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आज से ठीक 345 साल पहले मुगल सल्तनत की उस शहजादी का निधन हुआ, जिसे सबसे ताकतवर और खूबसूरत माना गया। वो अपने जमाने की सबसे...
16/07/2026

आज से ठीक 345 साल पहले मुगल सल्तनत की उस शहजादी का निधन हुआ, जिसे सबसे ताकतवर और खूबसूरत माना गया। वो अपने जमाने की सबसे सुसंस्कृत और फैशनेबल शहजादी भी थीं।

#जहाँआरा_बेगम, बादशाह शाहजहां की चहेती राजकुमारी थी। राजकुमारी खरीदारी की शौकीन थी उसे जहां भी कुछ अच्छा लग जाता वो खरीद लेती थी।
यूं तो शाहजहां ने अधिकतर चीज़ें अपने लिए बनवाई थीं। मगर 1650 में शुरू हुआ #चांदनी_चौक का निर्माण उसने ख़ास अपनी बेटी जहाँआरा बेगम के लिए विशेष तौर पर बनवाया था।
#बादशाह_शाहजहां का फरमान था कि इसकी बनावट बाकी सभी बाज़ारों से काफी अलग होनी चाहिए। यही वजह है कि इसे चौकोर आकार में बनाया गया था. इतना ही नहीं इसके बीच का हिस्सा खाली छोड़ा गया था,जहां पर यमुना नदी का पानी आता था।
#शाहजहाँनाबाद जिसे हम आज पुरानी दिल्ली कहते हैं, उसका नक्शा भी जहाँआरा बेग़म ने अपनी देखरेख में बनवाया था।

#दारा_शिकोह और #औरंगज़ेब में उत्तराधिकार का युद्ध चल रहा था तो जहाँआरा बेगम ने दारा शिकोह का साथ दिया। लेकिन जब औरंगज़ेब बादशाह बने तो उन्होंने जहाँआरा बेगम को ही पादशाह बेगम की उपाधि से नवाजा।
दारा शिकोह को हराकर औरंगजेब मुगलिया गद्दी पर बैठे तो जहांआरा इतना खास मुकाम रखती थी कि बादशाह औरंगजेब उनसे ज्यादातर सलाह लेते थे।

16 सितंबर 1681 में 67 साल की उम्र में जहांआरा का निधन हो गया. उनकी मौत की ख़बर औरंगज़ेब के पास तब पहुंची, जब वो अजमेर से दक्कन जाने के रास्ते में थे।
उन्होंने जहाँआरा की मौत का शोक मनाने के लिए शाही काफ़िले को तीन दिनों तक रोक दिया था।

जहांआरा बेगम को उनकी इच्छानुसार दिल्ली में
#हज़रत_निज़ामुद्दीन_औलिया की मज़ार के बग़ल में दफ़नाया गया।
जहाँआरा ने वसीयत की थी कि उनकी क़ब्र कच्ची होनी चाहिए,उसे पक्का नहीं किया जाना चाहिए।
मुग़ल इतिहास में सिर्फ़ औरंगज़ेब और जहांआरा की क़ब्रें ही पक्की नहीं बनाई गई हैं और वो बहुत साधारण कब्र है।

"अल्लाह ही अल-हय्य है और वही थामने वाला है। मेरे मकबरे (कब्र) को सिर्फ हरी घास के सिवा किसी और चीज़ से न ढका जाए, क्योंकि गरीबों के लिए उनकी कब्र पर यह घास ही काफी है। मुनक्सिर-उल-मिज़ाज राजकुमारी जहाँआरा, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मुरीदा, विजेता शाहजहाँ की बेटी—अल्लाह उनकी सनद को वाज़ेह करे।" 1092 [1681 ईस्वी]

जोधाबाई का महल ऐतिहासिक शहर फतेहपुर सीकरी (आगरा) में स्थित है, जो उत्तर प्रदेश राज्य में है। मुगल सम्राट अकबर ने अपनी प्...
14/07/2026

जोधाबाई का महल ऐतिहासिक शहर फतेहपुर सीकरी (आगरा) में स्थित है, जो उत्तर प्रदेश राज्य में है। मुगल सम्राट अकबर ने अपनी प्रिय रानी #मरियम_उज़_ज़मानी ( #जोधाबाई) के लिए 16वीं शताब्दी में इस भव्य महल का निर्माण करवाया था।

मुगल बादशाह #अकबर ने आमेर के #राजा_भारमल की पुत्री से शादी 1562 में की थी। इस विवाह का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक था। इससे मुगल साम्राज्य को राजपूतों का समर्थन और सैन्य शक्ति मिली, जबकि राजपूत राज्यों को मुगलों के आक्रमण से सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता प्राप्त हुई।

