं हो सकता। इसलिए अन्य पुराणों को समझने के लिए देवी पुराण तथा श्री शिव पुराण का सहयोग लिया जाएगा। क्योंकि यह ज्ञान दक्षादि ऋषियों के पिता श्री ब्रह्मा जी का दिया हुआ है। श्री देवी पुराण तथा श्री शिवपुराण को समझने के लिए श्रीमद् भगवद् गीता तथा चारों वेदों का सहयोग लिया जाएगा। क्योंकि यह ज्ञान स्वयं भगवान काल रूपी ब्रह्म द्वारा दिया गया है। जो ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जी का उत्पन्न कर्ता अर्थात् पिता है। पवित्र वेदों तथा पवित्र श्रीमद् भगवद् गीता जी के ज्ञान को समझने के लिए स्वसम वेद अर्थात् सूक्ष्म वेद का सहयोग लेना होगा जो काल रूपी ब्रह्म के उत्पत्ति कर्ता अर्थात् पिता परम अक्षर ब्रह्म (कविर्देव) का दिया हुआ है। जो (कविर्गीभिः) कविर्वाणी द्वारा स्वयं सतपुरुष ने प्रकट हो कर बोला था। (ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 16 से 20 तक प्रमाण है।) तथा श्रीमद् भगवत गीता में भगवान काल अर्थात् ब्रह्म ने अपनी स्थिति स्वयं बताई है जो सत है।

गीता अध्याय 15 श्लोक 18 में कहा है कि मैं (काल रूपी ब्रह्म) अपने इक्कीस ब्रह्मण्डों में जितने भी प्राणी हैं उनसे श्रेष्ठ हूँ। वे चाहे स्थूल शरीर में नाशवान हैं, चाहे आत्मा रूप में अविनाशी हैं। इसलिए लोकवेद (सुने सुनाए ज्ञान) के आधार से मुझे पुरुषोत्तम मानते हैं। वास्तव में पुरुषोत्तम तो मुझ (क्षर पुरुष अर्थात् काल) से तथा अक्षर पुरुष (परब्रह्म) से भी अन्य है। वही वास्तव में परमात्मा अर्थात् भगवान कहा जाता है। तीनों लोकों में प्रवेश करके सर्व का धारण पोषण करता है, वही वास्तव में अविनाशी परमेश्वर है (गीता अध्याय 15 श्लोक 16.17)। गीता ज्ञान दाता ब्रह्म स्वयं कह रहा है कि हे अर्जुन ! तेरे तथा मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 2 श्लोक 12 में प्रमाण है तथा अध्याय 7 श्लोक 18 में अपनी साधना को भी (अनुत्तमाम्) अति अश्रेष्ठ कहा है। इसलिए अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि हे अर्जुन ! सर्व भाव से उस परमेश्वर की शरण में जा जिसकी कृपा से ही तू परमशांति को प्राप्त होगा तथा कभी न नष्ट होने वाले लोक अर्थात् सतलोक को प्राप्त होगा। अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा है कि जब तुझे तत्वदर्शी प्राप्त हो जाए (जो गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में तथा अध्याय 15 श्लोक 1 में वर्णित है) उसके पश्चात् उस परम पद परमेश्वर की खोज करनी चाहिए जिसमें गए साधक फिर लौट कर संसार में नहीं आते अर्थात् पूर्ण मोक्ष प्राप्त करते हैं। जिस परमेश्वर से यह सर्व संसार उत्पन्न हुआ तथा वही सर्व का धारण-पोषण करने वाला है। मैं (गीता ज्ञान दाता ब्रह्म रूपी काल) भी उसी आदि पुरुष परमेश्वर की शरण में हूँ। पूर्ण विश्वास के साथ उसी की भक्ति साधना अर्थात् पूजा करनी चाहिए।

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Dowry Free Marriage
22/02/2023

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09/12/2022

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📚 𝐎𝐑𝐃𝐄𝐑 𝐅𝐑𝐄𝐄 𝐁𝐎𝐎𝐊 📚क्या आप जानते हैं?🤔◆ क्या शिव जी पूर्ण परमात्मा है ?◆ दुर्गा जी सिंदूर किसके लिए लगाती है?◆ ब्रह्मा ज...
09/12/2022

