05/05/2024
स्त्री सिर्फ़ तब तक
हमारी होती है
जब तक वो हमसे
रूठ लेती है,
लड़ लेती है
आँसू बहा बहा कर,
और दे देती है
दो चार उलाहना हमें /
कह देती है
जो मन में आता है उसके
बिना सोचे, बेधड़क
लेकिन जब वो देख लेती है
उसके रूठने का,
उसके आँसुओं का
कोई फर्क़ नहीं है
तो एकाएक वो
रूठना छोड़ देती है
रोना छोड़ देती है /
मुस्कुरा कर देने लगती है
ज़वाब हमारी बातों पर,
समेट लेती है वो ख़ुद को
किसी कछुए की तरह
अपने ही कवच में,
और हम समझ लेते हैं कि
सब कुछ ठीक हो गया है /
हम जान ही नहीं पाते
कि ये शान्त नहीं है
मृतप्राय हो चुकी है,
कहीं न कहीं
गला घोंट दिया है
उसने अपनी भावनाओं का,
और अब जो हमारे पास है,
वो हमारी हो कर भी
हमारी नहीं है /
क्योंकि स्त्री,
सिर्फ तब तक
हमारी होती है
जब तक प्रेम फैल रहा होता है
15/04/2024
#महीने में एक बार जरुर करें बीवी से झगड़ा,
मिलेंगे ये 8 ायदे...!!
बीवी से झगड़े के फायदे आपको किसी ने
बताए नहीं। कोई बताए भी क्यों...!!
अपने सुख को कोई किसी से क्यों बांटने लगेगा।
लेकिन हम हैं सच्चे समाजसेवी...!!
हम तो बता कर ही रहेंगे कि इसमें कितना फायदा है।
तो देर मत करिए पढ़िए कितने फायदे का सौदा है ये...!!
1. नींद में कोई व्यवधान नहीं आता...!!
सुन रहे हो क्या, लाइट बंद करो, पंखा बंद करो,
चादर इधर दो, इधर देखो टाइप
कुछ भी बाते नहीं होती।
2. पैसे की बचत...!!
जब बीवी से झगड़ा हुआ रहता है
इस दौरान बीवी पैसे नहीं मांगती।
3. तनाव से मुक्ति...!!
झगड़े के दैरान बातचीत बंद होती है।
जिससे किचकिच कम होती है
और पति तनाव से मुक्त रहता है।
4.आत्मनिर्भरता आती है...!!
जो अपना काम आप कर सकते हैं
वो इसलिए नहीं करते कि बीवी कर देती है।
झगड़े के बाद वो छोटे मोटे काम
(खुद ले कर पानी पीना, नहाने के बाद
अपने कपडे खुद निकालना,
अपने लिए खुद चाय बनाना)
खुद कर के आदमी आत्मनिर्भर हो जाता है।
5. काम में व्यवधान नहीं होता...!!
झगडे के दौरान काम के समय आपको
बीवी के फ़ालतू कॉल (जानू क्या कर रहे हो,
मन नहीं लग रहा है, आज बहुत गर्मी है,
इस प्रकार के) नहीं आते।
जिससे आप अपने काम में ध्यान
केंद्रित कर सकते है।
6. घर जल्दी जाने की चिंता से मुक्ति...!!
अधिकांश पतियों को काम के बाद जल्दी घर
आने के लिए घर से बारम्बार फ़ोन आते है।
मगर एक बार झगड़ा हो जाने के बाद
आप कुछ दिन तक इस चिंता से
दूर रह सकते है।
7. आप का मूल्य बढ़ता है...!!
ये इंसान का मनोविज्ञान है कि जो चीज
नहीं होती उसके मूल्य का अहसास
तभी होता है।
झगडे के दौरान बीवी को आपकी
मूल्य का अहसास होता है।
8. प्यार बढ़ता है...!!
