06/01/2025
*नवधा भक्ति (66-67-68)*
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_मानस मर्मज्ञ श्री रामकिंकरजी द्वारा विवेचन_
*नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो।*
*सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥* ७/४३/७
यह संसार एक समुद्र की तरह है और उसे पार करने के लिये मनुष्य का शरीर एक नौका की तरह है। नाव का संदुपयोग यही है कि यात्री गन्तव्य तक पहुँच जाय। नाव चलाने के लिये पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है। साधना ही मानो पुरुषार्थ है। नाव को गन्तव्य तक ले जाने के लिये पुराने समय में नाव के ऊपर कपड़ा वैंधा रहता था जिसे पाल कहते थे।
आजकल के जलयानों में यथपि इसकी आवश्यकता न रह गयी हो, पर पुराने समय में हवा की दिशा के अनुसार पाल का उपयोग नौका को दिशा व गति देने में होता था। भगवान् राम कहते हैं कि मेरी कृपा ही वायु है।
इसका अर्थ हैं कि व्यक्ति यह मानने की भूल न कर बैठे कि वह अपने पुरुषार्थ के द्वारा, अपनी साधना के द्वारा ही नाव से पार हो जाएगा। वस्तुतः न दिखाई देने वाली वायु की ही भाँति, ईश्वर की अनुकम्पा, अनुकूलता भी परम आवश्यक है।
बहुत से व्यक्ति पुरुषार्थ करने को ही बहुत महत्त्व देते हैं। पुरुषार्थ पर उन्हें वडा अभिमान भी होता है, पर पुरुषार्थी व्यक्ति को कितना सावधान रहना चाहिए, इसके विषय में एक व्यंगात्मक लघुगाया आती है।
एक व्यक्ति ने निर्णय किया कि वह रात्रि में यात्रा करेगा जिससे धूप-ताप से बचा जा सके। रात्रि में वह अपनी नौका में जा बैठा और रातभर बड़े उत्साह और परिश्रम से नाव खेता रहा। पर प्रातःकाल सूर्योदय होने पर उसने देखा कि नाव तो जहाँ थी, वहीं है। वह व्यक्ति सोचने लगा-'रातभर नाव चलाने के बाद भी यह क्या हो गया?"
किसी बुद्विमान् व्यक्ति ने उससे कहा-“भले ही तुम रातभर नाव खेते रहे, पर उससे नाव आगे कैसे बढ़ेगी क्योंकि तुमने लंगर तो उठाया ही नहीं! जब तक लंगर नहीं उठाओगे, सारा परिश्रम व्यर्थ चला जाएगा ।'” इसका अर्थ है कि व्यक्ति अभिमान का लंगर उठाए बिना चाहे जितनी साधना करता रहे, वह जीवन के चरम लक्ष्य की दिशा में एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकता। उसका सारा पुरुषार्थ व्यर्थ ही चला जाएगा।
साधना में निरभिमानिता प्रथम आवश्यकता है। अभिमान ही रावण के विनाश का कारण बन जाता है। भगवान् राम को दण्डकारण्य में विलाप करते हुए देखकर रावण के हृदय में यह संशय उत्पन्न हो जाता है कि “श्रीराम मनुष्य हैं या ईश्वर हैं” इस संशय के निराकरण का उसके पास बड़ा सरल उपाय था। भगवान् शंकर रावण के गुरु हैं। वह उनके पास जाकर अपने संशय का समाधान प्राप्त कर सकता था। पर अभिमान के कारण यह ऐसा नहीं कर पाता।
रावण सोचता है-'क्या मेरे पास बुद्धि नहीं है, तो मैं उनसे जाकर पूरँ?' वह अभिमान के कारण गुरु के महत्त्व को नहीं जान पाता। भगवान् राम साधना के सन्दर्भ में गुरु की महत्ता वताते हुए आगे कहते हैं कि- *करनधार सदगुर दृढ़ नावा।* सद्गुरु ही इस नाव के कर्णधार हैं।
