11/07/2026
बादशाह बाबर का पूरा नाम #जहीरुददीन_मोहम्मद_बाबर था। उसका जन्म 14 फरवरी 1483 ई० को अन्दीजन (फरगना) में हुआ था। उसके पिता का नाम ेख_मिर्जा तथा माता का नाम #कुतलग_निगार था। पित्र पक्ष की ओर से बाबर तैमूर का पांचवा वंशज तथा मातृ पक्ष की ओर से चंगेज खा का चौदहवां वंशज था। इस प्रकार उसके धमनियों में दो वीर विजेताओं का रक्त प्रवाहित था।
#फरगना को जीतने के बाद और अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद वह तैमूर की राजधानी #समरकन्द को जीतना चाहता था जो उसके चाचा अहमद मिर्जा के अधिकार में था।
समरकन्द के विषय में स्वयं बाबर ने लिखा है कि 'मनुष्य के रहने के लायक दुनिया के किसी भी हिस्से में समरकन्द जैसा आनन्ददायक कोई और शहर नहीं है।
#पानीपत का प्रथम युद्ध #बादशाह_बाबर व #इब्राहिम_लोदी के मध्य 21 अप्रैल, 1526 ई० को हुआ। इब्राहिम लोदी के पास एक विशाल सेना थी किन्तु बाबर की सेना संख्या में कम थी लेकिन युद्ध नीति में निपुण थी।
इसी युद्ध में उसने उजबेगों की युद्ध नीति तुलगुमा पद्धति तथा तोपों को सजाने की उस्मानी पद्धति का प्रयोग किया। बाबर की सहायता के लिए #हुमायूं, उसके योग्य सरदार व दो कुशतः तोपची उस्ताद अली व मुस्तफा मैदान में थे। इब्राहिम लोदी के चाचा ां_लोदी ने भी युद्धस्थल में बाबर की सहायता की थी।
इस युद्ध में बाबर के जीत के साथ भारत में #मुगल_साम्राज्य की स्थापना हो गई और इब्राहिम लोदी इस युद्ध में मारे गए थे।
#खानवा का युद्ध (16 मार्च, 1527 ई०)
खानवा के युद्ध का मुख्य कारण बाबर का भारत में रहने का निश्चय था। #राणा_सांगा समझता था कि मध्य एशियाई लुटेरों की भांति बाबर भी दिल्ली को लूटकर तथा लोदी सत्ता को शक्तिहीन कर काबुल लौट जाएगा। इसी लिए उसने बाबर को भारत पर आक्रमण करने व इब्राहिम लोदी के विरुद्ध सहायता देने का वचन दिया था। किन्तु जब बाबर ने भारत में रहने का निश्चय किया तब राणा सांगा उसका विरोधी हो गया। इसके अतिरिक्त जब पानीपत के युद्ध के पश्चात् बाबर ने अफगानों को कुचलने का निर्णय किया तो वे राणा सांगा के दरबार में शरण लिए। इसमें ां_मेवाती, #महमूद_लोदी व आलम खां लोदी प्रमुख थे। इन्होंने राणा सांगा को बाबर से युद्ध करने के लिए उत्तेजित किया।
खानवा गांव में मुगल शासक बाबर और मेवाड़ के राजपूत राजा राणा सांगा के इस निर्णायक युद्ध में मुगल सेना ने राणा सांगा को पराजित किया था। इस जीत के परिणामस्वरूप, बाबर ने उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव को पूरी तरह से मजबूत कर लिया था。
#चन्देरी का युद्ध (29 जनवरी, 1528 ई०)
बाबर के आक्रमण के समय चन्देरी का शासक #मेदिनी_राय था। वह एक शक्तिशाली राजपूत शासक था। अलवर, चंदावर, रापड़ी, इटावा पर अधिकार के बाद बाबर चन्देरी की ओर बढ़ा। सर्वप्रथम उसने शमसाबाद के बदले मेदिनीराय से चन्देरी मांगा। किन्तु मेदिनी राय ने प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अन्त में बाबर ने 29 जनवरी, 1528 ई० को दुर्ग घेर लिया। राजपूतों ने वीरतापूर्वक बाबर का सामना किया और राजपूत स्त्रियों ने जौहर कर लिया। किन्तु अन्त में पराजित हुए। मेदिनीराय युद्ध में मारा गया। चन्देरी पर मुगलों का अधिकार हो गया।
