Management Funda of N Raghuraman

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Management Funda is a column written by N. Raghuraman Journalist and Motivator

27/07/2026

नेकी लौटती है, हम तक नहीं तो हमारे बच्चों तक पहुंचती है

कुछ तारीखें अविस्मरणीय बन जाती हैं, इसलिए नहीं कि उस दिन कुछ खास घटित हुआ था बल्कि इसलिए कि वे समाज में नेकी का एहसास कराती हैं। 20 जुलाई ऐसी ही एक तारीख है। आप यह पढ़कर जो घटनाक्रम याद कर रहे हैं, उस पर मैं बाद में आऊंगा। लेकिन उससे पहले मैं आपको आईआईटी कानपुर में 20 जुलाई 2024 के दिन पर लेकर चलता हूं।
दरअसल, इस कहानी की शुरुआत बहुत पहले हुई थी। इसके बीज पद्मश्री से सम्मानित और फिजिक्स के जाने-माने शिक्षक प्रो. एच.सी. वर्मा ने बोए थे, जो मानते थे कि कोई छोटा-सा योगदान भी असाधारण बदलाव ला सकता है। आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर एमेरिटस रहे प्रो. वर्मा ने 1994 से 2017 तक वहां फिजिक्स पढ़ाई और बाद में कैंपस के ऑपर्च्युनिटी स्कूल में स्पेशल एडवाइजर के तौर पर सेवा दी।
1964 में स्थापित यह स्कूल समीप ही रहने वाले कैंपस के सपोर्टिंग स्टाफ और आसपास के जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देता आ रहा है। इनमें से कई बच्चे भूखे स्कूल आते थे। कुछ असेंबली में बेहोश हो जाते थे। कुछ का पढ़ाई में मन नहीं लगता या वे स्कूल ही नहीं आते थे, क्योंकि भूखे पेट पढ़ाई नामुमकिन है। प्रो. वर्मा इसे बदलना चाहते थे।
उनके मन में एक एनजीओ के जरिए बच्चों को पौष्टिक भोजन मुहैया कराने का विचार पहली बार 2017 में आया, लेकिन फंडिंग को लेकर मतभेद के कारण सिरे नहीं चढ़ पाया। 2024 में यह विचार फिर चर्चा में आया तो दूसरी बाधा थी कि एनजीओ ने जितने स्टूडेंट मांगे, उतने स्कूल में थे ही नहीं। लेकिन हार मानने के बजाय आईआईटी समुदाय ने खुद रास्ता खेाजा।
एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के असिस्टेंट प्रोफेसर टी.के. गुहा, जो हॉल-5 के वार्डन भी थे, ने मेस मैनेजर अंशु जोशी के साथ मिलकर एक सरल-सा समाधान निकाला कि हॉल-5 का हर स्टूडेंट अपनी पॉकेट मनी से हर हफ्ते सिर्फ 5 रुपए देगा। और 20 जुलाई 2024 को बच्चों को पहला भोजन परोसा गया।
जो शुरुआत में छोटा-सा प्रयोग लग रहा था, जल्द ही एक मुहिम बन गई। नवंबर 2024 तक हॉल 1, 3 और 8 के साथ गर्ल्स हॉस्टल-1 भी इसमें जुड़ गया, ताकि हर हफ्ते बच्चों को स्कूल के सभी पांचों दिन पौष्टिक खाना मिल सके। जैसे-जैसे यह बात स्टूडेंट्स जिमखाना और हॉस्टल अफेयर्स की काउंसिल ऑफ स्टूडेंट्स के जरिए फैली, और स्टूडेंट इसमें जुड़ते गए। आज आईआईटी, कानपुर के 1,649 छात्र हर हफ्ते 5 रुपए का योगदान देते हैं। इसका अर्थशास्त्र बेहद आसान है। करीब 250 बच्चों को एक समय का पौष्टिक भोजन कराने में लगभग 3 हजार रुपए खर्च होते हैं, यानी हर छात्र के मेस बिल में महीने के सिर्फ 20 रुपए अतिरिक्त जुड़ते हैं। चावल, गेहूं, चना और राजमा जैसी चीजों की थोक खरीदी के कारण लागत कम होती है और यह कार्यक्रम टिकाऊ बना रहता है।
लेकिन इसके असल फायदों को पैसों में नहीं मापा जा सकता। शिक्षकों ने देखा कि बच्चे अधिक स्वस्थ, ऊर्जावान और अटेंटिव हो गए। उनकी अटेंडेंस में सुधार और वे खुश रहने लगे। सबसे अहम आईआईटी स्टूडेंट्स ने वो सबक सीखा, जो कोई किताब नहीं सिखा सकती- यदि अपने हिस्से का छोटा-सा हिस्सा भी बांटें तो यह दूसरों की जिंदगी में बड़ा बदलाव ला सकता है।
अब 20 जुलाई 2026 पर लौटते हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों तक देशभर से अनजान लोगों ने भोजन पहुंचाया। कोई नहीं जानता, किसने उसका पैसा दिया। भोजन भेजने वालों को भी नहीं पता कि किसने उसे खाया। लेकिन चुपचाप, बिना किसी प्रचार के भोजन पहुंचता रहा, मानो करुणा ने खुद अपना रास्ता खोज लिया हो। इन दोनों कहानियों में बहुत सारी समानताएं हैं।
शायद अच्छाई भी ऐसे ही काम करती है। हम जो भलाई करते हैं, शायद हमें कभी भी वह उसी रूप में वापस नहीं मिलती। कई बार उसका फल हमें सीधे नहीं मिलता। लेकिन कहीं पर, किसी दिन वह किसी जरूरतमंद तक पहुंचता जरूर है- शायद खुद हमारे बच्चों तक या भावी पीढ़ी तक।

फंडा यह है कि दया से भरे छोटे-से काम को भी कमतर न समझें। अच्छे कर्मों का लौटकर आने का अपना तरीका होता है। अगर वे सीधे हम तक नहीं पहुंचते तो हमारे बाद आने वाली पीढ़ी के जीवन में लौटते हैं।

