Aligarian Boy

Aligarian Boy "History, headlines & sports." "From cricket pitches to world affairs legacy in motion."
- "Where history meets today, and sports unite us."
- "Cricket.
(5)

Sports. Current Affairs. History. One voice."
- play, and the power of knowledge."

जब बाबर काबुल में था, तो कहा जाता है कि राणा सांगा का उससे यह समझौता हुआ कि वह इब्राहीम लोधी पर आगरा की ओर से और बाबर उत...
25/08/2026

जब बाबर काबुल में था, तो कहा जाता है कि राणा सांगा का उससे यह समझौता हुआ कि वह इब्राहीम लोधी पर आगरा की ओर से और बाबर उत्तर की ओर से आक्रमण करे. जब आक्रमणकारी ने दिल्ली और आगरा को अधिकृत कर लिया, तब बाबर ने राणा पर अविश्वास का आरोप लगाया. उधर सांगा ने बाबर पर आरोप लगाया कि उसने कालपी, धौलपुर और बयाना पर अधिकार कर लिया जबकि समझौते की शर्तोँ के अनुसार ये स्थान सांगा को ही मिलने चाहिए थे. सांगा ने सभी राजपूत राजाओं को बाबर के विरुद्ध इकठ्ठा कर लिया और सन 1528 में खानवा के मैदान में बाबर और सांगा के बीच युद्ध हुआ. उस समय मेवात के राजा हसन खान मेवाती थे. हसन खान मेवाती की वीरता सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध थी. बाबर ने राजा हसन खान मेवाती को पत्र लिखा और उस पत्र में लिखा "बाबर भी कलमा-गो है और हसन खान मेवाती भी कलमा-गो है, इस प्रकार एक कलमा-गो दूसरे कलमा-गो का भाई है इसलिए राजा हसन खान मेवाती को चाहिए की बाबर का साथ दे."
राजा हसन खान मेवाती ने बाबर को खत लिखा और उस खत में लिखा "बेशक़ हसन खान मेवाती कलमा-गो है और बाबर भी कलमा-गो है, मग़र मेरे लिए मेरा मुल्क(भारत) पहले है और यही मेरा ईमान है इसलिए हसन खान मेवाती राणा सांगा के साथ मिलकर बाबर के विरुद्ध युद्ध करेगा". सन 1528 में राजा हसन खान मेवाती 12000हज़ार मेव घोड़ सवारों के साथ खानवा की मैदान में राणा सांगा के साथ लड़ते-लड़ते शहीद हो गये. मुल्क़ का नाम लेकर भारतवर्ष में शहीद होने वाले वह पहले व्यक्ति थे.
आज इतिहास की पन्नों में राजा हसन खान मेवाती को भुला दिया गया हुआ है. यदि ज्यादा विस्तृत रूप से पढ़ना चाहते है तो मेवात के ऊपर प्रसिद्ध लेखिका शैल मायाराम और इंजीनियर सिद्दीक़ मेव द्वारा लिखी पुस्तकों को अवश्य पढ़िये.

तालिबान, महिला, इस्लाम, शांति और आतंकवाद पर बहस करने से पहले इसे जरूर पढ़ें:वैसे तो उनके नाम कई खोज हैं लेकिन जब वह मिस्र...
25/08/2026

तालिबान, महिला, इस्लाम, शांति और आतंकवाद पर बहस करने से पहले इसे जरूर पढ़ें:
वैसे तो उनके नाम कई खोज हैं लेकिन जब वह मिस्र से इंग्लैंड गई तो, उन्होंने भौतिकी विज्ञान में दो महत्वपूर्ण योगदान दिया। विज्ञान के छेत्र में उनके दो महत्वपूर्ण योगदान के बारे बाद में चर्चा करेंगे सबसे पहले उनके बारे चर्चा शुरू करता हूँ:

यह जानकर हैरानी होती है कि २०वीं शताब्दी की शुरुआत में, जब अल्बर्ट आइंस्टीन , एनरिको फर्मी, अली मुस्तुफा मोशरफ़्फ़ा (जिसे अरब का आइंस्टीन कहा जाता है) जैसे लोग थे, ठीक उसी समय मिस्र की अभूतपूर्व परमाणु भौतिक वैज्ञानिक समीरा मुसा भी थीं। बीसवीं सदी के विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्र में मुस्लिम वैज्ञानिको के बारे हम आज तक काफी हद तक कम प्रतिनिधित्व और अनजान बने हुए हैं, यही कारण है कि अतीत से उनको दस्तावेज करना और वर्तमान में उन्हें प्रेरित करना महत्वपूर्ण है।