आमेर के राजा भारमल अपने राज्य की सीमाओं और आंतरिक विद्रोहों से परेशान थे। उन्होंने अकबर से मदद मांगने और दोनों के बीच शांति समझौता करने के लिए अपनी बेटी का विवाह अकबर से करने का प्रस्ताव रखा।

अकबर एक विशाल साम्राज्य बनाना चाहता था। उसे एहसास हुआ कि भारत पर लंबे समय तक शासन करने के लिए राजपूतों का सहयोग बेहद जरूरी है। इस विवाह ने मुगलों और राजपूतों के बीच एक मजबूत वैवाहिक और सैन्य गठबंधन की नींव रखी।
इस रिश्ते के बाद अकबर को राजपूत सरदारों और उनकी विशाल सेना का समर्थन मिला, जिससे उसे अपने साम्राज्य का विस्तार करने में काफी मदद मिली।

 #मुगल_सम्राट_अकबर की मृत्यु 27 अक्टूबर 1605 को हुई थी। उस समय उनकी आयु 63 वर्ष थी। उनकी मृत्यु पेचिस जैसी गंभीर बीमारी ...
12/07/2026

#मुगल_सम्राट_अकबर की मृत्यु 27 अक्टूबर 1605 को हुई थी। उस समय उनकी आयु 63 वर्ष थी। उनकी मृत्यु पेचिस जैसी गंभीर बीमारी के कारण हुई थी। मुगल सम्राट अकबर का मकबरा उत्तर प्रदेश में आगरा के उपनगर सिकंदरा में स्थित है। 119 एकड़ में फैले इस शानदार मकबरे को 1605-1613 के बीच उनके पुत्र #जहाँगीर द्वारा बनवाया गया था। लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से बनी यह पांच मंजिला इमारत अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए जानी जाती है।

स्थापत्य शैली: यह मकबरा हिंदू, इस्लामी, बौद्ध और जैन कला का एक अनूठा मिश्रण है।
मुख्‍य प्रवेश द्वार: इसके भव्य दक्षिणी प्रवेश द्वार को 'जहाँगीरी गेट' कहा जाता है।
अन्य मुगल मकबरों के विपरीत, इसका प्रवेश द्वार मक्का की ओर न होकर पूर्व दिशा की ओर है।

बादशाह बाबर का पूरा नाम  #जहीरुददीन_मोहम्मद_बाबर था। उसका जन्म 14 फरवरी 1483 ई० को अन्दीजन (फरगना) में हुआ था। उसके पिता...
11/07/2026

बादशाह बाबर का पूरा नाम #जहीरुददीन_मोहम्मद_बाबर था। उसका जन्म 14 फरवरी 1483 ई० को अन्दीजन (फरगना) में हुआ था। उसके पिता का नाम ेख_मिर्जा तथा माता का नाम #कुतलग_निगार था। पित्र पक्ष की ओर से बाबर तैमूर का पांचवा वंशज तथा मातृ पक्ष की ओर से चंगेज खा का चौदहवां वंशज था। इस प्रकार उसके धमनियों में दो वीर विजेताओं का रक्त प्रवाहित था।

#फरगना को जीतने के बाद और अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद वह तैमूर की राजधानी #समरकन्द को जीतना चाहता था जो उसके चाचा अहमद मिर्जा के अधिकार में था।
समरकन्द के विषय में स्वयं बाबर ने लिखा है कि 'मनुष्य के रहने के लायक दुनिया के किसी भी हिस्से में समरकन्द जैसा आनन्ददायक कोई और शहर नहीं है।

#पानीपत का प्रथम युद्ध #बादशाह_बाबर व #इब्राहिम_लोदी के मध्य 21 अप्रैल, 1526 ई० को हुआ। इब्राहिम लोदी के पास एक विशाल सेना थी किन्तु बाबर की सेना संख्या में कम थी लेकिन युद्ध नीति में निपुण थी।
इसी युद्ध में उसने उजबेगों की युद्ध नीति तुलगुमा पद्धति तथा तोपों को सजाने की उस्मानी पद्धति का प्रयोग किया। बाबर की सहायता के लिए #हुमायूं, उसके योग्य सरदार व दो कुशतः तोपची उस्ताद अली व मुस्तफा मैदान में थे। इब्राहिम लोदी के चाचा ां_लोदी ने भी युद्धस्थल में बाबर की सहायता की थी।
इस युद्ध में बाबर के जीत के साथ भारत में #मुगल_साम्राज्य की स्थापना हो गई और इब्राहिम लोदी इस युद्ध में मारे गए थे।