27/07/2026

जब बच्चे टू-व्हीलर्स के लिए जिद करें, तो उन्हें जीवन के सबक भी दें

शुक्रवार को जब मैं बेंगलुरु में उस 7 किलोमीटर लंबे मार्ग से गुजर रहा था, जहां बायोकॉन पार्क, माइक्रो लैब्स लिमिटेड, एपोटेक्स रिसर्च, एचसीएल टेक्नोलॉजीज का सेज परिसर, कार्ल जेइस इंडिया, सैनसेरा इंजीनियरिंग और टोयोटा इंडस्ट्रीज इंजन इंडिया जैसी सैकड़ों बहुराष्ट्रीय कंपनियां स्थित हैं, तभी मेरे चचेरे भाई का फोन आया। उन्होंने कहा, भाई, अरविंद (उनका बेटा, जो अभी 17 साल का हुआ है) कॉलेज जाने के लिए टू-व्हीलर मांग रहा है। मैंने उनसे पूछा कि तुम्हें इसमें ऐसी क्या चिंताजनक बात लग रही है, जो इस पर मेरी राय लेना चाहते हो? उन्होंने कहा कि वह अभी तक ऊपर की मंजिल से नीचे तक कपड़ों की टोकरी तक बिना गिराए नहीं ला पाता, लेकिन टू-व्हीलर मांग रहा है। शायद उसके दोस्तों के पास टू-व्हीलर्स हैं, इसलिए उस पर पीयर-प्रेशर है। मैंने कहा कि मैं थोड़ी देर में फोन करता हूं और डिसकनेक्ट कर दिया।
उस महज 20 मिनट की ड्राइव पर मुझे एक घंटा लग गया। मेरे आगे चल रहे दोपहिया वाहनों को सड़क के क्षतिग्रस्त हिस्सों और गड्ढों से बचने की तमाम कोशिशों के बावजूद लगातार दचके लग रहे थे। इस बोम्मासंद्रा-जिगनी लिंक रोड पर गड्ढों और उखड़ी सड़क से जूझते बड़ी संख्या में दोपहिया वाहन चालकों को देखकर मेरे मन में ऐसे सबक उभरने लगे, जिन्हें मैं अरविंद के पैरेंट्स से साझा कर सकता था। इनमें से कुछ सीखें मुझे पिता ने दी थीं, कुछ मैंने स्वयं वाहन चलाते हुए सीखी हैं और कुछ साथी बाइकर्स से मिली हैं :
अपनी पहचान का मोह छोड़ें : सड़क पर उतरते ही बाइकर्स को लगता है कि उन्हें एक खास तरह का व्यक्तित्व, पहनावा, अंदाज, सोच, बोलने और व्यवहार करने का तरीका अपनाना चाहिए। लेकिन जब मैं अपनी खरीदी बाइक पर पहली बार बैठा था तो मेरे पिता ने मुझे नसीहत देते हुए कहा था, एक बाइकर के रूप में तुम्हें ऐसी किसी चीज की जरूरत नहीं है। उन्होंने सहज अंदाज में कहा, तुम्हें कैसा होना चाहिए, इस विचार को छोड़ दो। तभी तुम उस व्यक्ति के लिए जगह बना पाओगे, जो तुम बन सकते हो या जो तुम पहले से हो।
पकड़ थोड़ी ढीली रखें : उनका दूसरा सबक था, अगर तुम तनकर रहोगे तो जीवन भी तनाव से भरा रहेगा। इग्निशन स्विच ऑन करते समय अपने कंधों को ढीला छोड़ो। इससे हैंडल पर पकड़ सहज रहेगी और तुम सहज होकर आगे बढ़ पाओगे। सड़क पर गड्ढे और खराब हिस्से भी आएंगे, इसलिए कई बार अचानक दिशा बदलनी पड़ सकती है। जितनी कसकर हैंडल पकड़ोगे, उतनी ही मुश्किल होगी। बाद में मुझे एहसास हुआ कि यह हिदायत सिर्फ टू-व्हीलर चलाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह जीवन के भी कई पहलुओं पर लागू होती है।
हर बाइकर का खयाल रखें : बाइक चलाना शुरू करने से पहले मुझे बाइकर-वेव के बारे में पता नहीं था। ये वो संकेत है, जिसमें दो बाइकर एक-दूसरे की ओर दो उंगलियां उठाकर अभिवादन करते हैं। लेकिन जब मुझे इसका अर्थ समझ में आया, तब तो मुझे इससे प्यार हो गया। दरअसल, यह केवल एक ग्रीटिंग भर नहीं, बल्कि सुरक्षित रहने का यूनिवर्सल संदेश भी है। यह छोटा-सा इशारा बार-बार सेफ-ड्राइविंग की याद दिलाता है।
सड़क पर प्रतिस्पर्धा न करें : कुछ लोग तेज रफ्तार से बाइक को पांचवें गियर में डालकर अगले ट्रैफिक सिग्नल के रेड होने से पहले ही वहां पहुंच जाना चाहते हैं। लेकिन मैंने यह सीखा है कि हर बाइक सवार की मंजिल एक जैसी नहीं होती।
वाहन चलाते समय भी करें एक्सरसाइज : मुझे कई अनुभवी ड्राइवरों ने बताया है कि वे ट्रैफिक सिग्नल पर हरी बत्ती का इंतजार करते समय श्वास संबंधी अभ्यास करते हैं। वे सिग्नल पर बचे सेकंड्स के अनुसार इसे समायोजित करते हैं। लेकिन कार सवारों की तुलना में बाइकर्स अकसर इतनी जल्दबाजी में रहते हैं कि ऐसी बुनियादी बातों को भूल जाते हैं। याद रखिए, यह हमारे शरीर के लिए अच्छा है और दिमाग को शांत रखता है- फिर चाहे आप बाइक पर हों या नहीं। साथ ही, इससे आसपास के माहौल को बेहतर तरीके से देखने की क्षमता भी विकसित होती है, जो सुरक्षित ड्राइविंग के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

फंडा यह है कि यदि आपका बच्चा टू-व्हीलर की मांग करता है, तो उसकी बात पर विचार जरूर कीजिए, लेकिन हेलमेट पहनने और यातायात नियमों का पालन करने की सीख देने के साथ-साथ उसे ये सिद्धांत भी सिखाइए।