समीरा मूसा 1917 में मिस्र में पैदा हुई, 1939 में काहिरा विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी के साथ रेडियोलॉजी ऑनर्स में विज्ञान स्नातक की डिग्री प्राप्त की। विभिन्न सामग्रियों पर एक्स-रे विकिरण के प्रभावों पर शोध करने के बाद, परमाणु विकिरण (atomic radiation) में डॉक्टरेट प्राप्त की, वह बाद में काहिरा विश्वविद्यालय में व्याख्याता और सहायक प्रोफेसर का पद संभालने वाली पहली महिला बनीं।

ऐसे समय में जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था, और हिरोशिमा और नागासाकी में एटम बम बरसाया जा रहा था, ठीक उसी समय समीरा मूसा दुनिया को यह दिखाने के लिए दृढ़ थी कि परमाणु तकनीक हमेशा खतरनाक नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सबसे पहले इंग्लैंड में "Atomic Energy for Peace” (शांति के लिए परमाणु ऊर्जा)" सम्मेलन आयोजित करवाई, जिसने सरकारों से सलाहकार परिषदों की स्थापना करने का आह्वान किया जो उद्योग को विनियमित करे और सुरक्षा खतरों से सुरक्षा प्रदान करे।

यह सब उस समय के दौरान प्रभावशाली ढंग से किया गया था जब परमाणु विकास का ज्ञान कम था और केवल सरकार में शीर्ष अधिकारियों के हाथों में था। समीरा मूसा की इस पहल से
उनके सम्मेलन के एक साल बाद, 1953 में अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक प्रसिद्ध भाषण "atoms for peace (शांति के लिए परमाणु)" दिया। यह पहली बार था कि परमाणु ऊर्जा के विषय का सार्वजनिक रूप से उल्लेख किया गया था, और इसका उद्देश्य इस विचार को फैलाना था कि "atomic dillema (परमाणु दुविधा)" को लोगों के जीवन को बचाने में योगदानकर्ता बनाने के तरीकों की खोज करके हल किया जा सकता है।

इस भाषण ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और परमाणु हथियारों के अप्रसार पर संधि जैसे महत्वपूर्ण संगठनों के लिए वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की, जिसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना और दुनिया भर में परमाणु निरस्त्रीकरण प्राप्त करना है।

समीरा मूसा के योगदान को मान्यता मिली, उल्लेखनीय रूप से, उन्हें शीर्ष गुप्त अमेरिकी परमाणु सुविधाओं (top secret US atomic facilities) का दौरा करने की अनुमति दी गई थी और ऐसा अनुमति पाने वाली वह पहली गैर-अमेरिकी व्यक्ति थीं।

उन्हें अमेरिकी नागरिकता प्राप्त करने और संयुक्त राज्य में रहने के लिए कई प्रस्ताव दिए गए थे, फिर भी उन्होंने "मिस्र, मेरी प्रिय मातृभूमि है, मिस्र मेरी प्रतीक्षा कर रही है" कहकर सभी प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।

सबसे पहले, वह ऐतिहासिक समीकरण (historic equation) के साथ आई जो तांबे जैसी सस्ती धातुओं के परमाणुओं को तोड़ देगी - एक ऐसी खोज जो परमाणु प्रौद्योगिकी के चिकित्सा अनुप्रयोगों, जैसे कि एक्स-रे, को सस्ता बनाने में मदद करेगी।

एक बैठक में जाते समय उनकी कार को अमेरिका में 40 फिट की एक खाई में गिरा कर ड्राइवर फरार हो गया। संदेह है कि यह इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद द्वारा एक सुनियोजित हत्या थी, ताकि मिस्र को परमाणु प्रौद्योगिकी पर विशेष ज्ञान प्राप्त करने से रोका जा सके।

सिसली को इंग्लिश में सिसिली, इटैलियन में सिसिलिया, स्पैनिश में सिसिलियन और अरेबिक में इसे सिसिलिया (صقلیہ) कहते हैं। यह ...
25/08/2026

सिसली को इंग्लिश में सिसिली, इटैलियन में सिसिलिया, स्पैनिश में सिसिलियन और अरेबिक में इसे सिसिलिया (صقلیہ) कहते हैं। यह भूमध्य सागर का सबसे बड़ा आइलैंड है जो इटली प्रायद्वीप से मेसीना जलमडरूमधय के द्वारा अलग होता है और ट्यूनीशिया से 90 मील दूर सिसली जलमडरूमधय द्वारा अलग है।

कभी यह आज़ाद देश होता था फिर इटली ने इसे अपने में मिला लिया अभी यह इटली का ऑटोनॉमस एरिया है।

सन 831 से 1090 तक करीब ढाई सौ साल यहां मुस्लिम हुकूमत रही पहले तूनिशिया का अगालीबा वंश फिर खिलाफते फातमिया और आखिर में बनी क्लब के लोग शासक रहे उन्होंने पालीरमो को सिसली की राजधानी बनाया था जो अभी तक राजधानी है।