#खानवा का युद्ध (16 मार्च, 1527 ई०)
खानवा के युद्ध का मुख्य कारण बाबर का भारत में रहने का निश्चय था। #राणा_सांगा समझता था कि मध्य एशियाई लुटेरों की भांति बाबर भी दिल्ली को लूटकर तथा लोदी सत्ता को शक्तिहीन कर काबुल लौट जाएगा। इसी लिए उसने बाबर को भारत पर आक्रमण करने व इब्राहिम लोदी के विरुद्ध सहायता देने का वचन दिया था। किन्तु जब बाबर ने भारत में रहने का निश्चय किया तब राणा सांगा उसका विरोधी हो गया। इसके अतिरिक्त जब पानीपत के युद्ध के पश्चात् बाबर ने अफगानों को कुचलने का निर्णय किया तो वे राणा सांगा के दरबार में शरण लिए। इसमें ां_मेवाती, #महमूद_लोदी व आलम खां लोदी प्रमुख थे। इन्होंने राणा सांगा को बाबर से युद्ध करने के लिए उत्तेजित किया।
खानवा गांव में मुगल शासक बाबर और मेवाड़ के राजपूत राजा राणा सांगा के इस निर्णायक युद्ध में मुगल सेना ने राणा सांगा को पराजित किया था। इस जीत के परिणामस्वरूप, बाबर ने उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव को पूरी तरह से मजबूत कर लिया था。

#चन्देरी का युद्ध (29 जनवरी, 1528 ई०)
बाबर के आक्रमण के समय चन्देरी का शासक #मेदिनी_राय था। वह एक शक्तिशाली राजपूत शासक था। अलवर, चंदावर, रापड़ी, इटावा पर अधिकार के बाद बाबर चन्देरी की ओर बढ़ा। सर्वप्रथम उसने शमसाबाद के बदले मेदिनीराय से चन्देरी मांगा। किन्तु मेदिनी राय ने प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अन्त में बाबर ने 29 जनवरी, 1528 ई० को दुर्ग घेर लिया। राजपूतों ने वीरतापूर्वक बाबर का सामना किया और राजपूत स्त्रियों ने जौहर कर लिया। किन्तु अन्त में पराजित हुए। मेदिनीराय युद्ध में मारा गया। चन्देरी पर मुगलों का अधिकार हो गया।

#घाघरा का युद्ध (5 मई, 1529 ई०)
घाघरा का युद्ध अफगानों व बाबर के मध्य हुआ था। यह बाबर का अन्तिम युद्ध था।
बाबर ने गंगा नदी पार कर आगे बढ़ने तथा अफगान एवं बंगाल की संयुक्त सेनाओं को पराजित करने का निश्चय किया। उसने गंगा नदी पार कर घाघरा नदी के तट पर 5 मई, 1529 ई० को अफगानों को पराजित किया। मध्य युगीन इतिहास में घाघरा का युद्ध पहला युद्ध था जो जल एवं थल दोनों पर लड़ा गया।
घाघरा के युद्ध में पराजित होने के बाद अफगानों की शक्ति पूरी तरह से नष्ट हो गयी। #महमूद_खां_लोहानी, जलाल खां, शेर खां सूर तथा #फरीद_खां जैसे अफगान सरदारों ने आत्मसमर्पण कर बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली।

कहां जाता है कि जब हुमायूँ बीमार हो गये थे उचित चिकित्सा के बाद भी उसके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ तो बाबर ने ईश्वर से अपनी जिन्दगी के बदले में हुमायूं के स्वस्थ होने की दुआ मांगी तो हुमायूं के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा तथा बाबर बीमार हो गया। अपनी मृत्यु शैय्या पर उसने हमायूँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। अन्त में 26 दिसम्बर, 1530 ई० को उसकी मृत्यु हो गयी। किन्तु आधुनिक इतिहासकारों ने बाबर की मृत्यु की उपर्युक्त घटना का खण्डन किया है। डॉ० आर०एस० शर्मा के अनुसार बाबर की मृत्यु स्वयं की बीमारी से हुई थी जबकि बाबर की पुत्री #गुलबदन_बेगम ने अपनी पुस्तक हुमायूँ नामा में एक षड्यंत्र द्वारा इब्राहिम लोदी की मां द्वारा उसे विष देने को माना।

मृत्यु के बाद बाबर को आगरा के चार बाग (आरामबाग) में दफनाया गया किन्तु बाद में शेरशाह के शासनकाल में उसकी अस्थियों को उसकी विधवा पत्नी #मुबारक_युसुफजई काबुल ले गई जहाँ उसे एक उद्यान में दफना दिया गया ।।

1504 ई० में काबुल पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् बाबर ने पहली बार तैमूरी परम्परा के विरुद्ध #पादशाह की उपाधि धारण की। इससे पूर्व वह #मिर्जा की पैतृक उपाधि धारण करता था। 1526 ई० में पानीपत के प्रथम युद्ध में विजय के बाद बाबर ने काबुल के प्रत्येक निवासी को एक-एक चांदी का सिक्का दान दिया था। उसकी इस उदारता के कारण उसे ' #कलन्दर' की उपाधि दी गई।

