09/12/2022
व्याख्यान : "अध्यात्मिकता बनाम आधुनिकता"
मुख्यवक्ता : माननीय एम. हनुमंतराव जी, उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी
आध्यात्मिकता बनाम आधुनिकता
आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, पटना के भौगोलिक अध्ययन केन्द्र में आध्यात्मिकता बनाम आधुनिकता पर शैक्षणिक एवं सूचनात्मक व्याख्यान का आयोजन किया गया ।जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में माननीय एम. हनुमंतराव जी, उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी उपस्थित थे। अपने व्याख्यान में उन्होने संगठन के महत्व को समझाते हुए बताया कि विभिन्न विचारधारा वाले लोगों के द्वारा संगठन मे आने पर इनकी ऊर्जा और चेतना का प्रवाह एक ही लक्ष्य को पाने के लिए बेहतरीन तरीके से अग्रसर होता हैं । विचारों की शक्ति पर बल देते हुए उन्होंने कहा- "यथा दृष्टि तथा सृष्टि" अर्थात हमारा विचार जिस प्रकार का होता है हमारा वातावरण हमें वैसा ही नजर आता है। उन्होने आध्यात्म की दिशा में अग्रसर होने के क्रम में व्यक्ति के अहंकार विहीन (निरहंकार), ममंकार रहित तथा मोहविहिन होने की आवश्यकता को जरूरी बताया। आध्यात्म के प्रकटीकरण के साधन के रूप में सेवा को महत्वपूर्ण बताया । उनके अनुसार आध्यात्म का उद्देश्य लोकहित या जनहित होना चाहिए। हमें इसकी अक्षुण्णता बनाए रखने के लिए शिक्षा के साथ मूल्यों के समावेशन पर बल देना होगा। शिक्षा, सत् चरित्र का समावेश आवशयक है अन्यथा शिक्षा विध्वंशकरी हो जाती है । आधुनिकीकरण वर्तमान विश्व की आवश्यकता है परंतु आज के समय में आध्यात्म में आधुनिकरण को नहीं बल्कि आधुनिकरण में आध्यात्म को लाना हैं ।
भौगोलिक अध्ययन केन्द्र की निदेशक प्रोo पूर्णिमा शेखर सिंह द्वारा भी अपना मत व्यक्त करते हुए बताया कि आध्यात्म समाज में जीने का तरीका बताता है।आध्यात्मिकता मनुष्य के जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि यह मनुष्य के आतंरिक दुनिया और बाह्य दुनिया, दोनों में एकात्मकता स्थापित करती है। इस तरह मनुष्य के जीवन और प्रकृति जिसमें मनुष्य रहता है; दोनों में सकारात्मक तारतम्य बना रहता है। आज का जो आधुनिक दौर है, इसमें हम केवल बाहर की ओर देखते है, अपने अन्तः मन में किसी को झाकने की फुरसत नहीं है और इसका नतीजा हमें कई दुष्परिणामों के रूप में देखने को मिलता हैं, जैसे: प्राकृतिक असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग, समाज में बढ़ती हुई हिंसा, बाढ़, सुखाड़, आदि। यदि हम अपने आंतरिक मन से जुड़े रहे तो हमारे जीवन में स्थिरता और संतुलन बना रहेगा और हमारी मानसिक शांति स्थापित होगी। सब चीजों को ज़्यादा बारीकी से और ज़्यादा स्पष्ट रूप से विश्लेषण कर मनुष्य आपने जीवन में संतुलित निर्णय लेने में सक्षम हो सकता हैं ।जिसका परिणाम मनुष्य और प्रकृति के लिए अवश्य ही अच्छा होगा। इनके आभाव में ही हमें कई तरह की विसंगति झेलनी पड़ रही है और मानवता अपने विनाश के कगार पर पहुंचा चुकी हैं।
आध्यात्मिकता बनाम आधुनिकता
आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, पटना के भौगोलिक अध्ययन केन्द्र में आध्यात्मिकता बनाम आधुनिकता पर शैक्षणिक एवं सूचनात्मक व्याख्यान का आयोजन किया गया ।जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में माननीय एम. हनुमंतराव जी, उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी उपस्थित थे। अपने व्याख्यान में उन्होने संगठन के महत्व को समझाते हुए बताया कि विभिन्न विचारधारा वाले लोगों के द्वारा संगठन मे आने पर इनकी ऊर्जा और चेतना का प्रवाह एक ही लक्ष्य को पाने के लिए बेहतरीन तरीके से अग्रसर होता हैं । विचारों की शक्ति पर बल देते हुए उन्होंने कहा- "यथा दृष्टि तथा सृष्टि" अर्थात हमारा विचार जिस प्रकार का होता है हमारा वातावरण हमें वैसा ही नजर आता है। उन्होने आध्यात्म की दिशा में अग्रसर होने के क्रम में व्यक्ति के अहंकार विहीन (निरहंकार), ममंकार रहित तथा मोहविहिन होने की आवश्यकता को जरूरी बताया। आध्यात्म के प्रकटीकरण के साधन के रूप में सेवा को महत्वपूर्ण बताया । उनके अनुसार आध्यात्म का उद्देश्य लोकहित या जनहित होना चाहिए। हमें इसकी अक्षुण्णता बनाए रखने के लिए शिक्षा के साथ मूल्यों के समावेशन पर बल देना होगा। शिक्षा, सत् चरित्र का समावेश आवशयक है अन्यथा शिक्षा विध्वंशकरी हो जाती है । आधुनिकीकरण वर्तमान विश्व की आवश्यकता है परंतु आज के समय में आध्यात्म में आधुनिकरण को नहीं बल्कि आधुनिकरण में आध्यात्म को लाना हैं ।
भौगोलिक अध्ययन केन्द्र की निदेशक प्रोo पूर्णिमा शेखर सिंह द्वारा भी अपना मत व्यक्त करते हुए बताया कि आध्यात्म समाज में जीने का तरीका बताता है।आध्यात्मिकता मनुष्य के जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि यह मनुष्य के आतंरिक दुनिया और बाह्य दुनिया, दोनों में एकात्मकता स्थापित करती है। इस तरह मनुष्य के जीवन और प्रकृति जिसमें मनुष्य रहता है; दोनों में सकारात्मक तारतम्य बना रहता है। आज का जो आधुनिक दौर है, इसमें हम केवल बाहर की ओर देखते है, अपने अन्तः मन में किसी को झाकने की फुरसत नहीं है और इसका नतीजा हमें कई दुष्परिणामों के रूप में देखने को मिलता हैं, जैसे: प्राकृतिक असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग, समाज में बढ़ती हुई हिंसा, बाढ़, सुखाड़, आदि। यदि हम अपने आंतरिक मन से जुड़े रहे तो हमारे जीवन में स्थिरता और संतुलन बना रहेगा और हमारी मानसिक शांति स्थापित होगी। सब चीजों को ज़्यादा बारीकी से और ज़्यादा स्पष्ट रूप से विश्लेषण कर मनुष्य आपने जीवन में संतुलित निर्णय लेने में सक्षम हो सकता हैं ।जिसका परिणाम मनुष्य और प्रकृति के लिए अवश्य ही अच्छा होगा। इनके आभाव में ही हमें कई तरह की विसंगति झेलनी पड़ रही है और मानवता अपने विनाश के कगार पर पहुंचा चुकी हैं।