आपस में झगडे से प्यार बढ़ता है।
क्योकि अक्सर देखा गया है
एक बार बारिश हो जाए तो मौसम
सुहाना हो जाता है।
और भी फायदे हैं।
मगर समयाभाव के कारण लिखना मुश्किल है।
तो आइये प्रण लें कि आज के बाद हम सभी
पति महीने में एक न एक बार अपनी बीवी से
झगड़ा जरूर करेंगे (बीवी तो हमेशा तैयार रहती है)
ताकि महीने में कुछ दिन पति लोग भी कुछ शांति से गुजार सकें।
#विशेष :- झगडा अपनी रिस्क पर व अपनी
सामर्थ्य के अनुसार करे।
इसके साइड इफेक्ट्स की
कोई गारंटी भेजने वाले की नहीं होगी।
🤓😁😊😎
10/04/2024
विवाह के दो वर्ष हुए थे जब सुहानी गर्भवती होने पर अपने घर पंजाब जा रही थी ...
पति शहर से बाहर थे ........
जिस रिश्ते के भाई को स्टेशन से ट्रेन मे बिठाने को कहा था वो लेट होती ट्रेन की वजह से रुकने में मूड में नहीं था इसीलिए समान सहित प्लेटफॉर्म पर बनी बेंच पर बिठा कर चला गया ....
गाड़ी को पांचवे प्लेटफार्म पर आना था ...
गर्भवती सुहानी को सातवाँ माह चल रहा था.
सामान अधिक होने से एक कुली से बात कर ली....
बेहद दुबला पतला बुजुर्ग...पेट पालने की विवशता उसकी आँखों में थी ...एक याचना के साथ सामान उठाने को आतुर ....
सुहानी ने उसे पंद्रह रुपये में तय कर लिया और टेक लगा कर बैठ गई.... तकरीबन डेढ़ घंटे बाद गाडी आने की घोषणा हुई ...लेकिन वो बुजुर्ग कुली कहीं नहीं दिखा ...
कोई दूसरा कुली भी खाली नज़र नही आ रहा था.....
ट्रेन छूटने पर वापस घर जाना भी संभव नही था ...
रात के साढ़े बारह बज चुके थे ..
सुहानी का मन घबराने लगा ...
तभी वो बुजुर्ग दूर से भाग कर आता हुआ दिखाई दिया .... बोला चिंता न करो बिटिया हम चढ़ा देंगे गाडी में ...भागने से उसकी साँस फूल रही थी ..उसने लपक कर सामान उठाया ...और आने का इशारा किया
सीढ़ी चढ़ कर पुल से पार जाना था कयोकि अचानक ट्रेन ने प्लेटफार्म चेंज करा था जो अब नौ नम्बर पर आ रही थी
वो साँस फूलने से धीरे धीरे चल रहा था और सुहानी भी तेज चलने हालत में न थी
गाडी ने सीटी दे दी
भाग कर अपना स्लीपर कोच का डब्बा ढूंढा ....
डिब्बा प्लेटफार्म खत्म होने के बाद इंजिन के पास था। वहां प्लेटफार्म की लाईट भी नहीं थी और वहां से चढ़ना भी बहुत मुश्किल था ....
सुहानी पलटकर उसे आते हुए देख ट्रेन मे चढ़ गई...
तुरंत ट्रेन रेंगने लगी ...कुली अभी दौड़ ही रहा था ...
हिम्मत करके उसने एक एक सामान रेलगाड़ी के पायदान के पास रख दिया ।
अब आगे बिलकुल अन्धेरा था ..
जब तक सुहानी ने हडबडाये कांपते हाथों से दस का और पांच का का नोट निकाला ...
तब तक कुली की हथेली दूर हो चुकी थी...
उसकी दौड़ने की रफ़्तार तेज हुई ..
मगर साथ ही ट्रेन की रफ़्तार भी ....
वो बेबसी से उसकी दूर होती खाली हथेली देखती रही ...
और फिर उसका हाथ जोड़ना नमस्ते
और आशीर्वाद की मुद्रा में ....
उसकी गरीबी ...
उसका पेट ....
उसकी मेहनत ...
उसका सहयोग ...
सब एक साथ सुहानी की आँखों में कौंध गए ..
उस घटना के बाद सुहानी डिलीवरी के बाद दुबारा स्टेशन पर उस बुजुर्ग कुली को खोजती रही मगर वो कभी दुबारा नही मिला ...