उंडुलस (स्पेन) की तरह यहां के मुसलमानों का इतिहास बहुत शानदार है मुस्लिम शासनकाल में सिसली कला ज्ञान शिक्षा व सांस्कृति का केंद्र रह चुका है इसे यूरोपीय इतिहासकारों ने भी स्वीकार किया है क्रूसेड सलीबी जंगों के समय यानी 1224 में इस देश से तमाम मुसलमानों को निकाल दिया गया

अल्लामा इक़बाल सन् 1908 में यूरोप के दौरे से वापस लौटा इस सफर में वह स्पेन भी गए थे जहां कुरताबा की मस्जिद की ज़ियारत की और उस पर अपनी मशहूर नज़्म लिखी जिसमें उन्होंने उंडुलस के लिए अपने जज्बात का इज़हार किया

उसी सफर में वह सिसली भी गए थे और सिसली यानी صقلیہ पर नज़्म लिखी जो बांगे दरा का हिस्सा है इसमें वह खुद भी रोए हैं और दूसरों को भी रुलाया है यहां उनकी नज़्म पेश की जा रही

मुसलमान इतना मायूस क्यों हैं? इस्लामी इतिहास की कुछ बेहद भयानक घटनाओं में से एक मंगोलों व तातारियों के हाथों बगदाद की तब...
25/08/2026

मुसलमान इतना मायूस क्यों हैं?
इस्लामी इतिहास की कुछ बेहद भयानक घटनाओं में से एक मंगोलों व तातारियों के हाथों बगदाद की तबाही थी अपने समय में विश्व के इस सबसे विकसित नगर को बुरी तरह से लूटा व बर्बाद किया गया बग़दाद की तबाही की बातें इतनी दर्दनाक हैं कि आज कई शताब्दियों बाद भी अपना प्रभाव रखती हैं आज भी हम मुस्लमान उसे सुन और पढ़ कर दुखी हो जाते हैं

पर क्या बगदाद की तबाही से इस्लाम मिट गया ? क्या मुसलमान कमज़ोर हो गएं? नहीं एक नशीमन बर्बाद हुआ तो दूसरा नशीमन आबाद कर लिया गया बल्कि नया नशीमन उन्हीं हाथों से आबाद हुआ जिन्होंने पुराने नशीमन को बर्बाद किया था

चंगेज खान का पोता हलाकू खान अपनी सेना के साथ बग़दाद तबाह कर रहा था तो वहीं उसका अपना सगा चचेरा भाई और चंगेज खान का दूसरा पोता बातू खान इस्लाम में दाखिल हो रहे थे वह कलमा पढ़ कर मुसलमान हो रहे थे

यह वह बातू खान हैं जिन्होंने एक शानदार सल्तनत की स्थापना की इनकी सल्तनत में आज के दोनों युद्ध ग्रस्त देश रूस व यूक्रेन भी शामिल थे ईरान के कुछ हिस्सों से शुरू हो कर पूरा सेंट्रल एशिया और पूर्वी यूरोप के देश रुस यूक्रेन पोलैंड और हंगरी भी इनकी सल्तनत का हिस्सा थे नक्शे में देखें मास्को व कीयफ़ दोनों शहर दिखाई देंगे इस सल्तनत को इतिहास में सुनहरा क़बीला या Golden Horde के नाम से जाना जाता है लगभग ढाई सौ साल यह सल्तनत शान से क़ायम रही और इसी ने आज के आधे यूरोप को सभ्यता सिखाई

बातू खान और उनके उत्तराधिकारियों ने वोल्गा नदी के तटीय इलाकों में एक नगर का निर्माण किया जिस का नाम सराय रखा उसे अपनी राजधानी बनाया , यह शहर बगदाद तो न बन सका लेकिन अपनी शान शौकत में बग़दाद से किसी तरह कम भी न था इब्ने बतूता ने अपने सफरनामा में इस नगर की भव्यता और शान शौकत के बारे में जो बयान किया है वह पढ़ने लायक है

Golden Horde पर हालीवुड में कई मूवी बन चुकी है कई टीवी सीरियल भी आ चुके हैं पता नहीं क्यों उर्दू हिन्दी किताबों में इस शानदार सल्तनत की चर्चा नहीं होती

इस पोस्ट का मकसद सिर्फ इतना है कि हम मुसलमानों ने बहुत कुछ देखा है बर्बादियों ने हमें तोड़ा नहीं नया हौसला दिया है और हम पहले से भी बेहतर तरीके से उठ खड़े हुए हैं आज जब कुछ मुसलमानों को मायूस देखता हूं तो अजीब सा लगता है यहां मै अल्लामा इक़बाल के कुछ अशआर पेश करना चाहता हूं