25/07/2026

‘अनफिल्ड टाइम’ का इस्तेमाल करें, तो क्रिएटिविटी बाहर आएगी

परिवार की एक शादी में शामिल होने बुधवार रात जब मैं बेंगलुरु जा रहा था तो मैंने तय किया कि इस बार लैपटॉप साथ नहीं ले जाऊंगा। मुझे सिर्फ मैरिज हॉल में उसकी सुरक्षा की चिंता ही नहीं सता रही थी, बल्कि रिश्तेदार मुझे ‘स्क्रीन मैन’ कहने लगे थे तो मैंने डिजिटल उपवास की योजना भी बनाई थी। वैसे भी मैं मोबाइल फोन की छोटी-सी स्क्रीन से चिपका रहने वाला व्यक्ति नहीं हूं। इसलिए मैं लगातार आसपास के माहौल को देखता हुआ इस कॉलम के लिए मेंटल नोटिंग करता रहा। फिर यही कॉलम मैंने मोबाइल पर लिखा। मेरे एक रिश्तेदार की पहली प्रतिक्रिया थी कि ‘घंटों तक आसपास देखते हुए आप बोर नहीं होते?’ मैंने कहा, ‘बिल्कुल नहीं।’
इस सवाल-जवाब ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि मैं तो जानबूझकर अपने लिए बोरियत पैदा करने की कोशिश कर रहा हूं, फिर भी इस एक हवाई सफर में मेरे दिमाग में कई आइडिया कैसे आ गए? पूरे रास्ते लोगों को देखते हुए मैं सोचता रहा कि वे कैसे व्यवहार करते हैं, क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, कैसे और क्या बात करते हैं और उनकी बॉडी लैंग्वेज कैसी है। यह सब देख रही मेरी आंखों से दिमाग कई सवाल पूछ रहा था। आखिरकार वही सवाल अगले कुछ दिनों के लिए मजबूत स्टोरी आइडिया बन गए।
जैसे ही उन विचारों को मैंने अपनी डायरी में लिखा मेरा तनाव और एंग्जायटी खत्म हो गए कि भीड़भाड़ वाली शादी में मैं अगला आर्टिकल कैसे लिख पाऊंगा। कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ वाटरलू में कॉग्निटिव न्यूरोसाइंस के प्रोफेसर डॉ. जेम्स डैनकर्ट कहते हैं कि ‘जब कोई व्यक्ति तनाव भरी स्थिति से अलग होकर खुद को सोचने के लिए स्पेस देता है तो एक नया आइडिया जन्म लेता है।
डॉ. जेम्स के इस दावे को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म ‘इक्का’ में भी देखा जा सकता है। एक सीन में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का किरदार निभा रहीं तिलोत्तमा शोम को रोजमर्रा की एक घटना देखकर फॉरेंसिक से जुड़ी एक अहम बात समझ आ जाती है। एक चाय-पान की दुकान में बैठे हुए उनका दिमाग तो खाली होता है, लेकिन नजरें बर्तन धो रहे दुकानदार पर होती हैं। वह ब्रश या कपड़े की बजाय अपनी उंगली गिलास के अंदर तक डालता है और इसे अंदरूनी सतह पर घुमाकर गंदगी बाहर निकालता है।
यही उनके लिए ‘यूरेका’ मोमेंट होता है। वह इस मोशन को उस सबूत के साथ कनेक्ट करती हैं, जिसे जांचकर्ता नजरअंदाज कर चुके थे। वह विजुअलाइज करती हैं कि अगर हत्या में कार की चाबी इस्तेमाल की गई थी तो उसी चाबी से कार स्टार्ट भी की गई होगी। यानी, की-होल के छोटे चैम्बर में खून के निशान होंगे, जिन्हें सिर्फ ऊपर से साफ करके नहीं हटाया जा सकता, जैसा अपराधी ने किया होगा। यह सीन इसलिए मायने रखता है, क्योंकि यह किसी क्लासिक थ्रिलर ट्रोप जैसा है, जिसमें कोई साधारण काम एक जटिल फॉरेंसिक पहेली को हल कर देता है। इसी के बाद मुकदमे की दिशा बदल जाती है। पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ऐसा ठोस सबूत पेश कर पाती हैं, जो सीधे बचाव पक्ष के नैरेटिव को चुनौती देता है।
इसे आप ‘एम्प्टी टाइम’ कहिए या ‘अनफिल्ड टाइम’, लेकिन जब यह आपके किसी बड़े लक्ष्य से जुड़ जाता है तो इंसान को बोरियत महसूस नहीं होती। जैसे मुझे आसपास हो रही घटनाओं को देखने में कभी बोरियत नहीं होती। कंटेंट कंज्यूमिंग कम करके मैं असल में माइंडफुलनेस के लिए स्पेस बनाता हूं। इसका मतलब यह भी नहीं कि पान वाले को देखते हुए पब्लिक प्रॉसिक्यूटर या सहयात्रियों को देखते हुए मैं पूरे समय क्रिएटिविटी से भरा हुआ था। लेकिन जब बिना किसी उम्मीद के यह देखना चलता रहा तो अचानक यह गतिविधि पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के लक्ष्य से जुड़ गई- एक जटिल क्रिमिनल केस में ब्रेक-थ्रू की तलाश।

फंडा यह है कि वर्कप्लेस पर क्रिएटिव बनने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि आपके पास थोड़ा ‘अनफिल्ड टाइम’ हो, जिसे ‘मी टाइम’ भी कह सकते हैं।

24/07/2026

एंटरटेनिंग आंत्रप्रेन्योर बोरियत को भी बिजनेस में बदल देते हैं

जिंदगी जब ठहर-सी जाए, एंग्जायटी बढ़ने लगे और आप खुद को चारदीवारी में फंसा महसूस करें तो आप क्या करते हैं? मैं यह स्थिति अकसर विश्वविद्यालयों के नए स्टूडेंट्स, खासकर होस्टलर्स में देखता हूं, जिन्हें समझ नहीं आता कि रविवार को नए शहर में आखिर क्या करें। सबसे पहले उन्हें यही लगता है कि यहां से भाग छूटें। वे बिना सोचे-समझे अंतहीन वीडियो स्क्रॉल करते हैं, आंखें दुखने तक बिंजवाॅच करते हैं या फिर वीडियो गेम्स में खो जाते हैं। इससे उन्हें कुछ समय की राहत तो मिलती है, लेकिन आखिर में वे खालीपन महसूस करते हैं। संक्षेप में, वे एंटरटेनमेंट को कंज्यूम तो करते हैं, लेकिन शायद ही उसे क्रिएट करने का सोचते हैं। लेकिन क्या हो अगर बोरियत दूर करने का आपका कोई साधारण तरीका, कोई लेट-नाइट स्ट्रेस-रिलीफ डूडल या पालतू डॉग से जुड़ा कोई मजाक ही करोड़ रुपए के ग्लोबल स्टार्टअप का बीज बन जाए?
लखनऊ की बहनों, मृणालिनी मित्रा (27) और न्योनिका (26) की यह असाधारण कहानी आज होस्टल के कमरे में बैठे किसी युवा के लिए बेहतरीन सीख है। यह साबित करती है कि जब आप एंटरटेनमेंट को इनोवेशन की भावना से देखते हैं तो लिविंग रूम में किया साधारण काम भी ग्लोबल बिजनेस में बदल सकता है। कुछ साल पहले मृणालिनी और न्योनिका वहीं खड़ी थीं, जहां पहुंचने का सपना भारत के कई महत्वाकांक्षी युवा देखते हैं। मृणालिनी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट थीं और न्योनिका ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डिग्री ली थी। विदेशों में प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट इंटर्नशिप और शानदार ग्लोबल कॅरिअर उनका इंतजार कर रहे थे।
तभी उन्होंने सुना कि उनकी मां को कैंसर है तो यह उनके लिए बड़ा सदमा था। एक पल भी सोचे बिना दोनों बहनें सारे प्लान छोड़कर मां की देखभाल के लिए लखनऊ के राजेंद्र नगर स्थित घर लौट आईं। घर का माहौल भारी था और दोनों पर बेहद भावनात्मक दबाव था। इससे निपटने के लिए परिवार ने एक नियम बनाया कि हर रविवार बोर्ड गेम्स खेले जाएंगे। यह कठिन समय में मन को थोड़ी-सी खुशी देने का जरिया था।
जैसे वनीला आइसक्रीम में चॉकलेट मिलाई जाती है, वैसे ही जब दोनों बहनों ने एंटरटेनमेंट में इनोवेशन को मिलाया तो उनकी साधारण पारिवारिक कहानी उद्यमिता की मिसाल बन गई। ज्यादातर लोग बस बाजार से कोई साधारण-सा बोर्ड गेम खरीद लेते हैं। लेकिन मित्रा बहनों ने एंटरटेनमेंट के साथ इनोवेशन करने का फैसला किया और अपनी एक दुनिया बनाने की ठानी।
कठिन हालात में घर में खुशी के पल लाने वाले अपने पालतू डॉग ‘यासु’ से प्रेरित होकर बहनों ने कुछ कैरेक्टर्स की स्केचिंग शुरू की। खाली कार्ड्स पर पौराणिक कथाएं, हाथ की चित्रकारी, ओरिजिनल म्यूजिक और निजी किस्से पिरोए। शुरुआत में यह सिर्फ तनाव दूर करने की थैरेपी जैसा था, ताकि वे एक-दूसरे को हंसा सकें और रोजमर्रा में खुशी से जुड़े रहें।
उन्होंने कोई बिजनेस प्लान नहीं बनाया। बस, थोड़ा मजा करने का बेहतर तरीका ईजाद किया। लेकिन जब उन्होंने हाथ से बनाए कैरेक्टर्स यूट्यूब पर शेयर किए तो वे इंटरनेट पर देखे जाने लगे। लोगों का जबरदस्त इंगेजमेंट मिला। अनजान भी पूछने लगे कि यह गेम कहां से खरीद सकते हैं। इसी पल बहनों को एहसास हुआ कि उनके निजी स्ट्रेस-बस्टर में कारोबारी संभावना भी है। ऐसे समय में जब टेक स्टार्टअप लागत बचाने के लिए एआई-जनरेटेड आर्टवर्क इस्तेमाल कर रहे हैं, इन बहनों ने एक साहसिक और उम्मीदों के विपरीत राह चुनी- हर चित्र अपने हाथों से बनाया। इस महीने की शुरुआत में उनके इस ‘लिविंग रूम स्ट्रेस-बस्टर’ ने एक लाख डॉलर (करीब 95.45 लाख रुपए) से ज्यादा का रेवेन्यू कमाया। 40 देशों में इस गेम के खरीदार हैं।