पुराने समय में नाव को नियन्त्रित करने के लिये एक व्यक्ति होता था जो नाव को दाएँ-बाएँ मोडता था, बीच में पड़ने वाली भँवर से बचाता या तथा नाव को सही दिशा में ले जाता था। इसे कर्णधार कहा जाता था। भगवान् राम बताते हैं कि साधक को सही दिशा में ले जाने वाले कर्णधार तो गुरुदेव ही हैं।
इसलिये साधक यदि साधना करना चाहता है तो अपने आप निर्णय न करके गुरुदेव से प्रार्थना करें कि जिससे वे बता दें कि उसके लिये कौन-सी साधना-पद्धति उपयोगी रहेगी। अपनी लीला के माध्यम से भगवान् श्रीराम गुरुदेव की विशेषता को प्रकट करते हैं।
लंका के महायुद्ध में भगवान् विजयी होते हैं। चारों ओर जयध्वनि सुनाई पड़ती है। देवतागण स्तुति करते हैं। पर भगवान् राम इस विजय को किस दृष्टि से देखते हैं? बहुधा देखा जाता है विजय प्राप्ति के वाद व्यक्ति में अभिमान का उदय हो जाता है और पराजय के बाद अनास्था उत्पन्न हो जाती है। दोनों ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं।
भगवान् राम जब लौटकर अयोध्या आते हैं तो कौसल्या अम्बा उन्हें चकित भाव से देख रही हैं कि मेरे पुत्र ने उस दुर्दान्त और शक्तिशाली रावण को कैसे परास्त किया होगा? गोस्वामीजी यही लिखते हैं कि-
*हृदये विचारति बारहिं बारा।*
*कवन भाँति लंकापति मारा॥* ७/६/७
भगवान् राम उनके मन की बात भाप लेते हैं और जो बात कहते हैं वह बड़ी उपयोगी है। वे एक दृष्टान्त देते हुए कहते हैं कि 'वस्तुतः यह युद्ध एक समुद्र की तरह था। और जैसे कोई व्यक्ति समुद्र की लम्बी यात्रा करके आए और यदि कहने लगे कि मैंने इतना विशाल समुद्र पार कर लिया, तो यह तो उसका एक व्यर्थ अभिमान है। समुद्र पार करने वाला व्यक्ति यदि जहाज पर चढ़कर पार हो जाय, तो इसमें अभिमान की क्या बात है?
मुझे भी एक जहाज की आवश्यकता थी जो मुझे प्राप्त हो गया और मैं उस पर सवार हो गया।' भगवान् राम के साथ वे बन्दर भी अयोध्या आए हुए हैं जो लंका में युद्ध गें सम्मिलित हुए थे। वे सब बन्दर गुरु वसिष्ठ के सामने ही खड़े हैं। गोस्वामीजी 'विनयपत्रिका' में बन्दरों को साधना के विविध रूपों में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि-
*कैवल्य-साधन अखिल भालु मर्कट विपुल,*
बन्दर और रीछ ये सब साधन हैं।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि "गुरुदेव एवं साधन और उनके मध्य खड़े भगवान् राम” मानो यही त्रिपुटी है। इन तीनों के योग से ही व्यक्ति का जीवन सार्थक हो जाता है। क्योकि यदि साधन हों पर गुरुदेव न हों तो व्यक्ति अभिमानी बन जाएगा और यदि गुरुदेव हों, पर उनके द्वारा बताए गये साधन क्रियान्वित न हों तो फिर ईश्वर की प्राप्ति कैसे होगी?
भगवान् राम गुरुदेव से बन्दरों का परिचय देते हुए कहते हैं कि-
*'ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे।*
*भए समर सागर कहैं वेरे॥* ७/७/७
"मुझे युद्ध-समुद्र से पार ले जाने के लिये इन बन्दरों की भूमिका एक जहाज की तरह रही है।' प्रभु का यह कथन साधन को गौरव प्रदान करता है क्योंकि सद्गुण रूपी साधनों के द्वारा दुर्गुण रूपी राक्षसों का विनाश होता है। प्रभु वन्दरों का परिचय जहाज के रूप में देते हैं और बन्दरों से गुरुदेव का परिचय कराते हुए कहते हैं कि 'साथियो!