तू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने से
नशा ए मय को ताल्लुक नहीं पैमाने से
है अयां यूरिश ए तातार के अफसाने से
पासबां मिल गए काबे को सनम खाने से
कश्ती ए हक़ का ज़माने में सहारा तू है
अस्रे नो रात है धुंधला सा सितारा तू है

इस्लामिक कल्चर में कोई मनु नहीं है , न ही एक किताब के पांच हजार संस्करण ! पैगम्बर समेत हर मुस्लिम के लिए कुरान ही एक मात...
25/08/2026

इस्लामिक कल्चर में कोई मनु नहीं है , न ही एक किताब के पांच हजार संस्करण ! पैगम्बर समेत हर मुस्लिम के लिए कुरान ही एक मात्र मार्गदर्शन स्रोत है। गंगा-जमनी तहज़ीब/ कल्चर में मनुवाद ज़रूर घुस जाता है । कारण यह है कि इस्लाम के आने से पहले से यहां मनु का भूत हावी था । जाति छोड़कर लोग इस्लाम में ज़रूर आए , लेकिन जातिवाद की कुप्रथा पूरी तरह न छोड़ सके ।इस्लामिक जीवनशैली और फिलॉस्फी न अपनाना जाति का शर्वनाश नहीं होने का कारण बना । आचरण से लोग मनुवादी प्रवृत्ति के ही रह गए । दूसरी ओर इस्लामिक होते जाना कट्टरता की पहचान भी बनकर चुभती रही । जुम्मन बने रहने का द्वंद्व यहां तब भी बना रहा ।

हम एकेश्वरवाद में यकीन रखते हैं। अल्लाह एक है और मोहम्मद (स.) उनके भेजे हुए नबी/ पैगम्बर हैं । मुहम्मद ( स.) हमारे जीवनयापन के रोलरोल मॉडल हैं , उनकी मुहब्बत में सुन्नतें अदा की जाती हैं । चरवाहा थे , ऊंट और बकरियां चराते थे । मेहनतकश थे , अपने होने वाली बीवी और मशहूर बिजनस वुमन खदीजा (रज.) के यहां नौकरी भी की । बादशाह नहीं थे कबिलाई थे , कुरैश कबीले से ताल्लुक रखते थे । प्रो-पीपल और एंटी एस्टेब्लिशमेंट रहे।मसावात/ सामाजिक न्याय और समानता को इस्लाम का उद्देश्य बताया । समाज छोड़कर पहाड़ी पर जाकर शांति पाने के बजाय लोगों के बीच रहकर न्याय करना कर्तव्य बताया । रंगभेद , नस्लभेद और शिशु कन्या हत्या , भ्रूण हत्या के उन्मूलन पर काम किया । मुस्लिम मैरेज एक्ट और प्रॉपर्टी एक्ट पढ़ कर बाकी जेंडर जस्टिस का मोटामोटी अंदाजा आप लगा सकते हैं , जिसको बाद में दुनिया ने सुविधानुसार कॉपी भी किया । "इन्कलाब" शब्द इस्लाम और मुहम्मद (स.) के साथ दुनिया में आया । यही आम हकीकत है जो हर मुसलमान जानता है । जो यह मानता है वह इस सामाजिक समानता/ मसावात की जंग का सिपाही है ।
उदाहरण के तौर पर आप बहुचर्चित तुर्किश धारावाहिक एर्तगुरुल देख सकते हैं । भारत में जिस पेशे/ वर्ग के लोगों को नीच कहकर युगों-युगों से शोषण किया जाता रहा है , उसी पेशे के लोग इस्लाम की शिक्षा और संघर्ष के तरीकों से ख़िलाफत-ए-उस्मानिया की नींव रखते हैं , गाजी बनते हैं ! बकरी चराने वाले, भेड़ की खाल पहनने वाले और कपड़े बुनने वालों ने न जाने कितने तख्त उछाले, कितने सीने दहकाए ! जिन अश्वेत गुलामों के साथ जानवर की तरह बर्ताव किया जाता रहा , वे मुहम्मद (स.) के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले । गुलाम से गाजी और वली बने । बादशाहत और सामंतवाद के मलबे पर ही ख़िलाफत की नींव रखी गई !