फंडा यह है कि जब आप अपने फन को इनोवेटिव बनाते हैं, विचारों को डॉक्यूमेंट में उतारते हैं और उन्हें ऑनलाइन शेयर करते हैं, साथ ही मानते हैं कि आपकी कल्पना महज समय बिताने का साधन नहीं बल्कि एक संभावित सम्पत्ति है तो कोई साधारण-सा खेल भी ग्लोबल बिजनेस का बीज बन सकता है।

23/07/2026

इंसानियत वो कमा सकती है, जो कोई अपने पूरे जीवन में नहीं कमा सकता

सिडनी के बॉन्डी बीच पर दिसंबर, 2025 में जब आतंकवादी हमला हुआ तो वहां माैजूद हैदराबाद निवासी 37 वर्षीय रहमत पाशा भागे नहीं, जबकि उनके पास वाहन था। इस हमले में 15 लोग मारे गए, जबकि 40 घायल हुए थे। पाशा न तो पुलिस अधिकारी थे और न ही पैरामेडिक। लेकिन उस दिन यह कैब ड्राइवर उम्मीद की किरण बन गया। बाद में समाचारों में आया कि वे न केवल गोलियों से बचे, बल्कि कई गंभीर घायलों के पास पहुंचे, उन्हें एंबुलेंसों तक पहुंचाया और 18-20 लोगों की जान बचाई। पाशा ने घबराए लोगों की सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने में भी मदद की। यह करते हुए उन्होंने खुद के डर को किनारे रखा और सदमे में आए लोगों की बातें भी धैर्य से सुनीं।
इस बुधवार खबर आई कि ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने उन्हें स्थायी निवास की अनुमति दी है। उसके साथ पत्नी और तीन बच्चे भी अब वहां रह सकेंगे। सरकार ने यह भी तय किया है कि उस दिन उन्होंने जो कैप पहनी थी, वह सिडनी म्यूजियम में प्रदर्शित की जाएगी। उन्हें कई बहादुरी पुरस्कारों के लिए भी नॉमिनेट किया गया है।
मेरे लिए यह महज साहसिक कहानी नहीं है। यह एक ऐसे वेल-परफॉर्मिंग लीडर की कहानी है, जिसने ‘CARE’ के साधारण सबक से बहुत-से लोगों को मैनेजमेंट का पाठ पढ़ाया। मैं कहूंगा कि पाशा में वेल-परफॉर्मिंग लीडर के सभी गुण मौजूद थे। यह बात अलग है कि हालात ने उन्हें टैक्सी ड्राइवर बना दिया। एक वेल-परफॉर्मिंग लीडर हमेशा जानता है कि अकसर लोग इसलिए विफल नहीं होते क्योंकि उनमें क्षमता की कमी होती है। याद रखिए, वे पर्यटक भागने या हमलावरों को काबू करने में सक्षम थे। लेकिन वे इसलिए संघर्ष कर रहे थे, क्योंकि शायद उन्हें अपने और खुद को सफलतापूर्वक बचाने के बीच कुछ बाधाएं नजर आ रही थीं। पाशा ने वही बाधाएं देखीं। किसी अपेक्षा और तारीफ की चाह के बिना उन्होंने चुपचाप लोगों को बचाने में मदद की। उनका ‘CARE’ का सबक हमें चार बातें सिखाता है।
1. C: कनेक्टिंग योरसेल्फ विद द नीड : अच्छे लीडर पहले 360 डिग्री पर हालात का विश्लेषण करते हैं और कार्रवाई से पहले समझते हैं कि उन्हें कैसे काम करना चाहिए। फुटबॉल खिलाड़ी मेस्सी से जुड़े आंकड़े याद करें। मैच में वह 83% समय मैदान पर चलते रहते हैं, जबकि बाकी खिलाड़ी दौड़ रहे होते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि वह गेंद को गोलपोस्ट में धकेलने से पहले विपक्षी खिलाड़ियों का 360 डिग्री पर जायजा लेते हैं।
2. A: अडाप्टेशन टु द सिचुएशन : कोई टैक्सी ड्राइवर चाहता तो किसी यात्री को घर छोड़कर अतिरिक्त पैसे कमा सकता था। लेकिन पाशा जानते थे कि उन्हें लोगों की जान बचानी है। इसलिए वे बार-बार लौटते रहे और कई लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। अच्छे लीडर हमेशा समझते हैं कि अलग-अलग लोगों को विभिन्न परिस्थितियों में अलग तरह की मदद की जरूरत होती है। इसीलिए लीडर को हर परिस्थिति के लिए अलग नजरिया चाहिए होता है। सरल शब्दों में अच्छा लीडर खुद को हालात के मुताबिक ढालता है।
3. R: रिमूव बैरियर्स : पाशा ने तत्काल हमलावरों की बाधाओं को पार किया और घायलों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। अच्छे लीडर कर्मचारियों और लक्ष्यों के बीच मौजूद बाधाओं को पहचानते हैं और उन्हें हटाने की कोशिश करते हैं।
4. E: एनेबल सक्सेस : उस कठिन समय में पाशा ने लोगों का हौसला बढ़ाने के लिए कई तरीके से मदद की। अच्छे लीडर हर समस्या खुद हल नहीं करते। वे रुकावटों को हटाते हैं, ताकि लोग खुद अपनी समस्या हल कर सकें।
बॉन्डी बीच जैसे हर हिंसक हमले को उसमें जान गंवाने वाले मासूम लोगों के लिए याद किया जाएगा। लेकिन ये हमले असाधारण काम करने वाले साधारण लोगों के लिए भी उतने ही याद किए जाते हैं- गोलीबारी की ओर दौड़ते पुलिस अधिकारी, अपने सर्फबोर्ड को स्ट्रेचर में बदलने वाले लाइफसेवर्स, आतंकवादी को निहत्था करने वाला कोई दुकानदार और वो भारतीय कैब ड्राइवर, जिसने टैक्सी को कमाने के लिए नहीं, बल्कि लोगों की जान बचाने के लिए इस्तेमाल किया।