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क्या आप जानते हैं?🤔

◆ क्या शिव जी पूर्ण परमात्मा है ?
◆ दुर्गा जी सिंदूर किसके लिए लगाती है?
◆ ब्रह्मा जी की पूजा क्यों नहीं की जाती?
◆ पिछले तीनो युग में भगवान के प्राकट्य का जिक्र है तो कलियुग में कौन है वह अवतार?
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09/12/2022

#मुसलमाननहींसमझेज्ञानकुरआन_Part117 के आगे पढिए.....)
📖📖📖
#मुसलमाननहींसमझेज्ञानकुरआन_Part118

हम पढ़ रहे है पुस्तक "मुसलमान नहीं समझे ज्ञान कुरआन"
पेज नंबर - 291-293

”परब्रह्म के सात संख ब्रह्माण्डों की स्थापना“
कबीर परमेश्वर (कविर्देव) ने आगे बताया है कि परब्रह्म (अक्षर पुरुष) ने अपने कार्य में गफलत की क्योंकि यह मानसरोवर में सो गया तथा जब परमेश्वर (मैंनें अर्थात् कबीर साहेब ने) उस सरोवर में अण्डा छोड़ा तो अक्षर पुरुष (परब्रह्म) ने उसे क्रोध से देखा। इन दोनों
अपराधों के कारण सात संख ब्रह्माण्ड़ों सहित सतलोक से बाहर कर दिया। अन्य कारण अक्षर पुरुष (परब्रह्म) अपने साथी ब्रह्म (क्षर पुरुष) की विदाई में व्याकुल होकर परमपिता कविर्देव (कबीर परमेश्वर) की याद भूलकर उसी को याद करने लगा तथा सोचा कि क्षर
पुरुष (ब्रह्म) तो बहुत आनन्द मना रहा होगा, वह स्वतंत्रा राज्य करेगा, मैं पीछे रह गया तथा अन्य कुछ आत्माऐं जो परब्रह्म के साथ सात संख ब्रह्माण्डों में जन्म-मृत्यु का कर्मदण्ड भोग रही हैं, उन हंस आत्माओं की विदाई की याद में खो गई जो ब्रह्म (काल) के साथ इक्कीस ब्रह्माण्डों में फंसी हैं तथा पूर्ण परमात्मा, सुखदाई कविर्देव की याद भुला दी। परमेश्वर कविर् देव के बार-बार समझाने पर भी आस्था कम नहीं हुई। परब्रह्म (अक्षर पुरुष) ने सोचा कि मैं भी अलग स्थान प्राप्त करूं तो अच्छा रहे। यह सोच कर राज्य प्राप्ति की इच्छा से सारनाम का जाप प्रारम्भ कर दिया। इसी प्रकार अन्य आत्माओं ने (जो परब्रह्म के सात संख ब्रह्माण्डों में फंसी हैं) सोचा कि वे जो ब्रह्म के साथ आत्माऐं गई हैं वे तो वहाँ मौज-मस्ती मनाऐंगे, हम पीछे रह गये। परब्रह्म के मन में यह धारणा बनी कि क्षर पुरुष अलग होकर बहुत सुखी होगा। यह विचार कर अन्तरात्मा से भिन्न स्थान प्राप्ति की ठान ली। परब्रह्म (अक्षर पुरुष) ने हठ
योग नहीं किया, परन्तु केवल अलग राज्य प्राप्ति के लिए सहज ध्यान योग विशेष कसक के साथ करता रहा। अलग स्थान प्राप्त करने के लिए पागलों की तरह विचरने लगा, खाना-पीना भी त्याग दिया। अन्य कुछ आत्माऐं जो पहले काल ब्रह्म के साथ गई आत्माओं के प्रेम में व्याकुल थी, वे अक्षर पुरूष के वैराग्य पर आसक्त होकर उसे चाहने लगी। पूर्ण प्रभु के पूछने पर परब्रह्म ने अलग स्थान माँगा तथा कुछ हंसात्माओं के लिए भी याचना की। तब कविर्देव ने कहा कि जो आत्मा आपके साथ स्वेच्छा से जाना चाहें उन्हें भेज देता हूँ। पूर्ण प्रभु ने पूछा कि कौन हंस आत्मा परब्रह्म के साथ जाना चाहता है, सहमति व्यक्त करे। बहुत समय उपरान्त एक हंस ने स्वीकृति दी, फिर देखा-देखी उन सर्व आत्माओं