,Associate Professor,Deptt.of Maths

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DR. Vijay Pal Singh,M.Stat.,M.A.( Economics ) Ph.D.

Associate Professor,deptt.of Mathematics&Statistics in Agriculter faculty of R.S.M.CollegeDhampurOf M.J.P.Rohilkhand University,Barelly.Fond of playing Tenis

Photos from ,Associate Professor,Deptt.of Maths's post 17/09/2022

पितृ पक्ष में
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पितृ पक्ष में क्या करें, क्या ना करें प्रबुद्ध।
मन-वाणी अरु कर्म से,करके तन-मन शुद्ध।।

अंतर्मन से कर स्मरण,निज पितरों का मान।
जल-भोजन अर्पित करें,कर उनका आह्वान।।

हृदय धार मन से करें,भाव युक्त सत्कार।
उनके कृपा-प्रसाद का,लाख-लाख आभार।।

सकल पूर्वजों से यही,है इतना अनुरोध।
क्षमा,भूल हमको करें,बालक जान अबोध।।

आना, देने घर पुनः,आशिष का आभास।
स्वागत को तत्पर यहीं,सदा रहेगा दास।।

जन्म दिया,पालन किया,दिखलायी सत् राह।
तर्पण करने को प्रबल,वंश बेल की चाह।।

विजय

16/07/2020

प्रेम-दर्शन
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लिखना कैसे छोड़ दूँ,
प्रेम भाव के छंद।
बढ़ती वय का देें भले,
ताना साथी चंद।।
तन-मन मेें मेरे बसा,
आकर्षण अनुराग।
प्रेम सपन की सर्जना,
प्रेम विरह-वैराग।।
ना विलास ना भोग-पथ,
प्रेम, नेह विश्वास।
अंतर उर संबल सबल,
अंतर्मन की आस।।
बिना प्रेम की ओस के,
प्यासा आत्म चकोर।
प्रेम-सुधा की साध भर,
पल-पल करे विभोर।।
प्रथम प्रेम ममता सरस,
बचपन जीवे जीव।
दिशा दिखा सन्मार्ग की,
जीवन करे सजीव।।
यौवन-प्रेम-पियूष से,
पावन पाश अदेह।
आत्म मिलन अद्भुत अनस,
दिव्यम् दरस सदेह।।
दैहिक शोषण दनुजता,
पर इच्छा प्रतिकूल।
स्वर्गिक सुख संसर्ग मेें,
अनुशंसा अनुकूल।।
प्रेम-भाव अन्तर बसे,
साँस-साँस सरसाय।
कोई स्वीकारे सहज,
कोई मन सकुचाय।।
शुचि प्रेम शीतल सलिल, ,
जो बूढ़े सो जान।
तज पाना,हर पल करे,
अर्पित इच्छा, मान।।
प्रेम लहू की लालिमा,
जीवन नव संचार।
नेह बिना बोझिल लगे,
आत्म बोध का सार।।

'विजय'