बाबर ने काबुल में चांदी का ' #शाहरुख' तथा कन्धार में ' #बाबरी' नामक सिक्का चलाया। उसके चांदी के सिक्को पर एक तरफ कलमा और चारों खलीफाओं का नाम तथा दूसरी ओर बाबर का नाम व उपाधि अंकित थी।

बाबर ने #तुर्की_भाषा में अपनी आत्मकथा ' #तुजुक_ए_बाबरी' की रचना की। इसे बाबरनामा या वाकियाते-बाबरी के नाम से भी जाना जाता है। सर्वप्रथम अकबर के समय में इसका फारसी भाषा में अनुवाद पायन्दा खां ने किया। इसके तुरन्त बाद 1590 ई० में अब्दुर्रहीम खानेखाना ने इसका फारसी अनुवाद किया। बाबरनामा का फारसी भाषा से अंग्रेजी अनुवाद सर्वप्रथम लीडन, अर्सकिन ने किया था .।।

मुगल साम्राज्य की सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली  शहज़ादी  #मेहरुन्निसा उर्फ नूरजहां 31 मई 1577 को कंधार अफ़ग़ानिस्तान में...
30/06/2026

मुगल साम्राज्य की सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली शहज़ादी #मेहरुन्निसा उर्फ नूरजहां 31 मई 1577 को कंधार अफ़ग़ानिस्तान में पैदाइश हुई। नूरजहां मुग़ल बादशाह #अक़बर के वज़ीर मिर्ज़ा ग्यास बेग़ की बेटी थीं।

यह अफगानिस्तान प्रांत के सूबेदार शेर अफगान अली कुली की बीवी थी
एक संघर्ष में अली कुली की मृत्यु हो गई ।

#नूरजहाँ की सम्राट #जहाँगीर से मुलाकात वसंतोत्सव 'नौरोज़' के दौरान महल के मीना बाज़ार में हुई थी। जहाँगीर को उनसे प्रेम हो गया और उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा। दोनों की शादी 12 रबी-उल-अव्वल, 1020 हिजरी/25 मई 1611 को हुई थी। जहाँगीर ने 1611 में विवाह के अवसर पर उन्हें 'नूर महल' (अर्थात 'महल की रोशनी') और 'नूरजहाँ' (अर्थात 'संसार की रोशनी') की उपाधि दी थी।

बादशाह जहाँगीर की अफीम और शराब की लत ने नूरजहाँ के लिए अपना प्रभाव जमाना और आसान कर दिया था। जहाँगीर का उन पर इतना अटूट विश्वास था कि उन्होंने उन्हें साम्राज्य की सत्ता और फरमानों को तय करने का सर्वोच्च प्रतीक अपनी शाही मुहर सौंप दी थी। इस प्रकार, कई वर्षों तक नूरजहाँ ने शाही सत्ता का उपयोग किया ।

नूरजहाँ ने जहांगीर के बेटे #शाहजहाँ (राजकुमार खुर्रम) की शादी #मुमताज़_महल (अर्जुमंद बानो बेगम) से कराई थी।
जो नूरजहाँ के सगे भाई #आसफ़_ख़ाँ की बेटी थीं।
जहाँगीर ने 1616 में शाहजहाँ और मुमताज महल के दूसरे बेटे, राजकुमार शाह शुजा के जन्म पर उनकी परवरिश की जिम्मेदारी भी नूरजहाँ को ही सौंपी थी। यह नूरजहाँ के लिए भी एक बहुत सम्मान की बात थी, क्योंकि शाह शुजा उनके दादा (जहाँगीर) के विशेष पसंदीदा थे।

वह इतिहास की एकमात्र मुगल महारानी थीं जिनके नाम के चांदी के सिक्के जारी किए गए थे।
उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों (पिता मिर्जा गयास बेग, भाई आसफ खां और राजकुमार खुर्रम) के साथ मिलकर एक शक्तिशाली समूह बनाया, जिसे नूरजहाँ जुंटा कहा जाता है।

नूरजहाँ कला और वास्तुकला की बड़ी संरक्षिका थीं
उन्होंने अपने पिता #एत्माद_उद_दौला की याद में एक मकबरा आगरा में बनवाया , जो सफेद संगमरमर से बनी एक उत्कृष्ट ईमारत है और इसे ताजमहल का पूर्ववर्ती रूप भी माना जाता है।
जहांगीर के निधन (1627) के बाद उनका राजनीतिक प्रभाव समाप्त हो गया।
17 दिसंबर 1645 को उनका निधन हो गया और उन्हें पाकिस्तान के लाहौर स्थित नूरजहाँ के मकबरे में दफनाया गया।।


20 नवंबर 1750 में कर्नाटक के देवनाहल्ली में जन्मे टीपू का पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान साहब था। उनके पिता का नाम  #हैदर...
31/03/2026