भारत के संदर्भ में बात करें तो मुसलमान इस देश में पहले अल्पसंख्यक हैं । सोशियो इकोनोमिक दृष्टि से देखते ही ईबीसी से जेनरल तक एक बड़ा स्पेक्ट्रम नजर आता है । इतिहास की चतुराईयों और इस्लामोफोबिक हथकंडों ने दर्जन भर चिन्हित मुस्लिम वर्गों को एससी / एसटी में आने से वंचित कर दिया । ठीक उसी आधार पर जिस आधार पर आज सिटीजनशिप एक्ट लागू किया गया है । सम्यक जानकारी के लिए संविधान का आर्टिकल 341 ज़रूर पढ़ लीजिए । हमारे यहां कुरैशी बिरादरी के लोग आज भी गोश्त और चमड़ा बेंचने को मजबूर हैं । नट , हलखोर , पवरिया, धोबी आज भी सामनांतर दलित जातियों से बदतर हालत में हैं ।बकरी पालन , मुर्गी पालन ही इनके आय का जरिया है ।
आपका बहुजानों का जीव प्रेम इनके लिए आफत साबित हो रहा है। ब्राह्मणवाद किसी जाति विशेष की प्रवृति नहीं है। इनका शोषण आज भी मनुवादी ब्राह्मणवादी सत्ताधारी कर रहे हैं, चाहे वे हिंदू दलित हों, पिछडे हों या अगडे !

तथाकथित अशराफ और पसमांदा सब मिला कर व्यवस्था में .05 प्रतिशत भी नहीं हैं । अशराफों की चौधराहट मुस्लिम संस्थाओं में जरूर चला करती है , पर मेनस्ट्रीम में आते ही चुपके से महादलित के नीचे आ खड़े होते हैं । वहां ये पहले अल्पसंख्यक हैं , फिर मुस्लिम हैं ..... फिर उनके चौधरी हैं ! सच्चर कमिटी ही पढ़ लीजिए । ताजा उदाहरण चाहिए तो एमयू जामिया में पुलिस बर्बरता को देखिए । अभी नॉर्थ ईस्ट दिल्ली नरसंहार में बहे खून के थक्के भी नहीं जमे हैं ! ऐसा हश्र सिर्फ़ अल्पसंख्यक समुदाय के साथ ही होता है । किसी बहुसंख्यक पिछडे अथवा दलित समाज के ऐसे नरसंहार की कल्पना मात्र से सरकार डोल जाए ।

देश में हमारी बड़ी आबादी पिछड़े में आती है , चिन्हित मुस्लिम वर्गों को दलित में डालने से हिंदू दलित भी डरते हैं । बौद्ध धर्म से इसका काट किया जाता रहा है । हमारा उत्थान तभी संभव है जब वंचित तबकों का एससी/ एसटी में वर्गीकरण हो । दूसरी ओर , अल्पसंख्यक आयोग को दंगे पर रिपोर्ट तैयार करने से फुर्सत दी जाय , ताकि माइनॉरिटी को मुख्यधारा में समायोजित करने के लिए कुछ खास प्लान तैयार करके अपने बहुजन नायकों के समाने रख सके!

ये बड़ी आम सी बातें अगर जान परख लें , तो लोग समझ जाएंगे कि मुसलमान बहुजन आंदोलन का समर्थन बेहिचक और सहजता से क्यूं करते रहे हैं , और क्या आकांक्षाएं लिए चलते हैं । इसलिए बहुजन चिंतकों और नेताओं को सलाह है कि विभिन्न वर्गों के बीच एक "बफर ज़ोन" ज़रूर रखें । कुछ बहस उनपर ही छोड़ दें जो ऐसे खास मुद्दों पर जानकारी रखते हों । एक दूसरे के संघर्षों को पढ़ें, देखें- सुनें और महसूस करें । ऐसा नहीं होने के कारण ही ओबीसी , दलित , माइनॉरिटी कॉन्फ्लिक्ट बढ़ते हैं । इन वर्गों के भीतर की अंतरजातीय परतें हमेशा से घर्षण खा कर चिंगारी फेंकते रही हैं जिससे पूरा समीकरण खाक हो जाता है ।

स्पेन पर मुसलमानो की हुकुमत 775-1492 तक रही। ग़रनाता (Granada) मे स्पेन मे मुस्लिम की आखरी हुकुमत रही क्योकि बाकी तीन-चौ...
25/08/2026

स्पेन पर मुसलमानो की हुकुमत 775-1492 तक रही। ग़रनाता (Granada) मे स्पेन मे मुस्लिम की आखरी हुकुमत रही क्योकि बाकी तीन-चौथाई हिस्सा को ईसाईयो ने पहले क़ब्ज़ा कर लिया था।

एक हिस्सा "सल्तनते ग़रनाता" के नाम से मशहूर है, जिस को नसर बिन यूसुफ़ ने क़ायम किया और तवारीख़ मे उस का बनाया महल "अल अहमर" (लाल) के नाम से मशहूर है।इसी खांदान के आपसी खाना जंगी और साज़िश के वजह कर स्पेन के बादशाह फरदीमेनंड ने 1492 मे ग़रनाता क़ब्ज़ा कर लिया। इस तरह स्पेन से मुस्लिम हुकुमत का नाम मिट गया और एक मुस्लिम वहॉ नही रहे। मगर "अल अहमर" (Alhambra) आलीशान महल आज भी टूरिस्ट के लिये अजूबा है।