आज वो जगह जगह दान आदि करती है मगर आज तक कोई भी दान वो कर्जा नहीं उतार पाया उस रात उस बुजुर्ग की कर्मठ हथेली ने किया था ...
सच है कुछ कर्ज कभी नही उतारे जा सकते......!!
#❤️ #दोस्तों
11/08/2023
पहले चित्र में ये सब्जी वाले जिनका नाम 'सोबरन' है, असम के तिनसुखिया जिले के हैं। जब ये 30 वर्ष के थे तब इन्हें कचरे के डिब्बे में पड़ी रोती हुई छोटी बच्ची मिली, वही बच्ची जो दूसरे चित्र में है... वो उसे अपने साथ घर ले गए... और उन्होंने चुना कि अब उन्हें शादी नही करनी है इसी बच्ची को पालना, पढ़ाना है... उसका नाम उन्होंने ज्योति रखा था...।।
उन्होंने सब्जी बेचते हुए ज्योति को पढ़ाया, आज ज्योति 25 साल की है, 2013 में ज्योति ने कंप्यूटर साइंस से ग्रेजुएशन किया और 2014 में असम पब्लिक सर्विस कमीशन में सेलेक्ट हुईं!
आज ज्योति असम में इनकम टैक्स असिस्टेन्ट कमिश्नर के पद पर कार्यरत हैं!!
आज जब सोबरन से पूछा जाता है कि उस वक़्त क्या आपको पता था कि आप उस बच्ची को पढ़ा लिखाकर इस पद तक पहुंचा देंगे तो वो एक ही बात कहते हैं...
"मुझे नही पता मैंने कचरे से किसको उठाया था मुझे बस इतना पता है कि मुझे कोयले की खान से
एक हीरा मिला था...!!"
प्रणाम है 🙏 उस सोबरन और उस जैसे हर सोबरन को जो जाति, पात, धर्म, द्वेष, हिंसा, क्रूरता, घमंड, अहंकार से दूर होकर किसी मात्र जीवित को जीने लायक जीवन एवं उज्ज्वल भविष्य दे रहे हैं...।।
यही लोग असली हीरो हैं मित्रों 💕❤️💕
25/07/2023
किसी भी लड़की की सुदंरता उसके चेहरे से ज्यादा दिल की होती है।
अशोक भाई ने घर में पैर रखा....‘अरी सुनती हो !'
आवाज सुनते ही अशोक भाई की पत्नी हाथ में पानी का गिलास लेकर बाहर आई और बोली-
"अपनी बिटिया का रिश्ता आया है, अच्छा-भला इज्जतदार सुखी परिवार है, लड़के का नाम युवराज है। बैंक में काम करता है।
बस बेटी हां कह दे तो सगाई कर देते हैं."
बेटी उनकी एकमात्र लडकी थी. घर में हमेशा आनंद का वातावरण रहता था।
कभी-कभार अशोक भाई की सिगरेट व पान मसाले के कारण उनकी पत्नी और बेटी के साथ कहा-सुनी हो जाती थी, लेकिन अशोक भाई मजाक में टाल देते थे।
बेटी खूब समझदार और संस्कारी थी। S.S.C पास करके टयूशन व सिलाई आदि करके पिता की मदद करने की कोशिश करती रहती थी।
अब तो बेटी ग्रेजुएट हो गई थी और नौकरी भी करती थी, लेकिन अशोक भाई उसकी पगार में से एक रुपया भी नही लेते थे। रोज कहते थे ‘बेटी यह पगार तेरे पास रख तेरे भविष्य में तेरे काम आएगी।'
दोनों घरों की सहमति से बेटी और
युवराज की सगाई कर दी गई और शादी का मुहूर्त भी निकलवा दिया गया.