ने भी सहमति व्यक्त कर दी। सर्व प्रथम स्वीकृति देने वाले हंस को स्त्राी रूप बनाया, उसका नाम ईश्वरी माया (प्रकृति सुरति) रखा तथा अन्य आत्माओं को उस ईश्वरी माया में प्रवेश करके अचिन्त द्वारा अक्षर पुरुष (परब्रह्म) के पास भेजा। (पतिव्रता पद से गिरने की सजा पाई।) कई युगों तक दोनों सात संख ब्रह्माण्डों में रहे, परन्तु परब्रह्म ने दुर्व्यवहार नहीं किया। ईश्वरी माया की स्वेच्छा से अंगीकार किया तथा अपनी शब्द शक्ति द्वारा नाखुनों से स्त्राी इन्द्री (योनि) बनाई। ईश्वरी देवी की सहमति से संतान उत्पन्न की। इस लिए परब्रह्म के लोक (सात संख ब्रह्माण्डों) में प्राणियों को तप्तशिला का कष्ट नहीं है तथा वहाँ पशु-पक्षी भी ब्रह्म लोक के देवों से अच्छे चरित्र युक्त हैं। आयु भी बहुत लम्बी है, परन्तु जन्म - मृत्यु कर्माधार पर कर्मदण्ड तथा परिश्रम करके ही उदर पूर्ति होती है। स्वर्ग तथा नरक भी ऐसे ही बने हैं। परब्रह्म (अक्षरपुरुष) को सात संख ब्रह्माण्ड उसके इच्छा रूपी भक्ति ध्यान अर्थात् सहज समाधि विधि से की उस की कमाई के प्रतिफल में प्रदान किये तथा सत्यलोक से भिन्न स्थान पर गोलाकार परिधि में बन्द करके सात संख ब्रह्माण्डों सहित अक्षर ब्रह्म व ईश्वरी माया को निष्कासित कर दिया। पूर्ण ब्रह्म (सतपुरुष) असंख्य ब्रह्माण्डों जो सत्यलोक आदि में हैं तथा ब्रह्म के इक्कीस ब्रह्माण्डों तथा परब्रह्म के सात संख ब्रह्माण्डों का भी प्रभु (मालिक) है अर्थात् परमेश्वर कविर्देव कुल का मालिक है। श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी आदि के चार-चार भुजाएं तथा 16 कलाएं हैं तथा प्रकृति देवी (दुर्गा) की आठ भुजाएं हैं तथा 64 कलाएं हैं। ब्रह्म (क्षर पुरुष) की एक हजार भुजाएं हैं तथा एक हजार कलाएं है तथा इक्कीस ब्रह्माण्ड़ों का प्रभु है। परब्रह्म (अक्षर पुरुष) की दस हजार भुजाएं हैं तथा दस हजार कला हैं तथा सात संख ब्रह्माण्डों का प्रभु है। पूर्ण ब्रह्म (परम अक्षर पुरुष अर्थात् सतपुरुष) की असंख्य भुजाएं तथा असंख्य कलाएं हैं तथा ब्रह्म के इक्कीस ब्रह्माण्ड व परब्रह्म के सात संख ब्रह्माण्डों सहित असंख्य ब्रह्माण्डों का प्रभु है। प्रत्येक प्रभु अपनी सर्व भुजाओं को समेट कर केवल दो भुजाएं भी रख सकते हैं तथा जब चाहें सर्व भुजाओं को भी प्रकट कर सकते हैं। पूर्ण परमात्मा परब्रह्म के प्रत्येक ब्रह्माण्ड में भी अलग स्थान बनाकर अन्य रूप में गुप्त रहता है। यूं समझो जैसे एक घूमने वाला कैमरा बाहर लगा देते हैं तथा अन्दर टी.वी. (टेलीविजन) रख देते हैं। टी.वी. पर बाहर का सर्व दृश्य नजर आता है तथा दूसरा टी.वी. बाहर रख कर अन्दर का कैमरा स्थाई करके रख दिया जाए, उसमें केवल अन्दर बैठे प्रबन्धक का चित्र दिखाई देता है। जिससे सर्व कर्मचारी सावधान रहते हैं। इसी प्रकार पूर्ण परमात्मा अपने सतलोक में बैठ कर सर्व को नियंत्रित किए हुए हैं तथा प्रत्येक ब्रह्माण्ड में भी सतगुरु कविर्देव विद्यमान रहते हैं जैसे सूर्य दूर होते हुए भी अपना प्रभाव अन्य लोकों में बनाए हुए है।

