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14/05/2026

हनुमान मंदिर कि स्थापना पर भड़के कट्टरपंथी मुस्लिम।
आंध्र प्रदेश के कडप्पा में शोभा यात्रा और 35 फीट ऊंची हनुमान मूर्ति स्थापना के विरोध में .......See More

सिवान की बेटी ने फिर किया कमाल! मियां के भटकल पंचायत (जिरादेई) की रहने वाली अमृता यादव ने एशियन चैंपियनशिप में अभी हाल ह...
03/05/2026

सिवान की बेटी ने फिर किया कमाल!
मियां के भटकल पंचायत (जिरादेई) की रहने वाली अमृता यादव ने एशियन चैंपियनशिप में अभी हाल ही में (साइकिल रेस) में मेडल जीतकर इतिहास रच दिया है।
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6 साल की लंबी तपस्या, अटूट मेहनत और परिवर्तन एकेडमी के बेहतरीन मार्गदर्शन का ही नतीजा है कि आज अमृता साइकिलिंग में मेडल लाने वाली बिहार की दूसरी लड़की बनी हैं। अब तक अमृता कुल 6-7 मेडल अपने नाम कर चुकी हैं।
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अमृता की यह सफलता उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो अपने सपनों के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं।
हमारी टीम आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है
??

03/05/2026

#गान फटे तो फटे #नवाबी ना घटे कैमरा ऑन है टोपी तो पहन कर ही रहूंगा चाहे कुछ हो जाए ! 😀😂

16/01/2026

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भूमिहार समाज की एक और बेटी गाजीपुर जिले की शान रेवतीपुर गांव निवासी आदरणीय श्री राजेश राय जी के सुपुत्री अंतरराष्ट्रीय व...
12/01/2026

भूमिहार समाज की एक और बेटी गाजीपुर जिले की शान रेवतीपुर गांव निवासी आदरणीय श्री राजेश राय जी के सुपुत्री अंतरराष्ट्रीय वालीवाल खिलाड़ी अनन्या राय जी जिन्होंने गाज़ीपुर का नाम पूरे विश्व में रोशन किया है हम भूमिहार परिवार के इस पेज की ओर से आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं

12/01/2026

Maharashtra के Satara में आठ घंटे पहले जन्मी बेटी,स्ट्रेचर पर पत्नी ने जाबांज पति को दी अंतिम विदाई

भूमिहार समाज के सच्चे सिपाही – आशुतोष कुमारपिछले 15 वर्षों से आशुतोष कुमार लगातार समाज के हक और सम्मान की लड़ाई लड़ते आ ...
11/01/2026

भूमिहार समाज के सच्चे सिपाही – आशुतोष कुमार
पिछले 15 वर्षों से आशुतोष कुमार लगातार समाज के हक और सम्मान की लड़ाई लड़ते आ रहे हैं।
उन्होंने बिना थके, बिना रुके, हर मंच पर भूमिहार समाज की आवाज़ बुलंद की है।
चाहे शिक्षा का मुद्दा हो, रोजगार का सवाल हो, सम्मान और पहचान की लड़ाई हो —
आशुतोष कुमार हमेशा आगे खड़े दिखाई दिए।
जब भी समाज पर अन्याय हुआ,
जब भी आवाज़ दबाने की कोशिश हुई,
आशुतोष कुमार चट्टान बनकर खड़े रहे।
15 साल का ये सफर आसान नहीं था —
आलोचनाएँ भी मिलीं, संघर्ष भी मिला,
लेकिन उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया।
आज भूमिहार समाज में जो जागरूकता है,
जो आत्मसम्मान की भावना है,
उसमें आशुतोष कुमार के संघर्ष की बड़ी भूमिका है।
हम सबको गर्व है ऐसे नेता पर —
जो सिर्फ राजनीति नहीं करता,
बल्कि समाज के लिए जीता है।
सलाम है आपके 15 साल के संघर्ष को,
आशुतोष कुमार Ashutosh Kumar !
आपकी लड़ाई हमारी पहचान है।