अब शादी के पन्द्रह दिन और बाकी थे. अशोक भाई ने बेटी को पास में बिठाया और कहा- "बेटा तेरे ससुर से मेरी बात हुई...उन्होने कहा दहेज में कुछ नही लेंगे, ना रुपये, ना गहने और ना ही कोई और चीज, तो बेटा तेरे शादी के लिए मैंने कुछ रुपये जमा किए हैं। यह दो लाख रुपये मैं तुझे देता हूँ।
तेरे भविष्य में काम आएंगे, तू तेरे खाते में जमा करा देना.'
"ठीक है पापा" - बेटी छोटा सा जवाब देकर अपने रुम में चली गई. समय को जाते कहां देर लगती है ? दो महीने पहले शुभ दिन बारात आंगन में आई, पंडितजी ने चंवरी में विवाह-विधि शुरु की।
फेरे का समय आया. कोयल जैसे कुहुकी हो ऐसे बेटी दो शब्दो में बोली -"रुको पंडित जी, मुझे आप सब की उपस्थिति में अपने पापा से बात करनी है।"
“पापा आप ने मुझे लाड-प्यार से बड़ा किया, पढाया-लिखाया, खूब प्रेम दिया इसका कर्ज तो चुका सकती नही, लेकिन युवराज और मेरे ससुर जी की सहमति से आपका दिया दो लाख रुपये का चेक मैं वापस देती हूँ।
इन रुपयों से मेरी शादी के लिए लिये हुए उधार वापस दे देना और दूसरा चेक तीन लाख जो मैंने अपनी पगार में से बचत की है. जब आप रिटायर होंगे तब आपके काम आएंगे।
मैं नहीं चाहती कि आप को बुढापे में किसी के आगे हाथ फैलाना पड़े। अगर मैं आपका लड़का होता तब भी इतना तो करता ना ?"
वहां पर सभी की नजर बेटी पर थी. “पापा अब मैं आपसे जो दहेज में मांगू वह दोगे ?"
अशोक भाई भारी आवाज में -"हां बेटा", इतना ही बोल सके।
"तो पापा मुझे वचन दो" आज के बाद सिगरेट को हाथ नहीं लगाओगे. तबांकू, पान-मसाले का व्यसन आज से छोड़ दोगे। सब की मौजूदगी में दहेज में बस इतना ही मांगती हूँ."
लड़की का बाप मना कैसे करता ?
शादी मे लड़की की विदाई समय कन्या पक्ष को रोते देखा होगा लेकिन आज तो बारातियों की आंखों में भी आँसूओं की धारा बह रही थी।
मैं दूर से उस बेटी को लक्ष्मी रुप में देख रही थी. रुपयों का लिफाफा मैं अपनी पर्स से नही निकाल पा रही थी. साक्षात लक्ष्मी को मैं कैसे लक्ष्मी दूं ?
लेकिन “भ्रूण हत्या करने वाले लोगों को इस जैसी लक्ष्मी मिलेगी क्या" ?
25/07/2023
रंजना की शादी एक अमीर संयुक्त
परिवार में हुई थी, वह घर की छोटी बहू थी । उसके ससुर शामलाल जी का होलसेल कपड़ो का बहुत बड़ा व्यापार था।
उससे बड़ी दो जेठानियां और थी पर दोनो ही अमीर घराने की थी जो बहुत दान दहेज लेकर आई थी।
उसके पति घर में सबसे छोटे थे और पैदाइशी लकवाग्रस्त थे इस कारण श्यामलाल जी ने रंजना के पिता जो उन की दुकान में मुनीम थे उनकी तीन बेटियां थी उन्होंने अपनी बड़ी बेटी की शादी में उनसे कर्ज लिया था जो वह चुका नही पा रहे थे इस कारण उनकी इस मजबूरी का फायदा उठाकर उनकी दूसरी बेटी रंजना से अपने अपाहिज बेटे चिराग की शादी करवा दी थी।
उसकी दोनो जेठानियां हमेशा उससे अकडकर रहती थी ।
दोनो ही उससे नौकरानियों जैसा व्यवहार करती थी ।