20 नवंबर 1750 में कर्नाटक के देवनाहल्ली में जन्मे टीपू का पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान साहब था। उनके पिता का नाम #हैदर_अली और माँ का #फकरुन्निसाँ था। उनके पिता मैसूर साम्राज्य के एक सैनिक थे लेकिन अपनी ताकत के बल पर वो 1761 में मैसूर के शासक बने। टीपू सुल्तान को इतिहास न केवल एक योग्य शासक और योद्धा के तौर पर देखता है बल्कि वो विद्वान भी था।

उनकी वीरता से प्रभवित होकर उनके पिता हैदर अली ने ही उन्हें शेर-ए-मैसूर के खिताब से नवाजा था। अंग्रेजों से मुकाबला करते हुए श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए 4 मई 1799 को टीपू सुल्तान की मौत हो गई।

टीपू सुल्तान को दुनिया का पहला मिसाइल मैन माना जाता है. बीबीसी की एक खबर के मुताबिक, लंदन के मशहूर साइंस म्यूजियम में टीपू सुल्तान के रॉकेट रखे हुए हैं। इन रॉकेटों को 18वीं सदी के अंत में अंग्रेज अपने साथ ले गए थे।

#टीपू_सुल्तान द्वारा कई युद्धों में हारने के बाद मराठों एवं निजाम ने अंग्रेजों से संधि कर ली थी। ऐसी स्थिति में टीपू ने भी अंग्रेजों से संधि का प्रस्ताव दिया। वैसे अंग्रेजों को भी टीपू की शक्ति का अहसास हो चुका था इसलिए छिपे मन से वे भी संधि चाहते थे। दोनों पक्षों में वार्ता मार्च, 1784 में हुई और इसी के फलस्वरूप 'मंगलौर की संधि' सम्पन्न हुई।

हिंदुस्तान में जब तक टीपू सुल्तान जबतक जिंदा रहे अंग्रेजों को लगा वो पूरे हिंदुस्तान पर कब्ज़ा नही कर सकते ना ही उसे अकेले हरा सकते है। इसलिए अंग्रेजों ने मराठो और हैदराबाद के निजाम को अपने साथ मिला और तय कर लिया मैसूर को तीनों बराबर हिस्से में बाट लेंगे। इसके बाद भी अंग्रेजों को टिपू सुल्तान से हारने का डर था इसलिए अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान के सेनापति को भी लालच देकर अपनी तरफ मिला लिया।

टीपु सुल्तान तन्हा रह गया लेकिन ना तो झुका और ना ही डरा अपने आखरी वक़्त में कहा शेर की एक दिन की ज़िंदगी गीदड़ की सौ साल से बेहतर है और लड़ते लड़ते शहीद हो गया

आज टीपू सुल्तान का इतिहास स्कूली पाठ्यक्रमों से हटाया जा रहा है उन्हे शायद पता नहीं है की इतिहास लोहे की तख्ती पर लिखा जाता है उसे कभी मिटाया नहीं जा सकता...

टीपू सुल्तान धर्म निरपेक्ष थे उन्होंने अपनी जागीर के मन्दिरों को 34 दान के सनद जारी किए।
'पालक्काड किला', 'टीपू का किला' नाम से भी प्रसिद्ध है। यह पालक्काड टाउन के मध्य भाग में स्थित है। इसका निर्माण 1766 में किया गया था। यह किला भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के अंतर्गत संरक्षित स्मारक है।
❤️🇮🇳❤️
#मैसूर

 #महेश_दास ( #बीरबल)(1528 - 16 फरवरी 1586) जो बीरबल के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं, इनका जन्म सीधी जिले के घोघरा नामक स्थान...
29/03/2026

#महेश_दास ( #बीरबल)(1528 - 16 फरवरी 1586) जो बीरबल के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं, इनका जन्म सीधी जिले के घोघरा नामक स्थान पर हुआ था, #मुगल_बादशाह_अकबर के दरबार में प्रमुख वज़ीर और अकबर के परिषद के नौ सलाहकारों (नवरत्नों) में से एक थे। उनका जन्म कायस्थ परिवार में हुआ था वह बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे। उनका नाम महेश दास था। उनकी बुद्धिमानी के हजारों किस्से हैं जो बच्चों को सुनाए जाते हैं।

स्वात घाटी के एक अफ़ग़ान कबीले यूसफ़ज़ाई ने मुग़लो के खिलाफ बगावत कर दी जिसे अपने नियंत्रण में लेने के लिए अक़बर ने अपने कमांडर जैन खान कोका को भेजा जहां उसकी सेना बुरी तरह फंस गई जैन खान ने अक़बर से सैन्य मदद मांगी।

जैन खान की मदद के लिए अकबर ने अपने सबसे होनहार मंत्री बीरबल को भेजा। बीरबल एक रणनीतिक थे लेकिन उन्हें सैन्य बल का ज़्यादा तजुर्बा नही था और वो अफगान कबीलों से भी वाकिफ़ नही थे।