 #नालंदा विश्वविद्यालय-1300 में  #बख्तियार खिलजी ने लगवा दी थी आग #तुर्की का सैन्य कमांडर बख्तियार खिलजी गंभीर रूप से बी...
11/01/2026

#नालंदा विश्वविद्यालय-1300 में #बख्तियार खिलजी ने लगवा दी थी आग

#तुर्की का सैन्य कमांडर बख्तियार खिलजी गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। सारे हकीम हार गए परंतु बीमारी का पता नहीं चल पाया। खिलजी दिनों दिन कमजोर पड़ता गया और उसने बिस्तर पकड़ लिया। उसे लगा कि अब उसके आखिरी दिन आ गए हैं।

एक दिन उससे मिलने आए एक बुज़ुर्ग ने सलाह दी कि दूर #भारत के #मगध साम्राज्य में अवस्थित #नालंदा महाविद्यालय के एक ज्ञानी #वैद्यराज राहुल शीलभद्र को एक बार दिखा लें, वे आपको ठीक कर देंगे। खिलजी तैयार नहीं हुआ। उसने कहा कि मैं किसी काफ़िर के हाथ की दवा नहीं ले सकता हूँ, चाहे मर क्यों न जाऊं!!

मगर बीबी बच्चों की जिद के आगे झुक गया। राहुल शीलभद्र जी तुर्की आए। खिलजी ने उनसे कहा कि दूर से ही देखो मुझे छूना मत क्योंकि तुम काफिर हो और दवा मैं लूंगा नहीं। राहुल शीलभद्र जी ने उसका चेहरा देखा, शरीर का मुआयना किया, बलगम से भरे बर्तन को देखा, सांसों के उतार चढ़ाव का अध्ययन किया और बाहर चले गए।

फिर लौटे और पूछा कि कुरान पढ़ते हैं?

खिलजी ने कहा दिन रात पढ़ते हैं!

पन्ने कैसे पलटते हैं?

उंगलियों से जीभ को छूकर सफे पलटते हैं!!

#शीलभद्र जी ने खिलजी को एक कुरान भेंट किया और कहा कि आज से आप इसे पढ़ें और राहुल शीलभद्र जी वापस भारत लौट आए।

उधर दूसरे दिन से ही खिलजी की तबीयत ठीक होने लगी और एक हफ्ते में वह भला चंगा हो गया। दरअसल राहुल शीलभद्र जी ने कुरान के पन्नों पर दवा लगा दी थी जिसे उंगलियों से जीभ तक पढ़ने के दौरान पहुंचाने का अनोखा तरीका अपनाया गया था।

खिलजी अचंभित था मगर उससे भी ज्यादा ईर्ष्या और जलन से मरा जा रहा था कि आखिर एक काफिर ईमानवालों से ज्यादा काबिल कैसे हो गया?

अगले ही साल उसने सेना तैयार की और जा पहुंचा नालंदा महाविद्यालय मगध बंगाल क्षेत्र। पूरी दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान और विज्ञान का केंद्र। जहां 10000 छात्र और 1000 शिक्षक एक बड़े परिसर में रहते थे। जहां एक तीन मंजिला इमारत में विशालकाय पुस्तकालय था, जिसमें एक करोड़ पुस्तकें, पांडुलिपियां एवं ग्रंथ थे।

#खिलजी सेना और #कुतुबुद्दीन ऐबक के समर्थन,इस अभियान में #स्थानिय लूटरों और #बाहरी लूटेरों का फौज के साथ और पूरी तैयारी के साथ मगध बंगाल आया।

बख्तियार खिलजी के मनेर क्षेत्र और सेन पर बड़ी तैयारी के साथ अचानक आक्रमण से #बिहार के शासकों ( #मनेर, #सेन वंश सहित) को शायद तुर्की आक्रमणकारी खिलजी के बढ़ते खतरे और उसकी शक्ति का सही अंदाजा नहीं था, लड़े नहीं तैयारीन होने के बावजूद, साहस और दृढ़ता से लड़े ।
#सेनवंश और #मनेर के #ब्रह्मर्षि राजा, जिन्हें स्थानीय रूप से राजा #मनियार या मनियार सिंह कहा जाता है, ने #बख्तियार खिलजी का जोरदार विरोध किया था, लेकिन वे हार गए और मनेर के पतन के बाद उनका किला नष्ट हो गय।