*गुरु बसिष्ठ कुल पूज्य हमारे। इनकी कृपा दनुज रन मारे॥* ७/७/६
रणांगण में गुरुदेव भले ही प्रत्यक्ष रूप से न दिखाई देते रहे हों, पर इनकी कृपा ही कर्णघार के रूप में सर्वदा, युद्ध-समुद्र में दिशा प्रदान करती रही ।' इस प्रकार प्रभु विजय के पीछे गुरुदेव की कृपा और बन्दरों के पुरुषार्य को ही कारण के रूप में देखते हैं।
इसलिये वे कहते हैं कि 'इस विजय अभियान में मेरी कोई भूमिका नहीं है, मैं तो बिना कुछ किए यश का भागीदार बन गया ।' गोस्वामीजी 'मानस' में गुरुदेव को कई रूपों में प्रस्तुत करते हैं। गोस्वामीजी ने अयोध्याकाण्ड के प्रारम्भ में गुरुदेव की वन्दना करते हुए एक दोहे में, जो हनुमान् चालीसा में भी है, कहते हैं कि-
*श्री गुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुघारि।*
'बरनउँ रघुबर विमल जसु जो दायकु फल चारि॥* २/०
मन रूपी दर्पण गुरु के पदरज से स्वच्छ होता है।
व्यक्ति को देखने के लिये दो वस्तुओं की आवश्यकता है। एक तो दृष्टि और दूसरा दर्पण। दृष्टि के अभाव में व्यक्ति देख ही नहीं पाएगा। पर यदि केवल दृष्टि हो, दर्पण न हो, तो व्यक्ति केवल दूसरों को ही देख पाएगा, स्वयं को नहीं देख पाएगा।
बाहर जैसे दृष्टि और दर्पण है वैसे ही अन्तःकरण में जो मन है वह दर्पण है और बुद्धि ही दृष्टि है । दर्पण के ऊपर यदि धूल, मिट्टी और गन्दगी जम गयी हो तो उसमें कुछ भी दिखाई नहीं देगा। अतः इसे साफ करने की आवश्यकता होगी । दृष्टि में भी दोष आ जाने पर व्यक्ति ठीक से नहीं देख पाता। इसलिये दर्पण और दृष्टि दोनों ठीक हों यह आवश्यक है।
गोस्वामीजी कहते हैं कि गुरुदेव की चरणधूलि में वह शक्ति है कि जिससे मन रूपी दर्पण और बुद्धि रूपी दृष्टि दोनों के दोष दूर हो जाते हैं-
*गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन।*
*नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।।*
*तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन।*
*बरनउँ राम चरित भव मोचन।।* १/१/२,३
मन के दोष जब दिखाई देने लगें, तब साधक उन्हें दूर करने का प्रयास करेगा। पर यह बहुत कठिन है। शरीर में रोग हो जाय तो व्यक्ति उसे स्वीकार कर उसका उपचार कराना चाहता है, पर मन के जो रोग होते हैं उनकी विडम्बना यही है कि मन का रोगी अपने आपको रोगी न मानकर दूसरों को रोगी मानता है।
रावण के सन्दर्भ में एक व्यंग्यात्मक प्रसंग आता है। रावण मूर्तिमान् मोह है। मन्दोदरी जब उसे समझाने की चेष्टा करती है तो रावण व्यंग्य करते हुए उससे यही कहता है कि-
*अहो मोह महिमा बलवाना।*
“मै समझ गया कि तुम कितनी मोहग्रस्त हो!
मूर्तिमान् मोह, मन्दोदरी को ही मोहग्रस्त बता रहा है! मन के रोगी का यही लक्षण है। पर गुरुकृपा से व्यक्ति मन तया बुद्धि दोनों के दोषों से मुक्त हो सकता है। बार-बार यह प्रश्न उठाया जाता है कि गुरु बड़े या भगवान् बड़े? दोनों ही बड़े हैं पर साधना काल में गुरु को ही बड़ा मानना चाहिए।
'मानस' में इस सूत्र का एक सुन्दर प्रमाण पार्वतीजी के प्रसंग में आता है। पार्वतीजी नारदजी को अपना गुरु मानती हैं और उनके उपदेश को ग्रहण कर भगवान् शंकर को पति के रूप में पाने के लिये बड़ी कठिन तपस्या करती हैं। भगवान् राम शंकरजी के पास जाकर पार्वतीजी की प्रशंसा करते हैं और उन्हें उनसे विवाह करने का आदेश देकर चले जाते हैं।
उसके बाद जव सप्तर्षि भगवान् शंकर के पास आते हैं तो बे उन्हें पार्वतीजी की परीक्षा लेने का काम सौंप देते हैं। सप्तर्षियो ने आश्चयंचकित होकर पूछा-“'महाराज! भगवान् राम ने भी तो परीक्षा लेने के बाद ही आपको पार्वतीजी से विबाह करने का आदेश दिया होगा! फिर भी आप हमें परीक्षा लेने के लिये क्यों भेज रहे हैं?”