#घाघरा का युद्ध (5 मई, 1529 ई०)
घाघरा का युद्ध अफगानों व बाबर के मध्य हुआ था। यह बाबर का अन्तिम युद्ध था।
बाबर ने गंगा नदी पार कर आगे बढ़ने तथा अफगान एवं बंगाल की संयुक्त सेनाओं को पराजित करने का निश्चय किया। उसने गंगा नदी पार कर घाघरा नदी के तट पर 5 मई, 1529 ई० को अफगानों को पराजित किया। मध्य युगीन इतिहास में घाघरा का युद्ध पहला युद्ध था जो जल एवं थल दोनों पर लड़ा गया।
घाघरा के युद्ध में पराजित होने के बाद अफगानों की शक्ति पूरी तरह से नष्ट हो गयी। #महमूद_खां_लोहानी, जलाल खां, शेर खां सूर तथा #फरीद_खां जैसे अफगान सरदारों ने आत्मसमर्पण कर बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली।
कहां जाता है कि जब हुमायूँ बीमार हो गये थे उचित चिकित्सा के बाद भी उसके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ तो बाबर ने ईश्वर से अपनी जिन्दगी के बदले में हुमायूं के स्वस्थ होने की दुआ मांगी तो हुमायूं के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा तथा बाबर बीमार हो गया। अपनी मृत्यु शैय्या पर उसने हमायूँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। अन्त में 26 दिसम्बर, 1530 ई० को उसकी मृत्यु हो गयी। किन्तु आधुनिक इतिहासकारों ने बाबर की मृत्यु की उपर्युक्त घटना का खण्डन किया है। डॉ० आर०एस० शर्मा के अनुसार बाबर की मृत्यु स्वयं की बीमारी से हुई थी जबकि बाबर की पुत्री #गुलबदन_बेगम ने अपनी पुस्तक हुमायूँ नामा में एक षड्यंत्र द्वारा इब्राहिम लोदी की मां द्वारा उसे विष देने को माना।
मृत्यु के बाद बाबर को आगरा के चार बाग (आरामबाग) में दफनाया गया किन्तु बाद में शेरशाह के शासनकाल में उसकी अस्थियों को उसकी विधवा पत्नी #मुबारक_युसुफजई काबुल ले गई जहाँ उसे एक उद्यान में दफना दिया गया ।।
1504 ई० में काबुल पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् बाबर ने पहली बार तैमूरी परम्परा के विरुद्ध #पादशाह की उपाधि धारण की। इससे पूर्व वह #मिर्जा की पैतृक उपाधि धारण करता था। 1526 ई० में पानीपत के प्रथम युद्ध में विजय के बाद बाबर ने काबुल के प्रत्येक निवासी को एक-एक चांदी का सिक्का दान दिया था। उसकी इस उदारता के कारण उसे ' #कलन्दर' की उपाधि दी गई।
बाबर ने काबुल में चांदी का ' #शाहरुख' तथा कन्धार में ' #बाबरी' नामक सिक्का चलाया। उसके चांदी के सिक्को पर एक तरफ कलमा और चारों खलीफाओं का नाम तथा दूसरी ओर बाबर का नाम व उपाधि अंकित थी।
बाबर ने #तुर्की_भाषा में अपनी आत्मकथा ' #तुजुक_ए_बाबरी' की रचना की। इसे बाबरनामा या वाकियाते-बाबरी के नाम से भी जाना जाता है। सर्वप्रथम अकबर के समय में इसका फारसी भाषा में अनुवाद पायन्दा खां ने किया। इसके तुरन्त बाद 1590 ई० में अब्दुर्रहीम खानेखाना ने इसका फारसी अनुवाद किया। बाबरनामा का फारसी भाषा से अंग्रेजी अनुवाद सर्वप्रथम लीडन, अर्सकिन ने किया था .।।