फंडा यह है कि नफरत सुर्खियां बना सकती है, लेकिन अच्छे लीडर इंसानियत के जरिए ऐसी कहानियां लिखते हैं, जो लंबे समय तक याद की जाती हैं। वे अपने कर्मचारियों की परवाह करके उन्हें वर्कप्लेस पर बेहतर प्रदर्शन करने में मदद भी करते हैं।

22/07/2026

इतिहास बोझ नहीं, बल्कि एक विरासत है

जब भी मैं मेहमानों को मुंबई के अंधेरी-कुर्ला रोड लेकर जाता हूं तो बताता हूं कि 1940 से 1980 के दशक तक यह इलाका बॉम्बे (अब मुंबई) के सबसे व्यस्त फिल्म निर्माण केंद्रों में से एक हुआ करता था। मोहन स्टूडियो में मुगल-ए-आजम, देवदास और बंदिनी जैसी महान फिल्में शूट हुई थीं। मुगल-ए-आजम के लिए के. आसिफ ने यहां लाहौर किले की तर्ज पर आइकनिक शीश महल का सेट बनवाया था। करीब 150 फीट × 80 फीट × 35 फीट का यह सेट बनाने में दो साल लगे, जिसमें फिरोजाबाद के कारीगरों द्वारा तैयार बेल्जियम ग्लास के हजारों टुकड़े लगाए गए थे। 1950 के दशक के आखिर में बने इस सेट पर 15 लाख रुपए से अधिक खर्च हुए, जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी। लेकिन जब मैं उन्हें यह विडंबना बताता हूं कि उस स्टूडियो में महिलाओं के लिए ढंग का वॉशरूम तक नहीं था, तो वे मेरी ओर संदेह से देखते हुए सोचते हैं कि ऐसा कैसे संभव है। वे हमेशा पूछते हैं कि जो स्टूडियो मैनेजमेंट सेट पर इतना खर्च कर सकता था, वह उन अभिनेत्रियों के लिए टाॅयलेट क्यों नहीं बनवा सका, जिनके कारण थिएटरों में भीड़ उमड़ती थी।
फिर मैं उनसे कहता हूं कि अभिनेत्री वहीदा रहमान के बारे में सर्च करो, जो बताती थीं कि वे शूटिंग के दौरान पानी पीने से बचती थीं। आशा पारेख ने भी एक बार कहा कि वह भाग्यशाली रहीं, जो लंबे शूटिंग शेड्यूल के दौरान लगातार वॉशरूम जाने को टालती थीं, लेकिन उन्हें कभी किडनी की समस्या नहीं हुई। रेणुका शहाणे ने भी कहा था कि 1990 के दशक में भी फिल्म सेटों पर कई महिलाएं पानी पीने से बचती थीं, क्योंकि वहां वॉशरूम गंदे और इस्तेमाल लायक नहीं होते थे। सिनेमाई भव्यता और अभिनेत्रियों की इन कठिनाइयों के विरोधाभास को सुनने के बाद मेहमान पूछते हैं कि ‘क्या हम वह स्टूडियो देख सकते हैं?’ दुर्भाग्य से मैं उन्हें उस दौर की एक ईंट तक नहीं दिखा सकता। स्टूडियो गायब हो चुका है और उसकी जगह अब रिहायशी इमारतें हैं। मैं बात को यह कह कर खत्म करता हूं कि ‘जब कोई स्टूडियो खत्म होता है तो उसके साथ भारतीय सिनेमा का एक पूरा चैप्टर समाप्त हो जाता है और इतिहास का एक हिस्सा भी भुला दिया जाता है।’
मंगलवार को मेरे साथ वेस्ट शिकागो से आए मेहमान थे। उन्होंने तुरंत कहा, ‘भगवान का शुक्र है कि इलिनॉय में लंबे समय से उपेक्षित पड़े 1913 में बने एक कमरे वाले स्कूल को आखिरकार सुधारा जा रहा है। अब वहां जिले के इंस्ट्रक्शनल कोच बैठेंगे, जो टीचिंग और लर्निंग में स्थानीय स्कूलों की मदद करेंगे।’ यह स्कूल अब एक जीवंत एजुकेशनल रिसोर्स बनेगा, जिससे युवा शिक्षक समझ सकेंगे कि कभी अमेरिका में आम रहे एक कमरे वाले स्कूल वास्तव में कैसे दिखते थे। एक एकड़ से भी कम जमीन पर फैली यह इमारत अब महज इतिहास की किताबों में दर्ज होकर नहीं रह जाएगी, बल्कि भावी शिक्षकों को शिक्षण के विकास के बारे में बताती रहेगी।
हाल ही में दिल्ली यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात साउथ एक्सटेंशन के एक स्थानीय इतिहासकार से हुई। उन्होंने एक रोचक किस्सा सुनाया कि उनके इलाके का यह नाम कैसे पड़ा। उनके अनुसार इस कॉलोनी का नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि इसे कनॉट प्लेस के आसपास ब्रिटिशों द्वारा बसाई गई नई दिल्ली के दक्षिणी एक्सटेंशन के तौर पर विकसित किया गया था। हालांकि इसका कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है, लेकिन कई लोगों का मानना है कि इसका नाम उसी भौगोलिक क्षेत्र से आया है, जहां कभी ‘साउथ-एंड रोड’ नामक सड़क हुआ करती थी। चूंकि बाद में उस सड़क का नाम पीलू मोदी रोड कर दिया गया तो इससे एक पेचीदा ऐतिहासिक डिस्कनेक्ट पैदा हो गया। आने वाली पीढ़ियां साेच सकती हैं कि क्यों किसी इलाके का नाम ‘साउथ एक्सटेंशन’ रखा गया होगा, जबकि जहां से इसका विस्तार शुरू हुआ, उसके आसपास मिलते-जुलते नाम की काेई जगह है ही नहीं। ऐसे में इस नाम के पीछे का भौगोलिक तर्क कम स्पष्ट हो जाता है और पुराने नक्शों, ऐतिहासिक रिकॉर्ड या इस विषय पर किताबें लिखने वाले इतिहासकारों के बिना दिल्ली के शहरी विकास को समझ पाना मुश्किल हो जाता है। जब पुरानी इमारतें तोड़ी जाती हैं या ऐतिहासिक नाम गायब हो जाते हैं तो हम केवल ईंटें, सड़कें या लैंडमार्क्स ही नहीं खाेते, बल्कि हमारे शहरों, संस्थाओं और पहचान के विकास को समझाने वाली कहानियों को भी मिटा देते हैं।