शंकरजी ने कहा-“भगवान् राम परीक्षा लेने में बड़े उदार हैं। वे किसको कौन-सा प्रमाणपत्र दे दें, कुछ पता नहीं । इसलिये उनके प्रमाणपत्र को उस व्यक्ति की योग्यता का प्रमाणपत्र न मानकर प्रभु की कृपा का प्रमाणपत्र मानना चाहिए। अतः आप लोग जाकर ठीक से परीक्षा लें।”
*"पारवती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु ।* १/७७
सप्तर्षियो ने पार्वतीजी के पास जाकर प्रश्न पूछना प्रारम्भ किया-“आप किसलिये तपस्या कर रही हैं?” बोलीं-
*चाहिअ सदा सिवहिं भरतारा॥* १/७७/७
“शंकरजी को पतिरूप में पाने के लिये।”
पूछने वाला अपने आपको यह मानकर प्रश्न करता है कि "मैं सबसे अधिक ज्ञान रखता हूँ', तो वह बड़े संकट में पड़ सकता है। कई वार लोग मेरे पास भी पूछने के लिये आते हैं। पर जव वे प्रश्न करते हैं तो मैं उनके हाव-भाव से समझ जाता हूँ कि वे जानने के लिये नहीं, परीक्षा लेने के लिये आए हैं।
इसलिये मैं उनसे यही कहता हूँ कि आप इतना ध्यान लगाकर अध्ययन करते हैं, आपने भी कुछ सोचा होगा? और जब वे बताते हैं तो मैं उनसे कहता हैँ कि 'आपने बिलकुल ठीक सोचा है।' बे प्रसन्न होकर लौटते हैं कि मैंने भी प्रमाणपत्र दे दिया।
पार्वतीजी समझ गयीं कि सप्तर्षिगण परीक्षा लेने के लिये आए हुए हैं। इसलिये उन्होंने प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर दिया कि 'वुद्धिचातुर्य जैसी कोई विशेषता मुझमें नहीं है।' वे कहती है-
*देखहु मुनि अविवेकु हमारा।*
*चाहिअ सदा सिवहि भरतारा॥* १/७७/७
सुनकर सातों महात्मा हँसने लगे । पूछा-“आपने किससे दीक्षा ली है?”
श्री नारद मेरे गुरु हैं।”
सप्तर्षियों ने व्यंग्य करते हुए कहा-“तुमने गुरु का बिलकुल गलत चुनाव किया है। नारद क्या जाने विवाह कराना? यदि जानता होता तो कम से कम अपना विवाह तो करा ही लेता! नारद को तुम जानती ही नहीं। उसकी चेष्टा तो यही रहती है कि कोई विवाह ही न करे। और यदि कहीं विवाह हो भी गया हो तो वह यही चाहता है कि वह टूट जाय। तुमने ऐसे नारद की बात मान ली! अब समझ में आया कि तुम पत्थर की ही तो बेटी हो ना!”
सप्तर्षि जव अपनी बात पूरी कर चुके तो पार्वतीजी ने कहा-“महाराज! मैंने तो पहले ही कह दिया था कि मैं विवेकरहित हूँ, जड़ हूँ। पर आप लोग यह बताइए कि जो पत्थर को उपदेश दे उसे क्या कहेंगे?” सप्तर्षियों को चुप हो जाना पड़ा।
पर उन्होंने हार नहीं मानी। वे कहने लगे-“ठीक है! तुम हमारी बात नहीं मान रही हो, पर जिनको पाने के लिये साधना कर रही हो यदि वे भगवान् शंकर स्वयं आकर तुम्हें नारद के उपदेश का परित्याग करने के लिये कह दें, तब तो तुम मान जाओगी न?”