रंजना एक अच्छे दिल की सु संस्कारी और बहुत पढ़ी लिखी लडकी थी ,उसने अपने पति चिराग को कभी महसूस नही होने दिया की वह अपाहिज है । वह घर में सभी का ध्यान रखती थी।
इस कारण उसके सास ससुर भी धीरे धीरे उससे अच्छा व्यवहार करने लगे थे ।
वक्त गुजरता गया वह एक बेटी मनाली की मां बन गई ,दोनो जेठनियों को दो दो लडके थे इस कारण उन दोनो का घमंड और बढ़ गया था ।
रंजना अपनी बेटी को खुद पढ़ाती थी और उससे कहती की मेरी रानी बेटी एक दिन अपनी मां का सपना पूरा करेगी क्योंकि वह शुरू से ही आई ए एस बनना चहाती थी ,पर जल्दी शादी हो जाने के कारण वह अपना ख्वाब पूरा नही कर पाई थी। उसकी बेटी भी पढ़ने में बहुत अच्छी थी ,वह हर क्लास में अव्वल आती थी इस कारण उस को हर साल स्कालरशिप भी मिलती थी ।दोनो जेठानियों के लड़के लाड प्यार में बिगड़ गए थे वह बहुत मुश्किल से जैसे तैसे पास होते और अपनी कॉलेज की पढ़ाई भी पूरी नही कर सके थे।
यह देख कर अब रंजना की दोनों जेठानियों की अकड़ और गरुर दोनो टूट गए थे उनकी जो गर्दन हमेशा ऐंठी रहती थी वह अब झुकने लगी थी।
अपने बेटो की असफलता के कारण उनके पति और ससुर भी अब उनको डांटते रहते और रंजना की अच्छी परवरिश के लिए उनको बोलते रहते थे यह देखकर वह दोनो अब रंजना से जलने लगी थी।
मनाली ने कॉलेज की पढ़ाई हो जाने के बाद उसने आई ए एस की तैयारी शुरू कर दी थी चिराग और रंजना दोनो उसका हर वक्त ध्यान रखते थे।
प्रतियोगी परीक्षा खत्म हो गई थी अब बस रिजल्ट आने वाला था
रंजना रोज भगवान से प्रार्थना करती मनाली कहती मां चिंता मत करो तुम्हारी बेटी अव्वल आयेगी और ऐसा ही हुआ जब रिजल्ट आया तो मनाली ने पूरे देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया था।
आज सुबह से उनके घर पर पेपर वालो और मीडिया वालो की भीड़ थी ।सभी लोग उसका इंटरव्यू ले रहे थे।
शामलालाजी ने मनाली की इस सफलता पर एक बहुत बड़ी पार्टी रखी थी ,चूंकि उनकी इकलौती
परिवार की एकमात्र बेटी ने आज दुनिया में उनके और उनके परिवार कानाम को रोशन जो किया था ।
25/06/2023
जब कोई चीज मुफ्त मिल रही हो, तो समझ लेना कि आपको इसकी कोई बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
नोबेल विजेता डेसमंड टुटू ने एक बार कहा था कि ‘जब मिशनरी अफ्रीका आए, तो उनके पास बाईबल थी, और हमारे पास जमीन। उनहोंने कहा 'हम आपके लिए प्रार्थना करने आये हैं।’ हमने आखें बंद कर लीं,,, जब खोलीं तो हमारे हाथ में बाईबल थी, और उनके पास हमारी जमीन।’
इसी तरह जब सोशल नैटवर्क साइट्स आईं, तो उनके पास फेसबुक और व्हाट्सएप थे, और हमारे पास आजादी और निजता थी।
उन्होंनें कहा 'ये मुफ्त है।’ हमने आखें बंद कर लीं, और जब खोलीं तो हमारे पास फेसबुक और व्हाट्सएप थे, और उनके पास हमारी आजादी और निजी जानकारियां।
जब भी कोई चीज मुफ्त होती है, तो उसकी कीमत हमें हमारी आजादी दे कर चुकानी पड़ती है।
“ज्ञान से शब्द समझ आते हैं, और अनुभव से अर्थ”
20/06/2023
पूरे चार महीने बाद वो शहर से कमाकर गाँव लौटा था। अम्मा उसे देखते ही चहकी...