( शेष भाग कल )
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19/07/2022

#कबीर_बड़ा_या_कृष्ण_Part107

‘‘ऋषि विवेकानन्द जी से ज्ञान चर्चा’’

स्वामी रामानन्द जी का एक शिष्य ऋषि विवेकानन्द जी बहुत ही अच्छे प्रवचन कत्र्ता रूप में प्रसिद्ध था। ऋषि विवेकानन्द जी को काशी शहर के एक क्षेत्र का उपदेशक नियुक्त किया हुआ था। उस क्षेत्र के व्यक्ति ऋषि विवेकानन्द जी के धारा प्रवाह प्रवचनों को सुनकर उनकी प्रसंशा किये बिना नहीं रहते थे। उसकी कालोनी में बहुत प्रतिष्ठा बनी थी। प्रतिदिन की तरह ऋषि विवेकानन्द जी विष्णु पुराण से कथा सुना रहे थे। कह रहे थे, भगवान विष्णु सर्वेश्वर हैं, अविनाशी, अजन्मा हैं। सर्व सृष्टि रचनहार तथा पालन हार हैं। इनके कोई जन्मदाता माता-पिता नहीं है। ये स्वयंभू हैं। ये ही त्रेतायुग में अयोध्या के राजा दशरथ जी के घर माता कौशल्या देवी की पवित्र कोख से उत्पन्न हुए थे तथा श्री रामचन्द्र नाम से प्रसिद्ध हुए। समुद्र पर सेतु बनाया, जल पर पत्थर तैराए। लंकापति रावण का वध किया। श्री विष्णु भगवान ही ने द्वापर युग में श्री कृष्णचन्द्र भगवान का अवतार धार कर वासुदेव जी के रूप में माता देवकी के गर्भ से जन्म लिया तथा कंस, केशि,शिशुपाल, जरासंध आदि दुष्टों का संहार किया। पाँच वर्षीय बालक कबीर देव जी भी उस ऋषि विवेकानन्द जी का प्रवचन सुन रहे थे तथा सैंकड़ों की संख्या में अन्य श्रोता गण भी उपस्थित थे। ऋषि विवेकानन्द जी ने अपने प्रवचनों को विराम दिया तथा उपस्थित श्रोताओं से कहा यदि किसी को कोई प्रश्न करना है तो वह निःसंकोच अपनी शंका का समाधान करा सकता है।

बालक कबीर परमेश्वर खड़े हुए तथा ऋषि विवेकानन्द जी से करबद्ध होकर प्रार्थना कि हे ऋषि जी ! आपने भगवान विष्णु जी के विषय में बताया कि ये अजन्मा हैं, अविनाशी है। इनके कोई माता-पिता नहीं हैं। एक दिन एक ब्राह्मण श्री शिव पुराण के रूद्र संहिता अध्याय 6, 7 को पढ़ कर श्रोताओं को सुना रहे थे, यह दास भी उस सत्संग में उपस्थित था। शिव पुराण में लिखा है कि निराकार परमात्मा आकार में आया वह सदाशिव, काल रूपी ब्रह्म कहलाया। उसने अपने अन्दर से एक स्त्री प्रकट की जो प्रकृति देवी, अष्टांगी, त्रिदेव जननी, शिवा आदि नामों से जानी जाती है। काल रूपी ब्रह्म ने एक काशी नामक सुन्दर स्थान बनाया वहाँ दोनों शिव तथा शिवा अर्थात् काल रूपी ब्रह्म तथा दुर्गा पति-पत्नी रूप में निवास करने लगे। कुछ समय पश्चात् दोनों के सम्भोग से एक लड़का उत्पन्न हुआ। उसका नाम विष्णु रखा। इसी प्रकार दोनों के रमण करने से एक पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम ब्रह्मा रखा तथा कमल के फूल पर डाल कर अचेत कर दिया। फिर अध्याय 9 के अन्त में लिखा है कि ‘‘ब्रह्मा रजगुण है, विष्णु सतगुण है तथा शंकर तमगुण है परन्तु सदा शिव इनसे भिन्न है वह गुणातीत है। यहाँ पर सदाशिव के अतिरिक्त तीन देव श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिवजी भी है। इससे सिद्ध हुआ कि इन त्रिदेवों की जननी दुर्गा अर्थात् प्रकृति देवी है तथा पिता काल ब्रह्म है। इन तीनों प्रभुओं विष्णु आदि का जन्म हुआ है इनके माता-पिता भी है।