फंडा यह है कि इतिहास कोई बोझ नहीं है, जिसे ढोना पड़े। यह एक विरासत है, जिसे भावी पीढ़ियों के लिए सहेज कर रखना चाहिए।

21/07/2026

हर विषय अपना खुद का ‘लिविंग म्यूजियम’ बना सकता है

स्कूली बच्चों के लिए 12वीं कक्षा तक अधिकांश उच्च शिक्षण लगभग अनदेखे ही रहते हैं। आमतौर पर वे एडमिशन के समय ही वहां पहली बार जाते हैं। कल्पना कीजिए कि ये बच्चे 5वीं कक्षा से या उससे भी पहले कॉलेज कैंपस जाने लगें। आप पूछ सकते हैं कि उन्हें क्यों जाना चाहिए? मेरा जवाब होगा, म्यूजियम देखने के लिए। सोच रहे हैं कि कॉलेज या यूनिवर्सिटी का म्यूजियम से क्या लेना-देना? तो इसका जवाब यहां है।
अगर आप कुछ शहरी बच्चों से पूछें कि सब्जियां कहां से आती हैं? तो वे मासूमियत से रेफ्रिजरेटर की ओर इशारा कर सकते हैं, या कह सकते हैं कि सुपरमार्केट से अथवा विभिन्न एप्स के डिलीवरी बॉय के जरिए। लेकिन अगर आपने बेंगलुरु के गांधी कृषि विज्ञान केंद्र में कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर द्वारा बनाए गए क्रॉप म्यूजियम को देखा है तो जवाब कुछ और होगा। यह विजिट ऐसा कुछ कर सकती है, जिसे हासिल करने के लिए पाठ्यपुस्तकें अब भी संघर्ष कर रही हैं। आप भी मानेंगे कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के चलते हमारे बच्चों में भाेजन के उत्पादन और खपत को लेकर समझ कम होती जा रही है। सब्जियों को सिर्फ डाइनिंग टेबल पर देखने के बजाय इस म्यूजियम में बच्चे उनके बीच चल सकते हैं। वे टमाटर का पौधा छू सकते हैं, पत्तेदार सब्जियां तोड़ सकते हैं और समझ सकते हैं कि भोजन वहां पैदा नहीं होता, जहां वो सोचते हैं। धीरे-धीरे उन्हें यह तथ्य पता चलता है कि इसकी शुरुआत मिट्टी, बीज, धूप, पानी और किसानों की अथक मेहनत से होती है।
बच्चे यहां पूरी भोजन यात्रा को समझ सकते हैं- बीज चयन और बुवाई से लेकर सिंचाई, परागण, कटाई, स्टोरेज, परिवहन और आखिर में रसोई तक। इस दौरान वे केंचुओं, मधुमक्खियों, कंपोस्ट पिट्स, औषधीय पौधों और देशी फसल किस्मों से भी परिचित होते हैं। ऐसा अनुभव बिना किसी परीक्षा के बायोलॉजी, इकोलॉजी, न्यूट्रिशन और इकनॉमिक्स सिखाता है। अब सवाल यह है कि यूनिवर्सिटी और कॉलेज सिर्फ क्रॉप म्यूजियम तक ही क्यों रुकें?
कोई इंजीनियरिंग कॉलेज इनोवेशन प्लेग्राउंड बना सकता है, जहां बच्चे साइकिल चलाकर बिजली पैदा करें, छोटे पुल बनाएं, वाॅटर पंप चलाएं, उपकरणों के साथ प्रयोग करें और व्यवहारिक एक्जिबिट्स के जरिए रोबोटिक्स को समझें। तब फिजिक्स डरावना नहीं, बल्कि मजेदार विषय बन जाएगा।
कोई मेडिकल कॉलेज हार्ट, लंग्स और ब्रेन के विशाल वॉक-थ्रू मॉडलों वाला ह्यूमन बॉडी डिस्कवरी सेंटर बना सकता है। इंटरैक्टिव डिस्प्ले के जरिए हैंड हाइजीन, न्यूट्रिशन, वैक्सिनेशन, फर्स्ट-एड और ऑर्गन डोनेशन जैसी बातें सिखाई जा सकती हैं। तब बच्चे अस्पतालों से डरने के बजाय यह समझेंगे कि उनका शरीर कैसे काम करता है।
लॉ यूनिवर्सिटीज एक कॉन्स्टिट्यूशन म्यूजियम बना सकती हैं, जहां युवा मॉक कोर्ट, चिल्ड्रंस पार्लियामेंट और अधिकारों व दायित्वों की बहसों में हिस्सा लें। लोकतंत्र, अभ्यास के जरिए ही सबसे बेहतर समझ में आता है।
बिजनेस स्कूल एक आंत्रप्रेन्योरशिप म्यूजियम बना सकते हैं, जो असाधारण उद्यम खड़े करने वाले आम भारतीयों की कहानियां बताए। मसलन, कैसे एक सड़क किनारे का छोटा फूड स्टॉल बड़ी रेस्तरां चेन में बदल गया या ग्रामीण महिलाओं ने कैसे सफल सहकारी संस्थाएं बनाईं। यहां बच्चे मिनिएचर बिजनेस चलाना, बजटिंग करना और यह भी सीख सकते हैं कि आइडिया कैसे कंपनी में बदलते हैं।
यह आइडिया नया नहीं है। कई उदाहरण पहले से मौजूद हैं। मसलन, अमेरिका में सैन फ्रांसिस्को के एक्सप्लोरेटोरियम में लाइट, साउंड, मोशन, ह्यूमन बिहेवियर और इंजीनियरिंग से जुड़े सैकड़ों इंटरैक्टिव एक्जिबिट्स के जरिए बच्चे रटने के बजाय सवाल पूछकर सीखते हैं। यूके के हैलिफैक्स स्थित नेशनल चिल्ड्रन्स म्यूजियम में विजिटर्स चौकोर पहियों वाली साइकिल चलाते हैं, जियोमेट्रिक स्ट्रक्चर बनाते हैं, विशाल पजल्स सुलझाते हैं और प्रकृति व आर्किटेक्चर में छिपे पैटर्न खोजते हैं। गणित को महज फॉर्मूलाें का संग्रह मानने के बजाय यह म्यूजियम बताता है कि संख्याएं कैसे खेल, संगीत, इंजीनियरिंग, फाइनेंस और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं। एक और मजबूत उदाहरण टोक्यो स्थित पासोना ग्रुप है, जिसने दुनिया से सबसे अनोखे कार्यस्थलों में से एक बनाया है। उसकी ऑफिस बिल्डिंग में चावल के खेत, वेजिटेबल गार्डन, फलों वाले पेड़ और हाइड्रोपोनिक फार्म्स बनाए गए हैं।

