01/04/2026
अस्सलामो अलैकुम व रहमतुल्लाह
तमाम अहले ग्रुप को उर्स तालिबुल कादरी अलैहिर रहमह की बहुत बहुत मुबारकबाद
*ख़ास पेशकश*
शुमाली बिहार की मुक़्तदिर हस्ती शेखुल मशाइख़ कुतुबे दौरां सरकार अलहाज तेग़े अली शाह अलैहिर रहमत व रिज़वान के चहेते ख़लीफ़ा इरशादुल तालिबीन अलाउल मिल्लत वद्दीन हज़रत मौलाना सूफ़ी शाह मुहम्मद अलाउद्दीन तालिबुल कादरी अलैहिर रहमह माज़ी क़रीब की एक अज़ीम शख़्सियत हैं, निहायत शरीफ़ुन्नसब, हलीमुत्तबअ, करीमुज़्ज़ात, और सलीमुल फ़ितरत होने के साथ जफ़ाकश, मेहनती और दीन ए इस्लाम की नश्र व इशाअत में हर वक़्त कोशां रहने वाली आपकी ज़ात अवाम व ख़्वास में यकसां मक़बूल व महबूब थी।
आपके दम क़दम से मुजफ़्फ़रपुर के वसीअ मग़रबी इलाक़े में इस्लामी उलूम व फ़ुनून के सरचश्मे फूट पड़े, जगह जगह मदारिस ए इस्लामिया खोले गए।
तबलीगी दौरों के लिए आप हमेशा हिंदुस्तान के मुक़्तदिर उलमा सूफ़िया और ख़ुतबा को मद्दऊ करते... एक ख़ित्तह जो इस्लामी तालीम व तमद्दुन से ख़ाली था आपने हर तरफ़ शम्अ इल्म व तहज़ीब जला दी... आपका ख़्वान इल्म व फ़न के परवरदा आज हिंदुस्तान के मुख़्तलिफ़ सूबों में इस्लामी ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं।
ज़ाहिरी उलूम के साथ बातिनी उलूम के तालिबीन की एक बड़ी जमाअत को आपने सैराब ए जान फरमाया।
बिहमदिही तआला मैं फ़क़ीर फातेह चिश्ती भी इसी आग़ोश ए विलायत का परवरदा और रेज़ा ख़्वार हूँ।
मेरी तिफ़लियत के तक़रीबन नौ साल आप ही के ज़ेर ए साया गुज़रे, और आपके रूहानी फ़ुयूज़ व बरकात का ही सदक़ा है जो आज मुझ जैसा ज़र्रा ए बेमिक़दार भी बाज़ार यूसुफ़ी के अदना ख़रीदारों में शामिल है।
मैंने ब-चश्मे सर नाना जान अलैहिर रहमह के शब व रोज़ देखे हैं।
आपकी मजलिस कितनी हसीन होती थी मुझे अच्छी तरह याद है कि उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ दीनियात और रूहानियत पर ही गुफ़्तगू होती थी।
नाना जान की मुझ पर ख़ास शफ़क़तें रहीं... आमतौर पर हर हफ़्ते आप घर तशरीफ़ लाते तो मुझ पर ख़ूब शफ़क़तें फरमाते, और आने वाले मेहमानों से मेरा ज़िक्र भी फरमाते... अगर आने वाले कोई आलिम या बुज़ुर्ग होते तो उनसे दुआएं दिलवाते,
हुज़ूर अमीन शरीअत मुफ़्ती रफ़ाक़त हुसैन साहब अलैहिर रहमह से आपको गहरा लगाव था, चुनांचे वो भी आपसे मिला करते थे।
आपकी वालिदा माजिदा आपके बचपन के जब हालात सुनातीं तो मैं आबदीदा हो जाया करता। वो फरमातीं, “बाबू तुम्हारे नाना ने बड़ी मशक़्क़त उठा कर पढ़ाई की है, चावल भून कर मैं उससे रोशनाई बनाती जिससे वो लिखते थे...” नाना जान के बचपन को वो यूँ बयान फरमातीं, “तुम्हारे नाना ने कभी भी किसी को एक भी नाज़ेबा लफ़्ज़ नहीं कहा... वो तमाम बच्चों और अपने हमजोलियों में निहायत शरीफ़ुत्तबअ थे, बचपन से ही बुर्दबारी और ज़ब्त का माद्दा उनमें कूट कूट कर भरा था...”
आपकी मुकम्मल ज़िंदगी सिर्फ़ और सिर्फ़ जद्दोजहद से इबारत थी... इतनी बड़ी शख़्सियत के मालिक होते हुए भी आपने दुनिया और माल ए दुनिया की तरफ़ अस्लन इल्तिफ़ात नहीं फरमाया... ग़ुरबत की तवक्कुल ज़िंदगी गुज़ार कर आपने सिर्फ़ और सिर्फ़ इस्लाहे मआशरा और इशाअते इल्मे दीन को अपना मतलबे नज़र बनाया।
यक़ीनन वो एक बा-इख़्लास आलिमे दीन के साथ एक अज़ीम रूहानी पेशवा थे।
आपसे बहुत सी करामतों का भी ज़ुहूर हुआ, लेकिन अफ़सोस कि गुज़रे वक़्त के साथ इस तरह के वाक़िआत ज़ाहिरी असबाब के न होने के सबब सीनों में ही रह गए... बहुत से लोग अभी भी बक़ैदे हयात हैं जिनसे राबता कर के साहिबे सज्जादा ने उनकी सवानिह तरतीब दिलवाई है... लेकिन इस पर मज़ीद पेश क़दमी की ज़रूरत है।
उनकी सीरत के बहुत से गोशे अभी उजागर नहीं हो सके हैं।
निहायत कम उम्र में आपका विसाल पुरमलाल हुआ जो पूरे ख़ित्ते का दिल हिला देने वाला सानिहा था... लेकिन उस वक़्त तक आपके इल्मी और रूहानी वारिस के तौर पर आपके एकलौते शाहज़ादे उलूमे शरइया से फ़राग़त हासिल कर चुके थे, बाद विसाल... अल्लामा अली अहमद जैयदुल कादरी साहब ने आपकी तमाम इल्मी व रूहानी विरासतों का अमीन हज़रत अल्लामा शहाबुद्दीन कादरी साहब को क़रार दिया और मौसूफ़ मुकर्रम यानी मेरे मामूँ जान तब से अब तक नाना जान के नक़्शे क़दम को आगे बढ़ाने में मसरूफ़ हैं, और एक ज़माना आपके फ़यज़ से फ़य्याज़ हो रहा है।
मौला करीम मेरे मामूँ जान को उम्रे ख़िज़्र मअ सिहत व सलामती अता फरमाए, और मेरे नाना जान के रूहानी मिशन को दवाम बख़्शे आमीन सुम्मा आमीन।
तारीख़ उर्स २/अप्रैल
फातेह चिश्ती मुजफ़्फ़रपुरी
२/४/२३