जैन खान कोका उस क़बीले से अच्छी तरह वाकिफ थे आगे रास्ता बहुत संकरा और खराब था आगे बढ़ना मुनासिब नही था उन्होंने बीरबल से थोड़ा इंतेज़ार करने के लिए बोला वो हमले के लिए तैयार नही थे। लेकिन बीरबल ने उनकी बात नही मानी बीरबल उनसे सीनियर और अक़बर के खास मंत्री और दोस्त भी थे तो जैन खान उनकी बात को इनकार नही कर सके।

फिर वही हुआ जिसका जैन खान को डर था। उस रास्ते पर घात लगाए अफ़ग़ानियों ने हथियार और पत्थरों से ऐसा ज़ोर का चौतरफ़ा हमला बोला कि पता नहीं चला कि हाथी कहां हैं, घोड़े कहां और कहां इंसान.. इस जंग में राजा बीरबल ऐसे घिरे कि उनकी और उनके पूरे आर्मी की लाश तक नहीं मिली। किसी की मौत पर भी बादशाह सलामत को इतना ग़म नहीं हुआ था, जितना बीरबल की मौत पर हुआ था इस ग़म में कई दिनों तक अकबर दरबार मे नही गए मातम छाया रहा।

मुग़ल बादशाह अक़बर के सलाहकार और मंत्री बीरबल का क़त्ल आज ही के दिन 25 फरवरी 1586 को इंदुस स्वात घाटी के यूसफ़ज़ाई कबीले में हुआ था
#बीरबल

शेर अली ने 1860 के दशक में पंजाब माउंट पुलिस में ब्रिटिश प्रशासन के लिए काम किया था। उन्होंने 1857 के भारतीय विद्रोह के ...
28/03/2026

शेर अली ने 1860 के दशक में पंजाब माउंट पुलिस में ब्रिटिश प्रशासन के लिए काम किया था।
उन्होंने 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान रोहिलखंड और औध में प्रेसीडेंसी सेनाओं में सेवा की। उन्होंने पेशावर में एक घुड़सवार सैनिक के रूप में मेजर ह्यूज जेम्स के तहत काम किया और रेनेल टेलर के लिए व्यवस्थित रूप से घुड़सवार के
रूप में काम किया, जिन्होंने घोड़े, पिस्तौल और प्रमाण पत्र के साथ शेर अली से सम्मानित किया।

#लॉर्ड_मेयो की हत्या

1869 से भारत के वाइसराय मेयो के 6 वें अर्ल रिचर्ड बोके फरवरी 1872 में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में जा रहे थे। द्वीप समूह को फिर अपराधियों और राजनीतिक कैदियों दोनों के भारत के अभियुक्तों के लिए ब्रिटिश दंड कॉलोनी के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
लॉर्ड मेयो द्वीप ब्लायर, द्वीपों के प्रमुख शहर के नियमों को तैयार करने में शामिल था। 8 फरवरी को, जब वाइसराय ने लगभग अपना निरीक्षण पूरा कर लिया था और 7:00 बजे अपनी नाव पर लौट रहा था, जहां लेडी मेयो भी इंतजार कर रहा था, #शेर_अली_आफ़रीदी को अंधेरे मे मायो दिखाई दिया और
उसको मौत के घाट उतार दिया। शेर अली को बारह सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत गिरफ्तार कर लिया था। लॉर्ड मेयो का खून ज्यादा बह गया और जल्द ही उस की मृत्यु हो गई।

इस घटना, जिसने द्वीप समूह पर अधिक ध्यान आकर्षित किया, माउंट हैरियेट के दौर में हुआ।
ब्रिटिश क्राउन द्वारा नियुक्त भारत के सर्वोच्च अधिकारी वाइसराय की हत्या ने पूरे ब्रिटेन और
ब्रिटिश भारत में एक सदमे की लहरें पैदा कर दी।
शेर अली अफरीदी को मौत की निंदा की गई और 11 मार्च 1873 को वाइपर द्वीप जेल में फांसी दी गई थी।

दुनिया फ़तह करने का इरादा रखने वाला ज़िद्दी सुल्तान  #अलाउद्दीन_खिलज़ी 19 जुलाई 1296 को अपने चाचा  #जलालुद्दीन_ख़िलजी को...
04/03/2026

दुनिया फ़तह करने का इरादा रखने वाला ज़िद्दी सुल्तान #अलाउद्दीन_खिलज़ी 19 जुलाई 1296 को अपने चाचा #जलालुद्दीन_ख़िलजी को गद्दी से हटाकर खुद दिल्ली सल्तनत का बादशाह बना। उसका मानना था कि" अल्लाह की बनाई हर नायाब चीज़ पर सिर्फ अलाउद्दीन का हक़ है"

अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा दिल्ली में कराए गए प्रमुख निर्माण कार्य:
#अलाई_दरवाजा (1311 ई.): यह कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के दक्षिण में बना एक शानदार प्रवेश द्वार है।
#सीरी_का_किला (सीरी टाउन): मंगोल आक्रमणों से दिल्ली की रक्षा के लिए अलाउद्दीन ने सीरी को अपनी राजधानी बनाया और वहां एक मजबूत किला बनवाया।
#हौज_ए_खास (अलाई जलाशय): दिल्ली में पानी की कमी दूर करने के लिए उसने 'हौज-ए-अलाई' या हौज-ए-खास का निर्माण करवाया, जो पत्थर की दीवारों से घिरा एक बड़ा जलाशय था।
#जमात_खाना_मस्जिद: यह दिल्ली की सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक है, जो पूरी तरह से इस्लामिक शैली में बनी है।
#अलाई_मीनार: अलाउद्दीन कुतुब मीनार से दोगुनी ऊँची मीनार बनवाना चाहता था, लेकिन उसके असामयिक निधन के कारण यह काम अधूरा रह गया, जिसका केवल पहला तल ही बन पाया था।
#हौज_ए_शम्सी की मरम्मत: 1311 ई. में उसने #इल्तुतमिश द्वारा बनवाए गए हौज-ए-शम्सी (जलाशय) की मरम्मत और सौंदर्यीकरण करवाया।

इन्होंने अपने साम्राज्य को सुदृढ़ और शक्तिशाली बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुधार किए ।

अमीरों पर अंकुश: विद्रोही गतिविधियों को रोकने के लिए सामाजिक समारोहों, दावतों और वैवाहिक संबंधों पर प्रतिबंध लगाया।

गुप्तचर प्रणाली: एक मजबूत जासूसी प्रणाली (बरीद ए मुमालिक) का गठन किया ताकि रईसों और प्रांतीय शासकों पर नज़र रखी जा सके।
धर्म का राजनीति से अलगाव: उलेमाओं (धार्मिक नेताओं) को प्रशासन में हस्तक्षेप करने से रोका।

नशाबंदी: दिल्ली में शराब और मादक पदार्थों की बिक्री और सेवन पर प्रतिबंध लगाया।

प्रत्यक्ष नियंत्रण: बिचौलियों को हटाकर सीधे किसानों से राजस्व (लगान) एकत्र करने की नीति अपनाई।

उच्च कर: कृषि उपज का 50% (आधा) तक कर (खराज) लिया जाता था।

मुस्तखराज: राजस्व संग्रह के लिए #दीवान_ए_मुस्तखराज' नामक विशेष अधिकारी नियुक्त किए।

शाहना-ए-मंडी: बाजारों पर नियंत्रण के लिए ' #दीवान_ए_रियासत' और ' #शहना_ए_मंडी' नामक अधिकारी नियुक्त किए।

स्थायी सेना: दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान जिसने एक बड़ी और स्थायी केंद्रीय सेना (स्थायी सेना) रखी।

नकद वेतन: सैनिकों को जागीर के बजाय नकद वेतन देने की शुरुआत की।

दाग और हुलिया: घोड़ों पर निशान लगाने की प्रणाली (दाग) और सैनिकों का रिकॉर्ड (हुलिया/चेहरा) रखने की प्रणाली शुरू की।

बादशाह बनते ही अलाउद्दीन खिलज़ी ने अपने विद्रोहियों को ख़त्म करना शुरू किया उस वक़्त उनके सबसे बड़े विद्रोही तुर्की थे जिन्हें हराकर खिलजियों ने सत्ता हासिल की थी। दिल्ली के हाजी मौला, गुजरात के नवी मुसलमान, उनके भतीजे अक़्त खां, उनका भांजा मंगू ख़ां, ने भी विद्रोह किया लेकिन अलाउद्दीन खिलज़ी ने सारे विद्रोहियों को खत्म कर दिया।

और फिर दिल्ली छोड़ पूरा हिंदुस्तान फ़तह करने निकल पड़ा। पहले अभियान 1298 में #राजा_कर्णदेव_वाघेला को हराकर गुजरात फ़तह किया राजा वाघेला ने हारने के बाद देवगिरि के राजा रामचन्द्र के यहां शरण ली।

दूसरा अभियान 1299 में सिर्फ ख़िलजी के सेना के घोड़े जब्त कर लेने की वजह से हुआ जैसलमेर के राजा दृदा के सहयोगियों ने अलाउद्दीन खिलज़ी की सेना के घोड़े जब्त कर लिए थे। क्रोधित अलाउद्दीन खिलज़ी ने जैसलमेर पर हमला कर राजा दृदा और उनके सहयोगियों को खत्म कर जैसलमेर फ़तह कर लिया।

तीसरा अभियान रणथम्भौर के राजा हम्मीरदेव ने अलाउद्दीन ख़िलजी के दुश्मन मंगोल सेनापति मुहम्मद शाह और कहब को अपने यहां शरण दे रखी थी। इसलिए खिलज़ी ने रणथम्भौर पर हमला कर के मंगोलों को भगाया और रणथम्भौर का किला फ़तह कर लिया इसमे अलाउद्दीन ख़िलजी के सेनापति #नुसरत_खां और #राजा_हम्मीरदेव मारे गए।

चौथे अभियान 1303 में चित्तौड़ और मेवाड़ पर हमला किया यह किला राजनीतिक दृष्टि से सबसे सुरक्षित था जिसे अलाउद्दीन खिलजी ने #राजा_रतनसिंह को हराकर जीत लिया। इस हमले को मलिक मोहम्मद जायसी की कहानी पद्मावती से जोड़कर भी देखा जाता है !