1492 मे ग़रनाता के आखरी बादशाह अबू अबदूल्लाह ने जब क़िला "अल अहमर" Alhambra) की चाभी बादशाह फरदीमेनंड को देकर रवाना हुआ तो बीस (20) मील दूर जाकर अलबशराये के पास रूक कर अल अहमर महल के तरफ देखा तो औरतो की तरह रोने लगा। उस की यह हालत देख कर उस की मॉ ने कहा कि " ऐ बूज़दिल जब तू नमर्दों के तरह अपने मूल्क और इस महल को न बचा सका तो अब औरतो की तरह रोने से क्या हासिल?"

आसमॉ ने दौलते ग़रनाता जब बर्बाद की
इब्न बदरू के दिले नाशाद ने फरयाद की (इक़बाल)
آسماں نے دولت غرناطہ جب برباد کی
ابن بدروں کے دل ناشاد نے فریاد کی

(इब्ने बदरू ने दौलते ग़रनाता का मर्सिया लिखा है)

चीन में इस्लाम का इतिहास कोई 1300 साल पुराना है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, चीन में इस्लाम का आरम्भ वर्ष 651 में हुआ। इस...
25/08/2026

चीन में इस्लाम का इतिहास कोई 1300 साल पुराना है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, चीन में इस्लाम का आरम्भ वर्ष 651 में हुआ। इसी पूर्व वर्ष 97 में ही चीन और अरब देशों के बीच आवा-जाही शुरू हो गई थी। उस वक्त एक चीनी नागरिक कान ईंग ने सरकारी दूत की हैसियत से फारस जैसे देशों की यात्रा की। इस के पश्चात बड़ी संख्या में चीनी व अरबी समुद्री जहाज और व्यापारी एक-दूसरे के यहां गए। चीन के थांग राजवंश में दोनों की आवाजाही में उभार आया। तब बड़ी संख्या में अरबी व्यापारी फारस की खाड़ी हो गए भारत और मलाया प्रायद्वीप के जरिए दक्षिणी चीन के क्वांगचओ और छ्वेनचओ जैसे समुद्रतटीय शहर पहुंचे।

इस के बाद और बड़ी संख्या में अरबी व्यापारी फारस और मध्य एशिया से चीन आए। उन्होंने जो रास्ता तय किया था, वहां आज मशहूर रेशम मार्ग कहलाता है। आज यह मार्ग चीन की अरब देशों व ईरान के साथ दोस्ती का प्रतीक माना जाता हैl

वर्ष 757, यानी चीन के थांग राजवंश में, सैनिक विद्रोह को शांत करने के लिए थांग राजवंश के सम्राट ने अरब से सैनिक सहायता की मांग की थी। यहां व्यवस्था बनाने के बाद अरबी सैनीक चीन में ही बस गए, वे चीन के मुसलिमों का एक हिस्सा माने जाते हैं।

चीन के थांग और सुंग राजवंश में बड़ी संख्या में अरबी व्यापारी चीन जाने लगे थे। वे सब इत्र, जड़ी-बूटी और आभूषण के व्यवसाय करते थे। चीन जाने वाले अरबी व्यापारियों की संख्या में बड़ी वृद्धि को देखते हुए अरबी पदाधिकारी ने अपना दूत भी चीन भेजा। 25 अगस्त, 651 को, अरब के तीसरे ख़लीफ़ा उथमान बी अफ़्फ़ान ने ऐसा प्रथम औपचारिक मिशन चीन भेजा था। मिशन ने थांग राजवंश के सम्राट से मुलाकात के दौरान अपने देश के धर्म और रीति-रिवाज से चीनी सम्राट को अवगत कराया। चीन के प्राचीन ग्रंथों में अरबी मिशन के चीन जाने को इस्लाम के चीन में प्रवेश का प्रतीक माना जाता है।

सुंग राजवंश के अंत में जंगेज ने पश्चिम पर कब्जा करने का सैनिक अभियान आरम्भ किया। इन अभियान के दौरान बड़ी संख्या में मकबूज़ा जातियों के मुसलिमों का चीन में स्थानांतरण हुआ। इन जातियों में खोरजम जाति की जनसंख्या सब से ज्यादा थी। इन जातियों के लोग बाद में चीन में ह्वेई जाति के पूर्वज बने। वर्ष 1271 में मंगोल जाति ने दक्षिण सुंग राजवंश की सत्ता का तख्ता उलटकर य्वान राजवंश की सत्ता स्थापित की। य्वान राजवंश काल में चीन भर में ह्वेई जाति के लोग बसने लगे थे और ह्वेई व उइगुर जैसी दसेक जातियों के लोग मुसलिम बन चुके थे।
चीन के सिंच्यांग उइगुर स्वायत प्रदेश के पश्चिमी भाग में 10 वीं सदी से ही बड़ी संख्या में तुर्क लोग इसलामी धर्म के अनुयाई बन गए थे।