02/07/2020

सुनो गौर से------!
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रोज चीन के उत्पातों का,
नया आकलन करने वालों।
देश विरोधी मनोभाव का,
दुश संचालन करने वालों।।
तुम्हें वास्ता भारत माँ के,अन्न- जल,मिट्टी- वायु का।
दूध पिया है अपनी माँ का,या फिर चीनी काऊ का।।
होता विश्वास नहीं तुम को,
सेना की गरिमा, गौरव पर।
क्यों नहीं गर्व से शीश उठे,
भारत जन नायक-सौरभ पर।।
कमनिस्टों के पिछलग्गू अब,तज दो वंदन चाऊ का।
तुम्हें वास्ता भारत माँ के,अन्न, जल, मिट्टी वायु का।।
जिन्हें नहीं होता है गौरव,
सैन्य शक्ति के संसाधन पर।
सैन्य बलों के राष्ट्र-प्रेम मय,
राष्ट्र-ध्वजा के अभिवादन पर।।
शर्मसार मत करो दरिन्दों,नाम कृष्ण बलदाऊ का।
तुम्हें वास्ता भारत माँ के,अन्न,जल,मिट्टी वायु का।।
शिनजिंपिंग के चमचों सुन लो,
बहुत हो चुकी गद्दारी अब।
शत्रु वंदना नित करते हो,
दिखलाओगे खुद्दारी कब।।
राजनीति में लुटा नाम अब,चाचा,पापा,ताऊ का।
तुम्हें वास्ता भारत माँ के,अन्न,जल,मिट्टी वायु का।।
राहुल गाँधी से मुक्त करो,
काँग्रेस जनित गठबंधन को।
मिला दिया मिट्टी में इसने,
गाँधी के कुशल प्रबंधन को।।
उसे देश हित से क्या मतलब,जो हो चाऊ-माऊ का।
तुम्हें वास्ता भारत माँ के,अन्न,जल,मिट्टी वायु का।
चीनी ऐप बंद क्या कर दी,
कराह उठे कुछ चीनी चींटे।
प्रतिबंधों का चला जो चाबुक,
सभी विरोधी मिल सिर पीटें।।
चीनी धन का हुआ खुलासा,पड़ गया चक्कर राहु का।
तुम्हें वास्ता भारत माँ के,अन्न, जल, मिट्टी वायु का।।
वहिष्कार कर चीनी चीजें,
देश-भक्ति कीअलख जगा दें।
अपना कर हम सर्व स्वदेसी,
अर्थ-तंत्र में प्राण जगा दें।।
सरकारी सहयोग बढ़ाता,स्तर अब धोबी-नाऊ का।
तुम्हें वास्ता भारत माँ के,अन्न,जल,मिट्टी वायु का।

'विजय'

09/06/2020

तुम्हारे जन्मदिन पर कुसुम
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सतरंगी किरणों सी आभा,
सौंदर्य कनक,अनुपम आनन।
मन सुधा, समर्पण संस्कार,
हर अभिलाषा का अनुपालन।।

जब से तुम पूरक बन आईं,
हर लक्ष्य हुआ साकार प्रिये!
कर दिया दीप्तिमय जीवन-पथ,
है अंतर उर आभार प्रिये !!

प्रिय तुम्हारे संग जीवन का,
हर पड़ाव था मधुर मनोहर।
यौवन का उन्माद असीमित,
आशाओं का अगम सरोवर।।

पारिवारिक संरचना संग,
संबंधों का सफल नियोजन।
नेह ,समर्पण,त्याग भाव से,
सामाजिक समरस संयोजन।।

उपलब्धि की हर पौड़ी पर,
एक सरीखी छाप पड़ी थी।
संग समन्वय ही से काटी,
जीवन में जो अशुभ घड़ी थी।।

आज तुम्हारे जन्म-दिवस पर,
अन्तर्मन सद्भाव समर्पित।
पुण्य कर्म अरु सुयश ,कीर्ति,
सकल सुवासित सौरभ अर्पित।।

इस अवसर पर,सब के सम्मुख,
स्वीकार मुझे हर अभियोजन।। प्रतिवाद क्षमा हों प्रिये सभी,
हैं सजल नयन आतुर तन मन।।

मन उदास, निस्तेज वदन पर-
सपनों का संसार सुहाना।
पीछे सुख, दुःख के सम साये,
आगे निर्जन पथ अंजाना।।

जीवन सरिता का सलिल शांत,
कब जा कर सागर खो जाए।
कल-कल निनाद की स्वर लहरी,
कब मौन अधर पर हो जाए।

इसलिए काव्य का कवच पहन,
शब्दों से सर्जित प्रणय प्रीत।
आभार, अनुग्रह , अनुलेपन,
हैं शुभाशिष हे मेरीे मीत!!