एक दिन मैंने एक ब्राह्मण द्वारा श्री देवी पुराण के तीसरे स्कंद में अध्याय 4-5 में सुना था कि जिसमें भगवान विष्णु ने कहा है ‘‘इन प्रकृति देवी अर्थात् दुर्गा को मैंने पहले भी देखा था मुझे अपने बचपन की याद आई है। मैं एक वट वृक्ष के नीचे पालने में लेटा हुआ था। यह मुझे पालने में झूला रही थी। उस समय में बालक रूप में था। प्रकृति देवी के निकट जाकर तीनों देव (त्रिदेव) श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिवजी करबद्ध होकर खड़े हो गए। भगवान विष्णु ने देवी की स्तुति की ‘‘तुम शुद्ध स्वरूपा हो, यह संसार तुम ही से उद्भाषित हो रहा है। हमारा अविर्भाव अर्थात् जन्म तथा तिरोभाव अर्थात् मृत्यु होती है। हम अविनाशी नहीं है। तुम अविनाशी हो। प्रकृति देवी हो। भगवान शंकर बोले, हे माता! यदि आप ही के गर्भ से भगवान विष्णु तथा भगवान ब्रह्मा का जन्म हुआ है तो क्या मैं तमोगुणी लीला करने वाला शंकर आपका पुत्र नहीं हुआ? अर्थात् मुझे भी जन्म देने वाली तुम ही हो।

हे ऋषि विवेकानन्द जी! आप कह रहे हो कि पुराणों में लिखा है कि भगवान विष्णु के तो कोई माता-पिता नहीं। ये अविनाशी हैं। इन पुराणों का ज्ञान दाता एक श्री ब्रह्मा जी हैं तथा लेखक भी एक ही श्री व्यास जी हैं। जबकि पुराणों में तो भगवान विष्णु नाशवान लिखे हैं। इनके माता-पिता का नाम भी लिखा है। क्यों जनता को भ्रमित कर रहे हो।

कबीर, बेद पढे पर भेद ना जाने, बाचें पुराण अठारा। जड़ को अंधा पान खिलावें, भूले सिर्जन हारा।।

कबीर परमेश्वर जी के मुख कमल से उपरोक्त पुराणों में लिखा उल्लेख सुनकर ऋषि विवेकानन्द अति क्रोधित हो गया तथा उपस्थित श्रोताओं से बोले यह बालक झूठ बोल रहा है। पुराणों में ऐसा नहीं लिखा है। उपस्थित श्रोताओं ने भी सहमति व्यक्त की कि हे ऋषि जी आप सत्य कह रहे हो यह बालक क्या जाने पुराणों के गूढ़ रहस्य को? आप विद्वान पुरूष परम विवेकशील हो। आप इस बच्चे की बातों पर ध्यान न दो। ऋषि विवेकानन्द जी ने पुराणों को उसी समय देखा जिसमें सर्व विवरण विद्यमान था। परन्तु मान हानि के भय से अपने झूठे व्यक्तव्य पर ही दृढ़ रहते हुए कहा हे बालक तेरा क्या नाम है? तू किस जाति में जन्मा है। तूने तिलक लगाया है। क्या तूने कोई गुरु धारण किया है? शीघ्र बताइए।