वर्ष 1990 के आंकड़ों के अनुसार, चीन में ह्वेई, उइगुर, कजाख, तुंगश्यांग, करकज, साला, ताजीक, उजबेक, पाउआन और तातार जैसे दस जातियों के लोग इसलाम में विश्वास रखते हैं। इन की कुल संख्या 1 करोड़ 70 लाख है। जिन में से ह्वेई जाति लोग 86 लाख, उइगूर लोग 21 लाख और खजाक लोग 11 लाख 10 हजार हैं।

चीन में अधिकांश मुसलिम सिंच्यांग उइगूर स्वायत प्रदेश में रहते हैं, शेष निंगश्या ह्वेई जाति स्वायत प्रदेश, भीतरी मंगोलिया स्वायत प्रदेश, कानसू, हनान, छिंगहै, युननान, हपेई, शानतुंग, आनह्वेई, प्रांतों और राजधानी पेइचिंग में रहते हैं। इस के अतिरिक्त अन्य प्रांतों, स्वायत प्रदेशों, केन्द्र शासित शहरों, हांगकांग, थाइवान और मकाओ में भी मुसलिमों की आबादी है।

सातवीं सदी के अंत में ह्वेई लोगों ने इसलाम पर विश्वास रखना शुरू किया। पहले खजाक लोग जोरोआस्तर, क्रीस्त धर्म और बौद्ध मत पर विश्वास रखते थे। आठवीं सदी में उन्होंने इसलाम पर विश्वास रखना शुरू किया। दसवीं सदी के मध्य में उइगुर लोगों ने पहले सामान धर्म और फिर मनी धर्म से निकल कर इस्लाम पर विश्वास रखना शुरू किया। 13 वीं सदी में मध्य एशिया से पश्चिमी चीन के लोग कानसू प्रांत में बड़ी तादाद में जा बसे, उन्हों ने मंगोल , ह्वेई और हान लोगों के साथ विवाह रचाना शुरू किया।

तुंगश्यांग लोग इनही की संतान है। साला लोगों के पूर्वज मध्य एशिया के समरकंद से पश्चिमी चीन के छिंगहै प्रांत में जा बसे थे। उन्होंने हान और तिब्बती लोगों के साथ विवाह किया। 15 वीं सदी में साला लोगों ने इसलाम पर विश्वास शुरू किया। उन का चीन की हर जाति के साथ विवाह देता है, मुसलिमों के बीच भी विवाह किया जाता है। हालांकि इस प्रकार के विवाह इतने ज्यादा नहीं होते है।

चीन में मस्जिदों की कुल संख्या 30 हजार से अधिक है। चीन के भीतरी और पश्चिमी भाग में मस्जिदों के निर्माण की शैली में फर्क भी काफी ज्यादा है। पश्चिम के मस्जिदों मे अरबी शैली नजर आती है, तो भीतरी चीन की मस्जिदें चीन की परम्परागत शैली की हैं। इमाम व आख़ुंनों की संख्या भी कोई 40 हजार के ऊपर है।

शिवाजी और मुग़लों की लड़ाई को हमेशा धार्मिक रंग दिया जाता है जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है। दोनों के बीच वर्चस्व और सत्ता ...
25/08/2026

शिवाजी और मुग़लों की लड़ाई को हमेशा धार्मिक रंग दिया जाता है जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है। दोनों के बीच वर्चस्व और सत्ता की लड़ाई थी।

शिवजी की पिता शाह जी और दादा मालोजी बीजापुर के सुल्तान की सेना के एक कमांडर थे। उनकी बहादुरी से खुश होकर आदिल शाह ने पुणे की जागीर सौंप दी और सर लश्कर नाम की सेना की एक टुकड़ी का प्रमुख बना दिया।

मालोजी कई साल तक बिना औलाद के रहे। हज़रत शाह शरीफ़ के आशीर्वाद से दो बेटे हुए। मालोजी ने अपने दोनो बेटो का नाम हज़रत के नाम पर रखा एक नाम शाहजी और दूसरे का नाम शरीफ जी।