फंडा यह है कि जब कॉलेज ऐसे अनुभव देने वाले म्यूजियम बनाएंगे, जहां स्कूली बच्चे एक दिन के लिए पेशेवरों की भूमिका का अनुभव खुद कर सकें तो यकीन मानिए स्कूली बच्चों के लिए कॉलेज सबसे पसंदीदा जगह बन जाएंगे।

21/07/2026

लग्जरी हमेशा डिग्निटी से जुड़ी हुई रहती है

जब कोई मेहमान होटल का सामान छिपाकर अपने बैग में रख लेता है तो कई हॉस्पिटैलिटी ब्रांड सख्त प्रोटोकॉल के साथ प्रतिक्रिया देते हैं। लेकिन असली लग्जरी इस बात से तय नहीं होती कि कोई ब्रांड अपनी संपत्ति की सुरक्षा कैसे करता है, बल्कि इससे तय होती है कि वह अपने मेहमान की डिग्निटी कैसे बचाए रखता है। इस फिलॉसफी का उत्कृष्ट उदाहरण मुंबई की ओबेरॉय प्रॉपर्टी में तब देखने को मिला, जब विजनरी होटेलियर बीआरएस ‘बिकी’ ओबेरॉय रिसेप्शन के पास अपने एक सहयोगी से बातचीत कर रहे थे और वहीं एक विदेशी मेहमान चेक-आउट कर रही थीं। जैसे ही उन्होंने बिल चुकाने के लिए पर्स खोला, होटल में आधे इस्तेमाल किए हुए शैम्पू और लोशन की छोटी बोतलें काउंटर पर गिर पड़ीं। मेहमान ठिठक गईं। पकड़े जाने की शर्मिंदगी चेहरे पर साफ दिख रही थी। लेकिन बिकी ने उन्हें नजरअंदाज करने या असहज स्थिति में ही छोड़ देने के बजाय अपने स्टाफ को निर्देश दिया कि मेहमान को अच्छे-से पैक की गई प्रीमियम स्किनकेयर उत्पादों की बास्केट गिफ्ट की जाए।
यह मशहूर घटना इंडस्ट्री के लिए कालजयी सबक मानी जाती है : जब कोई ग्राहक आपकी प्रॉपर्टी से कुछ ले जाए तो उसे चोरी मानने के बजाय लगाव की अभिव्यक्ति की तरह देखना टकराव की संभावित स्थिति को जीवनभर की ब्रांड लॉयल्टी में बदल सकता है। इसी नैरेटिव को कॉर्पोरेट सर्विस हैंडबुक्स और बिजनेस केस स्टडीज में काफी विस्तार से बताया गया है, खासकर ओबेरॉय सेंटर ऑफ लर्निंग एंड डेवलपमेंट के ट्रेनिंग करिकुलम में। इसे ओबेरॉय एम्पावर प्रोग्राम की बुनियाद के तौर पर पढ़ाया जाता है। यहां तक कि हार्वर्ड बिजनेस स्कूल जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं ने भी इस पर केस स्टडी प्रकाशित की है कि यह ब्रांड अत्यधिक ऑपरेशनल इफिशियंसी और इस स्तर की संवेदनशीलता के बीच कैसे संतुलन बनाता है। मैंने स्वयं 1990 में इंडियन एक्सप्रेस में काम करते हुए इस बेहद भावुक कर देने वाली घटना को कवर किया था।
सोमवार सुबह अत्यधिक सहानुभूति भरी यह कहानी मुझे तब याद आई, जब मैंने उसी अखबार में यह चौंकाने वाला आंकड़ा पढ़ा कि भारतीय रेलवे में एसी कोच के हर 1000 में से एक यात्री अपने बेडरोल का कम से कम एक सामान साथ ले जाता है। चाहे वह बेडशीट, कंबल, पिलो, पिलोकवर हो या फिर फेस टॉवल। सूचना के अधिकार पर आधारित एक रिपोर्ट दिल तोड़ने वाला यह खुलासा करती है कि बीते चार वर्षों में रेलवे यात्री कुल 1.27 करोड़ चीजें अपने साथ ले जा चुके हैं।
अपने ट्रेवल सॉवेनियर इकट्‌ठे करने वाले यात्रियों को समझना चाहिए कि भारतीय रेलवे कोई ओबेरॉय होटल नहीं है और ट्रेन की चुराई गई बेडशीट शैम्पू की कॉम्प्लीमेंट्री बोतल नहीं है। इन चीजों को ले जाने वालों को ठहरकर सोचना चाहिए कि उनके सफलतापूर्वक निकल जाने के बाद वास्तव में होता क्या है। जब ट्रेन अंतिम स्टेशन पर पहुंचती है और सामान की गिनती मेल नहीं खाती तो भारतीय रेलवे ठेकेदार पर जुर्माना लगाती है। चूंकि गायब हुए सामान की मात्रा अधिक होती है तो ठेकेदार इस जुर्माने का बोझ सबसे निचले स्तर पर, यानी कोच अटेंडेंट पर डाल देता है।
ये अटेंडेंट्स रोजाना महज 700 रुपए कमाते हैं। यदि वे महीने के पूरे 30 दिन तक एक भी छुट्टी लिए बिना, परिजनों के पास जाए बगैर काम करें, तब भी उनकी कुल कमाई सिर्फ 21 हजार रुपए ही होती है। फिर भी, हर महीने उनकी तनख्वाह से 2 से 3 हजार रुपए तक काट लिए जाते हैं। यह गहरी आर्थिक चोट उन्हें सिर्फ इसलिए मिली, क्योंकि एसी ट्रेन का टिकट खरीद सकने वाले किसी व्यक्ति ने कपड़े का एक टुकड़ा चुराना पसंद किया। जरा कल्पना कीजिए उस मेहनतकश पिता, उसके परिवार और उसके न दिखने वाले आंसुओं के बारे में, जो हर माह पगार में तीन हजार रुपए कम लेकर घर लौटता होगा। उसने जैसी मांगी गई, वैसी सेवा दी लेकिन फिर भी किसी अनजान व्यक्ति के कारण उसे दंड मिला।

फंडा यह है कि अगली बार यात्रा के दौरान यदि हम किसी को ऐसे ‘सॉवेनियर’ साथ ले जाते देखें तो उसे समझाएं कि एक बेडशीट की कीमत कभी इतनी नहीं होती कि उसके लिए किसी गरीब की रोजी-रोटी छीन ली जाए।

21/07/2026

क्या भारतीय पैरेंटिंग किसी भी पश्चिमी शैली से अधिक बेहतर हो सकती है?