"आ गया मेरा लाल! कितना दुबला हो गया है रे! खाली पैसे बचाने के चक्कर में ढंग से खाता-पीता भी नहीं क्या!"
"बारह घंटे की ड्यूटी है अम्मा, बैठकर थोड़े खाना है! ये लो, तुम्हारी मनपसंद मिठाई!"--कहकर उसने मिठाई का डिब्बा माँ को थमा दी!
"कितने की है?"
"साढ़े तीन सौ की!"
"इस पैसे का फल नहीं खा सकता था! अब तो अंगूर का सीजन भी आ गया है!"--अम्मा ने उलाहना दिया।
पूरा दिन गाँव-घर से मिलने में बीत गया था! रात हुई, एकांत में उसने बैग खोलकर एक पैकेट निकाला और पत्नी की ओर बढ़ा दिया--
"क्या है ये?"
"चॉकलेट का डिब्बा, खास तुम्हारे लिए!"
"केवल मेरे लिए ही क्यों!"
"अरे समझा करो। सबके लिए तो मिठाई लायी ही है!"
"कितने का है?"
"आठ सौ का!"
"हांय!!"
"विदेशी ब्रांड है!"
"तो क्या हुआ!"
"तुम नहीं समझोगी! खाना, तब बताना!"
"पर घर में और लोग भी हैं। अम्मा, बाबूजी, तीन तीन भौजाइयां, भतीजे। सब खा लेते तो क्या हर्ज था!"
"अरे पगली, बस चार पीस ही है इसमें, सबके लिए कहाँ से लाता!"
"तो तोड़कर खा लेते!"
"और तुम!"
"बहुत मानते हैं मुझे?"
"ये भी कोई कहने की चीज है!"
"आह! कितनी भाग्यशाली हूँ मैं जो तुम मुझे मिले!"
उसकी आँखें चमक उठी--"मेरे जैसा पति बहुत भाग्य से मिलता है!"
"सच है! लेकिन पता है, ये सौभाग्य मुझे किसने दिया है?"
"किसने?"
"तुम्हारी अम्मा और बाबूजी ने! उन्होंने ही तुम्हारे जैसा हट्टा-कट्टा, सुंदर और प्यार करने वाला पति मुझे दिया है! सोचो, तुम्हारे जन्म पर खुशी मनाने के लिए मैं नहीं थी, एक अबोध शिशु से जवान बनने तक, पढ़ाने-लिखाने और नौकरी लायक बनाने तक मैं नहीं थी। मैं तुम्हारे जीवन में आऊं, इस लायक भी उन्होंने ही तुम्हें बनाया!"
"तुम आखिर कहना क्या चाहती हो?"
"यही कि ये पैकेट अब सुबह ही खुलेगा! एक माँ है, जो साढ़े तीन सौ की मिठाई पर भी इसलिए गुस्सा होती है कि उसके बेटे ने उन पैसों को अपने ऊपर खर्च नहीं किया! और वो बेटा आठ सौ का चॉकलेट चुपके से अपनी बीवी को दे, ये ठीक लग रहा है तुम्हें!"
वो चुप हो गया! पत्नी ने बोलना जारी रखा...
"अम्मा-बाबूजी और लोग गाँव में रहते हैं! तुम ही एकमात्र शहरी हो। बहुत सारी चीजें ऐसी होंगी, जो उन्हें इस जनम में नसीब तो क्या, उनका नाम भी सुनने को नहीं मिलेगा! भगवान ने तुम्हें ये सौभाग्य दिया है कि तुम उन्हें ऐसी अनसुनी-अनदेखी खुशियां दो! वैसे कल को हमारे भी बेटे होंगे! अगर यही सब वे करेंगे तो.......!"
अचानक उसे झटका लगा। चॉकलेट का डिब्बा वापस बैग में रख वो बिस्तर पर करवट बदल सुबकने लगा!
"क्या हुआ? बुरा लगा सुनकर!"
"..............!"
"मर्दों को रोना शोभा नहीं देता! खुद की खुशियों को पहचानना सीखो! जीवन का असल सुख परिजनों को खुश देखने में है! समझे पिया! ✍️