मालोजी के बाद शाहजी ने पुणे की जागीर सम्भाली और बीजापुर की सुल्तान के सेनापति अम्बर मलिक के अंदर कमांडर रहे। शाहजहां ने जब बीजापुर पर हमला किया तो शाह कुछ वक़्त के लिए मुग़ल सेना में शामिल हो गए इनाम के तौर पर उन्हें बंगलोर की जागीर मिली। लेकिन कुछ समय बाद ही मुग़ल सेना छोड़ वापस अम्बर मलिक के साथ चले गए।

यहां तक लड़ाई मुग़लो और आदिल शाह के बीच थी लेकिन जैसे ही पुणे की जागीर शिवजी के पास आई वो आस पास की जागीर पर भी हमला कर अपना राज बढ़ाने की कोशिश करने लगे जिसके लिए बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी को गिरफ्तार कर लिया और इस शर्त पर छोड़ा की दोबारा पुणे से बाहर किसी दूसरे जागीर पर क़ब्ज़ा नही करेंगे।

लेकिन शिवजी माने नही जिसकी वजह से उनके पिता शाह जी ने उनसे ख़ुद को अलग कर लिया और पुणे छोड़कर दूसरे बेटे के पास चले गए। इधर मुग़लो ने बीजापुर फ़तह कर आदिलशाह को सत्ता से बेदखल कर दिया। शिवजी ने आदिलशाह के बचे हुए अफ़ग़ान लड़ाकों को अपनी सेना में शामिल कर लिया।

दक्कन में अब मुग़लों और मराठों की बीच संघर्ष शुरू हो गया इधर औरंगज़ेब के साथ जयसिंह, उदयभान जैसे कई बड़े राजपूत और उनकी सेना थी तो उधर शिवाजी की अफ़ग़ान लडको की सेना थी।

औरंगज़ेब जबतक जिंदा थे तब मुग़ल मराठों पर हावी थे औरंगजेब की वफ़ात के बाद मराठे मुग़लो पर हावी हो गए। सत्ता का संघर्ष यूँही चलता रहा इसमे कही धर्मयुद्ध जैसा नही जैसा की आज हिंदी फिल्मों और नेताओ द्वारा परोसा जाता है।

Rahil Hasi साहेब ने एक बात लिखी के अहिंसा कायरों की ढाल नही शूरवीरों का धर्म है। अहिंसावादी वो नही जो केवल हिंसा करने की...
25/08/2026

Rahil Hasi साहेब ने एक बात लिखी के अहिंसा कायरों की ढाल नही शूरवीरों का धर्म है। अहिंसावादी वो नही जो केवल हिंसा करने की क्षमता रखते हुए अहिंसावादी हो बल्कि वो है जो हिंसा सह कर भी अहिंसक बना रह सके।

7 जुन 1099 से 15 जुलाई 1099 तक जेरुशलम का मुहासरा सलीबी फ़ौज यानी क्रुसेडर द्वारा किया जाता है और यहां तक के जीत भी हासिल हो जाती है। उसके बाद जब सलीबी इसाईयो ने मुसलमानो के इस पवित्र मज़हबी शहर बैतुलमुक़द्दस (येरुशलम) में क़दम रखा तो उन्होने वहां मौजुद सारे मुसलमानो और यहुदीयों को क़त्ल (मार देना) कर दिया था।

तक़रीबन 70 हज़ार से अधिक गैर फ़ौजी मुस्लमानो (आम नागरिक) को एक मुश्त क़त्ल किया गया था। जो मुसलमान ईसाई फ़ौज से बच गए थे, उन्हे पादरियों द्वारा अपने हांथो से ज़बह किया गया।

इस घटना के पुरे 88 साल बाद 20 सितम्बर 1187 से 2 अक्तुबर 1187 तक चले मुहासरे के बाद हज़रत सलाहुद्दीन अय्यूबी(र.अ.) के क़ियादत मे 2 अक्तुबर 1187 को बैतुल मुक़द्दस (जेरुशलम) को फ़तह कर लिया गया था।

एक लाख से अधिक ईसाई औरत, मर्द व बच्चे उनकी क़ैद में थे। सभी डर के मारे कांप रहे थे, उन्हे डर था के उनसे 88 साल पुराना बदला लेने के लिए उन्हें क़त्ल न कर दिया जाए।

पर सलाहुद्दीन अय्यूबी ने सबको ये कहते हुए छोड़ दिया के हम फ़ौजी लड़ाई में मासूमो को नही मारते। आप आज़ाद हो, जहां चाहो जा सकते हो।

मने कहने का मतलब ये है के हिंसा करने की क्षमता रखते हुए सलाहुद्दीन अय्यूबी ना सिर्फ़ उस समय अहिंसावादी हो गए बल्कि उन्होने अपने पुर्वज पर हुए हिंसा को सह कर (याद कर) भी अहिंसक बना रहे।

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