कबीर परमेश्वर जी ने बोलने से पहले ही श्रोता बोले हे ऋषि जी! इसका नाम कबीर है, यह नीरू जुलाहे का पुत्र है। कबीर जी बोले ऋषि जी मेरा यही परिचय है जो श्रोताओं ने आपको बताया। मैंने गुरु धारण कर रखा है। ऋषि विवेकानन्द जी ने पूछा क्या नाम है तेरे गुरुदेव का? परमेश्वर कबीर जी ने कहा मेरे पूज्य गुरुदेव वही हैं जो आपके गुरुदेव हैं। उनका नाम है पंडित रामानन्द स्वामी। जुलाहे के बालक कबीर परमेश्वर जी के मुख कमल से स्वामी रामानन्द जी को अपना गुरु जी बताने से ऋषि विवेकानन्द जी ने ज्ञान चर्चा का विषय बदल कर परमेश्वर कबीर जी को बहुत बुरा-भला कहा तथा श्रोताओं को भड़काने व वास्तविक विषय भूलाने के उद्देश्य से कहा देखो रे भाईयो! यह कितना झूठा बालक है। यह मेरे पूज्य गुरुदेव श्री 1008 स्वामी रामानन्द जी को अपना गुरु जी कह रहा है। मेरे गुरु जी तो इन अछूतों के दर्शन भी नहीं करते। शुद्रों का अंग भी नहीं छूते। अभी जाता हूँ गुरु जी को बताता हूँ। भाई श्रोताओ! आप सर्व कल स्वामी जी के आश्रम पर आना सुबह-2। इस इस झूठे की कितनी पिटाई स्वामी रामानन्द जी करेगें? इसने हमारे गुरुदेव का नाम मिट्टी में मिलाया है। सर्व श्रोता बोले यह बालक मूर्ख, झूठा, गंवार है आप विद्वान हो। कबीर जी ने कहाः-

निरंजन धन तेरा दरबार-निरंजन धन तेरा दरबार। जहां पर तनिक ना न्याय विचार। (टेक)
वैश्या ओढे मल-मल खासा गल मोतियों का हार। पतिव्रता को मिले न खादी सूखा निरस आहार।।
पाखण्डी की पूजा जग में सन्त को कहे लबार। अज्ञानी को परम विवेकी, ज्ञानी को मूढ गंवार।।
कह कबीर सुनो भाई साधो सब उल्टा व्यवहार। सच्चों को तो झूठ बतावें, इन झूठों का एतबार।।

बन्दी छोड़ कबीर परमेश्वर जी अपने घर चले गए। वह ऋषि विवेकानन्द अपने गुरु रामानन्द स्वामी जी के आश्रम में गया तथा सर्व घटना की जानकारी बताई। हे स्वामी जी! एक छोटी जाति का जुलाहे का लड़का कबीर अपने आप को बड़ा विद्वान् सिद्ध करने के लिए भगवान् विष्णु जी को नाशवान बताता है। हे ऋषि जी! उसने तो हम ब्रह्मणों का घर से निकलना भी दूभर कर दिया है। हमारी नाक काट डाली अर्थात् हमें महा शर्मिन्दा (लज्जित) होना पड़ रहा है। उसने कल भरी सभा में कहा है कि पंड़ित रामानन्द स्वामी मेरे गुरु जी हैं। मैंने उनसे दिक्षा ले रखी है। उस कबीर ने तिलक भी लगा रखा था जैसा हम वैष्णव सन्त लगाते है। अपने शिष्य विवेकानन्द की बात सुनकर स्वामी रामानन्द जी बहुत क्रोधित होकर बोले हे विवेकानन्द कल सुबह उसे मेरे सामने उपस्थित करो। देखना सर्व के समक्ष उसकी झूठ का पर्दाफाश करूँगा।

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जब देश की नौजवान पीढी को "जीने की राह" जैसी दिशा दिखाने वाली पुस्तके पढने को मिलेगी। तो क्यो मेरा देश Super India नही बन...
10/07/2022

जब देश की नौजवान पीढी को "जीने की राह" जैसी दिशा दिखाने वाली पुस्तके पढने को मिलेगी। तो क्यो मेरा देश Super India नही बनेगा।

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