और इसके बाद 1304 में जालोर के राजा कान्हड़देव, 1305 में मालवा के राजा महलकदेव को हराकर अफ़ग़ानिस्तान से लेकर पूरा उत्तर भारत जीत लिया ।

अगला हमला देवगिरि पर किया गया #राजा_रामचन्द्र को हराकर उन्हें दिल्ली ख़िलजी के सामने पेश किया गया। लेकिन खिलजी ने रामचन्द्र को उनकी रियासत वापस कर उन्हें 1 लाख सोना टका देकर वापस भेज दिया।

इसके बाद 1309 में खिलज़ी की सेनापति #मलिक_काफूर ने तेलांगना पर हमला किया। वहां के #राजा_रुद्रदेव ने आत्मसमर्पण कर दिया बदले में मलिक काफूर को ढेर सारा सोना बेशक़ीमती हीरा #कोहिनूर दिया। तब इस हीरे का नाम कोहिनूर नही था। यह नाम अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा "कोह-ए नूर" (रोशनी का पहाड़) दिया गया था।

इस तरह खिलज़ी ने इतने कम वक्त में दक्षिण के कुछ हिस्से छोड़कर पूरे भारत पर खिलजियों का परचम बुलन्द कर दिया था। अलाउद्दीन ख़िलजी अपने जिंदगी में कभी कोई जंग नही हारा।
💗🇮🇳💗

केरल के त्रिशूर जिले के कोडुंगल्लूर तालुक  में स्थित चेरामन जुमा मस्जिद को भारत की पहली मस्जिद और दुनिया की सबसे पुरानी ...
13/02/2026

केरल के त्रिशूर जिले के कोडुंगल्लूर तालुक में स्थित चेरामन जुमा मस्जिद को भारत की पहली मस्जिद और दुनिया की सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक माना जाता है, जिसकी स्थापना 629 ईस्वी में हुई थी। #पैगंबर_मुहम्मद_साहब के सहाबी #मालिक_बिन_दीनार द्वारा निर्मित इस मस्जिद का नाम चेरा राजा #चेरामन_पेरुमल के नाम पर रखा गया था उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था।
मालिक बिन दिनार इस मस्जिद के क़ाज़ी बने रहें, बाद में हबीब बिन मालिक इस मस्जिद के काजी बने !

ये मस्जिद आज भी मौजूद हैं !! हजरत मालिक बिन दिनार रज़ि० ने भारत में दूसरी मस्जिद तकरीबन 642 C.E में थालेनगन रेलवे स्टेशन रोड कसरगोड़ केरला में तामीर किया

स्थापना की किंवदंती: परंपरा के अनुसार, चेरा राजा चेरामन पेरुमल पैगंबर मुहम्मद से मिलने के लिए अरब गए और इस्लाम धर्म अपना लिया, और अपने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उनकी वापसी पर मस्जिद का निर्माण करें।

मुख्य विशेषताएं: मस्जिद के अंदर एक प्राचीन दीपक जलता रहता है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसे मस्जिद की स्थापना के समय जलाया गया था।
यह मस्जिद अपनी पारंपरिक केरल शैली की वास्तुकला से निर्मित किया गया है

यह मस्जिद धार्मिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में खड़ी है, और इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण अक्सर लोग यहां दर्शन करने आते हैं।

मालिक बिन दिनार की आमद का वाकिया और सबूत से ये मालूम होता हैं कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दौर में ही इस्लाम भारत में मालिक बिन दिनार के ज़रिए आ चुका था
अल्लाह के प्यारे नबी हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात 632 C.E में हुवी और मालिक बिन दिनार रज़ि० 629 C.E में आये और इस्लाम की दावत आम की, मस्जिदें तामीर की !

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का विलादत 1142 में और ख्वाजा साहब की वफात 1236 में हुई थी! दीन ए इस्लाम तो उनसे 600 साल पहले आ चुका था !!
629 में बनी #चेरामन_जुमा_मस्जिद इस बात की गवाह हैं !!
❤️🇮🇳❤️
#राजा_रामा_वर्मन_कुलशेखरा
#चेरामन_जुमा_मस्जिद #केरल

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