यह बड़ा कठिन प्रश्न था। पर पार्वतीजी ने इसका जो उत्तर दिया बह साधना का प्राण है। वे बोली-“'भगवान् शिव तो मेरे परमाराध्य हैं, पर-
*तजउँ न नारद कर उपदेसू।*
*आप कहहिं सत वार महेसू॥* १/८०/६
उनके एक क्या सौ वार कहने पर भी मैं अपने गुरुदेव नारद के उपदेश का परित्याग नहीं कहूँगी /” यही साधना का महानतमू सूत्र है। सप्तर्षि उन्हें प्रणाम कर बड़ी प्रसन्नता से उनसे विदा लेते हैं।
रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में मानस-रोगों के सन्दर्भ में गुरु की भूमिका के महत्त्व को समझाते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि दवाएँ तो बहुत हैं-
*नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।*
*भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान॥* ७/१२१ (ख)
और लोग मनमानी दवा भी खा रहे हैं, पर रोग घट नहीं रहा है। और यदि एक रोग घट भी जाय तो दूसरा रोग बढ़ जाता है। अतः मानस रोगों को दूर करने के लिये ठीक दवा का निर्धारण करने वाला वैद्य तो सद्गुरु ही हे-
*सदगुर बैद वचन विस्वासा ।*
*संजम यह न विषय कै आसा॥* ७/१२१/६
बाजार में मिलने वाली बहुत-सी दवाओं के साथ जो पर्ची (सुचना ) होती है उसमें लिखा रहता है कि 'यह दवा चिकित्सक के परामर्श से लें। इसका अर्थ है कि बिना चिकित्सक के परामर्श के भी कभी-कभी दवा लाभ पहुँचा देती है, पर कभी-कभी बहुत हानि भी कर देती है।
अतः वैद्य के अनुसार रोग और दवा का निर्णय उचित माना जाता है। साधना का भी सत्य यही है। गुरु जो बताए उस मार्ग पर विश्वासपूर्वक चलकर साधक अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
रावण अपने आपको सबसे अधिक बुद्धिमान् मानता है। उसे इसका अहं भी है, अतः वह किसी की बात नहीं मानता। हनुमानूजी रावण के रोग को समझ गये। अतः उन्होंने रावण के हित के लिये जब दवा वताई, तो सुनकर वह व्यंग्यपूर्वक हँसने लगा-
*मिला हमहि कपि बड़ गुर ग्यानी।*
“एक बन्दर ही गुरु बन रहा है!” रावण तो अपने से बढ़कर योग्य किसी को मानता ही नहीं।
इस सन्दर्भ में मैं एक संस्मरण नहीं भूल पाता। एक सज्जन जब विद्यार्थी थे, तो पाठ्य पुस्तकों के साथ-साथ अन्यान्य विषयों के ग्रन्थों को भी पढ़ने का उन्हें शौक था। एक बार उन्होंने एलोपैथी चिकित्सा का एक ग्रन्य पढ़ा। पढ़कर उनके सामने एक समस्या आ गयी। उसके एक अध्याय में जिस रोग के लक्षणों का वर्णन था, उन्हें लगा कि वह रोग तो उनमें ही विद्यमान् है। वे धबराकर डॉक्टर के पास पहुँचे। और यह बताने के लिये कि “मैं ऐसा-वैसा रोगी नहीं हुँ, एलोपैथी का मैंने अध्ययन किया है, अपनी तकलीफ न बताकर एक रोग का नाम बताकर कहने लगे कि मुझे यह
रोग हो गया है।
सुनते ही डॉक्टर हँसकर लोट-पोट हो गया। उन्होंने पूछा-“मैं रोग की बात कर रहा हूँ, पर आपको हँसी क्यों आ रही है?” डॉक्टर ने कहा कि 'हँसी इसलिये आ रही है, क्योंकि जिस रोग का नाम तुम ले रहे हो वह तो केवल स्त्रियों को होता है, पुरुषों को नहीं।
तुमने उसके लक्षण तो पढ़े पर यह नहीं पढ़ा कि यह रोग किसको होता है।' इसका अर्थ है कि जैसे वैद्य पर ही रोग और दवा के निर्णय का भार होना चाहिए वैसे ही मानसिक रोग के निदान और उसे दूर करने के उपाय के लिये गुरु का ही आश्रय लेना चाहिए। इसीलिये भगवान् राम कहते हैं कि * गुरु के चरणों की अमान भाव से सेवा करना मेरी तीसरी भक्ति है*
*॥बोलिये सियावर रामचन्द्र की जया ।*
जय जय श्रीसीताराम 🙏
क्रमशः ..........!