अमेरिका में 4 से 8 साल की उम्र के बच्चों पर साल भर तक चले एक लंबे अध्ययन में पाया गया कि जब श्वेत बच्चे टीवी प्रोग्राम्स में अलग-अलग नस्लों के लोगों को साथ देखते हैं तो इससे उनके मन में किसी के प्रति भेदभाव विकसित नहीं होता। इस सोमवार को जर्नल ऑफ अमेरिकन साइकोलॉजिस्ट्स में प्रकाशित एक न्यूज रिपोर्ट बताती है कि जिन टीवी प्रोग्राम्स में क्लासिज्म दिखता है, यानी मुख्य किरदार शाही घरानों से होते हैं और सहायक किरदारों को उनसे कम अमीर या कम समझदार दिखाया जाता है तो इससे बच्चों में भेदभाव विकसित हो सकता है।
इस खबर ने मुझे बचपन याद दिला दिया, जब हमारे पैरेंट्स अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं की ऐसी कहानियां सुनाते थे। इन कहानियों में वही कालजयी सीख होती थीं, जो आज आधुनिक रिसर्च में भी बताई जाती हैं। भेदभाव मिटाने वाली कुछ कहानियां यहां पेश हैं।
बड़े होकर श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बने, जबकि सांदीपनि ऋषि के आश्रम में उनके साथ ही पढ़ने वाले सुदामा गरीबी में जीवन बिताते थे। एक दिन बहुत संकोच के साथ सुदामा कृष्ण से मिलने पहुंचे और उनके पास केवल चिवड़े की पोटली थी। कृष्ण ने बड़े प्रेम से उनका स्वागत किया, गले लगाया और उन्हें अति-सम्मानित अतिथि का दर्जा दिया। सुदामा को शर्मिंदा किए बिना कृष्ण ने चुपचाप मित्र का जीवन बदल दिया। हमने सीखा : मित्रता सम्पत्ति से बड़ी होती है।
वृद्ध आदिवासी महिला शबरी वर्षों तक भगवान राम की प्रतीक्षा करती रहीं। राम के आने की उम्मीद में वह रोज जंगल में रास्ता साफ करती थीं। जब राम आए तो उन्होंने प्रेम से हर बेर को पहले चखकर देखा, ताकि सबसे मीठे फल ही उन्हें दे सकें। राम ने उन्हें खुशी-खुशी स्वीकार किया, क्योंकि उनके लिए वो प्रेम किसी भी शाही भोजन से अधिक मूल्यवान था। हमने सीखा : प्रेम की कोई मर्यादा नहीं होती।
याद करिए, हस्तिनापुर में दुर्योधन के भव्य भोज के निमंत्रण के बावजूद कृष्ण विदुर के साधारण घर में गए। वहां विदुर की पत्नी इतनी भावविह्वल हुईं कि उन्होंने फलों की जगह केले के छिलके ही परोस दिए। कृष्ण मुस्कुराए और उन्हें भी स्वीकार किया, क्योंकि वे सच्चे प्रेम से परोसे गए थे। हमने सीखा : प्रेम से भरा घर महल से अधिक समृद्ध होता है।
सत्यकाम ऋषि गौतम के गुरुकुल में पढ़ना चाहते थे। जब सत्यकाम से उनके परिवार के बारे में पूछा गया तो उन्होंने ईमानदारी से कहा कि उनकी मां को नहीं पता कि उनके पिता कौन थे। उनकी सत्यवादिता से प्रभावित ऋषि ने कहा कि इतनी ईमानदारी भरे शब्द कोई श्रेष्ठ व्यक्ति ही बोल सकता है और उन्हें अपना शिष्य बना लिया। हमने सीखा : ईमानदारी ही आपकी सबसे बड़ी पहचान है।
संत रविदास जूते बनाकर आजीविका चलाते थे, जिसे कई लोग छोटा काम मानते थे। लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता, विनम्रता और भक्ति ने उन्हें भारत के महान संतों में से एक बनाया। राजा, रानी और विद्वान उनसे मार्गदर्शन लेते थे, क्योंकि वे संत के चरित्र का सम्मान करते थे, पेशे का नहीं। हमने सीखा : हर पेशा सम्मान के योग्य है।
गुजरात के प्रिय संत-कवि नरसी मेहता ने भगवान और मानवता के प्रति समर्पित एक सरल जीवन जिया। उनका प्रसिद्ध भजन ‘वैष्णव जन तो’ सिखाता है कि श्रेष्ठ वही है, जो दूसरे का दु:ख समझे और बिना किसी प्रशंसा या पुरस्कार की अपेक्षा किए उसकी मदद करे। उनके जीवन ने पीढ़ियों को हर इंसान के प्रति करुणा रखना सिखाया। हमने सीखा : दूसरे का दर्द महसूस करिए।
भगवान विट्ठल के समर्पित भक्त होने के बावजूद संत चोखामेला को भेदभाव झेलना पड़ा और सामाजिक परंपराओं के कारण उन्हें अकसर मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता था। फिर भी उन्होंने आस्था नहीं छोड़ी। उनके भक्ति गीत इतने प्रभावशाली बने कि आज भी पंढरपुर वारी के लाखों श्रद्धालु उन्हें गाते हैं। हमने सीखा : भक्ति की कोई जाति नहीं होती।
राजा रंतिदेव की कहानी बताती है कि कई दिनों भूखे रहने के बाद भी उन्होंने अपना भोजन दूसरों को दिया। उनका मानना था कि जरूरतमंदों की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है। हमने सीखा : आपके पास थोड़ा हो, तब भी बांटिए और दया का कोई दर्जा नहीं होता।

फंडा यह है कि यदि हम बच्चों को सोने से पहले यह कहानियां वापस सुनाने लगें तो शर्तिया ही हम हमेशा दुनिया के सबसे अच्छे पैरेंट्स बने रहेंगे।

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