पूरे #नालंदा को तहस नहस कर जब वह लौटा तो रास्ते में #विक्रम शिला विश्वविद्यालय को भी जलाते हुए लौटा। मगध क्षेत्र के बाहर #नदिया ( #बंगाल) में वह रूक गया और वहां खिलजी साम्राज्य की स्थापना की।

#नालंदा महाविद्यालय के हजारों छात्र और शिक्षक गाजर मूली की तरह काट डाले गए (क्योंकि कि वह सब अचानक हुए हमले से अनभिज्ञ थे)। खिलजी ने फिर ज्ञान विज्ञान के केंद्र पुस्तकालय में आग लगा दी। कहा जाता है कि पूरे तीन महीने तक पुस्तकें जलती रहीं।

#खिलजी चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था कि तुम काफिरों की हिम्मत कैसे हुई इतनी पुस्तकें पांडुलिपियां इकट्ठा करने की ? बस एक दीन रहेगा धरती पर बाकी सब को नष्ट कर दूंगा ।

पूरे #नालंदा को तहस नहस कर जब वह लौटा तो रास्ते में विक्रम शिला विश्वविद्यालय को भी जलाते हुए लौटा। मगध क्षेत्र के बाहर बंगाल में वह रूक गया और वहां खिलजी साम्राज्य की स्थापना की। जिसके बाद #लक्ष्मण सेन और उनके उत्तराधिकारियों ने #पूर्वी बंगाल ( #विक्रमपुर क्षेत्र) में शरण ली और वहाँ शासन किया!

जब वह #लद्दाख क्षेत्र होते हुए तिब्बत पर आक्रमण करने की योजना बना रहा था तभी एक रात उसके एक कमांडर ने उसकी निद्रा में हत्या कर दी। आज भी बंगाल के पश्चिमी दिनाजपुर में उसकी कब्र है जहां उसे दफनाया गया था।

और सबसे हैरत की बात है कि उसी दुर्दांत हत्यारे के नाम पर बिहार में बख्तियारपुर नामक जगह है जहां रेलवे जंक्शन भी है जहां से नालंदा की ट्रेन जाती है।

यह थी एक भारतीय वैद्यराज शीलभद्र की शीलता, जिन्होंने तुर्की तक जाकर तथा दुत्कारे जाने के पश्चात भी एक शत्रु की प्राण रक्षा अपने चिकित्सकीय धर्म का पालन किया बुद्धि और कौशल से ।

बदले में क्या मिला???

शांतिप्रिय समुदाय की एहसान फरामोशी! प्राण, समाज व संस्कृति पर घात!!!

दुर्भाग्यवश तबसे अब तक कुछ नहीं बदला। हम आज भी उस क्रूर विदेशी आक्रांता के नाम पर बसाये गये शहर का नाम तक नहीं बदल सके।

क्योंकि देश में सुशासन और तृप्तिकरण का राज है ।

नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त वंश के ब्रह्मर्षि राजा ** कुमारगुप्त प्रथम (Kumargupta I)** ने 4- 5वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 415-455 ईस्वी) में की थी, हर्षवर्धन,सेन और मनेर राजा के समय नालंदा विश्वविद्यालय अपने ज्ञान, वैभव और छात्र संख्या के शिखर पर था, जहाँ दुनिया भर से छात्र आते थे।

मनेर में शहीदों की बड़ी संख्या में कब्रें इस बात का प्रमाण हैं कि राजा द्वारा दिया गया प्रतिरोध बहुत बड़ा था और मुसलमानों ने मैनर पर कब्जा करने के बाद राजा की सेना का अधिकांश हिस्सा नष्ट कर दिया था।

11/01/2026

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14/05/2025

रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँती विपरीत।।

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