'विजय'

Photos from ,Associate Professor,Deptt.of Maths's post 18/02/2019

पुलवामा के शहीदों को श्रद्धाजंलि
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पुलवामा में खून बहाया,
चालिस वीर जवानों का।
कायर जैसी हरकत करके,
भागा सूकर, स्वानों सा।।

घात लगाकर हमला बोला,
भारत वीर सपूतों पर।
बहुत हुआ इतराना तेरा,
कायर क्रूर कपूतों पर।।

आँखों में अंगार लिए है,
भारत की संतान यहाँ।
बहु आयामी बार झेल अब,
पटते लख शमसान वहाँ।।

जल-थल,नभ क्या सभी ओर से,
अब मिसाइलें झेल जरा।
सात पुस्त पानी माँगेंगी,
तूने जो दुष्कर्म करा ।।

तुमने जितनी माँग उजाडी़,
भारत की अबलाओं की।
सपनों की हर आस तोड़ दी,
बाल और बालाओं की।।

आँखों में आँसू हैं तो क्या?
हर दिल तो सरफरोश है।
वंदेमातरम, जय हिंद का,
मातृ भूमि नमन घोष है।।

सुन इतनी बारूद फटेगी,
पाक तुम्हारी धरती पर।
घास तलक भी नहीं उगेगी।
तेरी बंजर धरती पर।।

बहुत हो चुका भाई चारा,
अब रण की तैयारी है।
तुझसे अब उम्मीद करें क्या,
तुझ में बस गद्दारी है।।
'विजय'

Photos from ,Associate Professor,Deptt.of Maths's post 01/01/2019

नव वर्ष 2019 पर अनंत शुभकामनाएँ
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बीता साल ,महीना बीता,
गया अठारह,उन्निस आया।
गए बरस की पीर भुला दो,
नया साल नव खुशियाँ लाया।।

सहनशीलता खोता मानव,
दानव बना घूमता निर्भय।
प्रेम-भाव संवेदन भूला,
भूल गया संस्कार समन्वय।।

द्वेष, दंभ, दुर्भाव त्याग कर,
पर हित,पर उपकार ध्येय हो।
जाति-पाति विद्वेष वंचना,
देश-प्रेम,मनु नेह श्रेय हो।।

हरित वसन शोभित यह बसुधा,
उर पर क्षीर नीर शुभ पावन।
प्रेम- भाव- रोली अक्षत से,
सोहे भाल मनुज,मन भावन।।

नव सर्जन,शुभ अर्जन का पथ,
श्रम,सत्यम्, सन्मार्ग शिवम् हो।
त्याग-भाव, संकल्प अमल सब,
निश्चय दृढ़ ,मन-दिशा प्रियम् हो।।

संचित कर ऊर्जा तन-मन से,
श्रेय, प्रेय, सद्भाव, समर्पण।
सत्य पंथ उपकार भाव से,
सकल मानवी हित सब अर्पण।।

सकल मनोरथ,श्रेष्ठ भाव सब,
पूर्ण होय, हो सफल साधना।
नया वर्ष हो शुभ हितकारी,
शुभमकामना, शुभमकामना।।
विजय

07/09/2017

पितृ पक्ष में
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पितृ पक्ष में क्या करें, क्या ना करें प्रबुद्ध।
मन-वाणी अरु कर्म से,करके तन-मन शुद्ध।।

अंतर्मन से कर स्मरण,निज पितरों का मान।
जल-भोजन अर्पित करें,कर उनका आह्वान।।

हृदय धार मन से करें,भाव युक्त सत्कार।
उनके कृपा-प्रसाद का,लाख-लाख आभार।।

सकल पूर्वजों से यही,है इतना अनुरोध।
क्षमा,भूल हमको करें,बालक जान अबोध।।

आना, देने घर पुनः,आशिष का आभास।
स्वागत को तत्पर यहीं,सदा रहेगा दास।।

जन्म दिया,पालन किया,दिखलायी सत् राह।
तर्पण करने को प्रबल,वंश बेल की चाह।।

विजय

शीर्षक-रहित चित्रावली 05/06/2012

पुत्र एवं पुत्रवधू

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